Saturday, May 23, 2026

मृण्मयी दीपिका _ युगबोध से समन्वित काव्यसंग्रह

कृति - मृण्मयी दीपिका

कृतिकार - कालिन्दी परीख

विधा - मुक्तच्छन्दकाव्यसंग्रह

प्रकाशन वर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली

पृष्ठ संख्या - 78

अंकित तूल्य - 150/-



   संस्कृत साहित्य में अपेक्षाकृत महिला कवि कम हैं। किन्तु आधुनिक संस्कृत साहित्य में कुछ महिला कवि सक्रिय हैं, यह आश्वस्त करता है। मृण्मयी दीपिका कालिन्दी परीख का संस्कृत में सम्भवतः प्रथम काव्यसंग्रह है। इस संग्रह में मुक्तच्छन्द में निबद्ध कविताएं संकलित हैं, जो आधुनिक भावबोध से युक्त हैं। संग्रह की भाषा सरल, सरस है। 



      काव्यसंग्रह में कुल 101 कविताएं संकलित की गई हैं। प्रायः कविताएं कलेवर में लघु हैं किन्तु इनका कथ्य, सन्देश बहुत व्यापक है। किसी मनुष्य के भाग्य में इतना दुःख होता है कि वह उस दुःख को ही अपनी सम्पत्ति मान बैठता है और स्वप्न में भी वह सुख के क्षण देखने से बचता है। जिसके भाग्य में मरुस्थल लिखा हो, बालू रेत में ही जिसका जीवन अथवा मरण हो भला वह नदी के स्वप्न देख कर करे भी तो क्या- 

न दीयतां नद्याः स्वप्नान्

मम भाग्ये तु मरुस्थलं लिखितम्

उष्ट्रः खर्जूरी दु्रमः तथा 

वालुकाः

एतत् सर्वं मम वैभवम् अस्ति।

मरुप्रदेशं व्रजामि, चरामि।

मृगजलं वा

अश्रुजलं पीत्वा

मम तृषा प्रतिदिनं,

प्रतिरात्रं वर्धते।

मरुभूमौ चिरं विहृत्य

प्रविशामि पुनः

मरुभूमिम्।

जीवनं वा मरणं वा 

सर्वम्

मे 

खलु सिक्तासु।।



     प्रेममहिम्नस्तोत्रम् कविता में मां की ममता का बखान किया गया है। ऐश्वर्यम् कविता विप्रलम्भ शृंगार से सिक्त है। मत्स्यः कविता बतलाती है कि मछली की हस्तरेखा में समुद्र है, लग्नेश भी समुद्र है और भाग्येश भी समुद्र है किन्तु जब मछुआरा उसे खाने के लिए, बेचने के लिए पकडता है तो समुद्र उसकी रक्षा नहीं कर पाता है। इधर हमारे समाज में सरोगेट मदर का प्रचलन बढता जा रहा है, जिसके अनेक कारण हैं। सरोगेट मदर दूसरे के बच्चे को अपनी कोख में धारण करती है और अन्त में अपना पारिश्रमिक लेकर चली जाती है। सरोगेट मदर आधुनिक परभृतिका कोयल के समान है-

परभृतिका

नवमासे सा प्रसूते 

नवजातशिशुम्।

किन्तु 

तस्याः स्तनयोः दुग्धं न स्रवति।

सा न जननी अस्ति

सा परिक्रीता माता,ा,

द्रव्यं गृहीत्वा

सा गच्छति निजगृहम्।

 शून्याहृदया

रिक्तहस्ता।।



    दन्तविहीना कविता में दांतों से रहित मुंह वाली माता की वृद्धावस्था का चित्रण किया गया है। मां की याददाश्त भले से दोषग्रस्त हो गई हो किन्तु उसे गाहे बगाहे अपनी सन्तानों का बचपन याद आ जाता है, यही उनकी सन्तानों के लिए सन्तोष की बात होती है क्योंकि इस बहाने वे फिर से अपना बचपन जी लेती हैं-

स्मृतिदोषग्रस्ता सा

सततं स्मरति

मम शैशवम्।।

   हतम् रे कविता में कवि कहती हैं कि ईमेल, फेसबुक और व्हाट्सअप आदि के द्वारा प्रिय को मैसेज कर देने से अब विप्रलम्भशृंगार का सारा सौन्दर्य खत्म हो गया है। बिल्वपत्राणि कविता दार्शनिकता से युक्त है। त्रिगुणातीत शिव के शिर पर बिल्वपत्र का समर्पण सत्व, रज एवं तम इन तीन गुणों को दूर करने के लिए, मोक्ष प्राप्ति के लिए है-

त्रिगुणातीतस्य शिरसि

बिल्वपत्राणि समर्पयामि

मम त्रिगुणान् दूरीकृतुम्।।

  बिल्वपत्र भी तीन नोक या तीन पत्तियों वाला होता है, तीन गुणों का प्रतीक त्रिदल। समकालीन घटनाओं के प्रयोग में कई बार कवि अभिधा में अपना कथ्य प्रस्तुत करने लगते हैं, जिससे कि वह कविता न होकर सूचना मात्र प्रतीत होती है। किन्तु कालिन्दी परीख ने अपने समय की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को प्रतीयमानार्थ के साथ उकेरा है। माम् अपि कविता me  too आन्दोलन की याद दिलाती है, जो यौनशोषण के विरुद्ध संचालित हुआ था_

माम् अपि' (Me too) 

आन्दोलनेन 

बहिः प्रकाशः आगच्छति 

साधूनां चरितम्।

मुनिवेशव्याजेन

रावणस्य दुरितम्। 

सद्यः उद्घाटितं भवति 

अनेनान्दोलनेन

 स्वैरविहारिणां 

भविष्यति शिरच्छेदः । 

अपटीक्षेपेण

 निर्दोष बालिकानाम् 

यौनशोषणं कृत्वा 

चरन्ति पशुभिः समानाः ।

किं न जानन्ति ते

अधुना 'माम् अपि' (Me too)

इति शस्त्रपातः 

तेषां विनाशाय 

जृम्भायते।



        संग्रह की सारी कविताएं विविध बिम्बों वाली हैं। कवि द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों में ताजगी है। कवि द्वारा मिथों, पुराकथाओं का प्रयोग अपने कथ्य को प्रस्तुत करने के लिए बखूबी किया है। कवि यह संग्रह आधुनिक संस्कृत साहित्य की श्रीवृद्धि करता है।

Sunday, May 17, 2026

आधुनिक संस्कृत का प्रथम विज्ञान लघु कथा संग्रह _ संस्कृतेर्नवोऽध्यायः

कृति - संस्कृतेर्नवोऽध्यायः 

विधा - विज्ञानकथासंग्रह

रचयिता - हर्षदेव माधव 

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन, दिल्ली

प्रकाशन वर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 156

अंकित मूल्य - 295

संस्कृत में विज्ञान कथा

       संस्कृत साहित्य में विज्ञान_ साहित्य बहुत कम मात्र में लिखा गया है| 1966 में संगमनी पत्रिका में हिंदी के एक रूपक का संस्कृत अनुवाद प्रकाशित हुआ था, जिसमें 2060 के भविष्य की कल्पना की गई थी| भगवान दास फडिया के इस मूल नाटक का अनुवाद प्रेमशंकर शास्त्री ने किया था| पराम्बा श्रीयोगमाया ने गोकुलानन्द महापात्र के कथाग्रंथ का संस्कृत अनुवाद मृत्यु: चंद्रमस: नाम से किया था, जो कि वैज्ञानिक साहित्य में ही आता है| लेकिन ये दोनों ग्रंथ अनूदित हैं| मौलिक विज्ञान साहित्य के अंतर्गत ऋषिराज जानी ने अन्तरिक्षयोधा नाम से संस्कृत उपन्यास लिखा है| हर्षदेव माधव अब आधुनिक संस्कृत की प्रथम विज्ञान कथाएं लेकर आए हैं| वे हमेशा नया साहित्य लेकर आते हैं और हमें चमत्कृत कर देते हैं| इस कथा ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद और संपादन किया है प्रो लालशंकर गयावाल ने| 

  हर्षदेव माधव की सर्वतोमुखी प्रतिभा ने संस्कृत में कई अद्भुत ग्रन्थों की रचना करवाई है। शायद ही कोई विधा ऐसी बची हो, जिसमें हर्षदेव माधव की नवीन प्रयोगोे के साथ रचना उपलब्ध नहीं होती हो। पारम्परिक छन्दों के साथ मुक्तच्छन्द में आपकी कविताएं संस्कृत की नई बानगी प्रस्तुत करती है। नाट्य साहित्य में एकांकीयों के माध्यम से एक अलग ही प्रकार की कथावस्तु संस्कृत में पढने को मिलती है। गद्यसाहित्य में उपन्यासविधा का नवीन रूप दृष्टिगोचर होता है, जहां डायरी विधा घुलमिल जाती है। स्मृतियों की जुगाली करती हुई कथाएं आपकों अपने अतीत में भ्रमण करवा देती हैं। बालसाहित्य की सरल, रोचक, सरस रचनाएं मन मोह लेती हैं। अब हर्षदेव माधव कथासाहित्य में वैज्ञानिक कथाओं का उपहार लेकर संस्कृत पाठकों के पास आये हैं। एआई, रोबाॅट, नवतकनीकि सब यहां मिल जाते हैं, जो रोचक तो हैं ही, साथ ही पाठक की ज्ञानवृद्धि भी करते हैं| 



      प्रस्तुत कथासंग्रह के दो खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में 11 कथाएं हैं तो दूसरे खण्ड में 2 कथाएं निबद्ध हैं। 



 संस्कृतेर्नवोऽध्यायः संग्रह की पहली कथा है। इसके कथानक का कालखण्ड भविष्य का है। 2090 में कृत्रिमबुद्धिमत्ता एआई के बढते प्रयोग से होंने वाले दुष्प्रभावों की ओर इसमें संकेत किया गया है- नवत्यधिकद्विसहस्रतमस्य संवत्सरस्य कश्चित् प्रातःकालः प्रचलति। घटिकायन्त्राणि सन्ति, द्रष्टुं मानवा न सन्ति। नगराणि सन्ति, नागरा न सन्ति। कृत्रिमबुद्धिप्रयोग- बाहुल्यात् मनुष्याः नैराश्यमनुभूय स्वात्मघातं कृतवन्तः। यन्त्रैर्मनुष्या हताः, मनुष्यैर्यन्त्राणि नाशितानि। विज्ञान ने विश्व को बहुत कुछ दिया और फिर वही विज्ञान दुरुपयोग होने पर सब कुछ छीन भी सकता है- विज्ञानेन सर्वमपि दत्तं विश्वस्मै, अथ च सर्वमपि अपहृतम्। लोपा नामक एक पात्र किस तरह से एक तपस्वी के सहयोग से पुनः संस्कृति का नया अध्याय रचती है, इसका वर्णन इसमें किया गया है, जो कथाकार की आशावादी दृष्टि का संकेत करता है - ततः पश्चात् पुनरपि यज्ञशालायाम् अग्निः स्थापितो भवति। वृक्षेषु फलानां सौरभं प्रसरति। क्षेत्रं शस्यकणिशैः रमणीयं भवति। कुटीरे शिशुरोदनं श्रूयते।........पुनरपि संस्कृतेर्नवोऽध्यायः प्रारभ्यते।



   षडयन्त्रम् कथा कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि मेे लिखी गई है। यहां कोरोना को पांच देशों के धनकुबेरों बिलेनियर द्वारा स्वार्थपूर्ति के लिए फैलाई गई बीमारी बतलाया है। अतः भारत सहित कुछ देशों के गुप्तचर पांचों नरपिशाचों को मार डालते हैं - समग्रं विश्वं स्वार्थपंकमग्नजातमासीत्। एते धनाढ्याः धनवृद्धिं कर्तुं विश्वस्य प्रजानां नाशं कृतवन्तः। एतैः पृथिव्यां नरकमानीतम्। 



           भविष्यत्कालस्य नगरे एक ऐसी कथा है जो यह बतलाती है कि रोबाॅट केवल खराब ही नहीं होते वे मनुष्यों का भला भी कर सकते हैं। चौर्यम् कथा हमें उस खतरे से आगाह करती है, जिससे जल्द ही हमारा सामना हो सकता है। रोबाॅट हमारे संस्थानों में जासूसी का काम भी करने लग जाएंगे, ऐसा सम्भावित खतरा मंडरा ही रहा है। मातृत्व कथा पच्चीसवीं सदी के रोबाॅट को केन्द्र में लेकर लिखी गई है, जो मारिया नामक स्त्री को प्रेम का अनुभव करवाता है और विज्ञान की तकनीकि से मारिया मातृत्व कर सुख भोगती है। यन्त्र और मानव के मध्य शारीरिक प्रेम भी घट सकता है, एसी यहां कल्पना की गई है- विशेषज्ञानां परिश्रमः सफलः अभवत्। विशेषज्ञैः रोबर्टे प्रणयसंवेदना आरोपिताः आसन्। रोबर्टः प्रणयसंवेदनैः पारंगतः अभवत्। 

                      आश्वासनम् कथा में एआई कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सदुपयोग का वर्णन है। कहानी पंजाब के एक गांव से शुरू होती है, जहां एक वृद्ध मां अपने सैनिक पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई जीने का प्रयास करती रहती है। वह प्रति सप्ताह बेटे से फोन पर बात करती है। इस कथा का अन्त चौंकाने वाला है। ओ. हेनरी की कथाओं की तरह इसका पर्यवसान किया गया है। कथाकार अन्त में स्वयं कहता है- आधुनिकी तान्त्रिकी मनुष्याणां दुःखेषु साहाय्यं कुर्यादिति कथाकारस् अभिप्रायः। विज्ञानं मनुष्यजातेर्हितार्थमेवास्ति। दुर्जनाः कस्यचित् वाण्याः प्रतिरूपं कृत्वा वंचनां कुर्वन्ति इति सायबर-अपराधेषु प्रसिद्धमस्ति। 

         आत्महत्या नामक कथा यह बतलाती है कि भविष्य में काम के बोझ के चलते केवल मानव ही नहीं अपितु रोबाॅट भी आत्महत्या करने लगेेंगे। कदाचित् तनाव बढने पर वे किसी की हत्या भी कर सकते हैं। कथाकार की चिन्ता इन कथनों में झलकती है- भविष्यत्काले अनृतवादिनां शठानां दुव्र्यव्हारं मनुष्याणां दुर्गुणा यन्त्रमानवेषु संक्रान्ता भविष्यन्ति किम्? कदाचिद् एवमेव भवेत्। मनुष्यैः समग्रा पृथ्वी दूषिताऽस्ति, तर्हि यन्त्रमानवाः कथमदूषिता भविष्यन्ति? कृत्रिमबुद्धिः एआई अपि मनुष्यसृष्टा बुद्धिरस्ति, तत्र सात्त्विकता कथं भवेत्?    

        मानसापहरणम् कथा में कल्पना की गई है कि कैसे भविष्य में वैज्ञानिक माइंडहेकिंग करके अपने गुप्त अभियानों को अंजाम देंगे। भयम् कथा यह प्रदर्शित करती है कि भविष्य में रोबाॅट भी अपने नष्ट हो जाने का भय करने लगेंगे। यहां बनारस के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के वातावरण के द्वारा जीवन व मृत्यु के बारे में दार्शनिक वर्णन किया गया है। कर्तव्य कथा यह बतलाती है कि भविष्य में रोबाॅट भी दाहसंस्कार आदि कर्तव्यों का निर्वाह पुत्र की भांति करने में सक्षम होंगे। कटुसत्यम् कथा 32 वीं सदी के किसी समय का चित्रण करती है, जब यान्त्रिकता के चलते मनुष्य आनी स्वाभाविक स्थिति खो चुके होंगे। अनेक तरह की बिमारियां उन्हें घेर लेंगी। इस कथा में कथाकार ने ज्ञानगंज नामक एक अद्श्य स्थान का वर्णन किया है, जो साधकों की तपोस्थली है। ध्यातव्य है कि गापीनाथ कविराज ने ज्ञानगंज नामक पुस्तक में हिमालय के पवित्र व दिव्य आश्रमों का वर्णन किया है। इस ज्ञानगंज को कुछ लोग सम्बाला, सम्बल या शम्भल भी कहते हैं। संग्रह के द्वितीय भाग में दो कथाएं और दी गई है, जो भिन्न विषय-वस्तु पर आधारित है।  



      ये वैज्ञानिक कथाएं संस्कृत की साहित्य के नव रूप को प्रस्तुत करती हैं। संस्कृत साहित्यकार की दृष्टि समाज के प्रत्येक पक्ष पर जाती है, यह इसका प्रमाण है। संस्कृत में वैज्ञानिक कथाओं का मुक्तकण्ठ से स्वागत किया जाना चाहिए।

Saturday, March 14, 2026

मधुर बालगीतियों का उपहार _ मंजुलाः बालगीतयः

कृति - मंजुलाः बालगीतयः

कृतिकार - डा. मंजुलता शर्मा

विधा - बालसाहित्य

प्रकाशक – परिमल पब्लिकेशंस दिल्ली

प्रकाशनवर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 102

अंकितमूल्य - 250



          भारतीय भाषाओं में बालसाहित्य लिखा व पढा जा रहा है। संस्कृत में बालसाहित्य मात्रात्मक एवं गुणात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत कम है। फिर भी कतिपय साहित्यकार इस दिशा में प्रशंसनीय प्रयास कर रहे हैं। मंजुलता  शर्मा आधुनिक संस्कृत साहित्य में अपनी समीक्षात्मक दृष्टि के लिए  जानी जाती हैं। आपकी समीक्षा की शैली अन्य समीक्षकों से अलगाती है। हाल ही में आपका कवि पक्ष भी मंजुलाः  बालगीतयः इस संग्रह से सामने आया है। किसी बेहतरीन समीक्षक का बालसाहित्य की  रचना में प्रवृत्त होना उम्मीद बढाता है। वस्तुतः बालसाहित्य की  रचना करना असिधारा पर चलने के समान ही है।


            प्रस्तुत बालगीति संग्रहमें 25 कविताएं संकलित हैं। कवि ने  स्वयं इनका हिन्दी अनुवाद भी किया है] जो सहज एवं लयात्मक है। साथ ही प्रत्येक कविता के साथ उस कविता के भावों से मेल खाता चित्र भी दिया गया है  जो इस संग्रह को और भी रोचक बना देता है। बालमन अनूठा होता है। उसके लिए संसार की  प्रत्येक वस्तु वयस्क व्यक्ति से भिन्न महत्त्व की होती है। उसकी विश्व को  देखने का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। यही कारण है कि कई बडे साहित्यकार बालसाहित्य की रचना में चूक जाते हैं। मंजुलता  शर्मा की कविताएं बालमन की  कविताएं हैं। पहली कविता बरसते बादलों पर रची गई है-


एवं वर्षति मेघः सततम्

भेकेनापि क्रीतं छत्रम्।।

मुसलधाराः पतन्ति मात्रम्।

अहो वेपते ममापि गात्रम्।।

बारिश के मौसम का यहां स्वाभाविक वर्णन किया गया है जिसमें एक  बालक कल्पना करता है कि लगातार होती बारिश के कारण मेंढक ने  भी    छाता खरीद लिया है। कविता में बालक के शरीर पर पडती बारिश की  बूंदों से कांपते शरीर का उल्लेख किया गया है। हमने स्वयं के साथ-साथ बच्चों को भी बारिश में नहाने से रोक  रखा हैं फिर हम उन्हें स्वीमिंग पुल में लेकर जाते हैं। हम जितना बच्चों को प्रकृति से दूर  रखेंगे उतना ही वे अन्दर से कच्चे रह जायेंगे। निदा फ़ाज़ली कहते हैं 

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

        सरलभाषा में लिखी गई ये गीतियां गेय भी हैं।  एकल परिवार के युग में संयुक्त परिवार की विशिष्टताओं का वर्णन करते हुए कहा गया है- 



यथा विशालः वटवृक्षोऽस्ति।

तथा दयालुः पितामहोऽस्ति।।

इक्षुदण्ड इव सदा मधुरः।

अहं तथा मे प्रियपरिवारः।।

वटवृक्षोऽहम् तथा वृक्षाः दोनों बालगीत अभिनेय भी हैं अतः इन्हें अभिनयगीत कहा गया है। मेघाः बालगीत पर्यायशब्द विशेषणगीत हैं।  यहां मेघ शब्द के जलद बलाहक वारिमुच वारिधर अम्बुधर आदि विशेषणो प्रयोग किया गया है| संख्यागीतिः बालगीत अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है।

         यहां एक से लेकर 20 तक की  संख्याओं का प्रयोग किया गया है ताकि  बालकों को गीत के साथ-साथ संख्याओं का ज्ञान भी हो सके-



त्रयोदश स्थिताः वृद्धा स्त्रियः सन्ति चतुर्दश।

पंचदश गजाः तत्र छात्रा गच्छन्ति षोडश।।

वर्णानां मनोरमा सृष्टिः गीति में श्वेत, गौर, पीत,‌ रक्त आदि वर्णों का उल्लेख किया  गया है। छोटे बालक रंगों के नाम संस्कृत में पहचान सकें, इसके लिए ऐसे प्रयास प्रशंसनीय हैं। देहि गीति में चतुर्थी विभक्ति का शिक्षण किया गया है-

वृक्षेभ्यः देहि पानीयं भिक्षुकेभ्यः च भोजनम्।

रंकेभ्यः देहि वस्त्राणि वनाय देहि रक्षणम्।।

          यहां एक तरफ तो देने के अर्थ में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है ऐसा बालक सीख जाता है साथ ही अनायास वह मानवीय मूल्यों को भी आत्मसात् करता रहता है। 

           मम मार्जारी गीति पालतु बिल्ली के प्रति बच्चों के सहज अनुराग को अभिव्यक्त करती है-



चपला चतुरा मम मार्जारी।

ननु दुर्ललिता मम मार्जारी।।

घृतं खादति पिबति च दुग्धम्।

सदा खादति मम मार्जारी।।

  चपल चतुर है मेरी बिल्ली

कैसी नटखट है मेरी बिल्ली

घी खाती और दूध भी पीती

सब कुछ खाती मेरी बिल्ली।।



   संग्रह की सभी गीतियां भावों से भरी हुई हैं। संस्कृत बालसाहित्य में यह नवीन कृति सर्वथा स्वागत के योग्य है।

Friday, January 2, 2026

गायत्रम् _ संस्कृत कविता का सशक्त निदर्शन

कृति - गायत्रम्

कृतिकार - प्रवीण पण्ड्या

विधा - कवितासंग्रह

प्रकाशक - विश्वबानी पब्लिकेशंस, भोपाल

प्रकाशन वर्ष - 2025

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या -96

अंकित मूल्य - 220/-



   प्रवीण पण्ड्या की गणना संस्कृत के प्रखर, तेजस्वी कवियों में होती है। कवि संस्कृत में चार काव्यसंग्रह, एक नाट्ससंकलन, एक कथासंग्रह, छह समीक्षात्मक पुस्तकों सहित आठ अनुवादसंग्रह एवं तीन शास्त्रीय ग्रन्थ प्रकाशित हैं। साहित्य अकादेमी के दो पुरस्कारों सहित कवि को आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी सम्मान, माघ पुरस्कार आदि प्राप्त हैं। प्रस्तुत संग्रह कवि का पांचवा काव्यसंग्रह है।

          इस संग्रह में कविताएं मुक्तच्छन्द में निबद्ध हैं। संकलित कविताओं की संख्या 36 हैं। कवि ने स्वयं इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है। संग्रह के आरम्भ में ही कवि अपनी कविताओं को द्रष्टा की कविता न कहकर श्रोता की कविताएं कहता है - कोई कवि मुझमें अवतीर्ण हुआ। वह बोला। मैंने कभी सावधान तो कभी अनवधान होकर सुना। ये द्रष्टा की नहीं, श्रोता की कविताएं हैं। श्रवण से मैं कवि हुआ। संग्रह के नामकरण को अन्वर्थ बताते हुए कहते हैं कि ज्ञान (सविता) जब धरती को छूता है तो वह गायत्री होता है। कवि अपनी अजंलि में जितना ले पाते हैं, वह धरातल पर उतरा हुआ गायत्र होता है।



       प्रथम कविता कस्त्वम् (कौन हो तुम) एक दीर्घ कविता है। कवि प्रश्न करता हुआ कहता है -

हे! हे! हे!

उपरि व्योम,

न स्वात्मनि विस्तरति।

अधो धरणी,

न स्वातन्त्र्येण प्रसरति।

उभे गुप्तं परतस्तुभ्यम्।

इतस्ततो या दिशज्ञता न दिशो

डाकिन्यस्त्वदिङ्गितैकजीविन्यः।


हे कौन हो तुम?

ऊपर आकाश नहीं फैलता है

स्वात्मा में,

और नीचे धरती

नहीं पसरती है अपनी मर्जी से।

दोनों जासूस हैं तुम्हारे।

इधर उधर की दिशाएं दिशाएं नहीं ,

तुम्हारी डाकिनियां हैं।      

         आत्मविष्णवो वयम् कविता युगबोध की कविता है, जो अपने समय का संज्ञान लेती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प की कर्णावती यात्रा में सडक के दोनों ओर सात फीट की दीवार बनाकर झुग्गी झोपडियोें को उनकी दृष्टि से बचाने का प्रयास किया गया था। इस को लेकर कवि ने यह कविता रची है-

राजन्!

आयाति ते राष्ट्रं सम्राट्,

किमर्थं दिदर्शयिषुस्त्वं

देशस्याऽर्धम्,

अर्धं चावृत्य।


कोई सम्राट् आ रहे हैं

राजन्! उन्हें क्यों दिखाना चाहते हैं

आधा अधूरा देश।

(आधे को छुपाकर)    



       समकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाले अनेक कवि हैं किन्तु केवल समसामयिक घटनाओं के वर्णन मात्र से ही आधुनिकता नही आती है। घटनाओं का सपाट वर्णन उसे अखबार की खबर मात्र जैसा बनाकर रख देता है। प्रतीयमानार्थ अर्थात् व्यंग्यार्थ जब तक काव्य में नहीं होगा, वह उत्कृष्ट नहीं बन सकती है। प्रवीण पण्ड्या एक कुशल कवि हैं। वे समसामयिक घटनाओें को यदि अपनी कविता का पात्र बनाते हैं तो उसमेे एक समूचा युगबोध प्रतिबिम्बित होता दृष्टिगोचर होता है-

सम्राट्! अलमलम्

ते देदीप्यमानेभ्यो यानपथेभ्यो यानेभ्यः,

उज्ज्वलं प्रकाशमानेभ्यो विविधेभ्यो बाह्यप्रदर्शनेभ्यः समं

तोलयितुम्,

नो निर्वापयितुमशक्यैर्हृज्योतिभिः।

सम्राट्!

देहविष्णुस्त्वम्

आत्मविष्णो वयम्।


सम्राट्!

तुम्हारी

चमाचम सडकों, कारों

झमाझम तामझामों की तुलना मत कर बैठना

हमारे हृदयों के उजाले से।

देह बडा हो सकता है तुम्हारा

आत्मा में विशाल हैं हम।

      संग्रह में दीर्घ कविताओं के साथ लघु कलेवर वाली कविताएं भी है। तेन तत्र. किं दृष्टम् डर कर भागे हुए एक बच्चे के मनोविज्ञान को टटोलने का प्रयास करती है तो विन्दुवृत्तौ कविता बिंदु और वृत्त के माध्यम से परमात्मा और प्रकृति की कथा कहती है। मिथकों के माध्यम से भी कवि अपना कथ्य प्रस्तुत करता है और वर्तमान राजनीति के प्रत्येक पक्ष को प्रकट करता हुआ अक्षाः प्रवर्तन्ताम् रचता है। सन्नाहः अथार््त् तैयार नामक छोटी सी कविता हमारे बाजारवाद की परते उघाड कर रख देती है। अगर आकाश यह सोचे कि राकेट को भेजना बच्चों का खेल है तो वह गलत सोच रहा है। वह तो इसलिए भेजे जा रहे हैं क्योंकि वहां अभी तक पृथ्वी की तरह बाजार नहीं खुला है और इस कारण आकाश को अधूरेपन का अहसास होता होगा-

व्योमन्!

त्वयि न सन्ति विपणयः।

वराकस्य तेऽनैयून्यसम्पादनाय

यतामहे वयम्,

नो रॉकेटप्रेक्षेपणं

नास्ति

नास्ति

नास्ति

बाललीला।।



      नास्ति क्रिया का प्रयोग तीन बार दृढता के लिए किया गया है। विचिकित्सा कविता में कवि वैयाकरणों, अर्थवेत्ताओं, वैतालिकों आदि से कुछ प्रश्न करता है। अन्नदाता शब्द के लिए कवि कहता है कि किसानों के लिए प्रयुक्त अन्नदाता शब्द क्या उपहास मात्र नहीं बन कर रह गया है क्योंकि अपनी देह को जोतते हुए ये किसान अब स्वयं अन्न बन चुके हैं -

अर्थज्ञ!

अन्नदातेति हासस्तु नास्ति,

हासस्तूज्ज्वल उक्तः।

नास्ति किमेष उपहासः कश्चित्

स्वात्मनि दैन्यं जीवते

स्वयमन्नीभूताय

कस्मैचित्।

कर्षन्तो स्वदेहं कर्षका एव।

       यहां कृष् धातु का प्रयोग साभिप्राय किया गया है। इसी तरह कवि प्रश्न करता है कि जब संसद् में सांसद एक साथ मिलकर बैठ (सदन) नहीं सकते तो फिर वह संसद् कैसी, वे सांसद कैसे-

एकीभवनाय न सदनं येषां

तैः कथं संसद् भवति-

इति कस्तावन्मां बोधयितुं शक्तो

निःशक्ते क्षणे?

ऐक्यं विघटियुतं वांछन्तः

सांसदाः कथं भवेयुः?



       ये कविताएं एक ओर संस्कृत भाषा के गाम्भीर्य को प्रदर्शित करती है तो दूसरी ओर यह भी सिद्ध करती है कि संस्कृत में समसामयिक विषयों पर बेहतरीन कविताएं रची जा रही हैं।



Thursday, January 1, 2026

आधुनिक संस्कृत साहित्य का विहंगावलोकन

 कृति -  भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् modern sanskrit literature in india:A Bird's eye view

कृतिकार - शुभ्रजित् सेन

विधा - आलोचना

प्रकाशक - संस्कृत पुस्तक भण्डारकोलकत्ता

प्रकाशन वर्ष - 2019

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 504

अंकित मूल्य - 600/-



      आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्यन्त विस्तृत है। न केवल मात्रात्मक अपितु गुणात्मक दृष्टि से भी संस्कृत का आधुनिक साहित्य प्रकर्ष पर है।  इसके परिचय के लिए कई ग्रन्थ भी लिखे गए हैयथा हीरालाल शुक्लकेशवराव मुसलगांवरकरश्रीधरभास्कर वर्णेकरदेवर्षि कलानाथ शास्त्रीआचार्य राधावल्लभ त्रिपाठीमंजुलता शर्मा आदि द्वारा लिखे गए ग्रन्थ। आधुनिक संस्कृत साहित्य के विहंगावलोकन के लिए युवा विद्वान् शुभ्रजित् सेन द्वारा भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् यह ग्रन्थ लिखा गया है। ग्रन्थ संस्कृत भाषा में ही लिखा गया है।



        प्रस्तुत ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है-

प्रथम अध्याय - आधुनिकतायाः तत्स्वरूपं च

      इस अध्याय में आधुनिकता की परिभाषाएं देते हुए अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के काल विभाजन पर भी विचार किया गया है। यहां भारतीय विद्वानों के मतों के साथ-साथ  पाश्चात्य विद्वानों के मतों का भी उल्लेेख करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि आधुनिकता न केवल कालगत है और न केवल मनोभावगत है अपितु दोनों ही आधुनिकता के नियामक शक्तिरूप हैं- एतदाधुनिकत्वं न कालगतं किन्तु मनोभावगतमिति। किन्तु न हि केवलं मनोभावापरपर्यायमाधुनिकत्वंसमयनिष्ठमपीति। एतद्द्वयमाधुनिकसाहित्यस्य तथा संस्कृतसाहित्यस्यापि नियामकशक्तिरूपम्।

द्वितीय अध्याय - आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये वस्त्वाङ्गिकदृष्ट्या परिवर्तनम्

               प्रस्तुत अध्याय में आधुनिक नाटक साहित्यगद्य साहित्य तथा पद्य साहित्य में आये प्रमुख परिवर्तनों तथा नवीन प्रवृत्तियों का सोदाहरण उल्लेख किया गया है। आधुनिक संस्कृत नाटकों मे आये भाषागत परिवर्तनोंतकनीकि परिवर्तनोंवस्तुगत परिवर्तनों के साथ रंगमंच के परिवर्तनों पर भी चर्चा की गई है। नाट्य की एक प्रमुख विधा नृत्यनाटिका का भी यहां वर्णन किया गया है। रेडियो नाटक की चर्चा करते हुए राधावल्लभ त्रिपाठी कृत प्रेक्षणकसप्तकम् को इस विधा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया हैकिन्तु यह सही नहीं है। प्रेक्षणकसप्तकम् रेडियोनाटक न होकर नुक्कडनाटक विधा का ग्रन्थ है।

   संस्कृत गद्यकाव्य की प्रवृत्तियों में प्रणयकथासामाजिक-कथालोककथाहास्यकथाचित्रकथा आदि के साथ उपन्यास नामक महत्त्वपूर्ण विधा का सोदाहरण वर्णन है। साथ ही ललितनिबन्ध नामक नवीन विधा पर चर्चा उपादेय है। संस्कृत कविता में हुए अन्तरंग और बहिरंग परिवर्तननवीन छन्द-प्रयोग,   महाकाव्य विधा में हुए परिवर्तन जीवनीमूलक काव्य आदि के वर्णन से यह अध्याय महत्त्वपूर्ण बन जाता है।



तृतीय अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतालंकारशास्त्रम्

      काव्य की समीक्षा के लिएउसके लक्षणभेदगुण-दोष आदि की चर्चा के लिए काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) रचे जाते रहे हैंजो लेखकसमीक्षक और सहृदय पाठकों/श्रोताओं के लिए उपादेय होते हैं। चूंकि संस्कृत में नये काव्य लिखे जा रहे हैं तो तदनुरूप नवीन काव्यशास्त्र भी लिखे गए हैं। इस अध्याय में पण्डितराज जगन्नाथ के बाद से 21 वीं सदी तक लिखे गए महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों पर चर्चा की गई है। यहां अलंकारशास्त्री के परिचय के साथ उनके द्वारा लिखित अलंकारशास्त्र का संक्षिप्त परिचय दिया गया हैयथा - रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत काव्यालंकारकारिकाअभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत अभिराजयशोभूषणम्राधावल्लभ त्रिपाठी कृत अभिनवकाव्यालंकारसूत्रब्रह्मानन्द शर्मा कृत रसालोचन। 

चतुर्थ अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतेवाङ्मये छन्दसां वैचित्र्यम्

         यद्यपि छन्द वैविध्य का वर्णन द्वितीय अध्याय में किया गया है किन्तु यहां पृथक् से उसका वर्णन विस्तार से किया गया है। मुक्तच्छन्दहिन्दी भाषा के छन्दहाइकुसॉनेटतांकासीजो जैसे वैदेशिक छन्द आदि छन्दोवैविध्य की विशद चर्चा की गई है। साथ ही वीरेन्द्र भट्टाचार्यकालीपद तर्काचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी के छन्द प्रयोग पर अलग से चर्चा की गई है। गौरतलब है कि  सॉनेट छन्द प्रयोग में वीरेन्द्र भट्टाचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी ने विशेष रूप से काव्यसर्जन किया है। इसी तरह हर्षदेव माधव हाइकुतांका और सीजो छन्दों के प्रयोग में विशेष रूप से जाने जाते हैं।



पंचम अध्याय - भारतवर्षे अर्वाचीनसंस्कृत वाङ्मय कवयितारः

     प्रस्तुत अध्याय के चार दिशाओं के आधार पर चार भाग करके प्रत्येक दिशा में स्थित राज्यों का आधुनिक संस्कृत में किये गए योगदान का वर्णन किया गया है। उत्तरप्रदेशहिमाचलप्रदेशमध्यप्रदेशराजस्थानदिल्ली आदि राज्यों के साहित्यकारों के योगदान के वर्णन के साथ त्रिपुरानागालैण्डमिजोरम जैसे राज्यों का संस्कृत साहित्य में योगदान का वर्णन इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है। उत्तरप्रदेशराजस्थान आदि राज्यों के साहित्यिक योगदान को तो रेखांकित किया जाता रहा है किन्तु पूर्वोत्तर के इन राज्यों में संस्कत में क्या कार्य हो रहा हैइसकी चर्चा प्रायः उपलब्ध नहीं होती है।

षष्ठ अध्याय - बङ्गभूमेः अर्वाचीनसंस्कृतसाहित्यम्

             यद्यपि पंचम अध्याय में बंगाल प्रदेश के येागदान पर चर्चा की जा सकती थी किन्तु लेखक ने इस प्रदेश के विस्तृत वर्णन के लिए पृथक् से अध्याय रखा है। ब्राह्मण-वशिष्ठ न्याय से हुए इस उल्लेख का कारण सम्भवतः लेखक का बंगभूमि से सम्बद्ध होना हो सकता है। इस अध्याय को दो पर्वों में विभक्त करके विधा तथा रचनाकार की दृष्टि से बंगप्रदेश के साहित्यिक योगदान का वर्णन किया गया है। यहां हरिदास सिद्धान्त वागीशयतीन्द्र विमल चौधुरीवीरेन्द्र भट्टाचार्य के साहित्यिक कार्यों के उल्लेख से पाठक समृद्ध होता है।



सप्तम अध्याय - आधुनिक संस्कृतसाहित्ये भारतवर्षे कवयित्र्यः

          संस्कृत साहित्य में महिला लेखकों के योगदान के वर्णन के लिए यह अध्याय रखा गया हैजो प्रशंसनीय है। प्रायः यह समझा जाता है कि संस्कृत में पुरुष लेखकों की ही रचनाएं हैं किन्तु आधुनिक संस्कृत की प्रायः 30 महिला लेखकों के साहित्य का यह परिचय इस को झुठला देता है।



 परिशिष्ट के रूप में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार के विजेता संस्कृत साहित्यकारों तथा उनकी कृतियों की सूची दी गई है। साथ ही प्रमुख आधुनिक संस्कृत साहित्कारांें के चित्रों को भी यहां दिया गया है। यह ग्रन्थ आधुनिक संस्कृत का परिचय बखूबी प्रस्तुत करता है। यद्यपि इस ग्रन्थ मंे कतिपय रचनाकारों और कृतियों का उल्लेख नहीं हो पाया है क्योंकि एक ही ग्रन्थ में यह सम्भव नहीं है तथापि अपनी उत्तम सामग्री से यह ग्रन्थ उपादेय सिद्ध होगा।