संस्कृत कहानियों का अनुपम निदर्शन - पुनर्नवा
कृति - पुनर्नवा
विधा - गद्य काव्य
लेखक -अभिराज राजेन्द्र मिश्र
संस्करण -प्रथम, 2008
प्रकाशक-वैजयंत प्रकाशन, इलाहाबाद
पृष्ठ संख्या - 160
अंकित मूल्य- 300 रु
साहित्य जनमंगल का साधक है। जनमंगल के सुन्दर साध्य को साधने वाले क्रान्तदर्शी कवि की संवेदना जनहृदय के साथ एकाकार होकर उनकी पीडाओं और संवेदनाओं को महसूस करती है और उनके समाधान की दिशा भी प्रदान करती है। नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का ही चमत्कार होता है कि वागर्थ समूह किसी भी भाषा अथवा साहित्य की किसी भी विधा में हो, उसका लक्ष्य लोकाराधन ही होता है।
ऋग्वेद की प्रथम ऋचा के अवतरण से अद्यावधि संस्कृत सरिता विविध विधाओं मे सतत प्रवाहमान है। साहित्य की प्रत्येक विधा में प्रायः कथातत्त्व विद्यमान रहता है किन्तु शुद्धकथाविधा में कोई अद्भुत ही बात है, जो हठात् सहृदय-हृदय को चमत्कृत कर शिक्षित करती आई है।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में साहित्यानुरागी जनों के हृदयों में विराजमान अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने विविध विधामय विपुल काव्य सर्जना से एक नवीन साहित्य युग का प्रवर्तन किया है। उनकी नवीन दृष्टि काव्यसृष्टि में प्रतिबिम्बित होती है। वे एक संवेदनशील साहित्यकार हैं, समाज के सूक्ष्म अध्येता हैं, मानवता के पक्षधर हैं, मानव मन के विश्लेषक हैं, मनोभावों के चित्रकार हैं तथा सामाजिक विसंगतियों विशेषतः नारजीवन की विसंगतियों को सुसंगतियों में परिणमित करने के लिये संकल्पित हैं। सम्पूर्ण अभिराजीय कथा संसार स्त्री संवेदना से प्राणमय है। उनकी कथाएं प्रायशः नारी प्रधान हैं, उनके शीर्षक भी इसका संकेत करते हैं।
पुनर्नवा अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित कथानिका संग्रह है। कथानिका को परिभाषित करते हुए वे स्वयं स्पष्ट करते हैं कि कथानिका प्राचीन शास्त्रीय विशाल कलेवरा कादम्बरी, वासवदत्ता जैसी कथाओं की अपेक्षा कथावस्तु, चरित्रचित्रण, संवाद, परिवेश, भाषाशैली एवं उद्देश्य रूपी छः तत्त्वों पर आधारित हिन्दी कहानी के ज्यादा निकट है। इस कथासंग्रह में ग्यारह कथानिकाएं हैं जिनमें अन्तिम अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा को दीर्घकथा में रखा जा सकता है। इस संग्रह की प्रतिनिधि कथा पुनर्नवा कथानिकाओं की मूल संवेदना को सम्प्रेषित करती है । पुनर्नवा औषधि ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त ताप से मुरझा जाती है किन्तु वर्षा ऋतु में जलमयी अमृत बून्दों से पुनः लहलहा उठती है तथा स्वस्थ व सुन्दर समाज के निर्माण में अपना योगदान देती है। उसी प्रकार यह कथानिका संग्रह सामाजिक सन्तापों से मुरझाए स्त्री समाज को नवचेतना के अमृतमय स्वरों से स्वस्थ व प्रफुल्लित करना चाहता है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी सामाजिक संरचना के विकार का उपचार कर उसे सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप प्रदान करने का संकल्प रखती है| इन कथानिकाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
संकल्प- संकल्प कहानी उच्चवर्ग के यहां कार्य कर आजीविका चलाने वाले दो चर्मकार युवकों की मनोदशा को चित्रित करती है, जिसमें वर्गसंघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कहानी का एक पात्र भोगी गांव से शहर की ओर पलायन करना चाहता है किन्तु अपने एक मित्र के विरह में व्याकुल परिवार की दशा देखकर अपनी मां एवं मातृभूमि को न छोडने का संकल्प लेता है। कथा में समाज की विविधता को स्वीकार किया गया है क्योंकि उसका आधार प्रकृति प्रदत्त गुण एवं योग्यता है- प्रकृतिः स्वयमेव भिद्यते। चटको मयूरः पिकः पारावतष्टिट्टिभश्चातक इति शतमिता पक्षिणः। परस्परं भिन्नास्ते। परन्तु भिन्नत्वेऽपि किंचिद् विलक्षणमेव रहस्याकर्षणम्।
सपत्नी - मातृत्व से वंचित, वन्ध्यत्व की वेदना से व्यथित, परिवार एवं समाज के तिरस्कार से दग्ध, अपने परिवार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपने अस्तित्व को दाव पर लगा देने वाली उदारहृदया बुधनी की मनोदशा को साकार रूप प्रदान करती सपत्नी कहानी समाज के उस पक्ष को उजागर करती है, जो एक स्त्री को बांझ होने के कारण उपेक्षित कर देता है।
वाग्दत्ता - वाग्दत्ता कहानी सुदीर्घकाल से स्थापित वैवाहिक व्यवस्था में परिवर्तन की पक्षधर है। कहानी की विलक्षणता इस बात में निहित है कि इस परिवर्तन की पहल के लिए कथाकार ने उमाचरण शुक्ल को चुना है ,जो कथा में धर्म एवं दर्शन के विद्वान् हैं क्योंकि समाज श्रेष्ठ जनों का अनुसरण करता आया है। शुक्ल महोदय समाजभय को त्यागकर अमेरिका से भारतीय दर्शन में शोध के लिए आई जेनी को हृदय से पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करते हैं- समाजस्तु नदीप्रवाहकल्पो यो हि प्रावृषि मलीमसश्शीतर्तौ च स्वच्छतरो जायते।
नर्तकी - संस्मरणात्मक रूप में लिखी गई नर्तकी कहानी नर्तकी के भीतर की नारी के मनोभावों को साकार रूप प्रदान करती है। नर्तकी कमरजहां की मां हुस्नाबाई के मन के स्तर पर जाकर उसके स्त्रीत्व, ममता, करुणा, शरणागतवत्सलता एवं वचन की मर्यादा को मूर्त रूप प्रदान किया गया है।
न्यामहं करिष्ये - न्यायमहं करिष्ये कहानी माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् भाई-भाभी पर आश्रित ननद भवानी एवं उसकी संकुचित हृदय वाली भाभी के सम्बन्धों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या है। यहां भवानी भतीजी मुदिता ही अपनी मां को उचित राह दिखाती है।
ध्रुवस्वामिनी - ऐतिहासिक पात्र समुद्रगुप्त के ज्येष्ठ निवीर्य पुत्र की वधू ध्रुवस्वामिनी अपने पति के द्वारा सताये जाने पर देवर के द्वारा रक्षित होती है और देवर के द्वारा पति को मार दिये जाने पर देवर के प्रति ही समर्पित हो जाती है किन्तु कथाकार ने अपनी कथा की नायिका में हृदय परिवर्तन को दिखलाते हुए कहानी को सुखद अन्त प्रदान किया है।
वन्ध्या - वन्ध्या कहानी में कथाकार ने बांझ स्त्री की पीडा को न केवल भावनात्मक धरातल प्रदान किया है अपितु समाज को नया दृष्टिकोण भी प्रदान किया है। सन्तानहीनता से जीवन को निरर्थक मानने वाली कथानायिका को उसका पति कहता है- सन्ततिप्रजननं नाम न केवलं पत्न्या दायित्वम्। वस्तुतः उभयसंविभक्तमिदं दायित्वम्। तर्हि कोऽयं न्यायो यद्यया सन्ततिविरहघटनया वराकी नारी समाजे सर्वजनतिरस्कृता जायते, वन्ध्या कथ्यते।
न्यासरक्षा - सौतेली मां की स्थापित छवि के विपरित यह कहानी एक आदर्श सौतेली मां को चित्रित करती है। सौतेली मां बनी सुन्दरा किस प्रकार अपने सौतेले पुत्र का उचित लालन-पालन करती है तथा उसके प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देती है, यह इस कहानी में माार्मिक ढंग से उकेरा गया है।
मरुन्यग्रोध - मरुन्यग्रोध कहानी वैधव्य के रेगिस्तान की तपती धूप से संतप्त श्यामा एवं इस तपती धूप में शीतल छाव बनकर आये मरुन्यग्रोध दयालु की कहानी है।
पुनर्नवा - पुनर्नवा कहानी इस संग्रह की प्राणरूपा कही जा सकती है। पति को देख बिना ही विधवा हुई कृष्णा के पुनर्विवाह को शास्त्रीय आधार देते हुए कथाकार कहते हैं- सर्वा अपि स्मृतयः सर्वेऽपि महर्षयो विधवाविवाहं समर्थयन्ते। यथा वर्षाजलपरीवाहेनाऽपेयसलिलाऽपि वापीपरमार्थत: शुध्यति तथैव प्रत्येकं रजोदर्शनेन नारी शुध्यति।
अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा - अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा हजारी प्रसाद द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा का स्मरण करवाती है। यह कथाकार द्वारा स्वप्नदर्शन अनुभव के रूप में लिखी गई है। प्रकारान्तर से कथाकार ने सनातन वैदिक धर्म के पक्ष को दृढता से अनुकरणीय सिद्ध करते हुए बौद्ध धर्म का खण्डन किया है।
डॉ. अशोक कंवर शेखावत
सहायक आचार्य
संस्कृत विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झालावाड़, राजस्थान
मोबाइल नम्बर - 9414595573
कृति - पुनर्नवा
विधा - गद्य काव्य
लेखक -अभिराज राजेन्द्र मिश्र
संस्करण -प्रथम, 2008
प्रकाशक-वैजयंत प्रकाशन, इलाहाबाद
पृष्ठ संख्या - 160
अंकित मूल्य- 300 रु
साहित्य जनमंगल का साधक है। जनमंगल के सुन्दर साध्य को साधने वाले क्रान्तदर्शी कवि की संवेदना जनहृदय के साथ एकाकार होकर उनकी पीडाओं और संवेदनाओं को महसूस करती है और उनके समाधान की दिशा भी प्रदान करती है। नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का ही चमत्कार होता है कि वागर्थ समूह किसी भी भाषा अथवा साहित्य की किसी भी विधा में हो, उसका लक्ष्य लोकाराधन ही होता है।
ऋग्वेद की प्रथम ऋचा के अवतरण से अद्यावधि संस्कृत सरिता विविध विधाओं मे सतत प्रवाहमान है। साहित्य की प्रत्येक विधा में प्रायः कथातत्त्व विद्यमान रहता है किन्तु शुद्धकथाविधा में कोई अद्भुत ही बात है, जो हठात् सहृदय-हृदय को चमत्कृत कर शिक्षित करती आई है।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में साहित्यानुरागी जनों के हृदयों में विराजमान अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने विविध विधामय विपुल काव्य सर्जना से एक नवीन साहित्य युग का प्रवर्तन किया है। उनकी नवीन दृष्टि काव्यसृष्टि में प्रतिबिम्बित होती है। वे एक संवेदनशील साहित्यकार हैं, समाज के सूक्ष्म अध्येता हैं, मानवता के पक्षधर हैं, मानव मन के विश्लेषक हैं, मनोभावों के चित्रकार हैं तथा सामाजिक विसंगतियों विशेषतः नारजीवन की विसंगतियों को सुसंगतियों में परिणमित करने के लिये संकल्पित हैं। सम्पूर्ण अभिराजीय कथा संसार स्त्री संवेदना से प्राणमय है। उनकी कथाएं प्रायशः नारी प्रधान हैं, उनके शीर्षक भी इसका संकेत करते हैं।
पुनर्नवा अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित कथानिका संग्रह है। कथानिका को परिभाषित करते हुए वे स्वयं स्पष्ट करते हैं कि कथानिका प्राचीन शास्त्रीय विशाल कलेवरा कादम्बरी, वासवदत्ता जैसी कथाओं की अपेक्षा कथावस्तु, चरित्रचित्रण, संवाद, परिवेश, भाषाशैली एवं उद्देश्य रूपी छः तत्त्वों पर आधारित हिन्दी कहानी के ज्यादा निकट है। इस कथासंग्रह में ग्यारह कथानिकाएं हैं जिनमें अन्तिम अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा को दीर्घकथा में रखा जा सकता है। इस संग्रह की प्रतिनिधि कथा पुनर्नवा कथानिकाओं की मूल संवेदना को सम्प्रेषित करती है । पुनर्नवा औषधि ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त ताप से मुरझा जाती है किन्तु वर्षा ऋतु में जलमयी अमृत बून्दों से पुनः लहलहा उठती है तथा स्वस्थ व सुन्दर समाज के निर्माण में अपना योगदान देती है। उसी प्रकार यह कथानिका संग्रह सामाजिक सन्तापों से मुरझाए स्त्री समाज को नवचेतना के अमृतमय स्वरों से स्वस्थ व प्रफुल्लित करना चाहता है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी सामाजिक संरचना के विकार का उपचार कर उसे सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप प्रदान करने का संकल्प रखती है| इन कथानिकाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
संकल्प- संकल्प कहानी उच्चवर्ग के यहां कार्य कर आजीविका चलाने वाले दो चर्मकार युवकों की मनोदशा को चित्रित करती है, जिसमें वर्गसंघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कहानी का एक पात्र भोगी गांव से शहर की ओर पलायन करना चाहता है किन्तु अपने एक मित्र के विरह में व्याकुल परिवार की दशा देखकर अपनी मां एवं मातृभूमि को न छोडने का संकल्प लेता है। कथा में समाज की विविधता को स्वीकार किया गया है क्योंकि उसका आधार प्रकृति प्रदत्त गुण एवं योग्यता है- प्रकृतिः स्वयमेव भिद्यते। चटको मयूरः पिकः पारावतष्टिट्टिभश्चातक इति शतमिता पक्षिणः। परस्परं भिन्नास्ते। परन्तु भिन्नत्वेऽपि किंचिद् विलक्षणमेव रहस्याकर्षणम्।
सपत्नी - मातृत्व से वंचित, वन्ध्यत्व की वेदना से व्यथित, परिवार एवं समाज के तिरस्कार से दग्ध, अपने परिवार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपने अस्तित्व को दाव पर लगा देने वाली उदारहृदया बुधनी की मनोदशा को साकार रूप प्रदान करती सपत्नी कहानी समाज के उस पक्ष को उजागर करती है, जो एक स्त्री को बांझ होने के कारण उपेक्षित कर देता है।
वाग्दत्ता - वाग्दत्ता कहानी सुदीर्घकाल से स्थापित वैवाहिक व्यवस्था में परिवर्तन की पक्षधर है। कहानी की विलक्षणता इस बात में निहित है कि इस परिवर्तन की पहल के लिए कथाकार ने उमाचरण शुक्ल को चुना है ,जो कथा में धर्म एवं दर्शन के विद्वान् हैं क्योंकि समाज श्रेष्ठ जनों का अनुसरण करता आया है। शुक्ल महोदय समाजभय को त्यागकर अमेरिका से भारतीय दर्शन में शोध के लिए आई जेनी को हृदय से पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करते हैं- समाजस्तु नदीप्रवाहकल्पो यो हि प्रावृषि मलीमसश्शीतर्तौ च स्वच्छतरो जायते।
नर्तकी - संस्मरणात्मक रूप में लिखी गई नर्तकी कहानी नर्तकी के भीतर की नारी के मनोभावों को साकार रूप प्रदान करती है। नर्तकी कमरजहां की मां हुस्नाबाई के मन के स्तर पर जाकर उसके स्त्रीत्व, ममता, करुणा, शरणागतवत्सलता एवं वचन की मर्यादा को मूर्त रूप प्रदान किया गया है।
न्यामहं करिष्ये - न्यायमहं करिष्ये कहानी माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् भाई-भाभी पर आश्रित ननद भवानी एवं उसकी संकुचित हृदय वाली भाभी के सम्बन्धों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या है। यहां भवानी भतीजी मुदिता ही अपनी मां को उचित राह दिखाती है।
ध्रुवस्वामिनी - ऐतिहासिक पात्र समुद्रगुप्त के ज्येष्ठ निवीर्य पुत्र की वधू ध्रुवस्वामिनी अपने पति के द्वारा सताये जाने पर देवर के द्वारा रक्षित होती है और देवर के द्वारा पति को मार दिये जाने पर देवर के प्रति ही समर्पित हो जाती है किन्तु कथाकार ने अपनी कथा की नायिका में हृदय परिवर्तन को दिखलाते हुए कहानी को सुखद अन्त प्रदान किया है।
वन्ध्या - वन्ध्या कहानी में कथाकार ने बांझ स्त्री की पीडा को न केवल भावनात्मक धरातल प्रदान किया है अपितु समाज को नया दृष्टिकोण भी प्रदान किया है। सन्तानहीनता से जीवन को निरर्थक मानने वाली कथानायिका को उसका पति कहता है- सन्ततिप्रजननं नाम न केवलं पत्न्या दायित्वम्। वस्तुतः उभयसंविभक्तमिदं दायित्वम्। तर्हि कोऽयं न्यायो यद्यया सन्ततिविरहघटनया वराकी नारी समाजे सर्वजनतिरस्कृता जायते, वन्ध्या कथ्यते।
न्यासरक्षा - सौतेली मां की स्थापित छवि के विपरित यह कहानी एक आदर्श सौतेली मां को चित्रित करती है। सौतेली मां बनी सुन्दरा किस प्रकार अपने सौतेले पुत्र का उचित लालन-पालन करती है तथा उसके प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देती है, यह इस कहानी में माार्मिक ढंग से उकेरा गया है।
मरुन्यग्रोध - मरुन्यग्रोध कहानी वैधव्य के रेगिस्तान की तपती धूप से संतप्त श्यामा एवं इस तपती धूप में शीतल छाव बनकर आये मरुन्यग्रोध दयालु की कहानी है।
पुनर्नवा - पुनर्नवा कहानी इस संग्रह की प्राणरूपा कही जा सकती है। पति को देख बिना ही विधवा हुई कृष्णा के पुनर्विवाह को शास्त्रीय आधार देते हुए कथाकार कहते हैं- सर्वा अपि स्मृतयः सर्वेऽपि महर्षयो विधवाविवाहं समर्थयन्ते। यथा वर्षाजलपरीवाहेनाऽपेयसलिलाऽपि वापीपरमार्थत: शुध्यति तथैव प्रत्येकं रजोदर्शनेन नारी शुध्यति।
अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा - अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा हजारी प्रसाद द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा का स्मरण करवाती है। यह कथाकार द्वारा स्वप्नदर्शन अनुभव के रूप में लिखी गई है। प्रकारान्तर से कथाकार ने सनातन वैदिक धर्म के पक्ष को दृढता से अनुकरणीय सिद्ध करते हुए बौद्ध धर्म का खण्डन किया है।
डॉ. अशोक कंवर शेखावत
सहायक आचार्य
संस्कृत विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झालावाड़, राजस्थान
मोबाइल नम्बर - 9414595573































