Sunday, May 17, 2026

आधुनिक संस्कृत का प्रथम विज्ञान लघु कथा संग्रह _ संस्कृतेर्नवोऽध्यायः

कृति - संस्कृतेर्नवोऽध्यायः 

विधा - विज्ञानकथासंग्रह

रचयिता - हर्षदेव माधव 

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन, दिल्ली

प्रकाशन वर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 156

अंकित मूल्य - 295

संस्कृत में विज्ञान कथा

       संस्कृत साहित्य में विज्ञान_ साहित्य बहुत कम मात्र में लिखा गया है| 1966 में संगमनी पत्रिका में हिंदी के एक रूपक का संस्कृत अनुवाद प्रकाशित हुआ था, जिसमें 2060 के भविष्य की कल्पना की गई थी| भगवान दास फडिया के इस मूल नाटक का अनुवाद प्रेमशंकर शास्त्री ने किया था| पराम्बा श्रीयोगमाया ने गोकुलानन्द महापात्र के कथाग्रंथ का संस्कृत अनुवाद मृत्यु: चंद्रमस: नाम से किया था, जो कि वैज्ञानिक साहित्य में ही आता है| लेकिन ये दोनों ग्रंथ अनूदित हैं| मौलिक विज्ञान साहित्य के अंतर्गत ऋषिराज जानी ने अन्तरिक्षयोधा नाम से संस्कृत उपन्यास लिखा है| हर्षदेव माधव अब आधुनिक संस्कृत की प्रथम विज्ञान कथाएं लेकर आए हैं| वे हमेशा नया साहित्य लेकर आते हैं और हमें चमत्कृत कर देते हैं| इस कथा ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद और संपादन किया है प्रो लालशंकर गयावाल ने| 

  हर्षदेव माधव की सर्वतोमुखी प्रतिभा ने संस्कृत में कई अद्भुत ग्रन्थों की रचना करवाई है। शायद ही कोई विधा ऐसी बची हो, जिसमें हर्षदेव माधव की नवीन प्रयोगोे के साथ रचना उपलब्ध नहीं होती हो। पारम्परिक छन्दों के साथ मुक्तच्छन्द में आपकी कविताएं संस्कृत की नई बानगी प्रस्तुत करती है। नाट्य साहित्य में एकांकीयों के माध्यम से एक अलग ही प्रकार की कथावस्तु संस्कृत में पढने को मिलती है। गद्यसाहित्य में उपन्यासविधा का नवीन रूप दृष्टिगोचर होता है, जहां डायरी विधा घुलमिल जाती है। स्मृतियों की जुगाली करती हुई कथाएं आपकों अपने अतीत में भ्रमण करवा देती हैं। बालसाहित्य की सरल, रोचक, सरस रचनाएं मन मोह लेती हैं। अब हर्षदेव माधव कथासाहित्य में वैज्ञानिक कथाओं का उपहार लेकर संस्कृत पाठकों के पास आये हैं। एआई, रोबाॅट, नवतकनीकि सब यहां मिल जाते हैं, जो रोचक तो हैं ही, साथ ही पाठक की ज्ञानवृद्धि भी करते हैं| 



      प्रस्तुत कथासंग्रह के दो खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में 11 कथाएं हैं तो दूसरे खण्ड में 2 कथाएं निबद्ध हैं। 



 संस्कृतेर्नवोऽध्यायः संग्रह की पहली कथा है। इसके कथानक का कालखण्ड भविष्य का है। 2090 में कृत्रिमबुद्धिमत्ता एआई के बढते प्रयोग से होंने वाले दुष्प्रभावों की ओर इसमें संकेत किया गया है- नवत्यधिकद्विसहस्रतमस्य संवत्सरस्य कश्चित् प्रातःकालः प्रचलति। घटिकायन्त्राणि सन्ति, द्रष्टुं मानवा न सन्ति। नगराणि सन्ति, नागरा न सन्ति। कृत्रिमबुद्धिप्रयोग- बाहुल्यात् मनुष्याः नैराश्यमनुभूय स्वात्मघातं कृतवन्तः। यन्त्रैर्मनुष्या हताः, मनुष्यैर्यन्त्राणि नाशितानि। विज्ञान ने विश्व को बहुत कुछ दिया और फिर वही विज्ञान दुरुपयोग होने पर सब कुछ छीन भी सकता है- विज्ञानेन सर्वमपि दत्तं विश्वस्मै, अथ च सर्वमपि अपहृतम्। लोपा नामक एक पात्र किस तरह से एक तपस्वी के सहयोग से पुनः संस्कृति का नया अध्याय रचती है, इसका वर्णन इसमें किया गया है, जो कथाकार की आशावादी दृष्टि का संकेत करता है - ततः पश्चात् पुनरपि यज्ञशालायाम् अग्निः स्थापितो भवति। वृक्षेषु फलानां सौरभं प्रसरति। क्षेत्रं शस्यकणिशैः रमणीयं भवति। कुटीरे शिशुरोदनं श्रूयते।........पुनरपि संस्कृतेर्नवोऽध्यायः प्रारभ्यते।



   षडयन्त्रम् कथा कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि मेे लिखी गई है। यहां कोरोना को पांच देशों के धनकुबेरों बिलेनियर द्वारा स्वार्थपूर्ति के लिए फैलाई गई बीमारी बतलाया है। अतः भारत सहित कुछ देशों के गुप्तचर पांचों नरपिशाचों को मार डालते हैं - समग्रं विश्वं स्वार्थपंकमग्नजातमासीत्। एते धनाढ्याः धनवृद्धिं कर्तुं विश्वस्य प्रजानां नाशं कृतवन्तः। एतैः पृथिव्यां नरकमानीतम्। 



           भविष्यत्कालस्य नगरे एक ऐसी कथा है जो यह बतलाती है कि रोबाॅट केवल खराब ही नहीं होते वे मनुष्यों का भला भी कर सकते हैं। चौर्यम् कथा हमें उस खतरे से आगाह करती है, जिससे जल्द ही हमारा सामना हो सकता है। रोबाॅट हमारे संस्थानों में जासूसी का काम भी करने लग जाएंगे, ऐसा सम्भावित खतरा मंडरा ही रहा है। मातृत्व कथा पच्चीसवीं सदी के रोबाॅट को केन्द्र में लेकर लिखी गई है, जो मारिया नामक स्त्री को प्रेम का अनुभव करवाता है और विज्ञान की तकनीकि से मारिया मातृत्व कर सुख भोगती है। यन्त्र और मानव के मध्य शारीरिक प्रेम भी घट सकता है, एसी यहां कल्पना की गई है- विशेषज्ञानां परिश्रमः सफलः अभवत्। विशेषज्ञैः रोबर्टे प्रणयसंवेदना आरोपिताः आसन्। रोबर्टः प्रणयसंवेदनैः पारंगतः अभवत्। 

                      आश्वासनम् कथा में एआई कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सदुपयोग का वर्णन है। कहानी पंजाब के एक गांव से शुरू होती है, जहां एक वृद्ध मां अपने सैनिक पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई जीने का प्रयास करती रहती है। वह प्रति सप्ताह बेटे से फोन पर बात करती है। इस कथा का अन्त चौंकाने वाला है। ओ. हेनरी की कथाओं की तरह इसका पर्यवसान किया गया है। कथाकार अन्त में स्वयं कहता है- आधुनिकी तान्त्रिकी मनुष्याणां दुःखेषु साहाय्यं कुर्यादिति कथाकारस् अभिप्रायः। विज्ञानं मनुष्यजातेर्हितार्थमेवास्ति। दुर्जनाः कस्यचित् वाण्याः प्रतिरूपं कृत्वा वंचनां कुर्वन्ति इति सायबर-अपराधेषु प्रसिद्धमस्ति। 

         आत्महत्या नामक कथा यह बतलाती है कि भविष्य में काम के बोझ के चलते केवल मानव ही नहीं अपितु रोबाॅट भी आत्महत्या करने लगेेंगे। कदाचित् तनाव बढने पर वे किसी की हत्या भी कर सकते हैं। कथाकार की चिन्ता इन कथनों में झलकती है- भविष्यत्काले अनृतवादिनां शठानां दुव्र्यव्हारं मनुष्याणां दुर्गुणा यन्त्रमानवेषु संक्रान्ता भविष्यन्ति किम्? कदाचिद् एवमेव भवेत्। मनुष्यैः समग्रा पृथ्वी दूषिताऽस्ति, तर्हि यन्त्रमानवाः कथमदूषिता भविष्यन्ति? कृत्रिमबुद्धिः एआई अपि मनुष्यसृष्टा बुद्धिरस्ति, तत्र सात्त्विकता कथं भवेत्?    

        मानसापहरणम् कथा में कल्पना की गई है कि कैसे भविष्य में वैज्ञानिक माइंडहेकिंग करके अपने गुप्त अभियानों को अंजाम देंगे। भयम् कथा यह प्रदर्शित करती है कि भविष्य में रोबाॅट भी अपने नष्ट हो जाने का भय करने लगेंगे। यहां बनारस के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के वातावरण के द्वारा जीवन व मृत्यु के बारे में दार्शनिक वर्णन किया गया है। कर्तव्य कथा यह बतलाती है कि भविष्य में रोबाॅट भी दाहसंस्कार आदि कर्तव्यों का निर्वाह पुत्र की भांति करने में सक्षम होंगे। कटुसत्यम् कथा 32 वीं सदी के किसी समय का चित्रण करती है, जब यान्त्रिकता के चलते मनुष्य आनी स्वाभाविक स्थिति खो चुके होंगे। अनेक तरह की बिमारियां उन्हें घेर लेंगी। इस कथा में कथाकार ने ज्ञानगंज नामक एक अद्श्य स्थान का वर्णन किया है, जो साधकों की तपोस्थली है। ध्यातव्य है कि गापीनाथ कविराज ने ज्ञानगंज नामक पुस्तक में हिमालय के पवित्र व दिव्य आश्रमों का वर्णन किया है। इस ज्ञानगंज को कुछ लोग सम्बाला, सम्बल या शम्भल भी कहते हैं। संग्रह के द्वितीय भाग में दो कथाएं और दी गई है, जो भिन्न विषय-वस्तु पर आधारित है।  



      ये वैज्ञानिक कथाएं संस्कृत की साहित्य के नव रूप को प्रस्तुत करती हैं। संस्कृत साहित्यकार की दृष्टि समाज के प्रत्येक पक्ष पर जाती है, यह इसका प्रमाण है। संस्कृत में वैज्ञानिक कथाओं का मुक्तकण्ठ से स्वागत किया जाना चाहिए।

Saturday, March 14, 2026

मधुर बालगीतियों का उपहार _ मंजुलाः बालगीतयः

कृति - मंजुलाः बालगीतयः

कृतिकार - डा. मंजुलता शर्मा

विधा - बालसाहित्य

प्रकाशक – परिमल पब्लिकेशंस दिल्ली

प्रकाशनवर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 102

अंकितमूल्य - 250



          भारतीय भाषाओं में बालसाहित्य लिखा व पढा जा रहा है। संस्कृत में बालसाहित्य मात्रात्मक एवं गुणात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत कम है। फिर भी कतिपय साहित्यकार इस दिशा में प्रशंसनीय प्रयास कर रहे हैं। मंजुलता  शर्मा आधुनिक संस्कृत साहित्य में अपनी समीक्षात्मक दृष्टि के लिए  जानी जाती हैं। आपकी समीक्षा की शैली अन्य समीक्षकों से अलगाती है। हाल ही में आपका कवि पक्ष भी मंजुलाः  बालगीतयः इस संग्रह से सामने आया है। किसी बेहतरीन समीक्षक का बालसाहित्य की  रचना में प्रवृत्त होना उम्मीद बढाता है। वस्तुतः बालसाहित्य की  रचना करना असिधारा पर चलने के समान ही है।


            प्रस्तुत बालगीति संग्रहमें 25 कविताएं संकलित हैं। कवि ने  स्वयं इनका हिन्दी अनुवाद भी किया है] जो सहज एवं लयात्मक है। साथ ही प्रत्येक कविता के साथ उस कविता के भावों से मेल खाता चित्र भी दिया गया है  जो इस संग्रह को और भी रोचक बना देता है। बालमन अनूठा होता है। उसके लिए संसार की  प्रत्येक वस्तु वयस्क व्यक्ति से भिन्न महत्त्व की होती है। उसकी विश्व को  देखने का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। यही कारण है कि कई बडे साहित्यकार बालसाहित्य की रचना में चूक जाते हैं। मंजुलता  शर्मा की कविताएं बालमन की  कविताएं हैं। पहली कविता बरसते बादलों पर रची गई है-


एवं वर्षति मेघः सततम्

भेकेनापि क्रीतं छत्रम्।।

मुसलधाराः पतन्ति मात्रम्।

अहो वेपते ममापि गात्रम्।।

बारिश के मौसम का यहां स्वाभाविक वर्णन किया गया है जिसमें एक  बालक कल्पना करता है कि लगातार होती बारिश के कारण मेंढक ने  भी    छाता खरीद लिया है। कविता में बालक के शरीर पर पडती बारिश की  बूंदों से कांपते शरीर का उल्लेख किया गया है। हमने स्वयं के साथ-साथ बच्चों को भी बारिश में नहाने से रोक  रखा हैं फिर हम उन्हें स्वीमिंग पुल में लेकर जाते हैं। हम जितना बच्चों को प्रकृति से दूर  रखेंगे उतना ही वे अन्दर से कच्चे रह जायेंगे। निदा फ़ाज़ली कहते हैं 

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

        सरलभाषा में लिखी गई ये गीतियां गेय भी हैं।  एकल परिवार के युग में संयुक्त परिवार की विशिष्टताओं का वर्णन करते हुए कहा गया है- 



यथा विशालः वटवृक्षोऽस्ति।

तथा दयालुः पितामहोऽस्ति।।

इक्षुदण्ड इव सदा मधुरः।

अहं तथा मे प्रियपरिवारः।।

वटवृक्षोऽहम् तथा वृक्षाः दोनों बालगीत अभिनेय भी हैं अतः इन्हें अभिनयगीत कहा गया है। मेघाः बालगीत पर्यायशब्द विशेषणगीत हैं।  यहां मेघ शब्द के जलद बलाहक वारिमुच वारिधर अम्बुधर आदि विशेषणो प्रयोग किया गया है| संख्यागीतिः बालगीत अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है।

         यहां एक से लेकर 20 तक की  संख्याओं का प्रयोग किया गया है ताकि  बालकों को गीत के साथ-साथ संख्याओं का ज्ञान भी हो सके-



त्रयोदश स्थिताः वृद्धा स्त्रियः सन्ति चतुर्दश।

पंचदश गजाः तत्र छात्रा गच्छन्ति षोडश।।

वर्णानां मनोरमा सृष्टिः गीति में श्वेत, गौर, पीत,‌ रक्त आदि वर्णों का उल्लेख किया  गया है। छोटे बालक रंगों के नाम संस्कृत में पहचान सकें, इसके लिए ऐसे प्रयास प्रशंसनीय हैं। देहि गीति में चतुर्थी विभक्ति का शिक्षण किया गया है-

वृक्षेभ्यः देहि पानीयं भिक्षुकेभ्यः च भोजनम्।

रंकेभ्यः देहि वस्त्राणि वनाय देहि रक्षणम्।।

          यहां एक तरफ तो देने के अर्थ में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है ऐसा बालक सीख जाता है साथ ही अनायास वह मानवीय मूल्यों को भी आत्मसात् करता रहता है। 

           मम मार्जारी गीति पालतु बिल्ली के प्रति बच्चों के सहज अनुराग को अभिव्यक्त करती है-



चपला चतुरा मम मार्जारी।

ननु दुर्ललिता मम मार्जारी।।

घृतं खादति पिबति च दुग्धम्।

सदा खादति मम मार्जारी।।

  चपल चतुर है मेरी बिल्ली

कैसी नटखट है मेरी बिल्ली

घी खाती और दूध भी पीती

सब कुछ खाती मेरी बिल्ली।।



   संग्रह की सभी गीतियां भावों से भरी हुई हैं। संस्कृत बालसाहित्य में यह नवीन कृति सर्वथा स्वागत के योग्य है।

Friday, January 2, 2026

गायत्रम् _ संस्कृत कविता का सशक्त निदर्शन

कृति - गायत्रम्

कृतिकार - प्रवीण पण्ड्या

विधा - कवितासंग्रह

प्रकाशक - विश्वबानी पब्लिकेशंस, भोपाल

प्रकाशन वर्ष - 2025

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या -96

अंकित मूल्य - 220/-



   प्रवीण पण्ड्या की गणना संस्कृत के प्रखर, तेजस्वी कवियों में होती है। कवि संस्कृत में चार काव्यसंग्रह, एक नाट्ससंकलन, एक कथासंग्रह, छह समीक्षात्मक पुस्तकों सहित आठ अनुवादसंग्रह एवं तीन शास्त्रीय ग्रन्थ प्रकाशित हैं। साहित्य अकादेमी के दो पुरस्कारों सहित कवि को आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी सम्मान, माघ पुरस्कार आदि प्राप्त हैं। प्रस्तुत संग्रह कवि का पांचवा काव्यसंग्रह है।

          इस संग्रह में कविताएं मुक्तच्छन्द में निबद्ध हैं। संकलित कविताओं की संख्या 36 हैं। कवि ने स्वयं इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है। संग्रह के आरम्भ में ही कवि अपनी कविताओं को द्रष्टा की कविता न कहकर श्रोता की कविताएं कहता है - कोई कवि मुझमें अवतीर्ण हुआ। वह बोला। मैंने कभी सावधान तो कभी अनवधान होकर सुना। ये द्रष्टा की नहीं, श्रोता की कविताएं हैं। श्रवण से मैं कवि हुआ। संग्रह के नामकरण को अन्वर्थ बताते हुए कहते हैं कि ज्ञान (सविता) जब धरती को छूता है तो वह गायत्री होता है। कवि अपनी अजंलि में जितना ले पाते हैं, वह धरातल पर उतरा हुआ गायत्र होता है।



       प्रथम कविता कस्त्वम् (कौन हो तुम) एक दीर्घ कविता है। कवि प्रश्न करता हुआ कहता है -

हे! हे! हे!

उपरि व्योम,

न स्वात्मनि विस्तरति।

अधो धरणी,

न स्वातन्त्र्येण प्रसरति।

उभे गुप्तं परतस्तुभ्यम्।

इतस्ततो या दिशज्ञता न दिशो

डाकिन्यस्त्वदिङ्गितैकजीविन्यः।


हे कौन हो तुम?

ऊपर आकाश नहीं फैलता है

स्वात्मा में,

और नीचे धरती

नहीं पसरती है अपनी मर्जी से।

दोनों जासूस हैं तुम्हारे।

इधर उधर की दिशाएं दिशाएं नहीं ,

तुम्हारी डाकिनियां हैं।      

         आत्मविष्णवो वयम् कविता युगबोध की कविता है, जो अपने समय का संज्ञान लेती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प की कर्णावती यात्रा में सडक के दोनों ओर सात फीट की दीवार बनाकर झुग्गी झोपडियोें को उनकी दृष्टि से बचाने का प्रयास किया गया था। इस को लेकर कवि ने यह कविता रची है-

राजन्!

आयाति ते राष्ट्रं सम्राट्,

किमर्थं दिदर्शयिषुस्त्वं

देशस्याऽर्धम्,

अर्धं चावृत्य।


कोई सम्राट् आ रहे हैं

राजन्! उन्हें क्यों दिखाना चाहते हैं

आधा अधूरा देश।

(आधे को छुपाकर)    



       समकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाले अनेक कवि हैं किन्तु केवल समसामयिक घटनाओं के वर्णन मात्र से ही आधुनिकता नही आती है। घटनाओं का सपाट वर्णन उसे अखबार की खबर मात्र जैसा बनाकर रख देता है। प्रतीयमानार्थ अर्थात् व्यंग्यार्थ जब तक काव्य में नहीं होगा, वह उत्कृष्ट नहीं बन सकती है। प्रवीण पण्ड्या एक कुशल कवि हैं। वे समसामयिक घटनाओें को यदि अपनी कविता का पात्र बनाते हैं तो उसमेे एक समूचा युगबोध प्रतिबिम्बित होता दृष्टिगोचर होता है-

सम्राट्! अलमलम्

ते देदीप्यमानेभ्यो यानपथेभ्यो यानेभ्यः,

उज्ज्वलं प्रकाशमानेभ्यो विविधेभ्यो बाह्यप्रदर्शनेभ्यः समं

तोलयितुम्,

नो निर्वापयितुमशक्यैर्हृज्योतिभिः।

सम्राट्!

देहविष्णुस्त्वम्

आत्मविष्णो वयम्।


सम्राट्!

तुम्हारी

चमाचम सडकों, कारों

झमाझम तामझामों की तुलना मत कर बैठना

हमारे हृदयों के उजाले से।

देह बडा हो सकता है तुम्हारा

आत्मा में विशाल हैं हम।

      संग्रह में दीर्घ कविताओं के साथ लघु कलेवर वाली कविताएं भी है। तेन तत्र. किं दृष्टम् डर कर भागे हुए एक बच्चे के मनोविज्ञान को टटोलने का प्रयास करती है तो विन्दुवृत्तौ कविता बिंदु और वृत्त के माध्यम से परमात्मा और प्रकृति की कथा कहती है। मिथकों के माध्यम से भी कवि अपना कथ्य प्रस्तुत करता है और वर्तमान राजनीति के प्रत्येक पक्ष को प्रकट करता हुआ अक्षाः प्रवर्तन्ताम् रचता है। सन्नाहः अथार््त् तैयार नामक छोटी सी कविता हमारे बाजारवाद की परते उघाड कर रख देती है। अगर आकाश यह सोचे कि राकेट को भेजना बच्चों का खेल है तो वह गलत सोच रहा है। वह तो इसलिए भेजे जा रहे हैं क्योंकि वहां अभी तक पृथ्वी की तरह बाजार नहीं खुला है और इस कारण आकाश को अधूरेपन का अहसास होता होगा-

व्योमन्!

त्वयि न सन्ति विपणयः।

वराकस्य तेऽनैयून्यसम्पादनाय

यतामहे वयम्,

नो रॉकेटप्रेक्षेपणं

नास्ति

नास्ति

नास्ति

बाललीला।।



      नास्ति क्रिया का प्रयोग तीन बार दृढता के लिए किया गया है। विचिकित्सा कविता में कवि वैयाकरणों, अर्थवेत्ताओं, वैतालिकों आदि से कुछ प्रश्न करता है। अन्नदाता शब्द के लिए कवि कहता है कि किसानों के लिए प्रयुक्त अन्नदाता शब्द क्या उपहास मात्र नहीं बन कर रह गया है क्योंकि अपनी देह को जोतते हुए ये किसान अब स्वयं अन्न बन चुके हैं -

अर्थज्ञ!

अन्नदातेति हासस्तु नास्ति,

हासस्तूज्ज्वल उक्तः।

नास्ति किमेष उपहासः कश्चित्

स्वात्मनि दैन्यं जीवते

स्वयमन्नीभूताय

कस्मैचित्।

कर्षन्तो स्वदेहं कर्षका एव।

       यहां कृष् धातु का प्रयोग साभिप्राय किया गया है। इसी तरह कवि प्रश्न करता है कि जब संसद् में सांसद एक साथ मिलकर बैठ (सदन) नहीं सकते तो फिर वह संसद् कैसी, वे सांसद कैसे-

एकीभवनाय न सदनं येषां

तैः कथं संसद् भवति-

इति कस्तावन्मां बोधयितुं शक्तो

निःशक्ते क्षणे?

ऐक्यं विघटियुतं वांछन्तः

सांसदाः कथं भवेयुः?



       ये कविताएं एक ओर संस्कृत भाषा के गाम्भीर्य को प्रदर्शित करती है तो दूसरी ओर यह भी सिद्ध करती है कि संस्कृत में समसामयिक विषयों पर बेहतरीन कविताएं रची जा रही हैं।



Thursday, January 1, 2026

आधुनिक संस्कृत साहित्य का विहंगावलोकन

 कृति -  भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् modern sanskrit literature in india:A Bird's eye view

कृतिकार - शुभ्रजित् सेन

विधा - आलोचना

प्रकाशक - संस्कृत पुस्तक भण्डारकोलकत्ता

प्रकाशन वर्ष - 2019

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 504

अंकित मूल्य - 600/-



      आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्यन्त विस्तृत है। न केवल मात्रात्मक अपितु गुणात्मक दृष्टि से भी संस्कृत का आधुनिक साहित्य प्रकर्ष पर है।  इसके परिचय के लिए कई ग्रन्थ भी लिखे गए हैयथा हीरालाल शुक्लकेशवराव मुसलगांवरकरश्रीधरभास्कर वर्णेकरदेवर्षि कलानाथ शास्त्रीआचार्य राधावल्लभ त्रिपाठीमंजुलता शर्मा आदि द्वारा लिखे गए ग्रन्थ। आधुनिक संस्कृत साहित्य के विहंगावलोकन के लिए युवा विद्वान् शुभ्रजित् सेन द्वारा भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् यह ग्रन्थ लिखा गया है। ग्रन्थ संस्कृत भाषा में ही लिखा गया है।



        प्रस्तुत ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है-

प्रथम अध्याय - आधुनिकतायाः तत्स्वरूपं च

      इस अध्याय में आधुनिकता की परिभाषाएं देते हुए अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के काल विभाजन पर भी विचार किया गया है। यहां भारतीय विद्वानों के मतों के साथ-साथ  पाश्चात्य विद्वानों के मतों का भी उल्लेेख करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि आधुनिकता न केवल कालगत है और न केवल मनोभावगत है अपितु दोनों ही आधुनिकता के नियामक शक्तिरूप हैं- एतदाधुनिकत्वं न कालगतं किन्तु मनोभावगतमिति। किन्तु न हि केवलं मनोभावापरपर्यायमाधुनिकत्वंसमयनिष्ठमपीति। एतद्द्वयमाधुनिकसाहित्यस्य तथा संस्कृतसाहित्यस्यापि नियामकशक्तिरूपम्।

द्वितीय अध्याय - आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये वस्त्वाङ्गिकदृष्ट्या परिवर्तनम्

               प्रस्तुत अध्याय में आधुनिक नाटक साहित्यगद्य साहित्य तथा पद्य साहित्य में आये प्रमुख परिवर्तनों तथा नवीन प्रवृत्तियों का सोदाहरण उल्लेख किया गया है। आधुनिक संस्कृत नाटकों मे आये भाषागत परिवर्तनोंतकनीकि परिवर्तनोंवस्तुगत परिवर्तनों के साथ रंगमंच के परिवर्तनों पर भी चर्चा की गई है। नाट्य की एक प्रमुख विधा नृत्यनाटिका का भी यहां वर्णन किया गया है। रेडियो नाटक की चर्चा करते हुए राधावल्लभ त्रिपाठी कृत प्रेक्षणकसप्तकम् को इस विधा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया हैकिन्तु यह सही नहीं है। प्रेक्षणकसप्तकम् रेडियोनाटक न होकर नुक्कडनाटक विधा का ग्रन्थ है।

   संस्कृत गद्यकाव्य की प्रवृत्तियों में प्रणयकथासामाजिक-कथालोककथाहास्यकथाचित्रकथा आदि के साथ उपन्यास नामक महत्त्वपूर्ण विधा का सोदाहरण वर्णन है। साथ ही ललितनिबन्ध नामक नवीन विधा पर चर्चा उपादेय है। संस्कृत कविता में हुए अन्तरंग और बहिरंग परिवर्तननवीन छन्द-प्रयोग,   महाकाव्य विधा में हुए परिवर्तन जीवनीमूलक काव्य आदि के वर्णन से यह अध्याय महत्त्वपूर्ण बन जाता है।



तृतीय अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतालंकारशास्त्रम्

      काव्य की समीक्षा के लिएउसके लक्षणभेदगुण-दोष आदि की चर्चा के लिए काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) रचे जाते रहे हैंजो लेखकसमीक्षक और सहृदय पाठकों/श्रोताओं के लिए उपादेय होते हैं। चूंकि संस्कृत में नये काव्य लिखे जा रहे हैं तो तदनुरूप नवीन काव्यशास्त्र भी लिखे गए हैं। इस अध्याय में पण्डितराज जगन्नाथ के बाद से 21 वीं सदी तक लिखे गए महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों पर चर्चा की गई है। यहां अलंकारशास्त्री के परिचय के साथ उनके द्वारा लिखित अलंकारशास्त्र का संक्षिप्त परिचय दिया गया हैयथा - रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत काव्यालंकारकारिकाअभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत अभिराजयशोभूषणम्राधावल्लभ त्रिपाठी कृत अभिनवकाव्यालंकारसूत्रब्रह्मानन्द शर्मा कृत रसालोचन। 

चतुर्थ अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतेवाङ्मये छन्दसां वैचित्र्यम्

         यद्यपि छन्द वैविध्य का वर्णन द्वितीय अध्याय में किया गया है किन्तु यहां पृथक् से उसका वर्णन विस्तार से किया गया है। मुक्तच्छन्दहिन्दी भाषा के छन्दहाइकुसॉनेटतांकासीजो जैसे वैदेशिक छन्द आदि छन्दोवैविध्य की विशद चर्चा की गई है। साथ ही वीरेन्द्र भट्टाचार्यकालीपद तर्काचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी के छन्द प्रयोग पर अलग से चर्चा की गई है। गौरतलब है कि  सॉनेट छन्द प्रयोग में वीरेन्द्र भट्टाचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी ने विशेष रूप से काव्यसर्जन किया है। इसी तरह हर्षदेव माधव हाइकुतांका और सीजो छन्दों के प्रयोग में विशेष रूप से जाने जाते हैं।



पंचम अध्याय - भारतवर्षे अर्वाचीनसंस्कृत वाङ्मय कवयितारः

     प्रस्तुत अध्याय के चार दिशाओं के आधार पर चार भाग करके प्रत्येक दिशा में स्थित राज्यों का आधुनिक संस्कृत में किये गए योगदान का वर्णन किया गया है। उत्तरप्रदेशहिमाचलप्रदेशमध्यप्रदेशराजस्थानदिल्ली आदि राज्यों के साहित्यकारों के योगदान के वर्णन के साथ त्रिपुरानागालैण्डमिजोरम जैसे राज्यों का संस्कृत साहित्य में योगदान का वर्णन इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है। उत्तरप्रदेशराजस्थान आदि राज्यों के साहित्यिक योगदान को तो रेखांकित किया जाता रहा है किन्तु पूर्वोत्तर के इन राज्यों में संस्कत में क्या कार्य हो रहा हैइसकी चर्चा प्रायः उपलब्ध नहीं होती है।

षष्ठ अध्याय - बङ्गभूमेः अर्वाचीनसंस्कृतसाहित्यम्

             यद्यपि पंचम अध्याय में बंगाल प्रदेश के येागदान पर चर्चा की जा सकती थी किन्तु लेखक ने इस प्रदेश के विस्तृत वर्णन के लिए पृथक् से अध्याय रखा है। ब्राह्मण-वशिष्ठ न्याय से हुए इस उल्लेख का कारण सम्भवतः लेखक का बंगभूमि से सम्बद्ध होना हो सकता है। इस अध्याय को दो पर्वों में विभक्त करके विधा तथा रचनाकार की दृष्टि से बंगप्रदेश के साहित्यिक योगदान का वर्णन किया गया है। यहां हरिदास सिद्धान्त वागीशयतीन्द्र विमल चौधुरीवीरेन्द्र भट्टाचार्य के साहित्यिक कार्यों के उल्लेख से पाठक समृद्ध होता है।



सप्तम अध्याय - आधुनिक संस्कृतसाहित्ये भारतवर्षे कवयित्र्यः

          संस्कृत साहित्य में महिला लेखकों के योगदान के वर्णन के लिए यह अध्याय रखा गया हैजो प्रशंसनीय है। प्रायः यह समझा जाता है कि संस्कृत में पुरुष लेखकों की ही रचनाएं हैं किन्तु आधुनिक संस्कृत की प्रायः 30 महिला लेखकों के साहित्य का यह परिचय इस को झुठला देता है।



 परिशिष्ट के रूप में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार के विजेता संस्कृत साहित्यकारों तथा उनकी कृतियों की सूची दी गई है। साथ ही प्रमुख आधुनिक संस्कृत साहित्कारांें के चित्रों को भी यहां दिया गया है। यह ग्रन्थ आधुनिक संस्कृत का परिचय बखूबी प्रस्तुत करता है। यद्यपि इस ग्रन्थ मंे कतिपय रचनाकारों और कृतियों का उल्लेख नहीं हो पाया है क्योंकि एक ही ग्रन्थ में यह सम्भव नहीं है तथापि अपनी उत्तम सामग्री से यह ग्रन्थ उपादेय सिद्ध होगा।


Sunday, November 3, 2024

संस्कृत में नुक्कड़ नाटक : प्रेक्षणसप्तकम्

कृति _ प्रेक्षणकसप्तकम्

रचयिता _ राधावल्लभ त्रिपाठी

विधा _ प्रेक्षणक (नुक्कड़नाटक)

प्रकाशक_ प्रतिभा प्रकाशन दिल्ली

संस्करण _ 1997 प्रथम संस्करण

पृष्ठ संख्या_ 131

अंकित मूल्य _ मूल्य अंकित नहीं



              लोक-नाट्य-परम्परा शास्त्राधारित परम्परा को सर्वजन सुलभ बनाने के लिए विकसित हुई है। प्रेक्षणक विधा भी इसी लोक-नाट्य-परम्परा का ही एक रूप है। वस्तुतः प्रेक्षणक को वर्तमान के नुक्कड़ नाटकों (स्ट्रीट प्ले) का ही एक प्राचीन रूप कहा जा सकता है जो संक्षिप्त दृश्य-संयोजन के माध्यम से एक अंक में निबद्ध होकर कहीं गली, चतुष्पथ (चौराहा)तथा एकत्रित सामाजिकों के मध्य खेला जा सके। कभी मदिरालय या मेला आदि में इन प्रेक्षणकों का प्रयोग कवि अपने कथ्य को प्रस्तुत करने के लिए करता था। डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी इस संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हैं-

"प्रेक्षणकं नाम नाट्यशास्त्रपरम्परायां रूपकस्यावान्तरभेदेषु उपरूपकेषु वा पठितं दृश्यकाव्यम् । तल्लक्षणं भोजस्य शृङ्गारप्रकाशे रामचन्द्रगुणचन्द्रयोर्नाट्यदर्पण इत्थं प्राप्यते"-

रथ्या-समाज-चत्वर-सुरालयादौ प्रवर्त्यते बहुभिः ।

पात्रविशेषैर्यत् तत् प्रेक्षणकं कामदहनादि ।।

"प्रेक्षणकं रथ्यासु-समाजेषु (मेलायां लोकोत्सवेषु वा) चत्वरेषु सुरालयेष्वपि वा अभिनेतुं शक्यते ।'

            दक्षिण भारत (आन्ध्र) में प्रचलित "वीथीनाट्य" से भी प्रेक्षणक की साम्यता है। तमिलनाडु में इसे "तेरुकुत्तु" कहा जाता है। कर्नाटक के "यक्षगान" केरल के "कूटियाट्टम्" और श्रीलंका के "नाडुकूटु" से भी इसका कुछ सादृश्य है। इन प्रेक्षणकों के अभिनय के लिए रंगमंच की आवश्यकता नहीं होती। दर्शकों के मध्य कतिपय पात्रों द्वारा कम समय में किसी खुले स्थान पर अभिनीत होकर मनोरंजन का पुट लिये हुए ये प्रेक्षणक अपने उद्देश्य में सहज ही सफलता प्राप्त कर लेते हैं।



             आधुनिक संस्कृत-नाट्य-साहित्य में भी इस प्राचीन परम्परा के माध्यम से नवीन समस्याओं के सम्प्रेषण के स्तुत्य प्रयास किये जा रहे हैं। "प्रेक्षणससकम्" डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी के सम-सामयिक व युगानुरूप विषयों पर लिखे गये सात प्रेक्षणकों का संग्रह है। इनमें से कतिपय प्रेक्षणक यथा "धीवरशाकुन्तलम् " "सोमप्रभम्"" तथा "मेघसन्देशम् दूर्वा नामक संस्कृत पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित किये गये हैं। "मुक्ति", "मशकधानी", "गणेशपूजनम्" तथा "प्रतीक्षा" को सम्मिलित करके ये ७ प्रेक्षणक प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली से पुस्तकाकार ग्रहण कर चुके हैं। आधुनिक युग की ज्वलन्त समस्याओं एवं सामाजिक विसंगतियों को प्रतिविम्बित करने हेतु डॉ. त्रिपाठी ने नाट्य के विशाल-फलक पर प्रेक्षणक विधा में इस कृति की रचना की है।

1 सोमप्रभम्

                               "सोमप्रभम्" की विमला की विवशतायें वर्तमान की वधुओं की आम विवशतायें हैं। यह प्रेक्षणक "यौतुक प्रथा" (दहेज प्रथा) को केन्द्र में रखकर रचा गया है। विमला नौकरी करने वाली एक ऐसी विवाहिता महिला है, जिसका पति दूसरे शहर में नौकरी करता है। विमला अपने विवाह में अल्प दहेज लेकर आई है, ऊपर से उसकी प्रथम सन्तति कन्या है, जिसका नाम सोमप्रभा है। यही कारण है कि विमला के सास- ससुर उसे पीड़ित करते रहते हैं, किन्तु विमला एक आदर्श भारतीय वधू के समान सब कुछ मौन रूप से सहन करती रहती है। सोम प्रभा भी अपनी माँ की विवशता से परिचित है, वह कहती है- "अहं पुत्री जाता इति हेतोः सा कुप्यति। नैव किम् ?' किन्तु वह पाँच वर्षीय कन्या अपनी माँ की सहायता नहीं कर पाती। सहसा एक दिन छोटी-सी बात को लेकर सास-ससुर व विमला में विवाद बढ़ जाता है। सास उसे बुरा-भला कहती है और पूरा दहेज न लाने का ताना मारती है- "कस्मिन् मुहूर्ते अनया पिशाच्या पदक्षेपो विहितोऽस्माकं गृहे। सर्वानस्मानियं खादिष्यति।..... तव पिता ..... अवशिष्टस्य यौतुकराशेरिदानीं यावदपि यः पूर्ति न करोति न दर्शयति च स्वकलुषितं मुखमपि अधुना'। सास-ससुर उसे पाकशाला में ले जाकर मारने का प्रयत्न करते हैं।



 इस दारुण स्थिति में कवि की आर्त्त-वाणी नेपथ्य से गूंज उठती है-

क्षणे क्षणे प्रवर्धते धनाय हिंस्त्रता खरै- 

र्विलोप्यतेऽतिनिर्दयं च जन्तुभिर्मनुष्यता।

विभाजितं जगद्द्विधा, निहन्यते च घातकै- 

रतीव दैन्यमागतास्ति साधुता मनुष्यता ।।"



        सोमप्रभा चुपके से अपनी माँ की दयनीय स्थिति को देखकर समीप के थाने से पुलिस (आरक्षकों) को बुलाकर लाती है। इस प्रकार विमला की प्राण रक्षा होती है और उसके दहेज लोभी सास-ससुर पकड़े जाते हैं। इस प्रेक्षक के सुखान्त में कवि की आशावाहिनी दृष्टि प्रतिबिम्बित होती है।


2   मेघसन्देशम्

                        पर्यावरण की बिगड़‌ती स्थिति वर्तमान की प्रमुख समस्या है। "मेघसन्देशम्" का बाल-पात्र सौरभ अपने शहर में वर्षा न होने से चिन्तित है। बाल सुलभतावश यह मेघ को पत्र प्रेषित कर उसे बुलाने का उपक्रम करता है-



एहि रे! एहि रे!!

कृष्णमेघ समुपेहि रे!

मम नगरं समुपेहि रे! 

देहि रे, देहि रे!! 

अलमये जलं देहि रे! 

त्वामाह्वयतीह धरेयं विकला 

प्रतीक्षते त्वां जनता सकला 

गर्ज गर्ज वर्ष वर्ष 

रसं निधेहि रे! 

एहि रे! एहि रे।। 

कृष्णमेघ समुपेहि रे!

         सौरभ पत्रमञ्जूषा (लैटर-बॉक्स) में पत्र डालना चाहता है, पर वह मेघ का पता नहीं जानता। सौरभ की बहन लता उस पत्र को यह कहकर नीम के पेड़ पर रख देती है कि नीम अपनी शाखा रूपी बाहों से मेघ को यह सन्देश पहुंचा देगा। कुछ समय पश्चात् गर्जता घुमड़ता मेघ पहाड़ों पर उतरता हुआ बस्ती में आ जाता है। सौरभ के प्राध्यापक पिता को इस घटना से आश्चर्य होता है और उनकी इस धारणा को भी झटका लगता है- "मेघस्तु सन्देशं न शृणोति, नापि नयति।


3 धीवरशाकुन्तलम्

                "धीवरशाकुन्तलम्" में कालिदास रचित" अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नामक नाटक के षष्ठाङ्क के विष्कम्भक के कथानक को पल्लवित कर सम-सामयिक बनाया गया है। आधुनिक समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार व उत्कोच-प्रवृत्ति की ओर इसमें संकेत किया गया है। शकुन्तला की खोई हुई अंगूठी धीवर (मछुआरे) को प्राप्त हो जाती है। वह उसे बेचने के लिए हस्तिनापुर लाता है। वर्तमान के वणिक् एवं आरक्षक (पुलिस) कालिदास के समय से अधिक भ्रष्ट व पतित हो गये हैं। वणिक् उस अंगूठी को नकली बताते हुए हड़पना चाहता है। वाद-विवाद के मध्य सैनिक पहुँच जाते हैं। राजा दुष्यन्त अंगूठी पाकर धीवर के लिए पुरस्कार भेजते हैं। "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" के सिपाही तो पुरस्कार की राशि में से आधा भाग ले ही लेते हैं, किन्तु "धीवरशाकुन्तलम्" के वर्तमान सिपाही तो धीवर को मार-पीटकर समस्त धन हड़प लेते हैं, क्योंकि उनका मानना है- "राजपुरुषाणां कृते सर्वस्मिन् धने भागांशो भवत्येव"



4 मुक्ति: _

              "मुक्ति" एक प्रतीकात्मक प्रहसन और हास्य से युक्त प्रेक्षणक है। यह प्रेक्षणक हमें मनोरञ्जक ढंग से यह सन्देश देने का प्रयास करता है कि मनुष्य की मुक्ति अपने दायित्व पूरे करने में ही है। आलस्य से युक्त सूत्रधार मञ्ज्ञ पर जंजीरों से जकड़ा हुआ है। नटी उसकी अकर्मण्यता पर उपालम्भ देती है। जब सूत्रधार अपने दायित्वों के प्रति सजग होता है तो एक-एक करके उसकी सब श्रृंखलाएँ खुल जाती है। प्रेक्षणक के अन्य पात्र वर्तमान विसंगतियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हैं, यथा भिक्षुक नामक पात्र, जो भगवान् के नाम पर, समाजवाद के नाम पर, प्रजातन्त्र के नाम पर, यहाँ तक कि राम मन्दिर के नाम पर भी भीख माँग लेता है "दातः । भगवनाम्ना कि़चिद् देहि। समाजवादनाम्ना देहि। प्रजातन्त्रनाम्ना देहि। राममन्दिरनाम्ना देहि। उन्मुक्तापणनाम्ना देहि। 

          या फिर "विघ्नराज" नामक नेता, जो मध्यावधि चुनावों के कारण समय से पूर्व ही मत माँगने आया है। सूत्रधार भी आमजन के समान भारतीय नेताओं को पाँच वर्ष पूर्व अपने बीच में पाकर आश्चर्यचकित हो जाता है- "कुतोऽयमाकस्मिकः स्नेहानुबन्ध:, कथं च अप्रत्याशितमिदमागमनम् ? पूर्वं तु पञ्चवर्षेषु सकृदेव श्रीमतां दर्शनप्राप्यत।' कवि की पीड़ा है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी हमारी परतन्त्रता की भावना नष्ट नहीं हो पाई है-

स्वातन्त्र्येऽपि समागते विदलितो नो पारतन्त्र्यात्मको।

भावो भास्वति सत्यपि प्रभवति कलेशाय गाढं तमः ।।


5 मशकधानी _

                      "मशकधानी" (मच्छरदानी) भी हास्य-व्यंग्यपूर्ण प्रतीकात्मक प्रेक्षणक है। सूत्रधार जैसे ही नाटक की प्रस्तावना करने लगता है, वैसे ही उसको मच्छर काटने लगते हैं और वह परेशान हो जाता है।


 वहाँ पर चार व्यक्ति अपने श्रेष्ठी हेतु मशकधानी लेकर प्रवेश करते हैं। श्रेष्ठी शुद्रक रचित "मृच्छकटिकम्" के राजश्यालक के समान अशुद्ध भाषा का प्रयोग करता है। श्रेष्ठी की असावधानी से मशकधानी में मच्छर घुस आते हैं। परेशान श्रेष्ठी सूत्रधार से विवाद करते हुए मंच से प्रस्थान कर जाता है और भरत वाक्य के साथ ही प्रेक्षणक समाप्त हो जाता है। सूत्रधार के कर्णपटल पर मच्छर को गुनगुनाहट पर कवि द्वारा "उत्तररामचरितम्" के पद्य की पूर्वार्द्धपंक्तियों का अनुकरण द्रष्टव्य है-

किमपि किमपि मन्दं मन्दमासत्तियोगाद्-

अविरलितकपोलं जल्पतीवाक्रमेण ।

क इह मम नु कर्णे तन्तुनादं वितन्वन् 

रणति च परमधूर्तः कोऽपि कर्णे जपोऽयम् ।।

                          कवि मच्छर के व्याज से ऐश्वर्य में लिप्त श्रेष्ठी-गण व सामन्तों पर साहित्यिक- कटाक्ष करता है- "ननु मशकोऽयम्। यथा ऐश्वर्यमदावलिताः श्रेष्ठिनः सामन्ता वा श्रमिकाणां दरिद्राणां तथाऽयं रक्तमस्माकं चूषति"

             सूत्रधार मच्छरों को गालियाँ देना चाहता है किन्तु उसे संस्कृत भाषा की यह कमी लगती है कि इसमें अन्य भाषाओं के समान बढ़िया-बढ़िया गालियाँ नहीं है- "धत्। इयमेव संस्कृतभाषायाः न्यूनता। अत्र प्रचुराः गालयो न सन्ति। अन्याः भाषा: अवलोक्यन्तां तावत् । शतशः सहस्रशः गालिभिस्ता भाषाः समृद्धाः सन्ति। कथं प्रगतिशीलाः सन्ति ताः भाषाः ""


6 गणेशपूजनम्_ 

                     "गणेशपूजनम्" प्रेक्षणक द्वारा कवि ने विभिन्न उत्सवों के आयोजकों द्वारा जनता के धन को हड़पे जाने का चित्रण किया है। बुलाकीराम भी गणेशोत्सव समिति का ऐसा ही आयोजक सचिव है, जो बलात् चन्दा वसूल कर उसका हिसाब भी नहीं देता है, किन्तु एक बार गणेश की प्रतिमा इस स्थिति से विचलित होकर बुलाकीराम को सजा देती है तब बुलाकीराम चन्दे का हिसाब देने व समिति का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से करवाने हेतु तैयार हो जाता है। आज की परिस्थितियों में, जबकि आम व्यक्ति भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि को चुपचाप सहन करते हुए कोई प्रतीकार नहीं कर रहा है, तब ईश्वर की प्रतिमाओं से ही किञ्चित् परिवर्तन की आशा की जा सकती है। इस प्रेक्षणक में वर्णित घटनाओं, यथा गणेश पूजन के दिन एक अभील विडियो फिल्म दिखलाना, भ्रष्टाचार व घोटालों में लिप्त श्रेष्ठों द्वारा चन्दा दिये जाने पर उसे "महाज्ञानी", "महादानी", "पुण्यात्मा" बतलाना और गणेश बन्दना से पूर्व ही श्रेष्ठी-वन्दना करना आदि के द्वारा हमारे आधुनिक समाज में व्याप्त स्वार्थलोलुपताओं, विसंगतियों, विद्रूपताओं व असमानताओं का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया गया है।



7 प्रतीक्षा_ 

                 "प्रतीक्षा" नामक प्रेक्षणक वर्तमान के उस मध्यवर्गीय पिता की त्रासदी को प्रस्तुत करता है, जिसकी पुत्री नौकरी करती है और घर में देर से लौटती है। सेवानिवृत्त भवेश अपनी पुत्री कल्पना की प्रतीक्षा कर रहा है। पड़ोसिन भाटिया के साथ भवेश की पत्नी भामा के वार्तालाप से नगर में व्याप्त हिंसा और अतिचारों की सूचना प्राप्त होती है। बिजली के बन्द हो जाने, सहसा वर्षा होने, अंधकार बिर आने एवं टेलीफोन के बन्द होने जाने की पृष्ठभूमि से आतंक व घबराहट का वातावरण निर्मित हो जाता है। अन्ततः कल्पना लौट आती है। पिता भवेश अपनी पुत्री पर किये गये अविश्वास के लिए पश्चाताप व्यक्त करते हैं। मनुष्य अपनी कामवासना के कारण इतना पतित हो चुका है कि मासूम कन्यायें भी सुरक्षित नहीं है- "अष्टादशवर्षीयां तरूणीं ग्रामादागतां नगरे अज्ञाताः केचन तस्करा बलादपनीतवन्तः. विंशवर्षदेशीयो यौवनोन्मत्तः कश्चिन...प्रतिवेशिनः कन्यां षड्वर्षदेशीयाम्... घोरः कालः। किं क्रियते। 

                        कविवर डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी के भरतवाक्य प्रायः प्रेक्षणक के पात्रों के नाम भी आत्मसात् किये हुए हैं, यथा-

दुर्जनैर्जलप्तं नान्यथा कल्प्यताम्। 

कल्पना स्यात् सदा मंगलाकृता ।। 

स्यात् प्रकाशोऽक्षयो जीवने झंकृता । 

भारती भामती चास्तु सौख्यप्रदा।। 


इन प्रेक्षणकों में से "धीवरशाकुन्तलम्", "मशकधानी", "सोमप्रभम्", "मुक्ति" की अनेक प्रस्तुतियाँ सागर, पूना प्रभृति नगरों में हो चुकी हैं और ये अखिल भारतीय नाट्य स्पर्धाओं (मध्यप्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित) में पुरस्कृत भी हुई हैं। इन प्रेक्षणकों का हिन्दी अनुवाद भी स्वयं कवि ने ही कर दिया है, जिससे इन रचनाओं में सर्वजन-संवेद्यता आ गई है।



       कवि ने अपने कथ्य को सर्वजनसुलभ बनाने हेतु परम्परा में से अभिनव का सर्जन करते हुए प्रेक्षणक विधा का चयन किया है। इन प्रेक्षणकों के द्वारा कविवर डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी की युगीन जागरुकता भी प्रमाणित होती है। वस्तुतः संस्कृत- साहित्य की आधुनिकता उसके युग-दायित्व के प्रति सावधानता से ही हो सकती है। डॉ. जगन्नाथ पाठक कहते हैं-

कविता तद् वक्तव्यं येन तमो यातु नाशमिह किञ्चित्। 

नालङ्कारैर्न गुणैः कवित्वमिह सार्थकं भवति ।।

मराठी से अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास का हिंदी अनुवाद

कृति - अर्वाचीन संस्कृत साहित्य

लेखक - डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर (मूल मराठी) 

हिन्दी अनुवाद - डॉ. लीना रस्तोगी

प्रधान सम्पादक - आचार्य मधुसूदन पैन्ना

विधा - समीक्षा

प्रकाशक -कविकुलगुरू कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक

प्रकाशन वर्ष - 2022, प्रथम संस्करण

पृष्ठ संख्या - 502

अंकित मूल्य - 1095/- रू.



              अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में प्रभूत मात्रा में लिखा जा रहा है। साहित्य की प्राचीन एवं नूतन विधाओं में अनेक ग्रन्थ रचे व पढे जा रहे हैं। इन सब का परिचय देने के लिए साहित्य के इतिहास से सम्बन्धित ग्रन्थ भी लिखे जा रहे हैं। हीरालाल शुक्ल, केशवराव मुसलगावरकर, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, राधावल्लभ त्रिपाठी आदि ने समय-समय पर अपने ग्रन्थों में अर्वाचीन संस्कृत साहित्य पर लिखा है। श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने अर्वाचीन संस्कृत साहित्य की 1960 तक की रचनाओं का परिचय अपने शोधप्रबन्ध में दिया था।  यह शोधप्रबन्ध हांलाकि प्रकाशित है, किन्तु इसकी मूल भाषा मराठी होने से संस्कृत या हिन्दी भाषा के पाठकों को समस्या आती थी। हाल ही में डॉ. लीना रस्तोगी ने इस मराठी ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद किया है, जिसे कविकुलगुरू कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेक के प्रकाशन विभाग द्वारा अर्वाचीन संस्कृत साहित्य शीर्षक से ग्रन्थाकार में प्रकाशित किया गया है। 




       प्रस्तुत ग्रन्थ को 31 अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय में वर्णेकर जी ने अर्वाचीन संस्कृत का परिचय देते हुए बतलाया है कि इस ग्रन्थ में 17 वीं सदी से 1960 तक की रचनाओं का परिचय देने की आवश्यकता क्यों हुई-

   ऐसी दशा में, जब आधुनिक संस्कृत साहित्य का सर्वत्र अभाव दिखाई देता हो, तो यदि संस्कृत न जाननेवाले लोग तथा संस्कृत से मुँह मोडनेवाले नवशिक्षित लोग संस्कृत भाषा को 'मृत भाषा' मानने लगे, तो उसमें उनका कोई विशेष अपराध नहीं। "अमराणां भाषा मृता इति वदतोव्याघातः एवं' इस प्रकार के शब्दच्छलात्मक युक्तिवाद से संस्कृत की सजीवता सिद्ध नहीं हो सकती। संस्कृत को 'मृत भाषा' कहने का साहस ये लोग इसीलिए कर सकते हैं क्यों कि विगत ३०० वर्षों में उन्होंने संस्कृत साहित्य की निर्मिति देखी ही नहीं। प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ही उनके मतों का खण्डन करना उचित होगा। उसके लिए सोलहवीं शती के पश्चात् निर्मित साहित्य का, और उन साहित्यकर्मियों का यथोचित परिचय कराना आवश्यक है। इस कालखण्ड में अन्य प्रादेशिक भाषाओं में जो साहित्यिक विधाएँ, विशेषताएँ अथवा विचारधाराएँ दीखती र्थी, वे संस्कृत में र्थी या नहीं - यह भी प्रदर्शित करना आवश्यक है। यही नहीं यह भी सप्रमाण बताना होगा कि कालिदास, भट्टि, जयदेव, बैंकटाध्वरि आदि लेखकों ने जो विविध काव्यविधाएँ प्रवर्तित की थीं, वे इस आधुनिक कालखण्ड में अक्षुण्ण रहीं या खण्डित हुई। अंग्रेजी वाङ्मय के साथ संपर्क होने के कारण आधुनिक साहित्यक्षेत्र में कुछ नये वादों का जन्म हुआ। सो यह भी सप्रमाण सिद्ध करना पडेगा कि संस्कृत में वे उत्पन्न हुए या नहीं। 

                          द्वितीय अध्याय में आधुनिक साहित्य के प्रयोजनों पर प्रकाश डाला गया है। यहां संस्कृत में श्रद्धा, लोक जागृति, समाजहित, स्वाध्याय आदि को विभिन्न साहित्यकारों के कथन के माध्यम से प्रयोजन के रूप मंे प्रस्तुत किया गया है। तृतीय एवं चतुर्थ अध्याय में महाकाव्यात्मक चरित्रग्रन्थों एवं साधुजनों केे चरित्र ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। पंचम अध्याय में राजपुरुषों के चरित्र को आधार बनाकर रचे गये काव्यों का वर्णन है। 

                   षष्ठ अध्याय का शीर्षक है परकीय राजस्तुति। इस अध्याय में भारत पर शासन करने वाले मुगल शासकों यथा अकबर, जहांगीर आदि पर रचे गये काव्यों का वर्णन प्राप्त होता है। पाण्डुरंग कवि द्वारा रचित विजयपुरकथा में बीजापुर के मुस्लिम बादशाहों की जीवनियां चित्रित हैं। इसी अध्याय में आंग्ल राजाओं के चरित्र पर आधारित काव्यों का भी उल्लेख किया गया है। सर्वाधिक काव्य पंचम जार्ज पर लिखे गये, ऐसा उल्लेख मिलता है। यहां लेखक परकीय राजस्तुति को एक विचित्र बात बतलाते हुए इसे प्राचीन परम्परा की राजस्तुतिपरक काव्यरचना की एक दुःखद विकृति कहते है और इसे आजीविका से जोडते हुए इसका समाधान खोजने का प्रयत्न करते हैं। 



    सप्तम अध्याय में क्लिष्ट काव्यों का परिचय है तो 8 वें अध्याय में शास्त्रनिष्ठ काव्यों का वर्णन किया गया है। नवें अध्याय में चम्पू वांग्मय का परिचय दिया गया है।   10 वें अध्याय में ऐतिहासिक काव्यों का वर्णन प्राप्त होता है- यथा  औरंगजेब और मराठा वीरों मध्य हुए युद्ध को आधार बनाकर रचा गया राजारामचरितम्।

              11 वें अध्याय में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रत्यक्ष प्रेरणा से लिखे गये ग्रन्थों का परिचय दिया गया है, यथा - रघुनाथपण्डित रचित राजव्यवहार कोश, जो भाषाशुद्धि को लेकर रचा गया था। 12 वें अध्याय से लेकर 21 वें अध्याय तक अर्वाचीन संस्कृत के शतककाव्यों, स्तोत्र साहित्य, दूतकाव्यों, सुभाषितसंग्रहों, नाटकों एवं  गद्य साहित्य का परिचय निबद्ध है। 

                                      22 वें अध्याय में अनूदित संस्कृत साहित्य का परिचय दिया गया है, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहां अनुवाद में होने वाली समस्याओं का वर्णन करते हुए तमिल, तेलगु, हिन्दी, मराठी, बांगला आदि भारतीय भाषाओं से संस्कृत में किये गये अनुवाद का उल्लेख है। यही पर फारसी भाषा से संस्कृत मे हुए अनुवादों का भी वर्णन किया गया है। उमर खय्याम की रुबाईयों के तीन अनुवादों का परिचय यहां प्राप्त होता है। साथ ही अंग्रेजी से संस्कृत में हुए अनुवादों का भी परिचय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 23 वां अध्याय अन्य भाषीय शब्दों के संस्कृतीकरण पर आधारित है। जब संसकृत के कवियों ने विभिन्न नवीन विषयों पर कविता रची तो उन्हें नये शब्दों की आवश्यकता हुई। उन्होंने इसके लिए उन नये शब्दों का संस्कृतीकरण कर दिया जो, अन्य भाषाओं में तो हैं किन्तु संस्कृत में नहीं थे। यथा-

श्री  रामावतार  शर्मा ने 'भारतीयं वृत्तम्' नामक पद्यात्मक इतिहासग्रन्थ की रचना की है। उसमें परकीय शब्दों के स्थान पर नवनिर्मित संस्कृत रूप प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त हैं। वे यहाँ दिये जा रहे हैं-


नेपोलियन = नयपाल्यः । (नयपाल्योऽभवद्द्वीरः सम्राट् फ्रान्सनिवासिनाम् ।)


व्हिक्टोरिया = व्यक्तोर्जा । (आङ्ग्लवंशधरा राज्ञी व्यक्तोर्जा वसुधामशात् ।) (पृ.५१)


बाष्पानस् = रेल्वे ट्रेन। (बाष्पानसा च पोतैश्च सुगमास्ता भुवोऽभवन् ।) (पृ.५१) टेलिग्राफी = विद्युत्संवादशैली ।


आद्यव्रत = एडवर्ड (आद्यव्रतेन राज्ञाऽथ व्यक्तोर्जासूनुनाभवत् ।) (पृ.५२) कर्पूरद्वीप = जपान। (समयेऽस्याऽभवद्युद्धं कर्पूरद्वीपवासिनाम् ।)


रुष्य = रशियन । (जिगीषूणां समं रुष्यै रुष्या यत्र पराजिताः ।।) (पृ.५२)


शर्मण्यः = जर्मन.


बलियम = विल्यम् । (शर्मण्यानां बलियमो रुष्याणां निचुलो नृपः ।)


कुलुम्बः = कोलम्बस. (कुलुम्बो भारतान्वेषी प्राप्ते पञ्चदशे शते ।)


तुङ्‌ङ्गान्धिः = अटलांटिकसागर। तुङ्गाब्धेरपरे पारे धीरः प्रापदमेरिकाम् ।। (पृ.४८)


वस्का = वास्को डि गामा। (वस्काभिधः पुर्तुगलाभिजनश्च ततः परम् । आगाद् भारतमन्विष्यन् दक्षिणाम्बुनिधेस्तटम् ।।

                     किन्तु यहां ग्रन्थकार यह भी कहते हैं कि ऐसे शब्दों के संस्कृतीकरण के लिए नियम भी निर्धारित किये जाने चाहिए-

          इस प्रकार, विगत सौ वर्षों में (कदाचित् उसके पूर्व भी) ऐसे बहुत से संस्कृत शब्द निर्माण हुए जो प्राचीन संस्कृत को परिचित नहीं थे। परंतु उनमें एकसूत्रता नहीं है। ऐसे शब्द आगामी काल में भी बनते ही रहेंगे, क्यों कि आधुनिक व्यवहार में जो शब्द उपयुक्त हैं वे न प्राचीन साहित्य में पाये जाते हैं न शब्दकोशों में। अतः इन नवनिर्मित शब्दों के विषय में नियमनिर्धारण अत्यंत आवश्यक है। मिन्त्र संस्कृति के ग्रन्थों का संस्कृत में अनुवाद करने वाले तथा आधुनिक विषयों पर संस्कृत में ग्रन्थरचना करनेवाले लेखकों को नये शब्दों का निर्माण करना ही पड़ता है। अतः आधुनिक संस्कृत लेखकों का पथप्रदर्शन करने हेतु आवश्यकता प्रतीत होती है कि पण्डित-परिषदों द्वारा कुछ नये नियम निर्धारित किये जावें। किन्तु उसमें ऐसी दक्षता हो कि पाणिनीय शास्त्र अथवा वैयाकरण सम्मत त्रिमुनिप्रामाण्य का किसी प्रकार का विरोध उसमें न हो। 

   25 वें अध्याय में संस्कृत पत्रकारिता पर प्रकाश डाला गया है। यहां संस्कृत की पहली मासिक पत्रिका विद्योदय को बतलाया गया है, जिसका प्रारम्भ हृषीकेश भट्टाचार्य ने किया था। 26 वें अध्याय में हास्य रस से सम्बन्धित रचनाओं तथा 27 वें अध्याय में संस्कृत साहित्य में राष्ट्रवाद पर अलग से सामग्री दी गई है, जो अत्यन्त उपयोगी है। 



                      शोधकर्ताओं एवं जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रन्थ उपादेय है। अनुवादिका एवं प्रकाशक इस प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं।  


ग़ज़ल के मूल संविधानक से भटकता ग़ज़लसंग्रह _ काव्यपीयूषम्

कृति - काव्यपीयूषम्

रचयिता - डॉ. के. सुधाकरराव

प्रधानसम्पादक - आचार्य के. नीलकण्ठम्

विधा - ग़ज़लसंग्रह

प्रकाशक - संस्कृत अकादमी, उस्मानिया विवि, हैदराबाद

प्रकाशन वर्ष - 2020 प्रथम संस्करण

पृष्ठ संख्या - 87

अंकित मूल्य - 100 रू 



   अर्वाचीन संस्कृत की नवीन विधाओं में सबसे लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। मंजुनाथ उपनाम से ग़ज़ल लिखने वाले भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से प्रारम्भ हुई यह विधा 21 वीं सदी के युवा रचनाकारों की रचनाओं में भी प्राप्त होती है। भारत सरकार के दूरदर्शन वार्ता विभाग में उपनिदेशक पद पर कार्यरत  डॉ. के. सुधाकरराव ने संस्कृत, तेलगु, कन्नड, हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में 80 से अधिक ग्रन्थ रचे हैं, ऐसा इस पुस्तक से लेखक का परिचय प्राप्त होता है। संस्कृत में आपके 20 से अधिक ग्रन्थ हैं। 

          डॉ. के. सुधाकरराव द्वारा संस्कृत में रची गई नवीन संस्कृत कविताओं को आचार्य के. नीलकण्ठम् के प्रधान सम्पादकत्व में संस्कृत अकादमी, उस्मानिया विवि, हैदराबाद से प्रकाशित किया गया है। आवरण पृष्ठ सहित अन्य कई स्थानों पर इस संकलन की विधा ग़ज़ल बतलाई गई है। संकलन का आमुख अकादमी के अध्यक्ष आचार्य नीलकण्ठ ने लिखा है, जो इस ग्रन्थ के प्रधान सम्पादक भी हैं। यहां 42 शीर्षकों में कविताएं प्रस्तुत की गई हैं। 



                         पुनर्जीवितोऽहम् शीर्षकयुक्त प्रथम कविता में  प्रेम केे भाव निबद्ध किये गये हैं-

तया स्वप्नहम्र्ये समालिङ्गितोऽहम्

 न जानेऽब्जनेत्र्या भृशं चुम्बितोऽहम् । 

तया चन्द्रिकायां मुहुर्वीक्षितोऽहम् 

वियोगाग्निदग्धो पुनर्जीवितोऽहम् ।।

              मतला में रदीफ एवं काफिए का प्रयोग किया गया है किन्तु  ग़ज़ल के एक शेर में कवि से उसमें चूक हुई है_

सदा सैकते सागरस्योपकण्ठम् 

तदीयं च शङ्खोपमं वीक्ष्य कण्ठम् ।

 नवं गानमाकर्ण्य रोमाञ्चितोऽहम् 

वियोगाग्निदग्धो पुनर्जीवितोऽहम् ।।

         कण्ठम्  यह रदीफ़ सही नहीं हैं क्योंकि  ग़ज़ल में हम् यह रदीफ है| 

            यहां कवि प्रेयसी के विरह से पीडित दिखलाई देता है। वह उससे जुडी बातों को याद करता हुआ बार-बार कहता है कि वह उसके विरह की अग्नि में जल कर फिर से जीवित हो गया है। ग़ज़ल को पढते हुए यहां वियोग शृंगार की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है किन्तु मक्ते अर्थात् ग़ज़ल के अन्तिम शेर में यह वियोग शृंगार करुण में परिवर्तित हो जाता है-

कृशाङ्गयाः वियोगेन दुःषावृतोऽहम्

तदीयोक्तिभिर्नर्मगर्भेस्तुतोऽहम् ।

समाधेः प्रियायाः समीपं गतोऽहम्

मृतो नाभवं किं पुनर्जीवितोऽहम् ।।

            संकलन की तीसरी गजल तक आते-आते कवि ग़ज़ल के संविधानक से भटक जाता है, जहां पाठक रदीफ और काफिए को खोजता ही रहता है-

       प्रियोच्छिष्टं जगत्


प्रिये ! ब्रूहि किं देयमस्मिन् क्षणे ते ? 

दत्तं मदीयं हृदब्जं त्वदर्थम् ? । 

प्रिये ! ब्रूहि किं भाषणीयं मयाऽद्य ? 

नेत्राञ्चलैः व्यक्तमेवेङ्गितं नः ।।


प्रिये ! ब्रूहि कुत्रास्ति गन्तव्यमद्य ?

 स्वप्ने जगत् दृष्टमेवाखिलं तत् । 

प्रिये ! ब्रूहि किं वाञ्छसे माक्षिकं त्वं 

बिम्बाधरं चुम्बितं ते मयाऽद्य ।।


सुधाकर ! प्राप्य तत्साहचर्यम् 

जगत्सर्वमेतद् प्रियोच्छिष्टमेव ।


​         चतुर्थ ग़ज़ल की हर पंक्ति में रदीफ की अनुपस्थिति में (गैर-मुरद्दफ ग़ज़ल में)  काफिए का संयोजन करने के प्रयास के पश्चात् नेता शीर्षक वाली पांचवी ग़ज़ल में रदीफ की अनुपस्थिति में इतनी बार काफिया परिवर्तित होता है कि इसे समूची एक ग़ज़ल कहना ही उचित प्रतीत नहीं होता। समुचित यह होता कि अगर इन शब्दों को काफिया बनाकर पूरी ग़ज़ल  नहीं रची जा रही थी तो उन्हें पृथक् से शेर कह कर संकलन में मुक्तक के रूप में रखा जा सकता था-

निर्वाचने नायको कोऽपि घुष्टः 

पूर्णोदरो श्वेतवस्त्रोऽतिपुष्टः । 

कालेन वित्तेन भृशं विशिष्टः 

नृणां विनाशं विदधाति दुष्टः ।।


पत्नी मृता मारिता वा न जाने 

लसत्यब्जनेत्री समीपे विमाने । 

कार्यालये काचन स्त्री चकास्ति 

लज्जा भृशं मानसे तस्य नास्ति ।।


सदा मद्यपाने निमग्नोऽस्ति नेता 

क्वचित् धूमपानेऽवलग्नोऽस्ति भ्राता । 

चलच्चित्रगीतावलीनां च श्रोता 

खलानां कृते भाग्यदोऽसौ विधाता ।।

         छठी ग़ज़ल हे पयोद! में पयोद शब्द रदीफ है किन्तु काफिया गायब है। बिना रदीफ के ग़ज़ल कही जा सकती है किन्तु बिना काफिया की ग़ज़ल को अच्छी ग़ज़ल के रूप में  आचार्य स्वीेकार नहीं करते हैं।



            यहां यह भी ध्यातव्य है कि अभिराज राजेन्द्र मिश्र के नवीन काव्यशास्त्र अभिराजयशोभूषणम् में ग़ज़ल का जो लक्षण दिया गया है, उसमें शेर के अन्त में दुहराए जाने वाले एक जैसे अन्तिम शब्द को काफिया कहा है‌ _

शब्द आरम्भिकाबन्धवाक्ययोरन्तिमोऽथ सः। 

एक एव भवेद् गीते काफियाख्योऽनुवर्तितः ।।८१ ।।

                 अभिराज  जी का यह कथन सही नहीं है क्योंकि इसे काफिया न कहकर रदीफ कहा जाता है। रदीफ काफिए के बाद आने वाला शब्द या शब्द समूह होता है। जैसा कि मद्दाहकोश के नाम से प्रसिद्ध उर्दू-हिन्दी शब्द कोश कहता है- 

रदीफ  ردیف अ.वि.-पीछे चलनेवाली; (स्त्री.) ग़ज़ल में काफिए के बाद आनेवाला शब्द या शब्द-समूह।



        काफिया किसी ग़ज़ल के शेर में रदीफ से पहले आने वाले तुकान्त को कहा जाता है। अभिराज जी ने आचार्य बच्चूलाल अवस्थी जी की इस ग़ज़ल को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है-

पिकाः कूजन्ति माकन्देषु कूजेयुः किमायातम् ? 

समीरा दाक्षिणात्या मन्दमञ्चेयुः किमायातम् ?

इदं पाणौ सुरापात्रं सुरा कुम्भेऽन्तिके रामा 

उदन्वन्तः समे सर्वत्र शुष्येयुः किमायातम् ? 

अतन्त्रं लोकतन्त्रं वा विवादो नामनि व्यर्थः 

सुमन्त्रा यान्त्रिके तन्त्रे न सिध्येयुः किमायातम् ?

           यहां किमायातम् इस अंश विशेष को अभिराज जी काफिया कहते हैं_

'काफिया' यथोपर्युदाहृते गीत एव किमायातम् इत्यंशः। अयमेवांशः प्रतिबन्धमनुवर्त्यते गलज्जलिकायाम्।

              जबकि ग़ज़ल के संविधानक की दृष्टि से यह काफिया न होकर रदीफ है। इसी ग़ज़ल में किमायातम् के पहले आने वाले कूजेयुः, मंचेयुः, शुष्येयुः, सिध्येयुः आदि तुकान्त शब्द काफिया कहलायेंगे। 

                   अस्तु, ग़ज़ल के मूल संविधानक से जुडी हुई ऐसी कई त्रुटियां प्रस्तुत संकलन में अखरती हैं, जिससे इसे ग़ज़ल विधा का संग्रह कहना सही नहीं जान पडता है। संग्रह के आमुख में ग़ज़ल के संविधानक की चर्चा तो की गई है किन्तु वहां इसी संकलन में उसी संविधानक में हुई चूकों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।  कवि के सुधाकर राव ने अपने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि ग़ज़ल सम्प्रदाय का अनुसरण सबसे पहले संस्कृत में त्रिवेणी कवि अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने किया है- गज़ल संप्रदायस्य अनुसरणं संस्कृते प्रप्रथमतया त्रिवेणीकविभिः शताधिकग्रन्थकर्तृभिः अभिराजराजेन्द्रमहोदयैः कृतम् । यह कथन सही नहीं है क्योंकि त्रिवेणी कवि के बहुत पहले जयपुर निवासी भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने संस्कृत में ग़ज़ल लिखी थी, ऐसे साक्ष्य विद्यमान हैं ही। कवि के प्रस्तुत संकलन के प्रास्ताविक में पैन्ना मधुसूदन जी ने इस का स्पष्ट उल्लेख करते हुए आचार्य बच्चूलाल अवस्थी आदि का नाम लिया है_

यथा महाकविना राजेन्द्रमिश्रमहाभागेन विवृतम् -

गलञ्जलिका पुरा फारसीभाषायामुत्पन्ना क्रमेण विकासमाप्य उर्दूभाषायामपि नको समवातरत् । ततश्च जयपुरवास्तव्यः फारसीसंस्कृतभाषाद्वयोद्भटः मथुरानाथशास्त्रीति प्रथितयशा संस्कृतेऽपि गजलगीतं सर्वप्रथमतया ससर्ज इति । नूनमेव मथुरानाथ- शास्त्रिवर्येण श्लाघनीयरीत्या संस्कृतेऽपि गजलरीतिमवलम्ब्य रचना कृता । स एव संस्कृतगजलस्य प्रथमः उद्गाता 

         संस्कृत अकादमी, जहां से यह संकलन प्रकाशित हुआ है, के निदेशक ने इस संग्रह के आमुख में हर्षदेव माधव द्वारा सम्पादित जिस द्राक्षावल्ली ग़ज़लसंग्रह का उल्लेख किया है, अगर उस पर संक्षिप्त दृष्टिपात् कर लिया जाए तो भी यह भ्रान्ति बडी सरलता से दूर हो सकती है कि संस्कृत में ग़ज़ल लिखना सबसे पहले किसने आरम्भ किया।   

                   कथ्य की दृष्टि से विचार किया जाए तो संग्रह की प्रायः आधी कविताओं में प्रणय के विविध चित्र उकेरे गये हैं। कुछ कविताओं को सामाजिक कुरूतियों, विडम्बनाओं आदि के चित्रण के साथ समसामयिक बनाया गया है। नेता कविता में आधुनिक राजनेता पर व्यंग्य किया गया है तो भाटकमाता कविता में किराए की कोख को आधार बनाया गया है। स्वयं लेखक ने इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी यहां प्रस्तुत किया है किन्तु अनुवाद के मुद्रण में इतनी त्रुटियां  हैं कि कई बार मन खिन्न हो जाता है।



            साहित्य में किसी नवीन विधा का प्रवेश सदैव स्वागत योग्य होता है किन्तु यह उस विधा में रचना करने वाले कवियों का कर्तव्य है किवे उस विधा के मूल संविधानक का पालन करना सुनिश्चित करें और उसमें उतनी ही छूट ले जितनी ग्राह्य है। इस संग्रह को बलात् ग़ज़लसंग्रह न कहकर केवल काव्य संग्रह कह दिया जाता तो कुछ बेहतर होता| ग़ज़ल कह देने मात्र से कोई रचना ग़ज़ल नहीं हो जाती है| अंत में कवि की ही कुछ पंक्तियों से अपनी बात को विराम देता हूं_


सत्यं समाजे यदि त्वं ब्रवीषि 

सत्यं ! प्रहारैः ! परितप्तदेहः । 

जीवच्छवत्वं समवाप्य शीर्णो 

हे मानव ! त्वं भविता शृणुष्व ! ।।