कृति - मंजुलाः बालगीतयः
कृतिकार - डा. मंजुलता शर्मा
विधा - बालसाहित्य
प्रकाशक – परिमल पब्लिकेशंस दिल्ली
प्रकाशनवर्ष - 2026
संस्करण - प्रथम
पृष्ठ संख्या - 102
अंकितमूल्य - 250
भारतीय भाषाओं में बालसाहित्य लिखा व पढा जा रहा है। संस्कृत में बालसाहित्य मात्रात्मक एवं गुणात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत कम है। फिर भी कतिपय साहित्यकार इस दिशा में प्रशंसनीय प्रयास कर रहे हैं। मंजुलता शर्मा आधुनिक संस्कृत साहित्य में अपनी समीक्षात्मक दृष्टि के लिए जानी जाती हैं। आपकी समीक्षा की शैली अन्य समीक्षकों से अलगाती है। हाल ही में आपका कवि पक्ष भी मंजुलाः बालगीतयः इस संग्रह से सामने आया है। किसी बेहतरीन समीक्षक का बालसाहित्य की रचना में प्रवृत्त होना उम्मीद बढाता है। वस्तुतः बालसाहित्य की रचना करना असिधारा पर चलने के समान ही है।
प्रस्तुत बालगीति संग्रहमें 25 कविताएं संकलित हैं। कवि ने स्वयं इनका हिन्दी अनुवाद भी किया है] जो सहज एवं लयात्मक है। साथ ही प्रत्येक कविता के साथ उस कविता के भावों से मेल खाता चित्र भी दिया गया है जो इस संग्रह को और भी रोचक बना देता है। बालमन अनूठा होता है। उसके लिए संसार की प्रत्येक वस्तु वयस्क व्यक्ति से भिन्न महत्त्व की होती है। उसकी विश्व को देखने का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। यही कारण है कि कई बडे साहित्यकार बालसाहित्य की रचना में चूक जाते हैं। मंजुलता शर्मा की कविताएं बालमन की कविताएं हैं। पहली कविता बरसते बादलों पर रची गई है-
एवं वर्षति मेघः सततम्
भेकेनापि क्रीतं छत्रम्।।
मुसलधाराः पतन्ति मात्रम्।
अहो वेपते ममापि गात्रम्।।
बारिश के मौसम का यहां स्वाभाविक वर्णन किया गया है जिसमें एक बालक कल्पना करता है कि लगातार होती बारिश के कारण मेंढक ने भी छाता खरीद लिया है। कविता में बालक के शरीर पर पडती बारिश की बूंदों से कांपते शरीर का उल्लेख किया गया है। हमने स्वयं के साथ-साथ बच्चों को भी बारिश में नहाने से रोक रखा हैं फिर हम उन्हें स्वीमिंग पुल में लेकर जाते हैं। हम जितना बच्चों को प्रकृति से दूर रखेंगे उतना ही वे अन्दर से कच्चे रह जायेंगे। निदा फ़ाज़ली कहते हैं
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
सरलभाषा में लिखी गई ये गीतियां गेय भी हैं। एकल परिवार के युग में संयुक्त परिवार की विशिष्टताओं का वर्णन करते हुए कहा गया है-
यथा विशालः वटवृक्षोऽस्ति।
तथा दयालुः पितामहोऽस्ति।।
इक्षुदण्ड इव सदा मधुरः।
अहं तथा मे प्रियपरिवारः।।
वटवृक्षोऽहम् तथा वृक्षाः दोनों बालगीत अभिनेय भी हैं अतः इन्हें अभिनयगीत कहा गया है। मेघाः बालगीत पर्यायशब्द विशेषणगीत हैं। यहां मेघ शब्द के जलद बलाहक वारिमुच वारिधर अम्बुधर आदि विशेषणो प्रयोग किया गया है| संख्यागीतिः बालगीत अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है।
यहां एक से लेकर 20 तक की संख्याओं का प्रयोग किया गया है ताकि बालकों को गीत के साथ-साथ संख्याओं का ज्ञान भी हो सके-
त्रयोदश स्थिताः वृद्धा स्त्रियः सन्ति चतुर्दश।
पंचदश गजाः तत्र छात्रा गच्छन्ति षोडश।।
वर्णानां मनोरमा सृष्टिः गीति में श्वेत, गौर, पीत, रक्त आदि वर्णों का उल्लेख किया गया है। छोटे बालक रंगों के नाम संस्कृत में पहचान सकें, इसके लिए ऐसे प्रयास प्रशंसनीय हैं। देहि गीति में चतुर्थी विभक्ति का शिक्षण किया गया है-
वृक्षेभ्यः देहि पानीयं भिक्षुकेभ्यः च भोजनम्।
रंकेभ्यः देहि वस्त्राणि वनाय देहि रक्षणम्।।
यहां एक तरफ तो देने के अर्थ में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है ऐसा बालक सीख जाता है साथ ही अनायास वह मानवीय मूल्यों को भी आत्मसात् करता रहता है।
मम मार्जारी गीति पालतु बिल्ली के प्रति बच्चों के सहज अनुराग को अभिव्यक्त करती है-
चपला चतुरा मम मार्जारी।
ननु दुर्ललिता मम मार्जारी।।
घृतं खादति पिबति च दुग्धम्।
सदा खादति मम मार्जारी।।
चपल चतुर है मेरी बिल्ली
कैसी नटखट है मेरी बिल्ली
घी खाती और दूध भी पीती
सब कुछ खाती मेरी बिल्ली।।
संग्रह की सभी गीतियां भावों से भरी हुई हैं। संस्कृत बालसाहित्य में यह नवीन कृति सर्वथा स्वागत के योग्य है।







संस्कृत में बाल साहित्य न के बराबर है।मंजुलता जी प्रयोग सराहनीय और स्वागतार्ह है।
ReplyDeleteडॉ कौशल तिवारी के ब्लॉग सदैव पूर्ण परिचयात्मक होते हैं। नव संस्कृत साहित्य के प्रयोग धर्मी कौशल में अनेक सम्भावनाएँ निहित हैं। इस समीक्षा दृष्टि हेतु धन्यवाद ।
ReplyDeleteहार्दिक आभार
ReplyDeleteइतने वरिष्ठ कवि डॉ हर्षदेव माधवजी जी द्वारा दिया गया प्रोत्साहन प्रेरित करता है ।