Saturday, June 13, 2020

''नतितति:'(स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य)

'नतितति:'(स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य)
कृति - नतितति:

विधा - स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य
लेखक - पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय
प्रकाशक -पाण्डेय प्रकाशन, जयपुर
सम्पर्क सूत्र - 9829271351 
संस्करण- प्रथम , 2007
पृष्ठ संख्या -
अंकित मूल्य - 100


राजस्थान प्रान्त के जयपुर परकोटे में जन्में राष्ट्रपति सम्मानित वाचस्पति, साहित्य मनीषी पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय संस्कृत साहित्य की निहारिका के कवि की तरह ज्वाज्वल्यमान नक्षत्र हैं जिन्होंने अपने ज्ञान वैदुष्य से नभोमण्डल को प्रकाशित किया । उनके द्वारा रचित यह स्तुति परक चित्रकाव्य संस्कृत जगत् के लिए अनुपम उपहार है। " नति:" शब्द की व्युत्पत्ति पर हम दृष्टिपात करते हैं तो 'नति:' शब्द का अर्थ है प्रणमन। वामन शिवराम आप्टे ने अपने शब्दकोश में नति:(स्त्रीलिंग) शब्द को इस प्रकार प्रस्तुत किया है-  नम्+क्तिन्--झुकाव, झुकना, प्रणमन, वक्रता, कुटिलता, अभिवादन करने के लिए शरीर को झुकाना, प्रणति, शालीनता तथा ज्योतिष में भोगांश में स्थानभ्रंश।'तति:'-तन्+क्तिन्---श्रेणी पंक्ति, रेखा, गण, दल, समूह। इस प्रकार 'नतितति:' का शाब्दिक अर्थ हुआ प्रणमन-शृंखला। कवि ने वैदिक देवताओं से लेकर दशावतार तक ही नहीं, अपितु मानवीय संचेतनाओं तक प्रणमन किया है।

          'नतितति:' में श्रीकृष्ण, वामन, विद्वज्जन, वराह, परब्रह्म, विष्णु, जमदग्नि, टंकेश्वरी, रूद्र, दुण्डिराज(गणेश), तारेश(शिव), अग्निदेव, दुर्गा, शेषनाग, वाग्देवता, भारद्वाज, गणपति, लक्ष्मीपति, कार्तिकेय, सूर्य, हनुमान, क्षमेश, षोडशमातृका, गंगा आदि देवी-देवताओं की प्रभुता तथा गरिमा के गुणों को लेकर रचना की गई है।
     पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय ने वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर से पद्य के प्रत्येक शब्द के आदि में उसी व्यंजन को रखा है। पद्यों की रचना में वर्णमाला के किसी भी अक्षर का परित्याग नहीं किया है यह भी एक अत्यन्त कठिन कार्य है क्योंकि टवर्ग प्रभृत ऐसे वर्ण हैं जिनमें सम्बधित सार्थक शब्दों की संस्कृत भाषा में अत्यन्त न्यूनता है परन्तु कवि ने सभी वर्णों पर पद्य निर्मित किये हैं। प्रस्तुत काव्य के माध्यम से कवि के प्रौढ़ पाण्डित्य का परिचय प्राप्त होता है।
स्तोत्र साहित्य में एक सुन्दर कड़ी जोड़ने वाले इस ग्रन्थ कि विशेषता है कि इसका प्रत्येक पद्य नागरी वर्णमाला के एक वर्ण को नायक बनाकर लिखा गया है और उस पद्य का प्रत्येक पद उस वर्ण से ही प्रारम्भ होता है। ऐसी कृतियों को सदियों से चित्रकाव्य कहा जाता रहा है। कभी एक पद्य एक ही अक्षर में पूरा गुम्फित होकर 'एकाक्षरचित्रकाव्य' कहा जाता है। यह काव्य इस दृष्टि से चित्रकाव्य भी है, स्तोत्र काव्य भी, मुक्तक काव्य भी।

तकार से प्रारम्भ हुआ एक श्लोक दर्शनीय है--

तारेशस्तापसेशस्तपतपसतमोहन्तृतुल्यत्रितार:,
तेजस्वी तोषतोलस्तनुतुहिनतनुस्तीर्थतोयातितृप्त:।
त्रैकाल्ये तापतप्तान् तमितरितरिकस्त्रायतां तोयतोष:,
तैतिक्षस्तुष्टुतुष्टस्त्रिपुरतपनकस्तत्त्वतस्तुर्यतल्प:॥


एक अन्य उदाहरण द्रष्टव्य है, जिसमें व वर्ण के चमत्कारिक प्रयोग के साथ गणेश-वन्दना की गई है-

वन्दे वन्दारुवृन्दैर्विबुधबुधवरैर्वन्दनीयं वरेण्यं,
वाग्वैदग्ध्यं विकर्णं विधिवरवदनैर्वर्ण्यमानं विशालम्।
विद्यावार्धिं वदान्यं विसृमरवपुषं विघ्नवारैकवेधं,
‘वं’ बीजे विद्यमानं बहुविधवरदं व्यापकं वारणस्यम्।।


प्रत्युत इस काव्य को  संस्कृत जगत् के समक्ष प्रस्तुत करने का ध्येय यही है कि आप इस अमूल्य निधि से रूबरू हो सकें|


  • डॉ तारेश कुमार शर्मा
मोबाइल नम्बर - 9810869055
मेल आई डी - kumartaresh82@gmail.com

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