Tuesday, June 30, 2020

आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री: (श्रीमद्रामज्युपाध्यायाभिनन्दनग्रन्थ:)

कृति - आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री: 
(श्रीमद्रामज्युपाध्यायाभिनन्दनग्रन्थ:)

सम्पादकद्वय - प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ. रमाकांत पांडेय
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन, 29/5, शक्तिनगर, दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 2001
पृष्ठ संख्या - 28+366+33
अंकित मूल्य - 750 


             अर्वाचीन संस्कृत में श्री रामजी उपाध्याय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है |  उपाध्याय जी के अभिनंदन ग्रन्थ के रूप में आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री:  ग्रन्थ का प्रकाशन प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ. रमाकांत पांडेय के सम्पादन में हुआ है | प्रस्तुत ग्रन्थ को तीन खण्डों में विभक्त किया है-


1. प्रथम खण्ड - प्रथम खण्ड में रामजी उपाध्याय का परिचय दिया गया है | इसमें 4 लेख संकलित हैं | राधावल्लभ त्रिपाठी ने श्रीमद्रामज्युपाध्यायचरितम् आलेख में रामजी उपाध्याय के व्यक्तित्व , उनके संस्कृत सेवा के कार्यों, शिष्यपरम्परा, अनुसंधान में  अवदान पर प्रकाश डाला है | रामजी उपाध्याय  का जन्म 1 जुलाई 1920 को उत्तरप्रदेश के एक ग्राम मलैजी में हुआ | 1 जुलाई 1920 से 17 जनवरी 2011 तक की जीवन यात्रा में रामजी उपाध्याय ने जो कार्य संस्कृत के क्षेत्र में किये, वे सदैव स्मरणीय रहेंगे | रामजी उपाध्याय  की शिष्य परम्परा में डॉ. हीरालाल शुक्ल, पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. कुसुम भूरिया, डॉ. रामलखन पांडेय, श्रीमती वनमाला भवालकर आदि विशेष रूप से  उल्लेखनीय हैं|  इसी खण्ड में रामजी उपाध्याय के ग्रन्थों का नामोल्लेख के साथ परिचय है तथा रामजी उपाध्याय के  सागरिका पत्रिका में प्रकाशित लेखों/ ग्रन्थों का उल्लेख संकलनकर्ता डॉ. धर्मेंद्र कुमार के द्वारा किया गया है | साथ ही रामजी उपाध्याय  के निर्देशन में सम्पन्न 45 शोध प्रबन्धों और उनके शोधकर्ताओं का परिचय भी दिया गया है, जो शोध के क्षेत्र में विशेष महत्त्व रखता है | डॉ. रमाकांत पांडेय ने अपने आलेख में रामजी उपाध्याय के साहित्य की समीक्षा की है | आपने रामजी उपाध्याय की कृतियों को तीन भागों में विभक्त किया है- 1. भारतीयसंस्कृतिसम्बन्धिनो ग्रन्था:, 2. नाटकोपन्यासग्रन्था:, 3. समीक्षा ग्रन्था: अनुसन्धानग्रन्थाश्च
रामजी उपाध्याय ने दो नाटक सीताभ्युदयम् और कैकयीविजयम् की रचना की | आपके द्वारा रचित दो उपन्यास द्वासुपर्णा और सत्यहरिशचंद्रोदयम् पारम्परिक कथाओं में युग के अनुरूप कथ्य प्रस्तुत करते हैं |



2. द्वितीय खण्ड - द्वितीय खण्ड में विभिन्न लेखकों के 33 आलेख संकलित हैं, जो अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करते हैं | अर्वाचीन संस्कृत की विविध विधाओं, विषय परिवर्तन, नवीन कथ्य और शिल्प आदि को जानने के लिए ये आलेख विशेष रूप से पठनीय हैं |


3. तृतीय खण्ड - तृतीय खण्ड में 3 व्याख्यान संकलित हैं | प्रथम व्याख्यान पूर्व राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा जी का है, जो केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के दीक्षांत महोत्सव में दिया गया था | यह व्याख्यान महात्मा बुद्ध के दर्शन और आधुनिक विश्व पर आधारित है | दो व्याख्यान पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी के हैं |  इनमें एक व्याख्यान बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन में संस्कृत के सार्वभौमत्व पर है और दूसरा व्याख्यान संस्कृत, विज्ञान और वर्तमान विश्व पर है, जो विश्व संस्कृत सम्मेलन के उद्धाटन के अवसर पर अध्यक्षीय भाषण के रूप में दिया गया था | सुखद तथ्य यह है कि ये तीनों ही व्याख्यान संस्कृत भाषा में ही दिए गए थे |


शोध पत्रिका- सागरिका

शोध पत्रिका- सागरिका

आरम्भ- विक्रम संवत् 2019 (1962 ई.)
प्रकाशक- सागरिका समिति, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) 470003
भाषा- संस्कृत
आवृत्ति- त्रैमासिक
विधा- शोधपत्रिका
संस्थापक संपादक- प्रो. रामजी उपाध्याय
प्रधान संपादक- प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
संपादक- प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी
प्रबन्ध संपादक-डॉ. शशिकुमार सिंह
संपादक मण्डल- डॉ. नौनिहाल गौतम, डॉ. संजय कुमार, डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. किरण आर्या
आईएसएसएन- 2229-5577


संस्कृत की प्राचीन पत्रिकाओं में सागरिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रकाशन सुविधाओं के अभाव और संचारसाधनों की न्यूनता के बावजूद संस्कृत की पत्रिका का प्रकाशन साहसपूर्ण कार्य था। शुरुआत में इसका मुद्रण वाराणसी या प्रयाग से करवाया जाता था। आरम्भ में यह पत्रिका षाण्मासिक थी जो बाद में त्रैमासिक हो गयी। इसका प्रकाशन भारतीय तिथियों  के अनुसार प्रतिवर्ष चैत्र, आषाढ, आश्विन और पौष माह में होता है। आरम्भिक अंकों में पत्रिका में संपादकीय, शोधपत्र, काव्य, संस्कृत वृत्त, ग्रन्थ समीक्षा, सागर विश्वविद्यालय में जारी शोधकार्य स्तम्भ होते थे। वर्तमान में इसमें केवल शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। सागरिका का पहला अंक डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, श्री जीवन्याय तीर्थ, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, श्री मंगलदेव शास्त्री, श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य, श्री धीरेन्द्र वर्मा, श्री सत्यव्रत सिंह, कृष्णनम्पूतिरिपाद, श्री कृष्णदत्त वाजपेयी, श्री गणपति शुक्रु, श्री व्रतीन्द्रकुमार सेनगुप्त, श्री रामकिशोर मिश्र, श्री शिवचन्द्र भट्टाचार्य, श्री मंजुलमय कपंतुल, श्री रुद्रदेव त्रिपाठी, श्रीमती वनमाला भवालकर, श्री विश्वनाथ शास्त्री और श्री रामगोपाल मिश्र के लेख, काव्य और संस्कृत वृत्त से समन्वित होकर प्रकाशित हुआ था। पिछली शती के विद्वान् आचार्यों, लेखकों और शोधार्थियों के गंभीर चिन्तनपरक लेख इसकी गरिमा के परिचायक हैं। एक ओर स्थापित विद्वानों को इस पत्रिका में आदर मिला वहीं दूसरी ओर शोधरत छात्रों को भी प्रकाशन का अवसर प्राप्त हुआ। पण्डित वायुनन्दन पाण्डेय, आचार्य अमरनाथ पाण्डेय, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, पं. बच्चूलाल अवस्थी, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया था। आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का सीताचरितमहाकाव्य प्रथमतः सागरिका में ही प्रकाशित हुआ था। देश के प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों को एक साथ पढ़ना विद्यारसिकों के लिए आनन्ददायक होता है। संस्कृतवाङ्मय के शास्त्रीय विषयों पर इसमें लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जैसे श्री गोपीनाथ कविराज का लेख ‘शाक्तदृष्ट्या सृष्टितत्त्वविमर्शः’। इसमें प्रकाशन हेतु भाषा की अर्हता रही है, वह है संस्कृत। विषयानुकूल होने पर अन्य भाषा में प्रकाशित लेखों को संस्कृत में अनूदित करके भी प्रकाशित किया गया है। विषयानुकूल लेखों का पुनः प्रकाशन भी किया गया है। इसके प्रकाशन की लगभग साठ वर्षों की अवधि में प्रो. रामजी उपाध्याय, डॉ. वनमाला भवालकर, डॉ विश्वनाथ भट्टाचार्य, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. रामगोपाल मिश्र, डॉ. मनोरमा त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया ने सम्पादन के दायित्व का निर्वहन किया है। प्रो. अच्युतानन्द दाश कुछ वर्षों तक प्रबन्ध संपादक रहे। काव्यशास्त्र विशेषांक के अतिथि संपादक प्रो. रमाकान्त पाण्डेय हैं। इकतालीसवें वर्ष में डॉ. शीतांशु त्रिपाठी संपादनसहायक रहे हैं। इसके अब तक सोलह विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं जो संग्रहणीय हैं। उनका विवरण इस प्रकार है-

राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक (महामहिम राष्ट्रपति) - प्रथम वर्ष में
भारतीय संस्कृति विशेषांक -  द्वितीय वर्ष में
विश्व संस्कृत सम्मेलन विशेषांक - दशम वर्ष में
कालिदास विशेषांक- द्वादश त्रयोदश वर्ष में
ज्योतिष विशेषांक- षोडश वर्ष में
नाट्यवेद विशेषांक- सप्तदश वर्ष में
मध्ययुगीन संस्कृत नाटक विशेषांक- अष्टादश वर्ष में
भट्टतौत विशेषांक- बाईसवें वर्ष में
रजत जयन्ती विशेषांक- पच्चीस वें वर्ष में
प्राचीन भारतीय समाज दर्शन विशेषांक- उनतीसवें वर्ष में
मनुस्मृति विशेषांक- तैंतीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत साहित्य विशेषांक- पैंतीसवें वर्ष में
संस्कृत गौरव विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
संस्कृत व्याकरण विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत गद्यकाव्य विशेषांक- सैतीसवें वर्ष में
काव्यशास्त्र विशेषांक- उनतालीसवें वर्ष में
आचार्यरामजीउपाध्यायस्मृतिविशेषांक- बयालीसवें वर्ष में

                       इनके अतिरिक्त अंक 47.1-4 में केवल महाकवि कालिदास से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित हैं, इसी प्रकार अंक 48.4 में महाकवि भास व भवभूति पर केन्द्रित शोधपत्र प्रकाशित हैं। अंक 48.1-2 में केवल डॉ. पूर्णचन्द्र उपाध्याय का बृहत् शोधकार्य ‘अर्वाचीनाचार्यराधावल्लभीयसंस्कृतसाहित्ये पार्यावरणचेतना’ प्रकाशित है।
              आईएसएसएन युक्त यह पत्रिका यूजीसी एप्रूव्ड जर्नल में सूचीबद्ध रही है। इसमें शोधपत्रों का प्रकाशन निःशुल्क होता है। आरम्भ से ही शोधपत्र लेखकों को लेखकीय प्रति निःशुल्क दी जाती रही है। इस पत्रिका का सदस्यता शुल्क 25रू प्रति अंक, 100 रू वार्षिक, 1000 रू प्रतिव्यक्ति आजीवन, 2000 रू. प्रति संस्था आजीवन है। आजीवन सदस्यता ग्रहण करने पर पुराने उपलब्ध अंक निःशुल्क दिये जाते हैं।
                     अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका सागरिका संस्कृत पत्रकारिता में एक प्रतिष्ठापूर्ण नाम है। सागर की यह सागरिका शोधपत्रिका शोधार्थियों के लिए ‘गागर में सागर’ की तरह अत्यन्त उपादेय है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत जगत् के लिए गौरव का विषय है।

Monday, June 29, 2020

सूर्यगेहे तमिस्रा (भारतीयदलितकविता)

कृति - सूर्यगेहे तमिस्रा (भारतीयदलितकविता)

अनुवादक व सम्पादक - डॉ. ऋषिराज जानी
प्रकाशक - गुजराती दलित साहित्य अकादमी, अहमदाबाद
संस्करण - प्रथम, 2018
पृष्ठ संख्या - 130
अंकित मूल्य -200 रू.
मोबाइल नम्बर- 9712375112
मेल आईडी - rushpharma@yahoo.co.in 

              संस्कृत साहित्य में अब वे स्वर भी अपना स्थान पा रहे हैं, जो कभी प्रायः उपेक्षित से रहे। विभिन्न भाषाओं के साहित्य के  समान अब प्रगतिवाद, यथार्थवाद, स्त्रविमर्श, दलितविमर्श आदि के आधार पर रचनाएं लिखी जा रही हैं एवं उनको आलोचना के स्तर पर परखा भी जा रहा है। दलितविमर्श एक ऐसा ही विमर्श है। संस्कृत में दलितचेतना का निरूपण मौलिक कविता के रूप में धीरे - धीरे स्थान बना रहा है। आचार्य हर्षदेव माधव अपने नवीन काव्यशास्त्र वागीश्वरीकण्ठसूत्रम् में दलितचेतनानिरूपण का लक्षण करते हुए कहते हैं कि शोषित, दलित लोगों की पीडा, व्यग्रता, रोष आदि का निरूपण दलित चेतना है-

शोषितदलितजनगतानां पीडाव्यग्रता-
रोषादीनां निरूपणं दलितचेतना ।।

                  डॉ. ऋषिराज जानी कविता, कथा एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। डॉ. जानी ने  सूर्यगेहे तमिस्रा के रूप में अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। इस संग्रह में डॉ. जानी ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में लिखी गई दलित विमर्श की कविताओं का संस्कृत अनुवाद किया है। डॉ. जानी ने इन कविताओं का चयन, सम्पादन एवं अनुवाद करके संस्कृत के पाठकों को भारतीय भाषाओं की दलित विमर्श की कविताओं के स्वर को पढने, सुनने का अवसर प्रदान किया है।

                       प्रस्तुत संग्रह में कुल 36 कवियों की कविताएं संकलित हैं। इन कवियों 34 कवि ं विभिन्न भाषाओं के हैं तो 2 कवियों की कविताएं मूल रूप से संस्कृत की हैं -

गुजराती कविता - अनुवादक ने संग्रह की 29 कविताएं गुजराती भाषा से ली हैं, जो 14 कवियों की रचनाएं हैं। इनमें पथिक परमार, जयन्त परमार, भी.न. वणकर, प्रवीण गढवी जैसे दलित विमर्श के महत्त्वपूर्ण रचनाकार सम्मिलित हैं। गुजराती साहित्य में दलित विमर्श की कविताएं प्रभूत मात्रा में लिखी जाती रही हैं। ऋषिराज जानी स्वयं भी गुजराती भाषा में कविताएं रचते हैं। यशवंत वाघेला की एक कविता द्रष्टव्य हैं, जिसमें वे वाल्मीकि से प्रश्न करते हैं-

हे वाल्मीके!
निषादकृतेन
क्रौंचवधेन
भवतः शोकः
श्लोकत्वं प्राप्नोत्
अपि च
रामायणस्य रचना जाता।
किन्तु
अस्माकं
प्रतिदिनं
एभिरार्तनादैः
चीत्कारैश्च
किं रचितं
भविष्यति?

हिन्दी कविता - इस भाग  में 15 हिन्दी कवियों की कविताओं का संस्कृत रूपान्तरण दिया गया है। जिनमें जयप्रकाश कर्दम, मलखान सिंह, असंगघोष, सतनाम सिंह, पूरन सिंह आदि कवि सम्मिलित हैं। मोहनदास नैमिश्राय शम्बुक के तीव्र आर्तनाद को विषय बनाकर कहते हैं-

शम्बुकस्य तीव्रार्तनादानां
प्रतिध्वनयः
अधुना अवशिष्टाः,
यथा हि दलितानां पृष्ठे व्रणचिह्नानि।।

डॉ. गोवर्धन बंजारा का एक हाइकु गागर में सागर भरने वाला है-

एकलव्यस्य
छिन्नोऽंगुष्ठः, लक्ष्यते
शिवलिंगवत्।।

मराठी कविता - इस भाग में दया पंवार की एक कविता का अनुवाद दिया गया है।

असमिया कविता - अनुवादक ने असमिया भाषा से पीताम्बर दास एवं हरेन्द्र कुमार मछहारी की दो कविताओं का अनुवाद किया है। हरेन्द्र कुमार मछहारी की कविता में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से बातचीत करता है-

त्वं मनुष्यः
अहञ्च।
आवामीश्वरस्यैव सन्तती।
वस्तुतः आवां संलग्नौ परस्परं
किन्तु आवयोर्नास्ति परिचयः।

पंजाबी कविता - पंजाबी भाष से द्वारका भारती की तीन कविताएं अनूदित की गई हैं। लज्जा कविता बडी मार्मिक कविता है-

कथम् एवं भवति
यत्
कस्यापि धर्मस्थानस्य समीपे
बहुधा गच्छतो मम शिरः
अवनमति
न श्रद्धया,
किन्तु
लज्जया?

बंगला कविता - इस भाग में बांगला भाषा की कवयित्री मंजूबाला की एक कविता का अनुवाद सम्मिलित है।

संस्कृत कविता - संस्कृत में भी मौलिक कविता के रूप में दलित विमर्श पर रचनाएं लिखी जा रही हैं, यद्यपि ये संख्या में अल्प ही हैं। यहां दो कवियों की चार संस्कृत कविताएं संकलित की गई हैं, जिनमें हर्षदेव माधव की तीन कविताएं तथा ऋषिराज जानी की एक कविता है। हर्षदेव माधव की कविता अहमस्मि तमिस्रा का एक अंश प्रस्तुत है-

अयं व्रणो
ब्राह्मणानां कूपाद् जलमानेतुं
गतयोश्चरणयोरपराधः
हस्ते यो दृश्यते
स तु
अपक्वरोटिकां दृष्ट्वा
मात्रा तप्तसन्दशिकाचिह्नेन
कृतोऽस्त्यनैपुण्यसूचकः।



यह अनुवाद संकलन संस्कृत भाषा में ई उम्मीदें जगाता है। अभी भारतीय भाषाओं में दलितविमर्श की कवितााओं का अधिकांश ऐसा है, जिसका अनुवाद करके संस्कृत में उतारना चाहिए। इस संकलन में सम्मिलित होने से शेष रही अनेक भाषाएं हैं, जिनमें ये स्वर अंकित हैं।

Saturday, June 27, 2020

संस्कृत कहानियों का अनुपम निदर्शन - पुनर्नवा

संस्कृत कहानियों का अनुपम निदर्शन -  पुनर्नवा
कृति - पुनर्नवा
विधा -  गद्य काव्य

लेखक -अभिराज राजेन्द्र मिश्र
संस्करण -प्रथम, 2008
प्रकाशक-वैजयंत प्रकाशन, इलाहाबाद
पृष्ठ संख्या - 160
अंकित मूल्य- 300 रु

             
       साहित्य जनमंगल का साधक है। जनमंगल के सुन्दर साध्य को साधने वाले क्रान्तदर्शी कवि की संवेदना जनहृदय के साथ एकाकार होकर उनकी पीडाओं और संवेदनाओं को महसूस करती है और उनके समाधान की दिशा भी प्रदान करती है। नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का  ही चमत्कार होता है कि वागर्थ समूह किसी भी भाषा अथवा साहित्य की किसी भी विधा में हो, उसका लक्ष्य लोकाराधन ही होता है।
            ऋग्वेद की प्रथम ऋचा के अवतरण से अद्यावधि संस्कृत सरिता विविध विधाओं मे सतत प्रवाहमान है। साहित्य की प्रत्येक विधा में प्रायः कथातत्त्व विद्यमान रहता है किन्तु शुद्धकथाविधा में कोई अद्भुत ही बात है, जो हठात् सहृदय-हृदय को चमत्कृत कर शिक्षित करती आई है।

                   अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में साहित्यानुरागी जनों के हृदयों में विराजमान अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने विविध विधामय विपुल काव्य सर्जना से एक नवीन साहित्य युग का प्रवर्तन किया है। उनकी नवीन दृष्टि काव्यसृष्टि में प्रतिबिम्बित होती है। वे एक संवेदनशील साहित्यकार हैं, समाज के सूक्ष्म अध्येता हैं, मानवता के पक्षधर हैं, मानव मन के विश्लेषक हैं, मनोभावों के चित्रकार हैं तथा सामाजिक विसंगतियों विशेषतः नारजीवन की विसंगतियों को सुसंगतियों में परिणमित करने के लिये संकल्पित हैं। सम्पूर्ण अभिराजीय कथा संसार स्त्री संवेदना से प्राणमय है। उनकी कथाएं प्रायशः नारी प्रधान हैं, उनके शीर्षक भी इसका संकेत करते हैं।

                         पुनर्नवा अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित कथानिका संग्रह है। कथानिका को परिभाषित करते हुए वे स्वयं स्पष्ट करते हैं कि कथानिका प्राचीन शास्त्रीय विशाल कलेवरा कादम्बरी, वासवदत्ता जैसी कथाओं की अपेक्षा कथावस्तु, चरित्रचित्रण, संवाद, परिवेश, भाषाशैली एवं उद्देश्य रूपी छः तत्त्वों पर आधारित हिन्दी कहानी के ज्यादा निकट है। इस कथासंग्रह में ग्यारह कथानिकाएं हैं जिनमें अन्तिम अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा को दीर्घकथा में रखा जा सकता है। इस संग्रह की प्रतिनिधि कथा पुनर्नवा कथानिकाओं की मूल संवेदना को सम्प्रेषित करती है । पुनर्नवा औषधि ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त ताप से मुरझा जाती है किन्तु वर्षा ऋतु में जलमयी अमृत बून्दों से पुनः लहलहा उठती है तथा स्वस्थ व सुन्दर समाज के निर्माण में अपना योगदान देती है। उसी प्रकार यह कथानिका संग्रह सामाजिक सन्तापों से मुरझाए स्त्री समाज को नवचेतना के अमृतमय स्वरों से स्वस्थ व प्रफुल्लित करना चाहता है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी सामाजिक संरचना के विकार का उपचार कर उसे सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप प्रदान करने का संकल्प रखती है| इन कथानिकाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-


संकल्प-  संकल्प  कहानी  उच्चवर्ग के यहां कार्य कर आजीविका चलाने वाले दो चर्मकार युवकों की मनोदशा को चित्रित करती है, जिसमें वर्गसंघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कहानी का एक पात्र भोगी गांव से शहर की ओर पलायन करना चाहता है किन्तु अपने एक मित्र के विरह में व्याकुल परिवार की दशा देखकर अपनी मां एवं मातृभूमि को न छोडने का संकल्प लेता है। कथा में समाज की विविधता को स्वीकार किया गया है क्योंकि उसका आधार प्रकृति प्रदत्त गुण एवं योग्यता है- प्रकृतिः स्वयमेव भिद्यते। चटको मयूरः पिकः पारावतष्टिट्टिभश्चातक इति शतमिता पक्षिणः। परस्परं भिन्नास्ते। परन्तु भिन्नत्वेऽपि किंचिद् विलक्षणमेव रहस्याकर्षणम्।

सपत्नी - मातृत्व से वंचित, वन्ध्यत्व की वेदना से व्यथित, परिवार एवं समाज के तिरस्कार से दग्ध, अपने परिवार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपने अस्तित्व को दाव पर लगा देने वाली उदारहृदया बुधनी की मनोदशा को साकार रूप प्रदान करती सपत्नी कहानी समाज के उस पक्ष को उजागर करती है, जो एक स्त्री को बांझ होने के कारण उपेक्षित कर देता है।

वाग्दत्ता - वाग्दत्ता कहानी  सुदीर्घकाल से स्थापित वैवाहिक व्यवस्था में परिवर्तन की पक्षधर है। कहानी की विलक्षणता इस बात में निहित है  कि इस परिवर्तन की पहल के लिए कथाकार ने उमाचरण शुक्ल को चुना है ,जो कथा में धर्म एवं दर्शन के विद्वान् हैं क्योंकि समाज श्रेष्ठ जनों का अनुसरण करता आया  है। शुक्ल महोदय समाजभय को त्यागकर अमेरिका से भारतीय दर्शन में शोध के लिए आई जेनी को हृदय से पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करते हैं- समाजस्तु नदीप्रवाहकल्पो यो हि प्रावृषि मलीमसश्शीतर्तौ च स्वच्छतरो जायते। 

नर्तकी - संस्मरणात्मक रूप में लिखी गई नर्तकी कहानी नर्तकी के भीतर की नारी के मनोभावों को साकार रूप प्रदान करती है। नर्तकी कमरजहां की मां हुस्नाबाई के मन के स्तर पर जाकर उसके स्त्रीत्व, ममता, करुणा, शरणागतवत्सलता एवं वचन की मर्यादा को मूर्त रूप प्रदान किया गया है।

न्यामहं करिष्ये -  न्यायमहं करिष्ये  कहानी माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् भाई-भाभी पर आश्रित ननद भवानी एवं उसकी संकुचित हृदय वाली भाभी के सम्बन्धों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या है। यहां भवानी भतीजी मुदिता ही अपनी मां को उचित राह दिखाती है।

ध्रुवस्वामिनी - ऐतिहासिक पात्र समुद्रगुप्त के ज्येष्ठ निवीर्य पुत्र की वधू ध्रुवस्वामिनी अपने पति के द्वारा सताये जाने पर देवर के द्वारा रक्षित होती है और देवर के द्वारा पति को मार दिये जाने पर देवर के प्रति ही समर्पित हो जाती है किन्तु कथाकार ने अपनी कथा की नायिका में हृदय परिवर्तन को दिखलाते हुए कहानी को सुखद अन्त प्रदान किया है।

वन्ध्या - वन्ध्या  कहानी में कथाकार ने बांझ स्त्री की पीडा को न केवल भावनात्मक धरातल प्रदान किया है अपितु समाज को नया दृष्टिकोण भी प्रदान किया है। सन्तानहीनता से जीवन को निरर्थक मानने वाली कथानायिका को उसका पति कहता है- सन्ततिप्रजननं नाम न केवलं पत्न्या दायित्वम्। वस्तुतः उभयसंविभक्तमिदं दायित्वम्। तर्हि कोऽयं न्यायो यद्यया सन्ततिविरहघटनया वराकी नारी समाजे सर्वजनतिरस्कृता जायते, वन्ध्या कथ्यते। 

न्यासरक्षा - सौतेली मां की स्थापित छवि के विपरित यह कहानी एक आदर्श सौतेली मां को चित्रित करती है। सौतेली मां बनी सुन्दरा किस प्रकार अपने सौतेले पुत्र का उचित लालन-पालन करती है तथा उसके प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देती है, यह इस कहानी में माार्मिक ढंग से उकेरा गया है।


मरुन्यग्रोध - मरुन्यग्रोध कहानी वैधव्य के रेगिस्तान की तपती धूप से संतप्त श्यामा एवं इस तपती धूप में शीतल छाव बनकर आये मरुन्यग्रोध दयालु की कहानी है।

पुनर्नवा - पुनर्नवा  कहानी इस संग्रह की प्राणरूपा कही जा सकती है। पति को देख बिना ही विधवा हुई कृष्णा के पुनर्विवाह को शास्त्रीय आधार देते हुए कथाकार कहते हैं- सर्वा अपि स्मृतयः सर्वेऽपि महर्षयो विधवाविवाहं समर्थयन्ते। यथा वर्षाजलपरीवाहेनाऽपेयसलिलाऽपि वापीपरमार्थत: शुध्यति तथैव प्रत्येकं रजोदर्शनेन नारी शुध्यति।

अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा -   अनाख्याता बाणभट्टात्मकथा    हजारी प्रसाद द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा का स्मरण करवाती है। यह कथाकार द्वारा स्वप्नदर्शन अनुभव के रूप में लिखी गई है। प्रकारान्तर से कथाकार ने सनातन वैदिक धर्म के  पक्ष को दृढता से अनुकरणीय सिद्ध करते हुए बौद्ध धर्म का खण्डन किया है।


डॉ. अशोक कंवर शेखावत
सहायक आचार्य
संस्कृत विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झालावाड़, राजस्थान
मोबाइल नम्बर - 9414595573

Tuesday, June 23, 2020

दारुब्रह्म - संस्कृत में लिखित गेयतापूर्ण भक्ति-गीतिकविताओं का संग्रह

कृति – दारुब्रह्म (The Wooden Deity) 
[ओडिआ भजनों के छाया पर संस्कृत में लिखित गेयतापूर्ण भक्ति-गीतिकविताओं का संग्रह]
कवि – डा. बनमाली बिश्वाल
प्रकाशक – पद्मजा प्रकाशन, 48/4 A, मास्टर जहरुल हसन् रोड, पुरानी सब्जी मण्डी, कटरा, इलाहाबाद  – 211002
प्रकाशन वर्ष – 2001,
मूल्य – Rs. 100/-
पृ. सं. – 120

आज आषाढ माह की शुक्ल द्वितीया तिथि है। ओडिशा राज्य की पुरी नगरी में अवस्थित महाप्रभु श्रीजगन्नाथ अपने अग्रज बलभद्र देव और बहन सुभद्रा देवी के साथ अपने जन्मवेदि को नव दिनात्मक यात्रा में जाते हैं । इस यात्रा को रथयात्रा, घोषयात्रा, नव दिनात्मक यात्रा, अन्तर्वेदि यात्रा, गुण्डिचा यात्रा (राणी गुण्डिचा के घर को जाते हैं इसलिए) आदि नाम से जाना जाता हैं । हर साल 10-15 लाख तक लोग इस समारोह में सम्मिलित होते हैं । लौटने के बाद आषाढ शुक्ल एकादशी की तिथि में श्रीमन्दिर के सामने सुसज्जित रथों के ऊपर स्वर्ण आभूषणों से श्रीविग्रहों को आभूषित किया जाता है । साल भर के 32-33 वेशों में से यह सबसे आकर्षक वेश हैं और गर्भगृह के बाहर रथों पर कड़ी सुरक्षा के साथ किया जाता हैं । वर्तमान अवस्थित श्रीजगन्नाथ मन्दिर 1000 – 800 वर्ष का पुराना मन्दिर हैं । बोला जाता है की 452 वर्ष के इतिहास में 32 बार यह रथयात्रा नहीं हुई थी । यवनों का आक्रमण जब जब मन्दिर के उपर हुआ है तब तब सेवक और राज पुरुषों ने अपने भगवान् की मूर्त्तियों को सुरक्षित रखने के लिए हर प्रयास किया हैं और सफल भी हुआ हैं । कलापाहाड के आक्रमण के कारण 1568 से 1577 तक, मिर्जा खुरम् का आक्रमण के कारण 1601 में, सुबेदार हासिम् खान का आक्रमण के कारण 1607 में, कल्याण मल्ल का आक्रमण के कारण 1611 में, फिर से कल्याण मल्ल का आक्रमण के कारण 1617 में, सुबेदार अहम्मद बेग् का आक्रमण के कारण 1621 में, सुबेदार एकाम्र सिंह का आक्रमण के कारण 1692 से 1707 तक और अन्त में महम्मद तकि खाँ का आक्रमण के कारण 1771 में यह रथयात्रा नहीं हुई थी । (ओडिआ भाषा में प्रकाशित सम्बाद पत्र ‘समाज’, 19 जुन् 2020, पृ. सं. 2) इस तरह के कारण के विना यदि रथयात्रा नहीं होती तो किम्बदन्ती के अनुसार फिर बारह साल तक यह यात्रा अनुष्ठित नहीं हो पाती । इसलिए इस साल कोरोना महामारी की करालता में भक्तों के विना और जन समागम के विना सुप्रीम कोर्ट के द्वारा निर्द्दिष्ट शर्तों का पालन करते हुए यह यात्रा आज अनुष्ठित हुई । यह साल श्रीमन्दिर और ओडिशा के इतिहास में लिपिबद्ध होगा । इसलिए सोचा प्रभु श्रीजगन्नाथ जी को लेकर संस्कृत में लिखे हुए एक भक्ति गीत के संग्रह को वागर्थ के लिए प्रस्तुत किया जाए|


     कवि बनमाली बिश्वाल संस्कृत काव्य, कथा, समीक्षा और शोध क्षेत्र में एक यशःस्वी नाम हैं । अद्यावधि कवि की 25 कृतियां प्रकाशित हैं । इस दारुब्रह्म नामक भक्ति गीतों के संग्रह में कवि ने अपने हृदय को भगवान् के समीप खोल दिया हैं । स्तुति भी की हैं, अभिमान भी किया हैं, अभियोग भी किया हैं, गाली भी दिया हैं और गाली के छल में स्तुति (व्याज स्तुति) भी की हैं । भक्त के लिए भगवान् के अतिरिक्त और कोई इतना अन्तरतम नहीं होता हैं कि सारे मनोभाव को शब्दों में न कहने पर भी जान लिया जाए। ओडिआ भाषा में पारम्परिक कवियों की रचनायों की आधार पर अङ्कित यह भक्ति गुच्छ संस्कृत में कवि का सरल भाषा प्रयोग में सुन्दर है । जगन्नाथ संस्कृति को समझने के लिए कवि ने अन्त में चार परिशिष्टों में पार्श्वदेवता शीर्षकों से काव्य संग्रह में व्यवहृत कुछ पारिभाषिक शब्दावली, शिखरिणी छन्द में छन्दायित आदि शङ्कराचार्य विरचित श्रीजगन्नाथाष्टकम्, श्रीजगन्नाथ जी को लेकर प्रचलित किम्बदन्तियों का संक्षिप्त परिचय जो बाद में कवि ने जगन्नाथतरितम् शीर्षक से किम्बदन्ती कथा संग्रह में विस्तारित किया है  और अन्तिम पार्श्वदेवता में (परिशिष्ट में) संस्कृत और ओडिआ भाषा का प्राणाणिक ग्रन्थों से श्रीजगन्नाथ और जगन्नाथ संस्कृति विषयक उद्धरणों का संग्रह दिया गया हैं । इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रस्तावना में सम्माननीय प्रौढ कवि जगन्नाथ पाठक जी ने भी श्रीजगन्नाथ के बारे में प्राक् सूचना दी है । कवि ने स्वयं काव्य की मुखशाला में संस्कृत में और अंग्रेजी में प्रस्तुत पृष्ठभूमि में श्रीजगन्नाथ और उनकी अनोखी संस्कृति को उल्लिखित किया हैं ।

               निराकार निर्गुण ब्रह्म का सगुण साकार प्रतिबिम्ब है श्रीजगन्नाथ । स्वतन्त्र लक्षण युक्त नीम के काष्ठ से निर्मित ब्रह्म के प्रतीक को दारुब्रह्म कहा जाता है । वह एक प्रतीक है अनन्तता और असीमीतता का-

अर्धनिर्मित-देवस्त्वं पूर्णदारुब्रह्म
भक्तनिमित्तं वहसि ‘जगन्नाथ’नाम ।।

सर्व धर्म समन्वय, साम्यवाद, मैत्री, एकता का प्रतीक है जगन्नाथ संस्कृति । जैन, बौद्ध, शबर संस्कृति, शाक्त, शैव, वैष्णव, गाणपत्य, सौर, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, विशुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि मत, पथ और दर्शनों का समन्वय देखने को मिलता है श्रीजगन्नाथ तत्त्व में । सारे मतवाद, सम्प्रदाय और दर्शन अपनी दृष्टि और पथ लेकर यहाँ आते है । पर सभी उन में समाहित हो गये है । उभय निगम और  आगम पद्धतियों से उनकी पूजा होती है । भगवान् को पाने का सबसे सरल और सुगम्य मार्ग भक्ति है । श्रीचैतन्य के षोडश शताब्दी में पुरी आगमन से गौडीय वैष्णव मत का प्रचार प्रसार हुआ जो स्वयं को राधा भाव में निमग्न कर सम्मुख में श्रीजगन्नाथ को रखते हुए तल्लीन होते थे और उनमें एकाकार हो जाते थे । यह एकाकार भाव को उत्कलीय वैष्णव परम्परा उससे पहले श्रीजगन्नाथ की मूर्त्ति में आरोपित कर चुका था । कृष्णवर्ण में पीत वर्ण का समावेश राधाकृष्ण की युगल मूर्त्ति के प्रतीक माना जाता हैं -

राधाप्रेममत्तं प्रभुं रङ्गाधरं
गोपीमनोहरं श्रीमुरलीधरम् ।
आगतोऽस्मि ... ।।
(आगतोऽस्मि द्रष्टुं त्वत्कृष्णवदनम्, पृ. सं. 74)

कुल 62 गीतों के स्तबक में श्रीजगन्नाथ को भक्ति अर्घ्य समर्पित करते हुए कवि ने जगन्नाथ तत्त्व, संस्कृति, किम्बदन्ती, इतिहास, साहित्य, दर्शन और उत्कलीय मन्दिर निर्माण कला, सौन्दर्य की ओर संकेत भी किया है । प्रथम स्तवक ‘श्रीजगन्नाथस्याखिलं मधुरम्’ में श्रीवल्लभाचार्य कृत मधुराष्टक की छाया है । (पृ. सं. 29) ‘कृष्णकमलम्’ नामक तृतीय स्तवक में भाव, लय और सौन्दर्य का मेल देखिए –

नभसि शोभते चन्द्रः
तडाग-जले कुमुदः ।
पश्य पश्य श्रीमन्दिरे
शोभते कृष्णकमलम् ।।
(पृ. सं. 31)

और

स्वर्गस्य सर्वमैश्वर्यं
श्रीक्षेत्रे करोति राज्यम् ।
तद्रूपमाधुर्ये सखि !
विश्राम्यति प्राण-पक्षी ।।
।(पृ. सं. 32)

सत युग में अवन्ती के राजा परम विष्णु भक्त राजा इन्द्रद्युम्न ने स्वप्नादेश से पुरुषोत्तम क्षेत्र में पहले श्रीजगन्नाथ का मन्दिर और विग्रह निर्माण करवाया था । उनकी राणी गुण्डिचा के नाम से उनकी उत्पत्ति स्थल नामित है और उस स्मृति को उजागर करने के लिए प्रभु प्रतिवर्ष रथयात्रा में अपनी मातृरूपा मौसी के स्नेह में आबद्ध होकर दीर्घ पथ में (संस्कृत में कवि ने प्रयोग किया है) या बड दाण्ड में (श्रीमन्दिर से श्रीगुण्डिचा मन्दिर का रास्ता का नाम) निकलते है -

गुण्डिचाहं मातृस्वसा श्रीजगन्नाथस्य
जननीवदात्मीयता मयि सदा तस्य ।
न देवकी जन्मदात्री न चास्मि यशोदा
गुण्डिचाऽहं मयि तस्यास्ति महती श्रद्धा ।।
(गुण्डिचा, पृ. सं. 33)

फिर दीर्धपथ (बडदाण्ड) भी बोल उठता है –

नन्दिघोषः तालध्वजोऽथ दर्पदलनं
रथचक्रस्पर्शात् धन्यं भवेन्मे जीवनम् ।
न परिवर्तनं मयि घोरे कलिकाले
यथापूर्वमादृतोsस्मि पुण्ये नीलाचले ।।
(दीर्घपथस्य आत्मकथा, पृ, सं. 46)

अपने प्रभु के विना भक्त विरही होता है । इसलिए कवि ने लिखा है –

अहमस्मि त्वदभावे जल-हीन-तडागस्य मीनः
अमावास्या-रात्रौ कदा रमते किं कुमुदस्य मनः ?
***

जीवितुं न जानाम्यहं त्वया विना प्रभो जगन्नाथ !
दर्शनं देहि मेऽन्यथा भविष्यति कश्चित् पक्षपातः ।। 
(जगन्नाथं विना, पृ. सं. 34)

कवि ने उत्कलीय वैष्णवीय परम्परा के पञ्चसखायों में अन्यतम बलराम दास के अभिमान को मार्मिक ढङ्ग से ‘मैत्रीभङ्गः’ (पृ. सं. 37) शीर्षक में दर्शाया है । ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन  स्नान वेदि में स्नान के बाद तीनों विग्रह अपनी मानुषी लीला में 14 दिन तक ज्वर पीडित होते हैं । आषाढ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सुस्थ होने के बाद पहले दर्शन देते हैं । उसे नव यौवन दर्शन कहते हैं । जिस साल दो आषाढ पडता हैं उस साल प्रभु अपना पुराने विग्रह छोडकर नूतन विग्रह में स्थापित होते हैं और उसी नव यौवन की तिथि में पहला दर्शन देते हैं । विग्रह परिवर्तन को नव कलेवर कहा जाता है जो 2015 में हुआ है ।-

वासांसि जीर्णनि परिवर्तयति यथा संसारे मनुष्यः ।
श्रीजगन्नाथस्य नव-कलेवरे सधवास्ताः देवदास्यः ।। 
(नवयौवनम्, पृ. सं. 39)

अशेष करुणा कटाक्ष से प्रभु सबको मुक्ति के पथ पर ले जाते हैं । चाहे वह धनी हो मानी हो गुणी हो ज्ञानी हो या फिर भोगी हो योगी हो या त्यागी हो -

पापिनस्तरन्ति तापिनस्तरन्ति तरन्ति योगि-भोगिनः ।
तारयसि सर्वान् विविधनरकात् हे महोदधिपुलिन ! 
(स्वर्ग-द्वारम्, पृ. सं. 42)

ओडिआ साहित्य में कवियों ने श्रीजगन्नाथ को कृष्ण मेघ के साथ उपमित किया है । जैसे कृष्ण मेघ जरूर बरसता है, ग्रीष्म सन्ताप दूर करके धरती को सस्य-श्यामला बनाता है वैसे ही यह जगन्नाथ रूपी कृष्ण मेघ बारह महीनों में उनके श्रीक्षेत्र आकाश में रहता हैं और संसार ताप से संतापित प्राणियों के लिए करुणा बरसाता हैं । भक्त जन चातक होकर अपना जीवन आकाश में प्रतीक्षा करते हैं -

श्रीक्षेत्र-नभसि कृष्णमेघः कश्चिद् वर्षति द्वादशमासान् ,
तृषार्त-कृषक-चातकानां सम्यक् शमयति क्षुधा-तृषाः ।
पुण्ये नीलाचले कृष्णमेघ-जलं पिबन्ति भावुकाः भक्ताः
तज्जलेन सिक्ताः सानन्दं भजने कीर्तने सन्ति प्रमत्ताः । 
(कृष्ण-मेघः, पृ. सं. 53)

भगवान् ने जो मनुष्य जन्म दिया है और उनको मनन और ध्यान करने का सुयोग दिया उसके लिए भक्त प्रभु के पाश हमेशा के लिए ऋणी है । आत्मा का परमात्मा प्राप्ति प्रति जीवन का जीवन लक्ष्य है । इस तथ्य को कितना सुन्दर पंक्तिओं में कहा गया है देखिए –

तिष्ठतु आवयोर्भावः युगात् युगान्तरम्,
जगन्नाथ ! न कदापि मां कुरुष्व परम् ।
प्रायच्छश्चेत् जन्म मह्यं नश्वरे संसारे,
विवशोऽस्मि प्रचलितुं त्वन्माया-जञ्जाले ।
भविष्यति अज्ञानेन यदि कश्चिद् द्वेषः,
पन्थानं दर्शयिष्यसि प्रभो स्वर्णवेश !
मयि तव महद् ऋणमहमधमर्णः,
प्राप्य ते उत्तमर्णत्वम् अहमस्मि धन्यः ।
अतिक्षुद्रा प्रार्थनाऽस्ति त्वत्सविधे मम,
शरीरेण सहात्माऽस्तु त्वत्पदे विलीनः ।

यद्यपि हम जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का स्वरूप मानते हैं फिर भी यहाँ राधा स्वरूपतः नहीं है और नहीं है राधा को पुकारने वाली वंशी । अतः कवि की नजर में राधा अभियोग करती है राधाया अभियोगः स्तवक में । भव रोग दूर करने के लिए वह वैद्य हैं कृष्णवैद्य शीर्षक कविता की पंक्तियों में । भक्त का अभिमान ‘अभिमानम्’ शीर्षक में और गालि के व्याज में स्तुति प्रसिद्ध ओडिओ कवि कविसूर्य बलदेव रथ का ‘सर्पजणाण’ के आधार पर ‘भुजगोऽयं जगन्नाथः’ शीर्षक में निबद्ध हैं -

भयेन त्वां कृपा-सिन्धुः वदन्ति बुधाः, फलं न मिलति किञ्चित् भजन्ति मुधा ।
***
कर्णौ न स्तः प्रसिद्ध्यति नयनश्रवाः, चक्र-मुखे न किमस्ति श्रवणाभावः ।
विस्तृतफणत्वात् सर्पस्य नाम भोगी षड्पञ्चाशत्भोगं प्राप्य त्वमपि भोगी ।

भारतवर्ष के चारों धामों में से पुरी क्षेत्र भोग क्षेत्र के नाम से जाना जाता है । प्रतिदिन श्रीजगन्नाथ को 56 प्रकार का प्रसाद भोग लगाया जाता है । इस 56 संख्या का महत्त्वों से एक प्रतीक यह है की माँ यशोदा रोज श्रीकृष्ण को 8 प्रकार का खाना खिलाती थी । जब गिरि गोवर्धन धारण किये तब सात दिन तक विना खाये पिये सबको रक्षा करने में लगे हुए थे । उसके बाद माँ यशोदा ने 8x7 = 56 प्रकार का खाना खिलाया था। इसलिए यहाँ प्रतिदिन 56 प्रकार का भोग होता है और प्रभु को निन्दापरक स्तुति में भक्त भोगी कहता है । आत्मा का परमात्मा से मिलन रूप अहरह चेष्टा प्रिय मिलन जैसा की सज्जता ही है । ‘अभिसारिका’ कविता में यह भाव उजागर है ।

मिलिष्यमि सखि ! अद्य प्रियतमं
प्रिय-मिलनाय अहमुत्सुका,
जगन्नाथः मम प्रणयी पुरुषः
अहमस्मि तस्य अभिसारिका ।
 (पृ. सं. 71)

‘जगन्नाथ ... हो हो... किछि मागु नाहिँ तोतो... हे हे ...’ यवन भक्त सालबेग द्वारा रचित इस प्रसिद्ध ओडिआ भजन की छाया में कवि ने लिखा है ‘न किञ्चिद्याचेऽहम्’ (पृ. सं. 73) ।
श्रीकृष्ण का जिस शरीराङ्ग को अग्नि ने भस्मसात् नहीं कर पाया उस शरीराङ्ग श्रीजगन्नाथ विग्रह में ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हैं । दारु मूर्त्ति में ब्रह्म की प्रतिष्ठा के कारण वह दारुब्रह्म कहलाते हैं जो इस गीति कविता संग्रह का नाम है ।

ज्वलदेव दारु यदवशिष्यते गण्डुकी-सरितस्तीरे,
जले भासमानमागतं तद्दारु पूते महोदधि-तीरे ।
 (दारुब्रह्म, पृ. सं. 93)

यद्यपि यह संस्कृत के पारम्परिक छन्द में निबद्ध नहीं हैं फिर भी ओडिआ भजन की शैली में और छाया में लिखी हुई इन गीति कविताओं का भक्ति भाव और श्रीजगन्नाथ का उभय निर्गुण और सगुण उपासना वर्णन ही मुख्य विषय है । ओडिआ साहित्य में अनेक काव्य संस्कृत साहित्य को उपजीव्य बना कर रचित हुए है और यह काव्य संग्रह ओडिआ भजनों के आधार पर हुआ है । अन्य भारतीय भाषाओं में इस प्रकार ढेर सारे उदाहरण रहा ही होगा ।
                           डॉ. पराम्बा श्रीयोगमाया


सहायक आचार्य, स्नातकोत्तर वेद विभाग, श्रीजगन्नाथ संस्कृत   विश्वविद्यालय, श्रीविहार, पुरी 752003, ओडिशा 
सम्पर्क सूत्र - 8917554392

Saturday, June 20, 2020

प्राचीन आख्यान का पुनराविष्कार - नाचिकेतकाव्यम्

कृति - नाचिकेतकाव्यम्

लेखक - डॉ. हरिराम आचार्य
विधा - प्रबन्धकाव्य
प्रकाशक -लिट्रेरी सर्किल, जयपुर
संस्करण - प्रथम, 2013
पृष्ठ संख्या - 98
अंकित मूल्य - 250 रू.

           संस्कृत की विविध विधाओं के सृजन-कर्म में निष्णात, अभिनय कौषल में प्रवीण, ममधुर गीतियों के गायक, कवि डॉ. हरिराम आचार्य का अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में विशिष्ट स्थान है। आप संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, प्राकृत, राजस्थानी आदि भाषाओं के लोकप्रिय सरस गीतकार रहे हैं। प्राकृत रचना हाल कृत गाहासतसई  पर आपका विद्वत्तापूर्ण शोधग्रन्थ है तथा प्राकृत गाथाओं का काव्यानुवाद आपके सरस काव्यमय व्यक्तित्व की सफल अभिव्यक्ति है। आपकी संस्कृत में प्रकाशित रचनाओं में पूर्वशाकुन्तलम्, मधुच्छन्दा, नाचिकेतकाव्यम् आदि प्रमुख है।

     
        नाचिकेतकाव्यम् डॉ. हरिराम आचार्य का प्रथम प्रबन्ध काव्य है, जो कठोपनिषद् के प्रसिद्ध नचिकेता आख्यान पर आधारित है। इसका विभाजन सात सर्गों में किया गया है। इस आख्यान के जटिल दार्शनिक प्रसंग को कवि ने अपनी काव्यमयी सुललित शैली में प्रस्तुत किया है। यह काव्य प्राचीन भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों पर आधारित काव्य है, जिसमें प्राचीन गुरुकुल, तपोवन, यज्ञसंस्था, अतिथिसत्कार आदि की अभिव्यक्ति  की गई है-
         
     काव्य में वाजश्रवा का आश्रम प्राचीन वैदिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। वाजश्रवा के आश्रम का एक चित्र है-

सुवृष्टिं कुर्वते मेघाः
धरित्री धान्यपूरिता।
योगक्षेमं वहन्तीव 
देवास्तत्र यथाक्रमम्।।

               आश्रम में रहने वाले ब्रह्मचारी निरन्तर विद्या-व्यसन, तपश्चर्या, योगाभ्यास, व शास़ मनथन में लगे रहते थे, अतः वे वैचारिक रूप से शुद्ध थे-

जाड्यं प्रस्तर-खण्डेषु
कृष्णसारेषु कालिमा।
नदीविचिषु कौटिल्यं 
गुप्तिर्मन्त्रेषु केवलम्।

              भारतीय संस्कृति में गुरु का अत्यन्त महत्त्व रहा है। कवि डॉ. हरिराम आचार्य ने गुरु के महत्त्व को पदे-पदे प्रतिपादित किया है-

शमयति सुहृदिव हृदय-विषादं
गमयति कविरिव ब्रह्मास्वादम्।
शिष्यं श्रुतिगर्भे पालयते
तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

            गुरु जडता के पाशों से मुक्ति दिलाकर सन्मार्ग पर प्रवृत्त करता है अतः जीवन में गुरु का आशीर्वाद विशेष महत्ता लिये होता है।
            कवि ने काव्य में नारी पात्र नचिकेता की मां सुमेधा के उदात्त चरित का वर्णन किया है। कवि नारी के मंगलमय पवित्र रूप  को चित्रित करते हुए कहते हैं -

शिखेव गृहप्रदीपस्य
चाशीः मंगलरूपिणी।
आर्याऽऽचार्या ऋषेर्भाया
यशेषु सहधर्मिणी।।

             नचिकेता का आख्यान दान की महत्ता से भरा हुआ है। हमारा सम्पूर्ण परिवेश परोपकार के लिये ही तो अस्तित्व धारण किये हुए है-

सूर्यातपं सहन्ते ये 
जंगमयोगिनो दु्रमाः।
किमेते सफला भूत्वा
खादन्ति नितसम्पदाम्।।


जब नचिकेता प्रश्न करता है कि दान किसे और कब दिया जाए तथा उसकी विधि क्या हो तो सुमेधा उत्तर देती है-

पात्राय दीयते दानं 
वस्तूनामुपयोगिनाम्।
दीनाय वित्तहीनस्य 
दानं भवति पुण्यदम्।।

            अतिथि सत्कार हमारी परम्परा रही है। जब नचिकेता यम के द्वार पर बिना खाये पीये रहता है तो अतिथि को होने वाले कष्ट से यम भी व्याकुल हो जाता है, क्योंकि भूखा अतिथि अग्नि स्वरूप बताया गया है-

अनलोऽतिथरूपतो द्विजः
क्षुधितो यस्य गृहे प्रतीक्षते।
सकलार्जित-पुण्यसंचयो
विकलस्तस्य जनस्य जायते।।

            आत्मा का ज्ञान तो नचिकेता की कथा में मुख्य प्रसंग है। पंचभूतो से निर्मित जड शरीर में चेतन आत्मा किस प्रकार निवास करती है, इसे लौकिक उदाहरण के माध्यम से कवि इस प्रकार समझाते हैं-

नचिकेतः शृणु तत्त्वम्
आत्माऽयं वसति भौतिके देहे।
जडे निजाधिष्ठाने 
यथा स्वगेहे गृहाधिपतिः।।

                इस प्रबन्ध काव्य में संस्कृत के पारम्परिक छन्दों के साथ हिन्दी के छन्दों का भी प्रयोग किया गया है। द्वितीय सर्ग में दोहा व चौपाई, सातवें सर्ग में रोला छन्द के प्रयोग कवि की नवीन प्रयोगधर्मिता को दर्शाता है। वैदिक गायत्री छन्द के आधार पर गुरु गायत्री छन्द का प्रयोग तथा गुरु वन्दना गीति गेयता का अनुपम उदाहरण है। सम्पूर्ण प्रबन्ध काव्य की भाषा सहज, सरल, गतिशील एवं प्रवाहमयी है।
डॉ हरिराम आचार्य



-डॉ. सुदेश आहुजा
सम्पर्कसूत्र- 9413404463


Friday, June 19, 2020

संस्कृत में शायरी का आस्वाद -कापिशायनी

कृति - कापिशायनी

विधा - मुक्तककाव्य
लेखक - डॉ. जगन्नाथ पाठक
प्रकाशक - गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, प्रयाग
संस्करण - प्रथम, 1980
पृष्ठ संख्या - 103
अंकित मूल्य - 27 रू.

उर्दू-फारसी भाषा के साहित्य की शैली में संस्कृत में भी बहुत रचनाएं हुई हैं। डॉ. जगन्नाथ पाठक ने ऐसी कई रचनाएं लिखी हैं, जो सहृदय समाज में बहुत प्रसिद्ध हुई। उनकी कुछ ऐसी ही मुक्तक रचनाओं का संकलन कापिशायिनी के रूप में प्रकाशित हुआ है। यहां कापिशायिनी शब्द की सिद्धि ‘कापिश्याः ष्फक्’, इस पाणिनीय सूत्र से बताई गई है। यह कापिशी क्या है, यह जिज्ञासा स्वाभाविक है| ‘काशिका’  कहती है- ‘कापिश्यां जातादि कापिशायनं मधु, कापिशायनी द्राक्षा’।  डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अपनी पुस्तक में कापिशी नामक एक शहर विशेष का नाम भी बताया है, जो वर्तमान अफगानिस्तान में है। पाणिनी के निवास स्थान गन्धार के समीप ही इस स्थान के होने से पाणिनी इससे परिचित थे। कापिशी को हरे अंगूरों की उत्पत्ति का स्थान माना गया है। उसी से बना कापिशायन मधु (मदिराविशेष) भारत में भी लाया जाता रहा। कापिशी मदिरा के व्यापार का बहुत बडा केन्द्र था।  कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी कापिशायन का उल्लेख प्राप्त होता है। वस्तुतः उत्तरी अफगानिस्तान में हरे रंग के अंगूरों से बनी मदिरा कापिशायन कहलाती थी तो पश्चिमी अफगानिस्तान में बनी मदिरा हारहूरक कहलाती थी।

                    डॉ. जगन्नाथ पाठक ने इन मुक्तक रचनाओं में प्रायः मदिरा को आधार बनाकर अपना कथ्य प्रस्तुत किया है, अतः इसका नामकरण कापिशायिनी, ऐसा किया गया है। साहित्य में प्रायः ऐसे काव्यों की व्याख्या दार्शनिक भूमि के आधार पर की जाती रही है। पूर्व में ऐसे काव्यों से संस्कृत का श्रोता/पाठक अभ्यस्त नहीं था, किन्तु ग़ज़ल आदि विधाओं के प्रवेश से तथा अन्य भाषायी साहित्य के सम्पर्क से वह इधर इस शैली के काव्यों के मर्म को समझा जाने लगा है। इसमें पीने वाला सत्य का इच्छुक बन जाता है, पिपासु आत्मा बन जाता है, पिलाने वाला परम आत्मा का रूप ले लेता है। मदिरा प्रेम बन जाती है। मयखाना प्रार्थना का घर बन जाता है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या खूब कहा है-

हर-चंद हो मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगू
बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर

सत्य की बातें चलती रहनी चाहिए, पर बिना मय और पैमाने के बात कहीं भी कैसे जा सकती है।


इस संकलन को 10 भागों में बांटा गया है-


कापिशायनी -  इस भाग में 405  मुक्तक पद्य हैं। इनकी रचना का आरम्भ कवि ने छात्र जीवन से ही कर दिया था। इन मुक्तक पद्यों को समालोचकों व रसिकों ने चषक (प्याला/पैमाना) कहा है, जिनसे इस मदिरा का पान किया जाता है। ये पद्य उर्दू के शेरों के समान भावों से भरे हुए हैं। ब्रजमोहन चतुर्वेदी कहते हैं कि -‘‘ये चषक प्रायः प्रिया के प्रति निवेदित हैं, जिनमें कहीं कोई उससे आग्रह है तो कहीं उपालम्भ या शिकायत। कहीं उसके पास पहुंचने की झिझक प्रकट होती है तो कहीं उसके साथ अद्वैत-भाव की अभिव्यक्ति। मधुपायी कभी मधुपान की आशा से ही समुल्लसित है तो कभी निराश होकर अपने भाग्य को कोसता है।’’
                          कवि कहता है कि यूं तो मैंने जीवन में कई प्याले पिये और तोडे हैं पर यह जो नशा है वह केवल एक क्षण के लिये पी गई तुम्हारी मधु-मुस्कान का है-

चषका इह जीवने मया परिपीता अपि चूर्णिता अपि।
मदमेष बिभर्मि केवलं क्षणपीतस्य मधुस्मितस्य ते।।


मयखाने के तौर तरीके अलग ही होते हैं। साकी (मदिरा पीलाने वाली स्त्री) उसी को शराब पिलाती हैं, जो आंखों की भी भाषा जानता हो-

मधुपानगृहस्य योषितां पृथगेव व्यवतिष्ठते क्रमः।
मधु तं परिपाययन्ति यो नयनानामपि वेद भाषितम्।।

पिपासु कवि कहता है कि भले ही तुम्हे पूरा प्याला मिला हो और मुझे आधा, किन्तु देखना कौन अधिक मदमस्त होता है-

मिलितं चषकार्धमेव ते तव पूर्णश्चषको बभूव चेत्।
किमनेन, विलोकयाधिको मदमत्तो भविता क आवयोः।।

और जब मतवाला होने के बाद कदम लडखडाने लगे तो इसमें मद्यप का भला क्या दोष? वह तो उसे सहारा देने वाला ही नहीं मिला कोई तो वह भी क्या करे-

स्खलितानि बहूनि सन्ति मे मधुपानं न च तत्र कारणम्।
स्खलनप्रकृतेर्न हन्त मे मिलितः कोऽपि करावलम्बदः।।

कवि पाठक के इस मुक्तक  व गालिब के इस शेर में काफी समानता है-

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

कुत एव धार्मिकः कुतो मधुशालेति क एव पश्यति।
गत एव दिने विनिःसरन् प्रविशन्तं तमहं व्यलोकयम्।।

कवि डॉ. जगन्नाथ पाठक वेदान्ती को  कहते हैं कि तुम्हारी तरह ही मुझे भी यह संसार मिथ्या ही दिखाई देता है किन्तु अन्तर सिर्फ इतना सा है कि तुम पढकर कह रहे हो और मैं मदिरा पी कर ही इस को जान गया हूं-

अयि शांकरदर्शनज्ञ मेऽपि जगद् भाति मृषैव पश्यतः।
त्वमधीत्य हि वेत्सि मादृशा मधुमात्रं विनिपीय जानते।।
     
              इस  भाग के 405 चषक सहृदय रसिकों को मदमस्त कर देते हैं। संस्कृत श्रोताओं/पाठकों के लिये ये भिन्न आस्वाद की कविताएं हैं, जिनका मुक्तहृदय से स्वागत किया जाना चाहिए।

प्रकीर्णम् -  इस भाग में भिन्न-भिन्न विषयों पर 50 पद्य संकलित हैं। इनमें से एक पद्य द्रष्टव्य है जो संस्कृत की उस परम्परा का निर्वाह करता है, जिसमें समाज के निम्न वर्ग के संघर्षों, कष्टों, विपत्तियों को मार्मिक ढंग से उकेरा जाता है। एक गरीब किसान अपने घर पर देखता है कि उसका छोटा बच्चा अपनी माता के सूखे स्तन को चूस रहा है, बछडा अपनी मां के मुंह में रखे एकमात्र ग्रास की ओर उत्कण्ठा से देख रहा है  और पिंजरे में बैठा तोता तो अपने मुंह में अपने पंख के अग्रभाग को ही रख लेता है तो किसान को भला चैन की नींद कैसे आ सकती है-

डिम्भश्चूषति निर्दयं प्ररुदितः शुष्कं स्वमातुः स्तनं
वत्सो धेनुमुखस्थमेककवलं भोक्तुं समुत्कण्ठते।
तूष्णीमाश्रयते च पञ्जरशुकः पक्षाग्रमास्ये दधत्
पश्यन् दृश्यमिदं गृहस्य कृषको निद्राति नान्तःशुचा

समस्यापूर्तयः - इसमें कवि द्वारा 63 समस्यापूर्ति काव्यों का संकलन किया गया है  |

कालिदासप्रशस्तयः -  इसमें कवि कालिदास की प्रशस्ति में 12 पद्य निबद्ध हैं। यथा-

कुत एष इहागतः सुगन्धिः पवनः कश्चन शीतलश्च मन्दः।
किमितो मधुशालिकाऽस्ति काचित् किमितो वा कविकालिदासगोष्ठी।।

यह महकती हुई, ठण्डी, मन्द बयार कहां से आ रही है, यह मयखाना है या कवि कालिदास की गोष्ठी।

मैथिलकोकिलविद्यापतिप्रशस्तयः -  इस भाग में मैथिली भाषा के प्रसिद्ध कवि विद्यापति की प्रशस्ति में 5 पद्य हैं।

भारत-शार्दूलविक्रीडितम्-  यहां नाम से ही ज्ञात हो जाता है कि भारत देश को आधार बनाकर इन पद्यों की रचना की गई है। इस में नाम के ही अनुरूप शार्दूलविक्रीडितम् छन्द में 6 पद्य निबद्ध हैं।

गजलगीतानि - इस भाग में 7 संस्कृतगजलगीतियां संकलित हैं। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

त्वं मदन्तिके येषु ते हि नो गताः दिवसाः।
किं प्रतीक्षया तेषां ते हि नो गताः दिवसाः।।
किं वसन्त आगन्ता किं कुहूरवो भविता
प्रियजने विदूरस्थे ते हि नो गताः दिवसाः।।

तुम जिन दिनों मेरे पास थे, अब वे दिन चले गये। अब उनकी प्रतीक्षा करके क्या लाभ, अब वे दिन चले गये। अब वसन्त और कुहूकार से भी क्या, जब प्रिय ही दूर हो।

यवनिका -  इस भाग में पण्डितराज जगन्नाथ के विषय में प्रचलित उस प्रणयप्रसंग को आधार बनाकर 71 पद्यों की रचना की गई है, जिस के अनुसार उन्होंने एक यवनकन्या से विवाह किया था|

शलभदीपशिखम् -  पतंगे और दिये की लौ की भाव भूमि को आधार बनाकर 33 पद्य संकलित किये गये हैं।

रुबाई-गीतानि -  रुबाई उर्दू की नज्म-शायरी की वह विधा है जो चार मिसरों (पंक्तियों) पर आधारित होती है। इनमें पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति के काफिए (अन्त्यानुप्रास) की समानता होती है। उमर खैयाम की रुबाईयां तो विश्वप्रसिद्ध हैं ही, साथ ही हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला को भला कौन भूला सकता है। संस्कृत में उमर खैयाम की रुबाईयों के कई अनुवाद हुए हैं। डॉ. जगन्नाथ पाठक ने संस्कृत में भी रुबाईयां रच दी हैं। इस भाग में 6 रुबाई गीत संकलित  हैं-

सहसा न तथा व्योम्नि घना गर्जन्ति
वृक्षा न लता हन्त वृथा तर्जन्ति।
सौदामिनी! नैवं परिस्फुरेः सततं
नीडेषु शयाना हि खगा मूर्च्छन्ति।।