कृति - भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् modern sanskrit literature in india:A Bird's eye view
कृतिकार - शुभ्रजित् सेन
विधा - आलोचना
प्रकाशक - संस्कृत पुस्तक भण्डार, कोलकत्ता
प्रकाशन वर्ष - 2019
संस्करण - प्रथम
पृष्ठ संख्या - 504
अंकित मूल्य - 600/-
आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्यन्त विस्तृत है। न केवल मात्रात्मक अपितु गुणात्मक दृष्टि से भी संस्कृत का आधुनिक साहित्य प्रकर्ष पर है। इसके परिचय के लिए कई ग्रन्थ भी लिखे गए है, यथा हीरालाल शुक्ल, केशवराव मुसलगांवरकर, श्रीधरभास्कर वर्णेकर, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी, मंजुलता शर्मा आदि द्वारा लिखे गए ग्रन्थ। आधुनिक संस्कृत साहित्य के विहंगावलोकन के लिए युवा विद्वान् शुभ्रजित् सेन द्वारा भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् यह ग्रन्थ लिखा गया है। ग्रन्थ संस्कृत भाषा में ही लिखा गया है।
प्रस्तुत ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है-
प्रथम अध्याय - आधुनिकतायाः तत्स्वरूपं च
इस अध्याय में आधुनिकता की परिभाषाएं देते हुए अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के काल विभाजन पर भी विचार किया गया है। यहां भारतीय विद्वानों के मतों के साथ-साथ पाश्चात्य विद्वानों के मतों का भी उल्लेेख करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि आधुनिकता न केवल कालगत है और न केवल मनोभावगत है अपितु दोनों ही आधुनिकता के नियामक शक्तिरूप हैं- एतदाधुनिकत्वं न कालगतं किन्तु मनोभावगतमिति। किन्तु न हि केवलं मनोभावापरपर्यायमाधुनिकत्वं, समयनिष्ठमपीति। एतद्द्वयमाधुनिकसाहित्यस्य तथा संस्कृतसाहित्यस्यापि नियामकशक्तिरूपम्।
द्वितीय अध्याय - आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये वस्त्वाङ्गिकदृष्ट्या परिवर्तनम्
प्रस्तुत अध्याय में आधुनिक नाटक साहित्य, गद्य साहित्य तथा पद्य साहित्य में आये प्रमुख परिवर्तनों तथा नवीन प्रवृत्तियों का सोदाहरण उल्लेख किया गया है। आधुनिक संस्कृत नाटकों मे आये भाषागत परिवर्तनों, तकनीकि परिवर्तनों, वस्तुगत परिवर्तनों के साथ रंगमंच के परिवर्तनों पर भी चर्चा की गई है। नाट्य की एक प्रमुख विधा नृत्यनाटिका का भी यहां वर्णन किया गया है। रेडियो नाटक की चर्चा करते हुए राधावल्लभ त्रिपाठी कृत प्रेक्षणकसप्तकम् को इस विधा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किन्तु यह सही नहीं है। प्रेक्षणकसप्तकम् रेडियोनाटक न होकर नुक्कडनाटक विधा का ग्रन्थ है।
संस्कृत गद्यकाव्य की प्रवृत्तियों में प्रणयकथा, सामाजिक-कथा, लोककथा, हास्यकथा, चित्रकथा आदि के साथ उपन्यास नामक महत्त्वपूर्ण विधा का सोदाहरण वर्णन है। साथ ही ललितनिबन्ध नामक नवीन विधा पर चर्चा उपादेय है। संस्कृत कविता में हुए अन्तरंग और बहिरंग परिवर्तन, नवीन छन्द-प्रयोग, महाकाव्य विधा में हुए परिवर्तन जीवनीमूलक काव्य आदि के वर्णन से यह अध्याय महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
तृतीय अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतालंकारशास्त्रम्
काव्य की समीक्षा के लिए, उसके लक्षण, भेद, गुण-दोष आदि की चर्चा के लिए काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) रचे जाते रहे हैं, जो लेखक, समीक्षक और सहृदय पाठकों/श्रोताओं के लिए उपादेय होते हैं। चूंकि संस्कृत में नये काव्य लिखे जा रहे हैं तो तदनुरूप नवीन काव्यशास्त्र भी लिखे गए हैं। इस अध्याय में पण्डितराज जगन्नाथ के बाद से 21 वीं सदी तक लिखे गए महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों पर चर्चा की गई है। यहां अलंकारशास्त्री के परिचय के साथ उनके द्वारा लिखित अलंकारशास्त्र का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, यथा - रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत काव्यालंकारकारिका, अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत अभिराजयशोभूषणम्, राधावल्लभ त्रिपाठी कृत अभिनवकाव्यालंकारसूत्र, ब्रह्मानन्द शर्मा कृत रसालोचन।
चतुर्थ अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतेवाङ्मये छन्दसां वैचित्र्यम्
यद्यपि छन्द वैविध्य का वर्णन द्वितीय अध्याय में किया गया है किन्तु यहां पृथक् से उसका वर्णन विस्तार से किया गया है। मुक्तच्छन्द, हिन्दी भाषा के छन्द, हाइकु, सॉनेट, तांका, सीजो जैसे वैदेशिक छन्द आदि छन्दोवैविध्य की विशद चर्चा की गई है। साथ ही वीरेन्द्र भट्टाचार्य, कालीपद तर्काचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी के छन्द प्रयोग पर अलग से चर्चा की गई है। गौरतलब है कि सॉनेट छन्द प्रयोग में वीरेन्द्र भट्टाचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी ने विशेष रूप से काव्यसर्जन किया है। इसी तरह हर्षदेव माधव हाइकु, तांका और सीजो छन्दों के प्रयोग में विशेष रूप से जाने जाते हैं।
पंचम अध्याय - भारतवर्षे अर्वाचीनसंस्कृत वाङ्मय कवयितारः
प्रस्तुत अध्याय के चार दिशाओं के आधार पर चार भाग करके प्रत्येक दिशा में स्थित राज्यों का आधुनिक संस्कृत में किये गए योगदान का वर्णन किया गया है। उत्तरप्रदेश, हिमाचलप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि राज्यों के साहित्यकारों के योगदान के वर्णन के साथ त्रिपुरा, नागालैण्ड, मिजोरम जैसे राज्यों का संस्कृत साहित्य में योगदान का वर्णन इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है। उत्तरप्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के साहित्यिक योगदान को तो रेखांकित किया जाता रहा है किन्तु पूर्वोत्तर के इन राज्यों में संस्कत में क्या कार्य हो रहा है, इसकी चर्चा प्रायः उपलब्ध नहीं होती है।
षष्ठ अध्याय - बङ्गभूमेः अर्वाचीनसंस्कृतसाहित्यम्
यद्यपि पंचम अध्याय में बंगाल प्रदेश के येागदान पर चर्चा की जा सकती थी किन्तु लेखक ने इस प्रदेश के विस्तृत वर्णन के लिए पृथक् से अध्याय रखा है। ब्राह्मण-वशिष्ठ न्याय से हुए इस उल्लेख का कारण सम्भवतः लेखक का बंगभूमि से सम्बद्ध होना हो सकता है। इस अध्याय को दो पर्वों में विभक्त करके विधा तथा रचनाकार की दृष्टि से बंगप्रदेश के साहित्यिक योगदान का वर्णन किया गया है। यहां हरिदास सिद्धान्त वागीश, यतीन्द्र विमल चौधुरी, वीरेन्द्र भट्टाचार्य के साहित्यिक कार्यों के उल्लेख से पाठक समृद्ध होता है।
सप्तम अध्याय - आधुनिक संस्कृतसाहित्ये भारतवर्षे कवयित्र्यः
संस्कृत साहित्य में महिला लेखकों के योगदान के वर्णन के लिए यह अध्याय रखा गया है, जो प्रशंसनीय है। प्रायः यह समझा जाता है कि संस्कृत में पुरुष लेखकों की ही रचनाएं हैं किन्तु आधुनिक संस्कृत की प्रायः 30 महिला लेखकों के साहित्य का यह परिचय इस को झुठला देता है।
परिशिष्ट के रूप में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार के विजेता संस्कृत साहित्यकारों तथा उनकी कृतियों की सूची दी गई है। साथ ही प्रमुख आधुनिक संस्कृत साहित्कारांें के चित्रों को भी यहां दिया गया है। यह ग्रन्थ आधुनिक संस्कृत का परिचय बखूबी प्रस्तुत करता है। यद्यपि इस ग्रन्थ मंे कतिपय रचनाकारों और कृतियों का उल्लेख नहीं हो पाया है क्योंकि एक ही ग्रन्थ में यह सम्भव नहीं है तथापि अपनी उत्तम सामग्री से यह ग्रन्थ उपादेय सिद्ध होगा।






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ReplyDeleteआभार आपके द्वारा की गई टिप्पणी हमारा उत्साह बढ़ाती है प्रणाम
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