वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा
पुस्तक- वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा
लेखक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- सत्यम् पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज
आईएसबीएन- 978-93-85981-97-5
पृष्ठ संख्या- 505
अंकित मूल्य- 1100रू.
संस्करण- 2018 प्रथम
कवि- संस्कृत वाङ्मय के गंभीर अध्येता और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना कर साहित्य की श्रीवृद्धि की है। उन्होंने गुरुओं से शास्त्रों का विधिवद् अध्ययन किया था। उन्होंने परम्परागत अध्ययन करते हुए शास्त्री, आचार्य, काव्यतीर्थ उपाधियाँ प्राप्त कीं। अध्ययन हेतु काशी वास के समय उन्होंने स्वामी करपात्री जैसी विभूतियों को देखा-सुना था। कुछ समय उन्होंने संसार से विरक्त होकर यायावर जीवन जिया था। सागर लौटकर उन्होंने आधुनिक पद्धति से इण्टमीडियट, बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. उपाधियाँ प्राप्त कीं। इस प्रकार उन्होंने परम्परागत एवं आधुनिक दोनों विधाओं में अध्ययन किया था। महापुरुषों की संगति और सत्साहित्य के अध्ययन का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे स्वयं अपने मन, वचन और कर्म से शास्त्रीय आचार का पालन करते थे। धवल धौत वस्त्रों से परिवेष्टित सुदृढ दीर्घ काया उनके व्यक्तित्व को उभारती थी। उनके व्यक्तित्व में भारतीय संस्कारों की गहरी छाप थी। उनका आचरण एवं व्यवहार शास्त्रीय आचारों से अनुशासित था। गौ सेवा और गोदुग्ध का पान उनकी जीवन चर्या के आजीवन अभिन्न अंग रहे। संस्कृत सेवा हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और रामचरितमानस के संस्कृत पद्यानुवाद हेतु साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं, जो उन्हें मिले।
पुस्तक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 1964 में डॉ. वनमाला भवालकर के निर्देशन में पीएच.डी. उपाधि हेतु ‘वैष्णवपुराणों में आचार-समीक्षा’ शोधप्रबन्ध प्रस्तुत किया था। इसे पुस्तकाकार में 2018 में प्रकाशित किया गया है। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का प्राक्कथन, प्रो. कुसुम भूरिया की शुभाशंसा, प्रो. रमाकान्त पाण्डेय का पुरोवाक्, डॉ. धर्मेन्द्र कुमार सिंहदेव की शुभाशंसा, संपादक डॉ. ऋषभ भारद्वाज का निवेदन और पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जीवन-परिचय दिया गया है। इस पुस्तक में बारह अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में पुराण समालोचना, द्वितीय अध्याय में आचार समालोचना के अन्तर्गत आचार की परिभाषा और महत्त्व आदि हैं। तृतीय अध्याय में सदाचार के प्रेरक तत्त्वों का निरूपण है। चतुर्थ अध्याय में आचार के मूल तत्त्वों में सत्य, अहिंसा, शौच, अस्तेय, दम या मनःसंयम या इन्द्रिय संयम, दया, अनसूया, अकाम, अक्रोध और अलोभ का निरूपण है। पंचम अध्याय में वर्णों के आचार के अन्तर्गत वर्णों के आचारों को प्रोत्साहन, चारों वर्णों के आचार, आचारों से वर्णों का उत्थान, आचार के उत्कर्ष से अन्य जन्म में भी उच्च वर्ण प्राप्ति, कुत्सित आचारों से उच्च वर्ण से पतन, वर्णों का परस्पर व्यवहार और शिष्टाचार का निरूपण है। शष्ठ अध्याय में ब्रह्मचर्याश्रम के आचार के अन्तर्गत अध्ययन में आचार की आवश्यकता, ब्रह्मचारी के नित्य आचार, ब्रह्मचर्य साधन के नियम और ब्रह्मचारी के गुण आदि का निरूपण है। सप्तम अध्याय में वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के आचार के अन्तर्गत वानप्रस्थ को तप का महत्त्व, यम, नियम और योगादि आचार, संन्यास ग्रहण को अपेक्षित आचार, संन्यासियों के विभाजन में आचार का महत्त्व, संन्यासी का सांसारिक आचार, चिन्तन, अव्यक्त लिंग संन्यासी, परोपकार आदि का निरूपण है। अष्टम अध्याय में गृहस्थाश्रम के नित्य आचारों का निरूपण है। इसमें गृहस्थाश्रम का आचार की दृष्टि से महत्त्व, शौचादि कृत्य, देवपूजन, पंच महायज्ञ, भोजन, अर्थोपार्जन और शयन आदि को बताया गया है। नवम अध्याय में गृहस्थाश्रम के पारिवारिक आचार तथा सामान्य शिष्टाचार हैं। इसमें आचार पालन में दम्पती, गृहिणी के कर्तव्य, माता पिता के प्रति पुत्रों का आचार, परिवार में पुरुष वर्ग का नारी के प्रति कर्तव्य, रक्षण, आदर, अवध्यता, सामाजिक सच्चरित्रता, पुरुष वर्ग की सच्चरित्रता, गृहस्थ के सामान्य शिष्टाचार और निषिद्ध आचार, गृहस्थ के रहन-सहन वेष-भूषा आदि का वर्णन है। दशम अध्याय में संस्कार, मृत्यु, श्राद्ध, प्रायश्चित्त संबंधी नैमित्तिक आचार हैं। एकादश अध्याय में अन्य नैमित्तिक व आध्यात्मिक आचारों का निरूपण है जिनमें यज्ञ, दान, पूर्त, व्रत, तीर्थ, आध्यात्मिक आचारों का वर्णन है। द्वादश अध्याय में उपसंहार है। अन्त में आधार ग्रन्थ सूची दी गयी है। द्विवेदी जी दूरूह विषयों को भी सरल रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। वैदिक साहित्य, धर्मशास्त्र, आर्षकाव्य, पुराण साहित्य और अन्य ग्रन्थों के सन्दर्भों से यह ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक तथा उपादेय बन गया है। विभिन्न प्रकार की कुण्ठाओं और अतिचार से पीड़ित समाज को प्रामाणिक शास्त्रीय मार्ग दिखाने में समर्थ यह ग्रन्थ नितान्त उपयोगी होने से पठनीय और संग्रहणीय है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने इसके प्राक्कथन में लिखा है कि ‘इस कृति में उन्होंने वैष्णव पुराणों में प्रतिपादित आचारों की सर्वांगीण विवेचना तो की ही है, सदाचार के प्रेरक तत्त्वों तथा मूल तत्त्वों की गवेषणा भी करते हुए आचारमूलक जीवन के निष्कर्ष तथा ध्येयों की भी पहचान करायी है।’
पुस्तक- वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा
लेखक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- सत्यम् पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज
आईएसबीएन- 978-93-85981-97-5
पृष्ठ संख्या- 505
अंकित मूल्य- 1100रू.
संस्करण- 2018 प्रथम
कवि- संस्कृत वाङ्मय के गंभीर अध्येता और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना कर साहित्य की श्रीवृद्धि की है। उन्होंने गुरुओं से शास्त्रों का विधिवद् अध्ययन किया था। उन्होंने परम्परागत अध्ययन करते हुए शास्त्री, आचार्य, काव्यतीर्थ उपाधियाँ प्राप्त कीं। अध्ययन हेतु काशी वास के समय उन्होंने स्वामी करपात्री जैसी विभूतियों को देखा-सुना था। कुछ समय उन्होंने संसार से विरक्त होकर यायावर जीवन जिया था। सागर लौटकर उन्होंने आधुनिक पद्धति से इण्टमीडियट, बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. उपाधियाँ प्राप्त कीं। इस प्रकार उन्होंने परम्परागत एवं आधुनिक दोनों विधाओं में अध्ययन किया था। महापुरुषों की संगति और सत्साहित्य के अध्ययन का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे स्वयं अपने मन, वचन और कर्म से शास्त्रीय आचार का पालन करते थे। धवल धौत वस्त्रों से परिवेष्टित सुदृढ दीर्घ काया उनके व्यक्तित्व को उभारती थी। उनके व्यक्तित्व में भारतीय संस्कारों की गहरी छाप थी। उनका आचरण एवं व्यवहार शास्त्रीय आचारों से अनुशासित था। गौ सेवा और गोदुग्ध का पान उनकी जीवन चर्या के आजीवन अभिन्न अंग रहे। संस्कृत सेवा हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और रामचरितमानस के संस्कृत पद्यानुवाद हेतु साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं, जो उन्हें मिले।
पुस्तक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 1964 में डॉ. वनमाला भवालकर के निर्देशन में पीएच.डी. उपाधि हेतु ‘वैष्णवपुराणों में आचार-समीक्षा’ शोधप्रबन्ध प्रस्तुत किया था। इसे पुस्तकाकार में 2018 में प्रकाशित किया गया है। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का प्राक्कथन, प्रो. कुसुम भूरिया की शुभाशंसा, प्रो. रमाकान्त पाण्डेय का पुरोवाक्, डॉ. धर्मेन्द्र कुमार सिंहदेव की शुभाशंसा, संपादक डॉ. ऋषभ भारद्वाज का निवेदन और पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जीवन-परिचय दिया गया है। इस पुस्तक में बारह अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में पुराण समालोचना, द्वितीय अध्याय में आचार समालोचना के अन्तर्गत आचार की परिभाषा और महत्त्व आदि हैं। तृतीय अध्याय में सदाचार के प्रेरक तत्त्वों का निरूपण है। चतुर्थ अध्याय में आचार के मूल तत्त्वों में सत्य, अहिंसा, शौच, अस्तेय, दम या मनःसंयम या इन्द्रिय संयम, दया, अनसूया, अकाम, अक्रोध और अलोभ का निरूपण है। पंचम अध्याय में वर्णों के आचार के अन्तर्गत वर्णों के आचारों को प्रोत्साहन, चारों वर्णों के आचार, आचारों से वर्णों का उत्थान, आचार के उत्कर्ष से अन्य जन्म में भी उच्च वर्ण प्राप्ति, कुत्सित आचारों से उच्च वर्ण से पतन, वर्णों का परस्पर व्यवहार और शिष्टाचार का निरूपण है। शष्ठ अध्याय में ब्रह्मचर्याश्रम के आचार के अन्तर्गत अध्ययन में आचार की आवश्यकता, ब्रह्मचारी के नित्य आचार, ब्रह्मचर्य साधन के नियम और ब्रह्मचारी के गुण आदि का निरूपण है। सप्तम अध्याय में वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के आचार के अन्तर्गत वानप्रस्थ को तप का महत्त्व, यम, नियम और योगादि आचार, संन्यास ग्रहण को अपेक्षित आचार, संन्यासियों के विभाजन में आचार का महत्त्व, संन्यासी का सांसारिक आचार, चिन्तन, अव्यक्त लिंग संन्यासी, परोपकार आदि का निरूपण है। अष्टम अध्याय में गृहस्थाश्रम के नित्य आचारों का निरूपण है। इसमें गृहस्थाश्रम का आचार की दृष्टि से महत्त्व, शौचादि कृत्य, देवपूजन, पंच महायज्ञ, भोजन, अर्थोपार्जन और शयन आदि को बताया गया है। नवम अध्याय में गृहस्थाश्रम के पारिवारिक आचार तथा सामान्य शिष्टाचार हैं। इसमें आचार पालन में दम्पती, गृहिणी के कर्तव्य, माता पिता के प्रति पुत्रों का आचार, परिवार में पुरुष वर्ग का नारी के प्रति कर्तव्य, रक्षण, आदर, अवध्यता, सामाजिक सच्चरित्रता, पुरुष वर्ग की सच्चरित्रता, गृहस्थ के सामान्य शिष्टाचार और निषिद्ध आचार, गृहस्थ के रहन-सहन वेष-भूषा आदि का वर्णन है। दशम अध्याय में संस्कार, मृत्यु, श्राद्ध, प्रायश्चित्त संबंधी नैमित्तिक आचार हैं। एकादश अध्याय में अन्य नैमित्तिक व आध्यात्मिक आचारों का निरूपण है जिनमें यज्ञ, दान, पूर्त, व्रत, तीर्थ, आध्यात्मिक आचारों का वर्णन है। द्वादश अध्याय में उपसंहार है। अन्त में आधार ग्रन्थ सूची दी गयी है। द्विवेदी जी दूरूह विषयों को भी सरल रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। वैदिक साहित्य, धर्मशास्त्र, आर्षकाव्य, पुराण साहित्य और अन्य ग्रन्थों के सन्दर्भों से यह ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक तथा उपादेय बन गया है। विभिन्न प्रकार की कुण्ठाओं और अतिचार से पीड़ित समाज को प्रामाणिक शास्त्रीय मार्ग दिखाने में समर्थ यह ग्रन्थ नितान्त उपयोगी होने से पठनीय और संग्रहणीय है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने इसके प्राक्कथन में लिखा है कि ‘इस कृति में उन्होंने वैष्णव पुराणों में प्रतिपादित आचारों की सर्वांगीण विवेचना तो की ही है, सदाचार के प्रेरक तत्त्वों तथा मूल तत्त्वों की गवेषणा भी करते हुए आचारमूलक जीवन के निष्कर्ष तथा ध्येयों की भी पहचान करायी है।’
डॉ नौनिहाल गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com
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मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com
अति उत्तम
ReplyDeleteआभार
Deleteबहुत सुंदर कार्य का परिचय कराने के लिए आपको धन्यवाद
ReplyDeleteआभार धन्यवाद
Deleteवास्तव में यह ग्रन्थ सनातन संस्कृति को समझने का बहुत उपयोगी ग्रन्थ है।
ReplyDeleteअत्यन्त आभार
DeleteThis comment has been removed by the author.
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