कृति - लहरीदशकम्
विधा - लहरीकाव्य
लेखक - राधावल्लभ त्रिपाठी
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण - प्रथम-1986, द्वितीय-2003
पृष्ठ संख्या -156
अंकित मूल्य - 300
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में प्राचीन काव्यविधाओं के साथ-साथ नवीन काव्यविधाओं में भी रचनाएं लिखी जा रही हैं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्यकारों ने कुछ प्राचीन काव्यविधाओं को नवीन रूप में भी प्रस्तुत किया हैं। ऐसी ही एक काव्यविधा है-लहरीकाव्यविधा। प्राचीन संस्कृत साहित्य में ऐसे खण्डकाव्य उपलब्ध होते हैं जिनमें ‘लहरी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जैसे शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी और आनन्दलहरी, पण्डितराज जगन्नाथ कृत अमृतलहरी, करुणालहरी, सुधालहरी, गंगालहरी आदि। ये लहरीकाव्य प्रायः देवभक्ति पर ही आधरित हैं, जैसे सौन्दर्यलहरी में भगवती त्रिपुरसुन्दरी की, अमृतलहरी में यमुना की, करुणालहरी में विष्णु की तथा सुधालहरी में भगवान् भास्कर की स्तुति है। यही कारण रहा की संस्कृत साहित्य के इतिहासकारों ने इन काव्यों की गणना स्तोत्र- साहित्य के अन्तर्गत ही की।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में लहरीकाव्यविधा ने अपना एक पृथक् स्थान बना लिया है। यहां ध्यातव्य है कि अर्वाचीन लहरीकाव्यों में मात्र देवभक्ति ही नहीं की गई है अपितु कवि अनेक विषयों को आधार बनाकर इन लहरीकाव्यों की रचना कर रहा है, जैसे अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित विस्मयलहरी, वेलणकर रचित विरहलहरी, भास्कर पिल्लै रचित प्रेमलहरी, श्रीभाष्यम् विजय सारथी रचित विषादलहरी, श्रीधर भास्कर वर्णेकर रचित मातृभूलहरी आदि। युगानुरुप इस काव्यविधा का लक्षण देने का प्रयास भी आधुनिकसंस्कृत-काव्यशास्त्रियों ने किया है। प्रो. रहसबिहारी द्विवेदी ने लहरीकाव्यविधा का लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहा है-
देवे देशे निसर्गे वा प्रिये वस्तुनि भक्तिमान्।
कविर्यत्कुरुते काव्यं लहरीत्यभिधियते।।
स्वतोऽपि पूर्णपद्यानि चैकस्मिन् विषयेऽन्वितिम्।
दधते तानि काव्येऽस्मिन् कल्लोला इव वारिधौ।।
(दूर्वा पत्रिका, अंक-अपैल-जून 2005,पृष्ठ-94)
प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने खण्डकाव्य का ही एक भेद लहरीकाव्य को मानते हुए कहा है कि जैसे सागर में लहरियां एक दूसरे के साथ जुडी रहती हैं तथा नाना प्रकार की भंगियों को उत्पन्न करती हुई परस्पर अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार भक्ति एवं शृंगार के सन्दर्भ अथवा अन्यान्य प्रवृत्तियां जब परस्पर भिन्न होती हुई भी मूलभाव को समपुष्ट करती हैं तो उसे लहरीकाव्य कहते हैं-
लहरीकाव्यमप्येतत् खण्डकाव्यं समुच्यते।
प्रतिपाद्यं यदा काव्ये लहरीसन्निभं भवेत्।।
परस्परं समासक्ता लहर्यो जलधौ यथा।
भंगिव्रगजं जनयन्त्यो यान्त्यद्वैतस्वरूपताम्।।
भक्तिशृंगारसन्दर्भाः काव्येऽन्येऽपि तथा यदा।
भिन्ना: सन्तोऽपि पुष्णन्ति मूलभावं पुनः पुनः।।
लहरीसन्निभा भाषाविच्छितिं जनयन्ति च।
नयनाऽसेचनं भूरि वितन्वन्ति निरन्तरम्।।
(अभिराजयशोभूषणम्,पृष्ठ-224)
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी इस सन्दर्भ में कहते हैं कि चेतनारूप समुद्र में भावरूप तरंगे उठती हैं और परस्पर टकराती हैं, उनका व्यक्तीकरण ही लहरीकाव्य है-
पारावारे चेतसि उद्गच्छन्ति च मुहुः संघट्टन्ति ।
भावतरंगास्तेषां व्यक्तीकरणं भवेल्लहरी।।
(अभिनवकाव्यालंकारसूत्र,पृष्ठ-338;जगदीश संस्कृत पुस्तकालय, जयपुर)
लहरीेकाव्य के उपर्युक्त नवीन लक्षणों से स्पष्ट ही है कि लहरीकाव्यों का विषय केवल देव-स्तुति ही न होकर कोई भी भाव हो सकता है., किन्तु यह भाव सम्पुष्ट होकर काव्य में उभरना चाहिए।
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रणीत ’लहरीदशकम्‘ आधुनिक लहरीकाव्य-परम्परा में अन्यतम है। इसमें दस लहरीकाव्यों का संकलन किया गया है। कवि ने विषय-वस्तु के आधार पर ही इन लहरियों का नामकरण किया है, यथा-वसन्तलहरी, निदाघलहरी, रोटिकालहरी इत्यादि। कवि ने अपने चेतना समुद्र में उठ रहीं भावतरंगों के व्यक्तिकरण के लिए माध्यम चुनना था और लहरीकाव्य विधा से उत्तम माध्यम कोई और हो नहीं हो सकता था।
वसन्तलहरी में वसन्त ऋतु का चित्रण परम्परागत संस्कृत कविता से भिन्न है। निरन्तर विनाश की और अग्रसर पर्यावरण एवं सतत् वृद्धि को प्राप्त प्रदूषण के मध्य वसन्त के अवतरण-काल में व्यथित कवि के मन में उठने वाले भाव सहसा यहां कविता का रूप लिए हुए दृष्टिगोचर होते हैं, यथा-
सायं त्ववाप्य समयं भ्रमणाय यातो
गच्छामि निर्जनपथे नतमस्तकोऽहम्।
द्वित्रान् स्थितान् निभृतमत्र विलोकयामि
वृक्षान् विषण्णहृदयानिव सज्जनांस्तान्।।
सायं के समय
निकलता हूँ
निर्जन पथ पर
सिर झुकाएं
घूमने के लिए,
पाता हूँ वहां
दो-तीन वृक्षों को
खडे हो जैसे
खिन्न-मन सज्जन।।
कवि का भ्रमण के समय सिर झुकाएं निकलना, वहां मात्र दो-तीन वृ़क्षों का विद्यमान होना तथा उनकी उपमा खिन्न-मन सज्जनों से देना स्वयमेव प्रदूषण की सारी कथा प्रकट कर देता है। यहां समसामयिक समस्याएं भी वसन्त-वर्णन के व्याज से प्रस्तुत की गई हैं। ये कविताएं मात्र वसन्त ऋतु की मादकता का वर्णन करने के लिए नहीं लिखी गई हैं अपितु इनके माध्यम से कवि अपने पूरे युग को जी लेता है, यही सच्चे अर्थों में आधुनिकता है।
कवि नेे एक स्थान पर मेघ की तुलना मंचस्थ नेता से की है जो गरजता तो है किन्तु काम नहीं करता। ऐसी स्थिति में यदि कवि मेघ को दूत बनाए तो कैसे बनाए-
कुतो यक्षः कुतो मेघः सन्देशप्रापणः कुतः ।
विच्छिन्नाभ्रविलायं तल्लयं याति मनोजगत् ।।
यदि पर्यावरण की स्थिति ऐसी ही विकृत बनी रही तो सम्भवतः आगामी समय में गरजने के लिए भी मेघ उपलब्ध नहीं होगा।
एक पद्य में कवि ने अभिनव कल्पना की है-
रोमांचकण्टकैर्जुष्टा तुष्टा वन्या वसुन्धरा ।
लब्ध्वा पर्जन्यसंस्पर्शं समुछ्वसिति कोरकैः।।
रोमांच के कांटों से भरी
वन्य-वसुन्धरा
पाकर मेघ का स्पर्श
श्वास ले रही है
पुष्पों की कलियों से।।
प्रावृट् लहरी में प्रयुक्त श्यामनववधू, पूर्वरंग, परिघट्टना, प्रावेशिकी ध्रुवा, छलितनाट्य आदि शब्दों के प्रयोग से कवि का नाट्यशास्त्रीय ज्ञान भी प्रकट होता है।
धरित्रीदर्शनलहरी में किसी पथिक द्वारा की गई भारत से जर्मनी तक की यात्रा का वर्णन किया गया है। कवि ने अपनी हवाई-यात्रा के ही अनुभव यहां काव्य के रूप में प्रस्तुत किये हैं। कवि को कहीं आकाश के मध्य लटका विमान त्रिशंकु के समान लगता है तो कहीं पक्षीराज गरुड के समान। विमान से दिखती पृथिवी का भी हृदयावर्जक वर्णन उपलब्ध होता है। विषयानुरूप कई शब्दों का संस्कृतीकरण भी किया गया है, जैसे-पारपत्र(पासपोर्ट),प्रवेशाधिकार(वीसा),व्योमबाल (एअरहोस्टेस),यानाध्यक्ष(केप्टन)। यहां मेघदूत की कुछ पंक्तियों का प्रयोग सुन्दर बन पडता है,यथा यात्री को विमान देखकर कवि को वैसा ही अनुभव होता है,जैसा अनुभव मेघ को देखकर यक्ष को हुआ था-
कृत्वा पूर्णं विहितविधिना तं च यात्रोपचारं
शालामन्तः प्रचुरविशदां स प्रविष्टो विशालाम्।
आसीनोऽत्र स्थितमधितलं सम्मुखीनं विमानं
वप्रक्रीडापरिगणितगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
यहां ध्यातव्य है कि विमानयात्रा के अनुभवों को कविता के रूप में निबद्ध करने को ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र ने एक नवीन काव्य विधा मानकर उसका नामकरण ‘विमानकाव्य-विधा’ किया है, यथा प्रभाकर नारायण कवेठकर की कविता ‘भूलोकविलोकनम्’, हरिदत्त शर्मा की कविता ‘चल चल विमानराज रे’, ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र रचित ‘विमानयात्राशतकम्’ नामक खण्डकाव्य आदि।
भारतीय जनता को केन्द्र रख कर कवि ने 50 पद्यों के माध्यम से जनतालहरी में भारतीय गणतन्त्र की वर्तमान स्थिति की भी खबर ली है। भारतीय जनता की स्तुति कवि क्यों कर रहा है, जबकि स्तुति-प्रशस्ति के विषय देवता, महापुरुष आदि अन्य प्राचीन विषय उपलब्ध हैं ही? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए कवि कहते हैं कि हमारे लिए तो भारतीय जनता ही सर्वोपरी है अतः हम उसी की स्तुति कर रहे हैं-
केचिद् भक्तिपरायणा भवभयादर्चन्ति देवांस्तवैः
केचिच्चाटुरताः खलांश्चलधियो नेतृन् प्रभूंछ्रीमतः।
अस्माकं तु निसर्गतः स्थितिलयाविर्भावहेतुः परं
योगक्षेमविधायिनीह जनता राष्ट्रस्य सा स्तूयते।।
कवि का यह वक्तव्य उचित ही है क्योंकि आधुनिक संस्कृत कवि कोई ऐसा दरबारी कवि नहीं है जो किसी प्रलोभन या विवशता के चलते किसी नेता या तथाकथित महापुरुष की स्तुति करे, अपितु वह तो अपने देश की मिट्टी से जुडे व्यक्ति को ही अपने काव्य का नायक बनाना चाहता है।
कवि ने यहां उच्चपदासीन नेताओं, अधिकारियों में फैले भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग्य किये हैं। दिल्ली में जाकर बैठ गये किन्तु अपने क्षेत्र की सुध न लेने वाले नेता की उपमा कवि ने दक्षिण दिशा में गये अगस्त्य मुनि के प्राचीन आख्यान से दी है और बेचारी जनता विन्घ्य के समान प्रतीक्षारत है। किन्तु कवि की आशावाहिनी दृष्टि लोकतन्त्र में अब भी बनी हुई है-
होतारो वयमृत्विगस्तु जनताशक्तेर्महासंगमः
सुप्रातः सुदिवाः सुसन्धिसमयः सुश्वा जनो जायताम्।
यज्ञेऽस्मिन् प्रविभज्यतां प्रतिजनं निर्वाचने शासनं
ह्यालोकः प्रसरीसरीतु सुभगश्चालोकतन्त्राध्वनः।।
उपनिषद् साहित्य में एक स्थान पर अन्न को ही ब्रह्म कहा गया है-‘‘अन्नं वै ब्रह्म’’। यह एक आधिभौतिक सत्य का कथन है क्योंकि अन्न के बिना जीवन निर्वाह सम्भव नहीं हैं। इस के आलोक में ही कवि ने रोटिकालहरी लिखी है, जिसमें रोटी अन्न किंवा ब्रह्म की प्रतीक है-
यद् रसो वै च सेति श्रुतौ प्रोच्यते
ब्रह्मरूपं तथाऽन्नं च जेगीयते।
वर्तते सर्वमेतत् तु सर्वंकषं
गूहीतं विस्मृतं रोटिकागौरवम्।।
प्रतिदिन के व्यवहार में हम भी देखते हैं कि जो भी व्यापार किया जा रहा है उस के मूल में रोटी ही है। अतः यदि रोटी को काव्य का विषय बनाया जाता है तो इसमें कोई दोष नहीं है। रोटी यहां नायिका का रूप ले लेती है, ऐसी नायिका जिसका आस्वाद कितनी भी बार क्यों न लिया जाए, फिर भी वह नये स्वाद वाली ही बनी रहती है(तुलनीय वैदिक पुराणी युवती उषा से)। शकुन्तला दुष्यन्त के लिए अखण्ड पुण्यों का फल हो सकती है किन्तु साधारण मनुष्यों के लिए तो रोटी ही अखण्ड पुण्यों का एकमात्र प्रकृष्ट फल है-
रोटिका राजते पूर्णमुक्ताकृतिः
स्वादिता चापि नित्यं नवास्वादिता।
मानवानामखण्डस्य पुण्यस्य सा
केवलं चैकमस्ति प्रकृष्टं फलम्।।
कवि ने 55 पद्यों के माध्यम से नर्मदालहरी में नर्मदा नदी की देवी के रूप में स्तुति की गई है। एक स्थल पर ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृग्गोचर होता है, जहां कवि कहता है कि हे नर्मदे! जब सृष्टि समुल्लसित नहीं हुई थी तब भी तुम्हारे जल का पारावार श्वांस ले रहा था-
नो सद् बभूव न किल चापि बभूव वाऽसत्
सृष्टिर्यदा न च समुल्लसिता पुराऽऽसीत्।
निर्वात एव च समुच्छ्वसिति स्म चैकः
शून्यस्य गह्वरगतस्तव वारिराशिः।।
कवि ने यहां नर्मदा नदी से सम्बन्धित आख्यानों, ऐतिहासिक वृत्तान्तों को भी उद्घाटित किया है, जैसे- बलि-आख्यान, सहस्रार्जुन-आख्यान, रावण का वृत्तान्त, पाण्डवों के वनवास का वृत्तान्त, मण्डन मिश्र का वृत्तान्त आदि। कवि की नर्मदा के प्रति जो भक्ति है वह सर्वत्र अपना प्रवाह बनाए रखती है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कवि ने नर्मदा नदी की संस्कृति को जीया है।
मानव कहीं भी रहे किन्तु उसमें उसके देश की मिट्टी की सौंधी महक सदैव महकती रहती है। मृत्तिकालहरी में वर्णित मिट्टी अपने देश, गांव की भूमि, जडों की प्रतीक है। प्रत्येक मनुष्य मिट्टी की गोद में पला बडा है। मिट्टी के घर बनाना, खेल-खेल में मिट्टी खा लेना आदि बाल्यकाल की घटनाएं किसके मन को आह्लादित नहीं कर देती हैं? यह लहरी आपको आपके बचपन में ले जाती है, कुछ खट्टी-मिठी यादों को ताजा कर देती है-
प्रधावितं च शैशवेऽत्रमृत्तिकाचितेऽंगणे।
विनिर्मितानि गेहकानि तानि सैकतानि वा।।
अलक्ष्यदन्तकुड्मलाः कुटुम्बिभिर्गवेषिताः।
अभक्षयाम मृत्तिकां तदा निलीय कोणके।।
कवि ने यहां मिट्टी को अक्षुण्ण बताया है क्योंकि सभी वस्तुओं में निहित यह मिट्टी वस्तुओं के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती, वस्तुओं के भिन्न होने पर भी अभिन्न रहती है। यहां मिट्टी शाश्वत सत्य के रूप में उभर कर सामने आती है। कवि मिट्टी को ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करते प्रतीत होते हैं।
अद्यापिलहरी में जीवन के सातत्य व गत्यात्मकता का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। यहां 50 पद्य हैं, जिनमें प्रायः ‘अद्यापि’ पद की आवृत्ति होती है। कवि के अनुसार पद ‘अद्यापि’ की आवृत्ति इस बात की सूचक है कि सम्पूर्ण जटिलताओं के बीच अभी भी आशा व विश्वास बचे हुए हैं। यह लहरी काव्य तमाम विसंगतियों, विडम्बनाओं, निराशाओं के मध्य जीवन में आशा व आस्था की खोज करती है। यह मानव जीवनकी जिजीविषा की प्रतीक है। कवि उस संजीवनस्पर्श को अपने शब्दों से खोज रहा है, जो जीवन के जटिल, कण्टकित मार्गों पर कहीं खो गया है-
स्पर्शः पुरा परिचितो नियतं य आसीत्
संजीवनश्च मनसश्च रसायनं यत्।
लुप्तोऽधुना जटिलजीवनजीर्णमार्गेऽ-
द्यापीह गीर्भिरिह तंच गवेषयामि।।
यहां कवि कहीें अपने आस-पास के वातावरण की सुध लेते दिखलायी देते हैं तो कहीं पर्यावरण के विनाश के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं। कहीं मन्दिर-मस्जिद विवाद को व्यर्थ बताते हैं तो कहीं शाकुन्तल-कथा को वर्तमान सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बीच भी कवि की जिजीविषा समाप्त नहीं हुई है-
एते भवन्ति पलिता अधिमस्तकं मे
केशास्तथापि विरता न जिजीविषेयम्।
अद्यापि दक्षिणकरस्य दृढो ग्रहो मे
यावल्लिखामि कलमेन च कम्पहीनः।।
संग्रह के अन्तिम लहरी काव्य प्रस्थानलहरी के 52 पद्यों में कवि ने प्रस्थान वेला का चित्रण किया है। जहां एक ओर कवि अज्ञात को सम्बोधित करते हुए प्रस्थान की वेला में धीरज धरने को कहते है, वहीं दूसरी ओर कवि स्वयं चिन्ताकुल दिखलायी देते हैं-
अग्रे पदं यावदितः प्रकुर्यां
कश्चित् पदं कर्षति मे तु पृष्ठात्।
सिन्धोः प्रवाहो गिरिणेव रुद्धो
नाग्रे प्रयातोऽस्मि न संस्थितोऽहम्।।
कहीं यह प्रस्थान की वेला महाप्रस्थान के भाव को भी प्रकट करती दृष्टिगोचर होती है-
एषा जरोपैति यमस्य दूती
केशं गृहीत्वा पलितं स्वहस्ते।
शब्दापयन्ती किल कर्णमूले
प्रस्थानवेला नु समागतेति।।
विधा - लहरीकाव्य
लेखक - राधावल्लभ त्रिपाठी
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण - प्रथम-1986, द्वितीय-2003
पृष्ठ संख्या -156
अंकित मूल्य - 300
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में प्राचीन काव्यविधाओं के साथ-साथ नवीन काव्यविधाओं में भी रचनाएं लिखी जा रही हैं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्यकारों ने कुछ प्राचीन काव्यविधाओं को नवीन रूप में भी प्रस्तुत किया हैं। ऐसी ही एक काव्यविधा है-लहरीकाव्यविधा। प्राचीन संस्कृत साहित्य में ऐसे खण्डकाव्य उपलब्ध होते हैं जिनमें ‘लहरी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जैसे शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी और आनन्दलहरी, पण्डितराज जगन्नाथ कृत अमृतलहरी, करुणालहरी, सुधालहरी, गंगालहरी आदि। ये लहरीकाव्य प्रायः देवभक्ति पर ही आधरित हैं, जैसे सौन्दर्यलहरी में भगवती त्रिपुरसुन्दरी की, अमृतलहरी में यमुना की, करुणालहरी में विष्णु की तथा सुधालहरी में भगवान् भास्कर की स्तुति है। यही कारण रहा की संस्कृत साहित्य के इतिहासकारों ने इन काव्यों की गणना स्तोत्र- साहित्य के अन्तर्गत ही की।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में लहरीकाव्यविधा ने अपना एक पृथक् स्थान बना लिया है। यहां ध्यातव्य है कि अर्वाचीन लहरीकाव्यों में मात्र देवभक्ति ही नहीं की गई है अपितु कवि अनेक विषयों को आधार बनाकर इन लहरीकाव्यों की रचना कर रहा है, जैसे अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित विस्मयलहरी, वेलणकर रचित विरहलहरी, भास्कर पिल्लै रचित प्रेमलहरी, श्रीभाष्यम् विजय सारथी रचित विषादलहरी, श्रीधर भास्कर वर्णेकर रचित मातृभूलहरी आदि। युगानुरुप इस काव्यविधा का लक्षण देने का प्रयास भी आधुनिकसंस्कृत-काव्यशास्त्रियों ने किया है। प्रो. रहसबिहारी द्विवेदी ने लहरीकाव्यविधा का लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहा है-
देवे देशे निसर्गे वा प्रिये वस्तुनि भक्तिमान्।
कविर्यत्कुरुते काव्यं लहरीत्यभिधियते।।
स्वतोऽपि पूर्णपद्यानि चैकस्मिन् विषयेऽन्वितिम्।
दधते तानि काव्येऽस्मिन् कल्लोला इव वारिधौ।।
(दूर्वा पत्रिका, अंक-अपैल-जून 2005,पृष्ठ-94)
प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने खण्डकाव्य का ही एक भेद लहरीकाव्य को मानते हुए कहा है कि जैसे सागर में लहरियां एक दूसरे के साथ जुडी रहती हैं तथा नाना प्रकार की भंगियों को उत्पन्न करती हुई परस्पर अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार भक्ति एवं शृंगार के सन्दर्भ अथवा अन्यान्य प्रवृत्तियां जब परस्पर भिन्न होती हुई भी मूलभाव को समपुष्ट करती हैं तो उसे लहरीकाव्य कहते हैं-
लहरीकाव्यमप्येतत् खण्डकाव्यं समुच्यते।
प्रतिपाद्यं यदा काव्ये लहरीसन्निभं भवेत्।।
परस्परं समासक्ता लहर्यो जलधौ यथा।
भंगिव्रगजं जनयन्त्यो यान्त्यद्वैतस्वरूपताम्।।
भक्तिशृंगारसन्दर्भाः काव्येऽन्येऽपि तथा यदा।
भिन्ना: सन्तोऽपि पुष्णन्ति मूलभावं पुनः पुनः।।
लहरीसन्निभा भाषाविच्छितिं जनयन्ति च।
नयनाऽसेचनं भूरि वितन्वन्ति निरन्तरम्।।
(अभिराजयशोभूषणम्,पृष्ठ-224)
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी इस सन्दर्भ में कहते हैं कि चेतनारूप समुद्र में भावरूप तरंगे उठती हैं और परस्पर टकराती हैं, उनका व्यक्तीकरण ही लहरीकाव्य है-
पारावारे चेतसि उद्गच्छन्ति च मुहुः संघट्टन्ति ।
भावतरंगास्तेषां व्यक्तीकरणं भवेल्लहरी।।
(अभिनवकाव्यालंकारसूत्र,पृष्ठ-338;जगदीश संस्कृत पुस्तकालय, जयपुर)
लहरीेकाव्य के उपर्युक्त नवीन लक्षणों से स्पष्ट ही है कि लहरीकाव्यों का विषय केवल देव-स्तुति ही न होकर कोई भी भाव हो सकता है., किन्तु यह भाव सम्पुष्ट होकर काव्य में उभरना चाहिए।
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रणीत ’लहरीदशकम्‘ आधुनिक लहरीकाव्य-परम्परा में अन्यतम है। इसमें दस लहरीकाव्यों का संकलन किया गया है। कवि ने विषय-वस्तु के आधार पर ही इन लहरियों का नामकरण किया है, यथा-वसन्तलहरी, निदाघलहरी, रोटिकालहरी इत्यादि। कवि ने अपने चेतना समुद्र में उठ रहीं भावतरंगों के व्यक्तिकरण के लिए माध्यम चुनना था और लहरीकाव्य विधा से उत्तम माध्यम कोई और हो नहीं हो सकता था।
वसन्तलहरी में वसन्त ऋतु का चित्रण परम्परागत संस्कृत कविता से भिन्न है। निरन्तर विनाश की और अग्रसर पर्यावरण एवं सतत् वृद्धि को प्राप्त प्रदूषण के मध्य वसन्त के अवतरण-काल में व्यथित कवि के मन में उठने वाले भाव सहसा यहां कविता का रूप लिए हुए दृष्टिगोचर होते हैं, यथा-
सायं त्ववाप्य समयं भ्रमणाय यातो
गच्छामि निर्जनपथे नतमस्तकोऽहम्।
द्वित्रान् स्थितान् निभृतमत्र विलोकयामि
वृक्षान् विषण्णहृदयानिव सज्जनांस्तान्।।
सायं के समय
निकलता हूँ
निर्जन पथ पर
सिर झुकाएं
घूमने के लिए,
पाता हूँ वहां
दो-तीन वृक्षों को
खडे हो जैसे
खिन्न-मन सज्जन।।
कवि का भ्रमण के समय सिर झुकाएं निकलना, वहां मात्र दो-तीन वृ़क्षों का विद्यमान होना तथा उनकी उपमा खिन्न-मन सज्जनों से देना स्वयमेव प्रदूषण की सारी कथा प्रकट कर देता है। यहां समसामयिक समस्याएं भी वसन्त-वर्णन के व्याज से प्रस्तुत की गई हैं। ये कविताएं मात्र वसन्त ऋतु की मादकता का वर्णन करने के लिए नहीं लिखी गई हैं अपितु इनके माध्यम से कवि अपने पूरे युग को जी लेता है, यही सच्चे अर्थों में आधुनिकता है।
कवि नेे एक स्थान पर मेघ की तुलना मंचस्थ नेता से की है जो गरजता तो है किन्तु काम नहीं करता। ऐसी स्थिति में यदि कवि मेघ को दूत बनाए तो कैसे बनाए-
कुतो यक्षः कुतो मेघः सन्देशप्रापणः कुतः ।
विच्छिन्नाभ्रविलायं तल्लयं याति मनोजगत् ।।
यदि पर्यावरण की स्थिति ऐसी ही विकृत बनी रही तो सम्भवतः आगामी समय में गरजने के लिए भी मेघ उपलब्ध नहीं होगा।
एक पद्य में कवि ने अभिनव कल्पना की है-
रोमांचकण्टकैर्जुष्टा तुष्टा वन्या वसुन्धरा ।
लब्ध्वा पर्जन्यसंस्पर्शं समुछ्वसिति कोरकैः।।
रोमांच के कांटों से भरी
वन्य-वसुन्धरा
पाकर मेघ का स्पर्श
श्वास ले रही है
पुष्पों की कलियों से।।
प्रावृट् लहरी में प्रयुक्त श्यामनववधू, पूर्वरंग, परिघट्टना, प्रावेशिकी ध्रुवा, छलितनाट्य आदि शब्दों के प्रयोग से कवि का नाट्यशास्त्रीय ज्ञान भी प्रकट होता है।
धरित्रीदर्शनलहरी में किसी पथिक द्वारा की गई भारत से जर्मनी तक की यात्रा का वर्णन किया गया है। कवि ने अपनी हवाई-यात्रा के ही अनुभव यहां काव्य के रूप में प्रस्तुत किये हैं। कवि को कहीं आकाश के मध्य लटका विमान त्रिशंकु के समान लगता है तो कहीं पक्षीराज गरुड के समान। विमान से दिखती पृथिवी का भी हृदयावर्जक वर्णन उपलब्ध होता है। विषयानुरूप कई शब्दों का संस्कृतीकरण भी किया गया है, जैसे-पारपत्र(पासपोर्ट),प्रवेशाधिकार(वीसा),व्योमबाल (एअरहोस्टेस),यानाध्यक्ष(केप्टन)। यहां मेघदूत की कुछ पंक्तियों का प्रयोग सुन्दर बन पडता है,यथा यात्री को विमान देखकर कवि को वैसा ही अनुभव होता है,जैसा अनुभव मेघ को देखकर यक्ष को हुआ था-
कृत्वा पूर्णं विहितविधिना तं च यात्रोपचारं
शालामन्तः प्रचुरविशदां स प्रविष्टो विशालाम्।
आसीनोऽत्र स्थितमधितलं सम्मुखीनं विमानं
वप्रक्रीडापरिगणितगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
यहां ध्यातव्य है कि विमानयात्रा के अनुभवों को कविता के रूप में निबद्ध करने को ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र ने एक नवीन काव्य विधा मानकर उसका नामकरण ‘विमानकाव्य-विधा’ किया है, यथा प्रभाकर नारायण कवेठकर की कविता ‘भूलोकविलोकनम्’, हरिदत्त शर्मा की कविता ‘चल चल विमानराज रे’, ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र रचित ‘विमानयात्राशतकम्’ नामक खण्डकाव्य आदि।
भारतीय जनता को केन्द्र रख कर कवि ने 50 पद्यों के माध्यम से जनतालहरी में भारतीय गणतन्त्र की वर्तमान स्थिति की भी खबर ली है। भारतीय जनता की स्तुति कवि क्यों कर रहा है, जबकि स्तुति-प्रशस्ति के विषय देवता, महापुरुष आदि अन्य प्राचीन विषय उपलब्ध हैं ही? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए कवि कहते हैं कि हमारे लिए तो भारतीय जनता ही सर्वोपरी है अतः हम उसी की स्तुति कर रहे हैं-
केचिद् भक्तिपरायणा भवभयादर्चन्ति देवांस्तवैः
केचिच्चाटुरताः खलांश्चलधियो नेतृन् प्रभूंछ्रीमतः।
अस्माकं तु निसर्गतः स्थितिलयाविर्भावहेतुः परं
योगक्षेमविधायिनीह जनता राष्ट्रस्य सा स्तूयते।।
कवि का यह वक्तव्य उचित ही है क्योंकि आधुनिक संस्कृत कवि कोई ऐसा दरबारी कवि नहीं है जो किसी प्रलोभन या विवशता के चलते किसी नेता या तथाकथित महापुरुष की स्तुति करे, अपितु वह तो अपने देश की मिट्टी से जुडे व्यक्ति को ही अपने काव्य का नायक बनाना चाहता है।
कवि ने यहां उच्चपदासीन नेताओं, अधिकारियों में फैले भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग्य किये हैं। दिल्ली में जाकर बैठ गये किन्तु अपने क्षेत्र की सुध न लेने वाले नेता की उपमा कवि ने दक्षिण दिशा में गये अगस्त्य मुनि के प्राचीन आख्यान से दी है और बेचारी जनता विन्घ्य के समान प्रतीक्षारत है। किन्तु कवि की आशावाहिनी दृष्टि लोकतन्त्र में अब भी बनी हुई है-
होतारो वयमृत्विगस्तु जनताशक्तेर्महासंगमः
सुप्रातः सुदिवाः सुसन्धिसमयः सुश्वा जनो जायताम्।
यज्ञेऽस्मिन् प्रविभज्यतां प्रतिजनं निर्वाचने शासनं
ह्यालोकः प्रसरीसरीतु सुभगश्चालोकतन्त्राध्वनः।।
उपनिषद् साहित्य में एक स्थान पर अन्न को ही ब्रह्म कहा गया है-‘‘अन्नं वै ब्रह्म’’। यह एक आधिभौतिक सत्य का कथन है क्योंकि अन्न के बिना जीवन निर्वाह सम्भव नहीं हैं। इस के आलोक में ही कवि ने रोटिकालहरी लिखी है, जिसमें रोटी अन्न किंवा ब्रह्म की प्रतीक है-
यद् रसो वै च सेति श्रुतौ प्रोच्यते
ब्रह्मरूपं तथाऽन्नं च जेगीयते।
वर्तते सर्वमेतत् तु सर्वंकषं
गूहीतं विस्मृतं रोटिकागौरवम्।।
प्रतिदिन के व्यवहार में हम भी देखते हैं कि जो भी व्यापार किया जा रहा है उस के मूल में रोटी ही है। अतः यदि रोटी को काव्य का विषय बनाया जाता है तो इसमें कोई दोष नहीं है। रोटी यहां नायिका का रूप ले लेती है, ऐसी नायिका जिसका आस्वाद कितनी भी बार क्यों न लिया जाए, फिर भी वह नये स्वाद वाली ही बनी रहती है(तुलनीय वैदिक पुराणी युवती उषा से)। शकुन्तला दुष्यन्त के लिए अखण्ड पुण्यों का फल हो सकती है किन्तु साधारण मनुष्यों के लिए तो रोटी ही अखण्ड पुण्यों का एकमात्र प्रकृष्ट फल है-
रोटिका राजते पूर्णमुक्ताकृतिः
स्वादिता चापि नित्यं नवास्वादिता।
मानवानामखण्डस्य पुण्यस्य सा
केवलं चैकमस्ति प्रकृष्टं फलम्।।
कवि ने 55 पद्यों के माध्यम से नर्मदालहरी में नर्मदा नदी की देवी के रूप में स्तुति की गई है। एक स्थल पर ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृग्गोचर होता है, जहां कवि कहता है कि हे नर्मदे! जब सृष्टि समुल्लसित नहीं हुई थी तब भी तुम्हारे जल का पारावार श्वांस ले रहा था-
नो सद् बभूव न किल चापि बभूव वाऽसत्
सृष्टिर्यदा न च समुल्लसिता पुराऽऽसीत्।
निर्वात एव च समुच्छ्वसिति स्म चैकः
शून्यस्य गह्वरगतस्तव वारिराशिः।।
कवि ने यहां नर्मदा नदी से सम्बन्धित आख्यानों, ऐतिहासिक वृत्तान्तों को भी उद्घाटित किया है, जैसे- बलि-आख्यान, सहस्रार्जुन-आख्यान, रावण का वृत्तान्त, पाण्डवों के वनवास का वृत्तान्त, मण्डन मिश्र का वृत्तान्त आदि। कवि की नर्मदा के प्रति जो भक्ति है वह सर्वत्र अपना प्रवाह बनाए रखती है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कवि ने नर्मदा नदी की संस्कृति को जीया है।
मानव कहीं भी रहे किन्तु उसमें उसके देश की मिट्टी की सौंधी महक सदैव महकती रहती है। मृत्तिकालहरी में वर्णित मिट्टी अपने देश, गांव की भूमि, जडों की प्रतीक है। प्रत्येक मनुष्य मिट्टी की गोद में पला बडा है। मिट्टी के घर बनाना, खेल-खेल में मिट्टी खा लेना आदि बाल्यकाल की घटनाएं किसके मन को आह्लादित नहीं कर देती हैं? यह लहरी आपको आपके बचपन में ले जाती है, कुछ खट्टी-मिठी यादों को ताजा कर देती है-
प्रधावितं च शैशवेऽत्रमृत्तिकाचितेऽंगणे।
विनिर्मितानि गेहकानि तानि सैकतानि वा।।
अलक्ष्यदन्तकुड्मलाः कुटुम्बिभिर्गवेषिताः।
अभक्षयाम मृत्तिकां तदा निलीय कोणके।।
कवि ने यहां मिट्टी को अक्षुण्ण बताया है क्योंकि सभी वस्तुओं में निहित यह मिट्टी वस्तुओं के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती, वस्तुओं के भिन्न होने पर भी अभिन्न रहती है। यहां मिट्टी शाश्वत सत्य के रूप में उभर कर सामने आती है। कवि मिट्टी को ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करते प्रतीत होते हैं।
अद्यापिलहरी में जीवन के सातत्य व गत्यात्मकता का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। यहां 50 पद्य हैं, जिनमें प्रायः ‘अद्यापि’ पद की आवृत्ति होती है। कवि के अनुसार पद ‘अद्यापि’ की आवृत्ति इस बात की सूचक है कि सम्पूर्ण जटिलताओं के बीच अभी भी आशा व विश्वास बचे हुए हैं। यह लहरी काव्य तमाम विसंगतियों, विडम्बनाओं, निराशाओं के मध्य जीवन में आशा व आस्था की खोज करती है। यह मानव जीवनकी जिजीविषा की प्रतीक है। कवि उस संजीवनस्पर्श को अपने शब्दों से खोज रहा है, जो जीवन के जटिल, कण्टकित मार्गों पर कहीं खो गया है-
स्पर्शः पुरा परिचितो नियतं य आसीत्
संजीवनश्च मनसश्च रसायनं यत्।
लुप्तोऽधुना जटिलजीवनजीर्णमार्गेऽ-
द्यापीह गीर्भिरिह तंच गवेषयामि।।
यहां कवि कहीें अपने आस-पास के वातावरण की सुध लेते दिखलायी देते हैं तो कहीं पर्यावरण के विनाश के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं। कहीं मन्दिर-मस्जिद विवाद को व्यर्थ बताते हैं तो कहीं शाकुन्तल-कथा को वर्तमान सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बीच भी कवि की जिजीविषा समाप्त नहीं हुई है-
एते भवन्ति पलिता अधिमस्तकं मे
केशास्तथापि विरता न जिजीविषेयम्।
अद्यापि दक्षिणकरस्य दृढो ग्रहो मे
यावल्लिखामि कलमेन च कम्पहीनः।।
संग्रह के अन्तिम लहरी काव्य प्रस्थानलहरी के 52 पद्यों में कवि ने प्रस्थान वेला का चित्रण किया है। जहां एक ओर कवि अज्ञात को सम्बोधित करते हुए प्रस्थान की वेला में धीरज धरने को कहते है, वहीं दूसरी ओर कवि स्वयं चिन्ताकुल दिखलायी देते हैं-
अग्रे पदं यावदितः प्रकुर्यां
कश्चित् पदं कर्षति मे तु पृष्ठात्।
सिन्धोः प्रवाहो गिरिणेव रुद्धो
नाग्रे प्रयातोऽस्मि न संस्थितोऽहम्।।
कहीं यह प्रस्थान की वेला महाप्रस्थान के भाव को भी प्रकट करती दृष्टिगोचर होती है-
एषा जरोपैति यमस्य दूती
केशं गृहीत्वा पलितं स्वहस्ते।
शब्दापयन्ती किल कर्णमूले
प्रस्थानवेला नु समागतेति।।
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