Saturday, May 23, 2026

मृण्मयी दीपिका _ युगबोध से समन्वित काव्यसंग्रह

कृति - मृण्मयी दीपिका

कृतिकार - कालिन्दी परीख

विधा - मुक्तच्छन्दकाव्यसंग्रह

प्रकाशन वर्ष - 2026

संस्करण - प्रथम

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली

पृष्ठ संख्या - 78

अंकित तूल्य - 150/-



   संस्कृत साहित्य में अपेक्षाकृत महिला कवि कम हैं। किन्तु आधुनिक संस्कृत साहित्य में कुछ महिला कवि सक्रिय हैं, यह आश्वस्त करता है। मृण्मयी दीपिका कालिन्दी परीख का संस्कृत में सम्भवतः प्रथम काव्यसंग्रह है। इस संग्रह में मुक्तच्छन्द में निबद्ध कविताएं संकलित हैं, जो आधुनिक भावबोध से युक्त हैं। संग्रह की भाषा सरल, सरस है। 



      काव्यसंग्रह में कुल 101 कविताएं संकलित की गई हैं। प्रायः कविताएं कलेवर में लघु हैं किन्तु इनका कथ्य, सन्देश बहुत व्यापक है। किसी मनुष्य के भाग्य में इतना दुःख होता है कि वह उस दुःख को ही अपनी सम्पत्ति मान बैठता है और स्वप्न में भी वह सुख के क्षण देखने से बचता है। जिसके भाग्य में मरुस्थल लिखा हो, बालू रेत में ही जिसका जीवन अथवा मरण हो भला वह नदी के स्वप्न देख कर करे भी तो क्या- 

न दीयतां नद्याः स्वप्नान्

मम भाग्ये तु मरुस्थलं लिखितम्

उष्ट्रः खर्जूरी दु्रमः तथा 

वालुकाः

एतत् सर्वं मम वैभवम् अस्ति।

मरुप्रदेशं व्रजामि, चरामि।

मृगजलं वा

अश्रुजलं पीत्वा

मम तृषा प्रतिदिनं,

प्रतिरात्रं वर्धते।

मरुभूमौ चिरं विहृत्य

प्रविशामि पुनः

मरुभूमिम्।

जीवनं वा मरणं वा 

सर्वम्

मे 

खलु सिक्तासु।।



     प्रेममहिम्नस्तोत्रम् कविता में मां की ममता का बखान किया गया है। ऐश्वर्यम् कविता विप्रलम्भ शृंगार से सिक्त है। मत्स्यः कविता बतलाती है कि मछली की हस्तरेखा में समुद्र है, लग्नेश भी समुद्र है और भाग्येश भी समुद्र है किन्तु जब मछुआरा उसे खाने के लिए, बेचने के लिए पकडता है तो समुद्र उसकी रक्षा नहीं कर पाता है। इधर हमारे समाज में सरोगेट मदर का प्रचलन बढता जा रहा है, जिसके अनेक कारण हैं। सरोगेट मदर दूसरे के बच्चे को अपनी कोख में धारण करती है और अन्त में अपना पारिश्रमिक लेकर चली जाती है। सरोगेट मदर आधुनिक परभृतिका कोयल के समान है-

परभृतिका

नवमासे सा प्रसूते 

नवजातशिशुम्।

किन्तु 

तस्याः स्तनयोः दुग्धं न स्रवति।

सा न जननी अस्ति

सा परिक्रीता माता,ा,

द्रव्यं गृहीत्वा

सा गच्छति निजगृहम्।

 शून्याहृदया

रिक्तहस्ता।।



    दन्तविहीना कविता में दांतों से रहित मुंह वाली माता की वृद्धावस्था का चित्रण किया गया है। मां की याददाश्त भले से दोषग्रस्त हो गई हो किन्तु उसे गाहे बगाहे अपनी सन्तानों का बचपन याद आ जाता है, यही उनकी सन्तानों के लिए सन्तोष की बात होती है क्योंकि इस बहाने वे फिर से अपना बचपन जी लेती हैं-

स्मृतिदोषग्रस्ता सा

सततं स्मरति

मम शैशवम्।।

   हतम् रे कविता में कवि कहती हैं कि ईमेल, फेसबुक और व्हाट्सअप आदि के द्वारा प्रिय को मैसेज कर देने से अब विप्रलम्भशृंगार का सारा सौन्दर्य खत्म हो गया है। बिल्वपत्राणि कविता दार्शनिकता से युक्त है। त्रिगुणातीत शिव के शिर पर बिल्वपत्र का समर्पण सत्व, रज एवं तम इन तीन गुणों को दूर करने के लिए, मोक्ष प्राप्ति के लिए है-

त्रिगुणातीतस्य शिरसि

बिल्वपत्राणि समर्पयामि

मम त्रिगुणान् दूरीकृतुम्।।

  बिल्वपत्र भी तीन नोक या तीन पत्तियों वाला होता है, तीन गुणों का प्रतीक त्रिदल। समकालीन घटनाओं के प्रयोग में कई बार कवि अभिधा में अपना कथ्य प्रस्तुत करने लगते हैं, जिससे कि वह कविता न होकर सूचना मात्र प्रतीत होती है। किन्तु कालिन्दी परीख ने अपने समय की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को प्रतीयमानार्थ के साथ उकेरा है। माम् अपि कविता me  too आन्दोलन की याद दिलाती है, जो यौनशोषण के विरुद्ध संचालित हुआ था_

माम् अपि' (Me too) 

आन्दोलनेन 

बहिः प्रकाशः आगच्छति 

साधूनां चरितम्।

मुनिवेशव्याजेन

रावणस्य दुरितम्। 

सद्यः उद्घाटितं भवति 

अनेनान्दोलनेन

 स्वैरविहारिणां 

भविष्यति शिरच्छेदः । 

अपटीक्षेपेण

 निर्दोष बालिकानाम् 

यौनशोषणं कृत्वा 

चरन्ति पशुभिः समानाः ।

किं न जानन्ति ते

अधुना 'माम् अपि' (Me too)

इति शस्त्रपातः 

तेषां विनाशाय 

जृम्भायते।



        संग्रह की सारी कविताएं विविध बिम्बों वाली हैं। कवि द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों में ताजगी है। कवि द्वारा मिथों, पुराकथाओं का प्रयोग अपने कथ्य को प्रस्तुत करने के लिए बखूबी किया है। कवि यह संग्रह आधुनिक संस्कृत साहित्य की श्रीवृद्धि करता है।

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