Thursday, January 20, 2022

कोरोना काल की संस्कृत कविता _ कोरोनाकोपशतकम्

कृति - कोरोनाकोपशतकम्



प्रणेता- डॉ. बालकृष्णशर्मा

प्रकाशक- अमन प्रकाशन, सागर (म.प्र.)

आईएसबीएन- 978-93-80296-64-7

पृष्ठ संख्या- 128

अंकित मूल्य- 180रू.

संस्करण- प्रथम, 2020

कवि सम्पर्क- मो.- 09329682142, ईमेल- b.k.041973@gmail.com



कवि परिचय

        भारतवर्ष की पवित्र भूमि ने अनेक कवियों, मनीषियों को जन्म दिया है। महर्षि वाल्मीकि से प्रारम्भ हुई कवियों की उज्ज्वल परम्परा सतत विकासमान है। इसी परम्परा के सातत्य में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं- कवि डॉ. बालकृष्ण शर्मा। डॉ. शर्मा का जन्म 01.04.1962 को उ.प्र. के बस्ती जिले के गौरा पाण्डेय नामक ग्राम में हुआ। उन्होंने आचार्य नरेन्द्रदेव  किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बभनान जिला गोण्डा (उ.प्र.) से बी.ए., एम.ए. (संस्कृत) परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। तत्पश्चात् श्रीराजगोपाल संस्कृत महाविद्यालय, अयोध्या से 1985 में साहित्याचार्य तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी से 1996 में पं. वायुनन्दन पाण्डेय जी के निर्देशन में ‘ध्वनिसिद्धान्तालोके संस्कृतमुक्तककाव्यदर्शनम्’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की हैं। काशी में किये शास्त्रीय अध्ययन से प्राप्त वैदूष्य उनके अध्यापन में एवं काव्य रचनाओं में उभरकर सामने आता है। उन्होंने विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन पारंगत आचार्यों की सन्निधि में प्राप्त किया है। कवि डॉ. बालकृष्ण शर्मा वर्तमान में शासकीय संस्कृत महाविद्यालय लश्कर, ग्वालियर में सह प्राध्यापक हैं। उन्हें प्राप्त प्रमुख सम्मानों में महामहिम राज्यपाल द्वारा प्रदत्त म.प्र. संस्कृत बोर्ड का ’वागर्थ सम्मान’ (2007) प्रमुख है। मौलिक संस्कृत काव्य रचनाओं के अतिरिक्त उनके द्वारा सम्पादित, सहसंपादित और संशोधित ग्रन्थ एवं पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनका शोधकार्य गुणवत्तापूर्ण एवं उच्चस्तरीय है। 50 से अधिक शोधपत्र सागरिका, नाट्यम् आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उन पर कविभारती की कृपा छात्र जीवन में ही हो गयी थी फलस्वरूप उन्होंने स्फुट पद्य रचनाएं करना आरम्भ कर दिया था। शनैः शनैः प्रवर्धमान वाणी की साधना के फलस्वरूप उन्होंने मातृभूमि के प्रति प्रेमभावना से ओतप्रोत अपनी पहली पूर्ण काव्यकृति भारताभिज्ञानशतकम् के रूप में संस्कृत जगत् को समर्पित की। प्रकाशित मुक्तकाव्य/गीतिकाव्य/खण्डकाव्य- भावपञ्चासिकाकाव्यम् (तूणकछन्द, दूर्वा पत्रिका, उज्जैन, जनवरी-मार्च 2007 में प्रकाशित), गिराभरणकाव्यम् (शिखरिणी छन्द, पद्यबन्धा पत्रिका स्पन्द-9, अप्रैल 2016), वामाभरणकाव्यम्/ नारीवैभवम् (वसन्ततिलका छन्द) और कोरोनाकोपशतकम् (शार्दूलविक्रीडित छन्द, शतककाव्य, कोरोनामहाव्याधि पर) हैं। डॉ. बालकृष्ण शर्मा की स्फुट रचनाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होकर सहृदयों द्वारा सराही गयी हैं। निरन्तर प्रकाशित हो रहीं इन रचनाओं ने कवि को कविगोष्ठियों में सम्मान प्राप्त कराया है। अब तक ये कई बार बड़े मंचों पर संस्कृत काव्यपाठ कर चुके हैं। इनकी 50 से अधिक मौलिक संस्कृत कविताएं हैं  जो राष्ट्रभक्ति, महाकवि कालिदास, भवभूति, प्रकृति, प्रशस्ति इत्यादि विषयों पर केन्द्रित हैं।



पुस्तक परिचय-  

                 चीन देश के वुहान नगर में वर्ष 2019 के अन्त में कोरोना नामक कीटाणु का प्रकोप प्रारंभ हुआ। यह कीटाणु अल्प समय में ही पूरे विश्व में फैल गया। यह इतना घातक था कि इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक महामारी घोषित कर दिया। भारत में भी इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए सरकारी और निजी स्तर पर कई उपाय अपनाये गये। प्रधानमंत्री ने मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन घोषित कर दिया। यह लॉकडाउन क्रमशः कई चरणों में मई तक बढ़ता गया। इस भीषण महामारी में लॉकडाउन के चरण तीन तक के परिदृश्य का कवि डॉ. बालकृष्णशर्मा ने कवि दृष्टि से जो साक्षात्कार किया उसे ‘कोरोनाकोपशतकम्’ में निबद्ध किया है। कोरोनामहाव्याधि पर केन्द्रित इस शतककाव्य में 102 पद्य शार्दूलविक्रीडित छन्द में निबद्ध हैं। अन्तिम दो पद्यों में कवि का परिचय है। संस्कृत की परम्परागत पृष्ठभूमि पर समकालीन विषयों या समस्याओं को बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है और उनके समाधान की दुष्प्रभाव रहित तथा प्रकृतिहितैषी विधियाँ बतायी जा सकती हैं। इसी की एक प्रतिनिधि रचना है- ‘कोरोनाकोपशतकम्’। कोरोना जैसी आधुनिक महामारी की प्रभावशाली प्रस्तुति कवि के कौशल की और संस्कृत भाषा के अभिव्यक्ति सामर्थ्य की परिचायक है (द्रष्टव्य पद्य क्र. 64)। एक करुण दृश्य द्रष्टव्य है-

तातः पश्यति निर्निमेषनयनः कश्चिज्जराजर्जरः

कोरोनोपरतं विदीर्णहृदयः सन्तानमेकाकिनम्।

काष्ठीभूतवपुर्विवर्णवदनो निद्रादरिद्रीकृतः

आक्रोशन् च विधिं पुनः पुनरयं शोकाकुलो व्याकुलः।।

 (पद्य 40)

अर्थात् यह वृद्धावस्था ग्रस्त, टूटे हृदय वाला, चेष्टा रहित शरीर वाला, सूखे मुख वाला, उड़ी नींद वाला, परेशान एवं शोकमग्न, निरन्तर जागरण करता हुआ कोई पिता बार-बार अपने भाग्य को कोसता हुआ कोराना विषाणु के संक्रमण से मरे हुए इकलौते पुत्र को ठगा सा देख रहा है।

                       इस काव्य में पद्य के साथ उसका अन्वय, संस्कृत टीका, हिन्दी अनुवाद और काव्यसौन्दर्य भी स्वयं कवि ने दिया है। इससे हिन्दी जगत् के लिए भी यह कृति उपकारी हो गयी है। प्रत्येक पद्य मुक्तक भी है और सभी पद्य एक निश्चित विषय ‘कोरोना’ पर केन्द्रित होने से सामूहिकता में भी हैं। प्रत्येक पद्य की अपनी अद्वितीय विशेषता है। रुचिकर अर्थालंकारों और प्रवाह में आये हुए शब्दालंकारों से अलंकृत यह काव्य साहित्य के पारखियों को आकृष्ट करने में समर्थ है। इसमें पौराणिक सन्दर्भों का भरपूर प्रयोग किया गया है और वे पौराणिक सन्दर्भ विषय की अभिव्यक्ति में सटीक बैठे हैं। ‘कोरोना’ के लिए ‘रक्तबीज’ की उपमा अनुपम है। कोरोना के निवारण हेतु विभिन्न देवों से प्रार्थना करना, जैन आचार ‘एकान्तवास’ की संस्तुति करना कवि के लोकोपकारी भाव तथा धार्मिक उदारता को प्रकट करता है। कोरोना के कारण उपजे विभिन्न भयावह दृश्यों, परिस्थितियों और विसंगतियों के बावजूद कवि में आशावाद की ज्योति निरन्तर जलती दिखायी पड़ती है। कोरोना से भी गतिशीलता की सीख का निरूपण अदम्य जीवटता का दर्शन है। कोरोना की उत्पत्ति, फैलने के कारण, बचाव के उपायों को भी भलीभाँति निरूपित किया गया है। आयुर्वेद, ज्योतिष आदि शास्त्रों के उल्लेख भी प्रसंगवशात् आये हैं। कवि भारतीय शास्त्रीय सिद्धांतों पर अडिग हैं। उन्होंने भारतीयता के आधार पर सुस्थिर होकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य को देखा है। कई भारतीय मान्यताओं को कोरोना से बचाव में उपयोग में लाया जा रहा है। कवि उनको रेखांकित करते समय उन भारतीय मान्यताओं की प्रशंसा करना नहीं भूले हैं। कोरोना काल में दूरदर्शन पर प्रसारित किये गये धारावाहिकों रामायण, महाभारत, श्रीकृष्णा आदि का उल्लेख कवि ने किया है। साथ ही सोशल मीडिया फेसबुक आदि संचार माध्यमों की जनजागृति लाने के लिए प्रशंसा की है। संस्कृत कवि सुधारवादी आधुनिकता के समर्थक हैं। कहीं कवि प्रसिद्ध कवियों के अध्ययनजन्य संस्कारों से प्रभावित प्रतीत होते हैं। जैसे- ‘रम्ये सैकतलीनहंसमिथुने पुण्ये नदीसंगमे . . .’ (पद्य 57) पर महाकवि कालिदास के ‘कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी’(अभिज्ञानशाकुन्तलम् 6.17) की छाया है। ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ जैसी प्रचलित सूक्तियों का प्रयोग विषय को स्पष्ट करने के लिए किया गया है (पद्य 30)।

                            एक ओर कवि कोरोना निवारण योद्धाओं चिकित्सक आदि को महिमामण्डित करते हैं वहीं दूसरी ओर कोरोना निवारण में असहयोग करने वाले, कोरोना फैलाने वाले असामाजिक तत्त्वों की कड़े शब्दों में निन्दा करते हुए उन्हें राक्षस तक कह देते हैं। कवि ने उनके लिए संस्कृत में प्रचलित गाली ‘दासीपुत्र’ का प्रयोग किया है। नये शब्दों का निर्माण कर सकने की संस्कृत की सामर्थ्य का कवि ने उपयोग किया है। जैसे- लॉकडाउन के लिए संरोध/निरोध शब्द का प्रयोग। कोरोना काल में मानव मन में उठे झंझावातों को काव्य में महसूस किया जा सकता है। कवि कहीं कोरोना को शेषनाग के विष का अंश कहते हैं, कहीं तो कहीं दुर्वासा का शाप तो कहीं ज्ञानी, यायावर, सामाजिक और साम्यवादी कहते हैं। कोरोना से मृत्यु के समय निर्मित होने वाली विवशता का वर्णन पाठक व श्रोता की आँखों को नम कर देने वाला है। मृतकों की अधिकता बताने के लिए कवि महाभारत के युद्ध का उदाहरण देते हैं जहाँ चहुँ ओर शव थे। यह कवि की क्रान्तदर्शिता ही है कि कवि द्वारा संकेतित भाव ‘कोरोना से बचते हुए जीना सीखना होगा’ (पद्य 99) को काव्यरचना के बहुत दिनों बाद अनलॉक की प्रक्रिया में प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया था। काव्य का सौ वाँ पद्य संस्कृत नाटकों के भरतवाक्य की तरह लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत है। 

             कवि डॉ. बालकृष्ण शर्मा सनातन धर्म में सुदृढ़ आस्था रखने वाले आस्तिक जन हैं। उनमें परम्परा के संस्कार गहरे समाये हुए हैं। परम्परा पर सुदृढ स्थिर रहकर भी आधुनिकता को देखा, परखा, समझा और व्यक्त किया जा सकता है, इसका निदर्शन है यह काव्य- कोरोनाकोपशतकम्। संस्कृत शास्त्रों के गंभीर अध्येता होने पर भी भाषा कहीं बोझिल नहीं हुई है। काव्य में प्रायः असमस्तपदा पदावली का प्रयोग हुआ है। प्रसाद गुण है। इस काव्य में मुख्य रूप से करुण रस है। यह काव्य संस्कृत की प्राचीन परंपरा का वर्तमान प्रतिनिधि है।

        संस्कृत की परंपरागतशैली में आधुनिक विषय पर रचित यह काव्य ‘कोरोना काल’ का काव्यमय दस्तावेज है। ‘उदयनकथा’ की तरह वर्षों बाद भी लोग इस भयावह काल का सजीव प्रत्यक्ष कर सकेंगे। यह काव्य की विलक्षणता ही है कि महामारी का वर्णन भी सहृदयों को रुचिकर लगेगा। यह ‘कोरोनाकोपशतकम्’ काव्य आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी के ‘अभिमतम्’, प्रो. मनुलता शर्मा के ‘मङ्गलाशंसन’, प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी के ‘मेरी दृष्टि में’, डॉ. नौनिहाल गौतम की ‘भूमिका’ और स्वयं कवि के ‘आत्मनिवेदन’ की पूर्वपीठिका के साथ ही काव्य की विषयवस्तु को अभिव्यक्त करने वाले कवर-पृष्ठ से सुसज्जित है। यह संस्कृत में कोरोना पर रचित काव्यों में सर्वप्रथम प्रकाशित होने वाला ग्रन्थ है।।




-डॉ. नौनिहाल गौतम संस्कृत विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर 

98261 51335


Sunday, January 16, 2022

संस्कृत कविता की नई बानगी _ गगनवर्णानां गूहगवेषा

कृति - गगनवर्णानां गूहगवेषा



कवि - डॉ. हर्षदेव माधव

विधा - संस्कृत हाइकु काव्य

संस्करण - प्रथम, 2021

प्रकाशक - संस्कृति प्रकाशन, अहमदाबाद

पृष्ठ संख्या - 157

अंकित मूल्य - 125 रू. 





          डॉ. हर्षदेव माधव अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक प्रयोगधर्मी कवि के रूप में जाने जाते हैं। आपने जहां एक ओर नवीन से नवीन विषयों पर कविताएं लिखी हैं, वहीं दूसरी ओर नई विधाओं को भी इस पुरातन भाषा में उतारा है। ऐसी ही एक विधा है हाइकुकाव्य। संक्षिप्तीकरण की यह विधा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। जापान से पूरे विश्व में फैलने वाली हाइकुविधा संस्कृत मेें भी अपनी अर्थसौरभ से सहृदय पाठकों को महका रही है। हाइकु काव्य में महज तीन पंक्तियों के 17 अक्षरों में कवि वह बात कह सकता है, जो सम्भवतः महाकाव्य में भी कहने में चूक जाए। यहां सपाट बयानबाजी काम नहीं आती। यह तो वक्रपन्थ है, जो प्रतीयमानार्थ से लबरेज होता है। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी अगर कवि हर्षदेव माधव को हाइकुसम्राट् कहते हैं तो वह उचित ही है। 



            हजारों की संख्या में संस्कृत में हाइकु रचने वाले कवि कवि हर्षदेव माधव सतत् अपनी सर्जना में रत रहते हैं। कोरोना काल में कवि माधव ने सोशल मिडिया के सशक्त माध्यम फेसबुक पर कई हाइकु प्रस्तुत किये। इन हाइकु काव्यों को सहृदयों द्वारा बहुत सराहा गया।  इन से प्रेरणा पाकर अन्य कवियों ने भी संस्कृत हाइकु में लिखने का प्रयास किया। फेसबुक पर कवि द्वारा लिखे गये इन हाइकु काव्यों का कई पाठकों ने अपनी-अपनी भाषाओं में स्वतः ही अनुवाद भी किया, यथा- ओडिया, मराठी, राजस्थानी, अंग्रेजी, गुजराती, तेलगु, अवधी, नेपाली, गढवाली, सिन्धी, बंगाली आदि। कवि ने इस कोरोना काल में लिखे गये इन हाइकुकाव्यों का संकलन कर उपर्युक्त अनुवादों के साथ प्रकाशित करवाया है। अनुवादों से हाइकुकाव्यों की सम्प्रेषणता में वृद्धि हुई है।



    कोरोना काल में श्रमिकों के पलायन पर कवि हर्षदेव माधव कहते हैं -


आत्मनिर्भरा

जाताः श्रमिका गन्तुं

गृहं च मृत्युम्।।


आत्म निर्भर हो गए हैं मजदूर

घर और मौत

दोनों के लिए।।



       गौरतलब है कि जब मजदूरों को यातायात के साधन नहीं मिले तो वे पैदल ही अपने बलबूते पर घर के लिए निकल पडे थे। इस जद्दोजहद में कई श्रमिक अपने प्राणों से हाथ धो बैठे। यह हाइकु श्रमिकों की वेदना को बखूबी उकेरता है। हाइकु के ढांचे के अनुरूप यह व्यंजनागर्भित है। यहां च शब्द के प्रयोग से दोनों अर्थ साध्य हैं। संस्कृत भाषा की संश्लिष्टता इसे हाइकु काव्य के शिल्प के अनुकूल बनाती है। 

                 निम्न हाइकु के आधार पर इस संकलन का नामकरण किया गया है-


गूहगवेषां

क्रीडन्ति सान्ध्यकाले

गगनवर्णाः।।



प्रकृति चित्रण का अद्भुत काव्य है यह हाइकु। शाम के समय आकाश के रंग पल-पल बदलते हैं। कवि कहता हैं कि मानों ऐसा लग रहा है कि आकाश के ये रंग आंख मिचौली खेल रहे हों। कवि हर्षदेव माधव अपनी कविताओं में प्रतीकों का अद्भुत प्रयोग करते हैं। कवि के कई प्रतीक पूरी तरह से या तो अछूते होते हैं या वे नई अर्थवत्ता लेकर कवि माधव की कविताओं में प्रविष्ट होते हैं। एक हाइकु देखिए-


अक्ष्णोः प्रविष्टाः

कृषककन्यकाया

वृत्तेश्शलभाः।।


दाखिल हो गई हैं

किसान कन्या की आंखों में

बाड पर बैठी  तितलियां।।

        


 यहां तितलियां पहले प्यार की, युवावस्था की प्रतीक बन कर आती हैं। कितने कवि हैं जो प्रकृति के इन अंगो-उपांगों को अपनी कविताओं में इस तरह प्रतीक बनाकर प्रस्तुत कर पाते हैं? 



   प्रस्तुत संकलन में कवि ने हाइकु कविताओं को चित्रों के साथ भी प्रस्तुत किया है। संस्कृत कविता की नई बानगी देखने के लिये इन हाइकु काव्यों को पढा जाना चाहिए। यह देखना कितना दिलचस्प है कि विदेश से आई एक विधा किस तरह हमारी सबसे प्राचीन भाषा में केवल खप ही नहीं गई है अपितु एक नये रूप में अपने पूरे समय को भी प्रतिबिम्बित कर रही है।



Sunday, January 2, 2022

भावों और विचारों का अद्भुत प्रवाह : गोविंद चंद्र पांडेय कृत भागीरथी

कृति - भागीरथी

विधा - कवितासंग्रह

रचयिता - गोविन्द चन्द्र पाण्डेय

संस्करण - प्रथम

प्रकाशन वर्ष - 2002

प्रकाशक - राका प्रकाशन, प्रयागराज

पृष्ठ संख्या - 223

अंकित मूल्य - 200 रु.




   आचार्य गोविन्द चन्द्र पाण्डेय सुप्रतिष्ठित लेखक, कवि, इतिहासकार, दार्शनिक आदि कई रूपों में सुविख्यात हैं। हिन्दी और संस्कृत में आचार्य पाण्डेय की कविताएं सहृदय सामाजिकों के साथ समालोचकों में भी पर्याप्त रूप से चर्चित रही हैं। आचार्य पाण्डेय कृत भागीरथी काव्यसंग्रह का प्रकाशन 2002 में हुआ है। यह काव्यसंकलन कई मायनों में अनूठा है। यहां दर्शन काव्य के साथ चहलकदमी करते दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि दार्शनिक भाव काव्य में सर्वत्र अनुस्यूत हैं तथापि वे कहीं भी काव्य के आस्वादन में बोझिल नहीं जान पडते हैं। विषय-वैविध्य इस काव्य की अपर विशेषता है। कवि ने मुक्तछन्द में कविताओं का स्वयं ही हिन्दी अनुवाद कर दिया है, जो  पृथक् रूप से एक मौलिक हिन्दी काव्य के समान ही आनन्द प्रदान करता है। कवि ने इस काव्यसंग्रह को सात भागों में विभक्त किया है, जिनमें 163 विभिन्न शिर्षकों से युक्त कविताएं निबद्ध हैं। 



1. लोकः - इस भाग में 13 कविताएं संकलित हैं जो हमारे समक्ष लोक के विविध दृश्यों को प्रस्तुत करती हैं, यथा- नाट्यायितम्, खलपूः,लूता, कंकालः इत्यादि। नाट्यायितम कविता में कवि संसार को अद्भुत रस के युक्त ऐसा नाटक बतलाता है, जिसमें नार-नारी नट-नटी तो हैं ही, साथ ही वे स्वयं ही प्रेक्षक (दर्शक) भी हैं-

 

प्रत्याकारमधायि रूपसुषमा शब्देषु चानुस्वनो

वृत्तान्तेषु कथाप्रसंगविधिं कौतूहलं गुम्फितम्।

नानोपाधिजनेषु नेतृचरितं प्रत्यात्मवैचित्र्यभाक्

संलक्ष्यः प्रतिभावमद्भुतरसो लोको नु नाट्यायितम्।।


रूप रूप मे निरालेपन की शोभा अन्तर्निहित है

शब्दों में अनन्त गूंज

घटनाओं से कहानियों के सूत्रों में 

अनोखे कौतूहल गुंथे।

अलग-अलग मुखौटा पहने नर-नारियों में 

नायक-नायिकाएं छिपी हैं, विलक्षण स्वभाव की

सभी भावों में दीखता अद्भुत-रस

संसार ऐसा नाटक है जिसमें नट ही प्रेक्षक है। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


      लूता कविता में कवि ने लूता (मकडी) को सम्बोधित करते हुए वेदान्त के दर्शन के साथ स्पिनोजा के राजनीतिक विचारों को भी गूंथा है-



उक्ता ब्रह्मसरूपिणी विसृजसि स्वात्मानमात्मेच्छया

नानाजालवितानशिल्पनिपुणा मायाप्रतिस्पर्धिनी।

संख्याता वधदण्डकूटचतुरा प्राज्ञैर्जिगीषूपमा

लूते! तत्त्वनिरूपणादिव भयं त्वत्तो जनः प्राप्नुते।।


ब्रह्म की तुलना तुम से की गयी है

तुम अपने आप का स्वेच्छा से सृजन करती हो

नीति-कोविदों ने जिगीषुओं को तुम्हारे सदृश बताया है।

वध, दण्ड और कूटनीति में चतुर मकडी!

तुम से लोग वैसे ही डरते हैं, जैसे यथार्य से।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


               यहां उक्ता पद से वेदान्तियों का प्रसंग लिया गया है तो प्राज्ञैः पद से स्पिनोजा का संकेत है। ध्यातव्य है कि वेदान्त दर्शन में ब्रह्म को लूता के समान बताया है, जो मकडी के जाले के समान ही सृष्टि की उत्पत्ति, निर्माण व संहार करता है। 

2. कालः - इस भाग में 20 कविताएं संकलित हैं, यथा कालः, इतिहासः, गिरिजास्मृतिः, वासना, अजन्ता, महेशस्मृतिः, नीरोपमम् इत्यादि। आयुः कविता में बौद्धदर्शन में प्रचलित सर्वास्तित्ववाद के अन्तर्गत आने वाले अप्रतिसंख्यानिरोध का प्रयोग किया गया है। कवि ने जब अजन्ता में गुफाचित्रों को देखा तो उस समय मन में आये प्रश्न को अजन्ता कविता में कुछ यूं निबद्ध किया-



राजसुता  शयनीये कृच्छश्वासा मलिननयनकान्तिः।

स्वजनानुपेक्षमाणा कस्मिन्नेषाहितप्राणा।।


राजकन्या बिस्तर पर लेटी है

रुंध रही उसकी सांस

आंखें मुरझायी काली-सफेद।

स्वजनों की उपेक्षा करती हुई 

उसने कहां रखे अपने प्राण।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)




3. वसन्तानलः - इस भाग में 37 कविताएं संकलित हैं, जो विविध ऋतु-वर्णन व प्रकृति-चित्रण पर आधारित है। किन्तु ये वर्णन सामान्य कथन न होकर अपने आप में विशिष्ट हैं। कोकिल कविता में कवि वसन्तदूती कोयल को शहर से भाग जाने के लिये कहते हैं क्योंकि वर्तमान भौतिकतावादी समाज में नये संचारसाधनों के कारण विरह शहर से निर्वासित हो गया है-



अपसर वसन्तदूत्याः

क इवावसरोऽधुनास्ति नगरेषु।

निर्वासित इव विरहो

बहुतरसंचारसेवाभिः।।


भाग जा अब वसन्तदूती,

शहर में तुम्हारे लिए अब अवकाश नहीं।

निर्वासित कर दिया विरह को

नये संचारसाधनों ने।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


       यहां कोकिल के लिये प्रयुक्त वसन्तदूती शब्द साभिप्राय है। 


4. भागीरथी - इस भाग के आधार पर ही संग्रह का नामकरण किया गया है। इस भाग में कुल 11 कविताएं हैं। भागीरथी कविता शान्त रस से ओतप्रोत है-



याता नः पितरः प्रवाह-पतितास्त्वं निर्विकारं स्थिता

यास्यामो जलवीचिफेनसदृशाः शान्तं चिरं स्थास्यसि।

दग्धेष्वेव कृपाकरी त्वमथवा स्वर्गावतीर्णा धराम्

उत्संगे तव विश्रमाहितधियो मुक्तिं प्रतीक्षामहे।।


प्रवाह में गिरे हमारे पितर जा चुके हैं

तुम वैसे ही निर्विकार बनी हुई हो,

हम लोग भी चले जायेंगे 

लहरों में फेन के समान 

तुम चिरकाल तक शान्त बनी रहोगी।

अथवा, स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी हुई

तुम चिता में दग्ध लोगों पर ही कृपा करती हो,

तुम्हारी गोद में विश्राम की इच्छा से 

हम मुक्ति की प्रतीक्षा करते हैं।।  (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


         यहां कवि एक ऋषि के समान प्रतीत होते हैं, जिनसे ऋचाएं प्रकट हो रही हैं।  इस भाग की समुद्रमन्थनम्, शब्दसागरः, त्रिपथगा आदि कविताएं पठनीय, मननीय हैं। 


5. शतदलम् - इस भाग मे 36 कविताएं संकलित हैं, यथा चम्पकः, गन्धः, अरविन्दम्, कर्णिकारः, वृन्दावनम् आदि। कवि ने इस भाग में कतिपय कविताओं के माध्यम से काश्मीर को प्रदर्शित किया है। कवि कहीं वितस्ता कविता में वितस्ता (झेलम)  नदी का मनोहारी चित्र खिंचते हैं तो कहीं शारदादेशे कविता में काश्मीर की नारियों की उपमा शरद् में ज्योत्स्ना की हंसी से देते हैं। कवि मुक्तकण्ठ से मुगलों की प्रशंसा उनके सत्कार्यों के लिये करते हैं। चश्माशाही श्रीनगर में मुगलबागों में से एक बाग है, जो वहां स्थित झरने के मिनरल वाटर जैसे पानी के लिये अतिप्रसिद्ध है। कवि इस चश्माशाही के लिये मनोहारी उत्प्रेक्षा से युक्त वचन कहते हैं-


मुक्तापिष्टं द्रुतमिव, दिवः कौमुदी वा भुवीयम्,

आकाशं वा तरलितमिदं स्वच्छनीरूपभासम्।

शुभ्रं पर्युच्छलति सलिलं निर्झरेऽस्मिन्नजस्रं,

मन्ये कीर्तिर्वहति मुखरा मोगलीयाधुनापि ।।


जैसे मोती पिघल कर बहते हों

या द्युलोक से चांदनी पृथ्वी पर उतरी हो,

या आकाश तरल हो गया हो

बिना रूप के पारदर्शी।

चमकता हुआ पानी सब ओर उछलता

अविराम इस झरने का,

मुझे लगता है आज भी मुगलों की कीर्ति 

मुखरित बही जा रही है।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


       किन्तु ऐसा नहीं है कि कवि ने यहां काश्मीर के सुरम्य चित्र ही प्रस्तुत किये हो। कवि की दृष्टि वहां की वादियों में फैली हिंसा को भी देखती है-


कश्मीरान्वयमव्रजाम शिशिरे शान्ता यदोपत्यका

प्राप्ताः श्रीनगरोपकण्ठविपणिं मांसापणांश्चोभतः।

काचश्यानहिमाधिवेष्टनमयी रक्तातपिण्डावली

तत्रालम्ब्यत या विडम्बनमयी जाताऽद्य हिंस्रे युगे।।


जब हम कश्मीर गये

जाडों के दिन थे

जब हमने श्रीनगर में प्रवेश किया

हमने बाजार में खून और बरफ से जमे हुए

मांस के लोथडे लटके देखे दोनों ओर।

आज के हिंसा के युग में

उनकी स्मृति मानवशवों की

विडम्बना करती है।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


6. दक्षिणापथे जयसिंहः - इस भाग में 1 5 कविताएं निबद्ध हैं। यहां कवि ने पर्यटन एवं विविध क्षेत्रों से सम्बद्ध भावों को प्रकट किया है। एक कविता में चीन की विशाल दीवार का वर्णन है तो एक कविता में तीन श्लोकों के माध्यम सें हिमाचल में स्थित धर्मशाला नगर में कवि द्वारा की गई यात्रा व प्रवास का मनोरम वर्णन है। तीन श्लोकों में कवि ने कालीदास की प्रशस्ति तथा चार श्लोकों में वाल्मीकि की प्रशस्ति भी लिखी है। दक्षिणापथे जयसिंहः नामक कविता में मिर्जाराजा जयसिंह द्वारा दक्षिणापथ अभियान के दौरान फोग नामक कांटेदार पौधे को देखकर स्वदेश स्मरण का वर्णन  कवि द्वारा किया गया है किन्तु राजस्थानी किंवदन्तियों में इस घटना को बीकानेर के राजा रायसिंह के छोटे भाई और पीथल के नाम से प्रसिद्ध पृथ्वीराज से सम्बद्ध माना जाता है, जो अकबर के राजदरबार में सम्मानित थे।  बुहारनपुर प्रवास के दौरान फोग देखकर उन्हें देश की याद आ जाती है-


तूं सैं देसी रुंखडो, म्हे परदेशी लोग

म्हानै अकबर तेडिया तूं यूं आयो फोग


7. प्रत्यग्बिम्बाः - इस भाग में कुल 31 कविताएं संकलित हैं। क्रिसमसदिवस में सैनिकों द्वारा वैरभाव भूलकर शत्रुओं के साथ ईसा मसीह के जन्मोत्सव को मनाने का वर्णन है तो बोधिसत्त्व कविता मेे भगवान् बुद्ध की करुणा का चित्रण किया गया है। काचगवाक्षः कविता में बुढापे को कांच की खिडकी के समान बतलाया गया है, जिससे तटस्थ होकर द्वन्द्व संघर्षों को देखा जाता है-


निस्त्रिंशति हिमवातः प्रहरति दोधूयमानतरुराजौ।

वार्धककाचगवाक्षाद् ईक्षे द्वन्द्वान्यनुद्विग्नः।।


बर्फीली हवा

छुरी सी चल रही है

झपटती थरथर कांपते वृक्षों पर।

बुढापा जैसे कांच की खिडकी है

उससे देखता हूं द्वन्द्व संघर्षों को

अनुद्विग्न।। (अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)



               प्रस्तुत कृति में अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकार सहज भाव से मिलते हैं| उक्त कृति को सरस्वती सम्मान व कबीर सम्मान से सम्मानित किया गया है। प्रो. सत्यप्रकाश मिश्र ने इस कृति के विषय में सत्य ही कहा है- भागीरथी संस्कृत और हिन्दी दो भाषाओं में लिखा गया भारतीय परम्परा का ज्ञानकाण्ड और भावकाण्ड है। संस्कृत और हिन्दी दोनों में ही चिन्तनशीलता जिस रूप में अनुस्यूत है वह चकित ही नहीं करती है अपितु ठहरकर सोचने को बाध्य करती है।

Saturday, January 1, 2022

पश्यन्ती (75 समकालीन कवियों की संस्कृत कविताएं)

कृति - पश्यन्ती (75 समकालीन कवियों की संस्कृत कविताएं)

प्रधान सम्पादक - दयानिधि मिश्र

सम्पादक - बलराम शुक्ल, गायत्री प्रसाद पाण्डेय

संस्करण - प्रथम संस्करण

प्रकाशन - 2021

प्रकाशक - राका प्रकाशन, प्रयागराज

पृष्ठ संख्या - 138

अंकित मूल्य - 130





            समकालीन संस्कृत साहित्य में सतत् रचनाएं लिखी और पढी जा रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाएं अबाधित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। संस्कृत साहित्यकारों को विविध स्तरों पर उनके कृतित्व के लिए पुरस्कृत भी किया जा रहा है। आलोचकों का तो यहां तक मानना है कि संस्कृत में जितनी मात्रा में इस सदी में साहित्य लिखा गया है, उतनी मात्रा में गत सदियों में कभी नहीं लिखा गया। समकालीन संस्कृत रचनाकारों की प्रतिनिधि रचनाओं के विभिन्न संकलन भी  इधर प्रकाशित हुए हैं। ऐसा ही एक संकलन 2021 वर्ष के अन्त में सामने आया है, जो 75 कवियों की प्रतिनिधि रचनाओं को अपने में समाहित किये हुए है। यह संकलन दयानिधि मिश्र के प्रधान सम्पादकत्व तथा युवा कवि बलराम शुक्ल तथा गायत्री प्रसाद पाण्डेय के सम्पादकत्व में आया है। संकलन का प्रकाशन विद्याश्री न्यास के लिये राका प्रकाशन, प्रयागराज से हुआ है।



         संकलन के प्रारम्भ में बलराम शुक्ल की भूमिका है, जो समकालीन संस्कृत के परिदृश्य को समझने में सहायता करती है। यहां 75 कवियों को अकारादि क्रम ये दिया गया है। कई प्रसिद्ध कविेयों के साथ अल्पज्ञात, अल्पपरिचित कवियों को पढना आश्वस्त करता है। वरिष्ठ कवियों के साथ-साथ कई युवा कवियों को भी इसमें स्थान प्राप्त हुआ है, जो इनके लिये उत्साहवर्धक होगा। यहां कहीं पारम्परिक छन्दों मेें काव्य निबद्ध है तो कहीं नवीन प्रयोगों से प्रभावित मुक्तच्छन्द का काव्य भी सहजता से भावों को प्रकट कर रहा है। स्तुति, प्रशस्ति, प्रकृतिचित्रण, शृंगार आदि के साथ नवीन भावों पर भी कविताएं इस संकलन को विशिष्ट बनाती है।



         अभिराज राजेन्द्र मिश्र सुरवागमृता सुखदा वरदा कविता के माध्यम से स्पष्ट उद्घोषणा करते हैं कि संस्कृत न मरी थी, न मर रही है और न ही मरेगी-

 

न मृता, म्रियते न मरिष्यति वा

सुरवागमृता सुखदा वरदा

द्विषतां नियतिं रचयिष्यति वा।।


कवि अमरनाथ पाण्डेय मुक्तछन्द में निबद्ध मदीया कविता के विषय में कहते हैं-


पीडाधिः संरम्भेषु

क्षणं चेतनाया ये उल्लासाः

तेषु प्रेरणामन्विष्यति

स्खलन्ती पदे पदे

सुतरां दीना

याचमाना कणं कणम्

प्रतिवेशे विदेशे

क्वचिद् ह्रीणा

क्वचिद् सगर्वा

तथापि प्रिया कल्याणी

रहसि संगता

कविता मदीया।।


  आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी की  होलिकागजलम् एक मार्मिक गजल है-


रक्तरंगे त्वया रंजिता चोलिका।

ऐषमः कीदृशी मानिता होलिका।।

अत्र दग्धा गृहा दह्यते देहली,

तत्र साधो त्वया राधिता होलिका।।


     महराजदीन पाण्डेय की गजल आज के समय की विडम्बनाओं का दस्तावेज बन जाती है-


निर्वाचनस्य रंगे नटितेन तेन मुषितम्।

कस्यापि तेन रुदितं कस्यापि तेन हसितम्।।

नाट्ये न शान्तरस इति यत्प्रयोक्तमस्ति तन्न

किं किं न प्रेक्षणीयं धर्मस्थले विलसितम्।।


     प्रो. रमाकान्त शुक्ल रचित भारतस्य जनता समीक्षते राष्ट्रीय भावनाओं से युक्त ऐसी कविता है जो यह बतलाती है कि भारत की जनता बहुत सावधान है और वह सब कुछ जानती है-


को विरागमुपयाति शासनात् कोऽतिरागमुपयाति चासने।

धूर्त उच्चपदवीं कथं गतो भारतस्य जनता समीक्षते।।


प्रयोगधर्मी कवि हर्षदेव माधव की तीन कविताएं संकलित हैं, जो कोरानाकाल की वीभिषिका को बहुत मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती हैं-


हे अलकनन्दे

अत्र स्पर्शानां भाषा

विस्मृता हस्तैः।

श्वासेषु सुगन्धपरिचयो नास्ति,

ओष्ठपुटानि

शब्दस्पन्दनरहितानि वेपन्ते।

दूरता व्याप्तास्ति

प्रतिमनुष्यम्।


 

               राजकुमार मिश्र, अरविन्द तिवारी आदि की गजलें भी भावों से परिपूर्ण हैं। ऋषिराज पाठक की कविताएं संगीत की लय से युक्त हैं। कौशल तिवारी की 2 कविताएं दलित विमर्श परक रचनाएं हैं। सतीश कपूर विरचित चेतो ममाकर्षति तेऽनुरागे कविता 50 श्लोकों में निबद्ध है। यह अंश श्रीभुवनभास्करस्तवकाव्य से लिया गया है। बलराम शुक्ल की त्रिचक्रिकाचालककाव्यम् रिक्शा चालकों की दशा को दिखलाती है। युवा कवि परमानन्द झा की आलोकविधुरा दीपशिखा तथा सिंहशावका वयम् कविताएं पठनीय हैं। प्रवीण पण्ड्या की कविताएं गहन भावों से युक्त मुक्तछन्द की वे कविताएं हैं, जिन पर अभी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है।




             सुहास महेश, सूर्य हेब्बार की कविताओं में संस्कृत साहित्य के भविष्य की आहट सुनाई देती है। इस संकलन में महिला कवियों की कविताएं आश्वस्त करती हैं, महिलाओं की साहित्य सर्जना के प्रति।



 पुष्षा दीक्षित, उमारानी त्रिपाठी, कमला पाण्डेय, मनुलता शर्मा आदि वरिष्ठ महिला कवियों के साथ चन्द्रकान्ता राय, योगिता दिलीप छत्रे, वीणा उदयन,श्रुति कानिटकर, सुहासिनी जैसे अल्पज्ञात किन्तु प्रतिभाशाली नाम उनकी कविताओं के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।


 

         प्रत्येक संकलन की अपनी सीमाएं होती हैं, जिसके कारण उसमें बहुत कुछ छूट सकता है, यथा इस संकलन में कवि बनमाली बिश्वाल, नारायण दाश तथा युवा कवियों में ऋषिराज जानी, युवराज भट्टराई व महिला कवियों में पराम्बा श्रीयोगमाया का न होना आदि। किन्तु प्रत्येक संकलन चूंकि उसके संकलनकर्ता की चयनप्रक्रिया और परिस्थितियों पर निर्भर करता है अतः ऐसा होना स्वाभाविक ही है। कुल मिलाकर यह संकलन इस तथ्य को सिद्ध करता है कि संस्कृत न केवल जीवन्त भाषा है अपितु उसमें आज के समय का साहित्य भी लिखा व पढा जा रहा है।

Sunday, August 9, 2020

धनुरातनोमि (भारतीय-आदिवासी-कविता)

कृृति - धनुरातनोमि (भारतीय-आदिवासी-कविता)

विधा - अनुवाद

अनुवादक एवं सम्पादक - डॉ. ऋषिराज जानी

प्रकाशक - गोविन्द गुरु प्रकाशन, गोधरा, अहमदाबाद 9033451409

संस्करण - प्रथम, 2020

पृष्ठ संख्या -156

अंकित मूल्य - 160/-


           संस्कृत में मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनुवाद भी निरन्तर हो रहे हैं। न केवल भारतीय भाषाओं से अपितु विदेशी भाषाओं से भी उत्कृष्ट साहित्य का अनुवाद संस्कृत में होता रहा है। धनुरातनोमि अनुवाद संकलन दो विशेषताओं के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रथम तो यह कि इस संकलन में सर्वप्रथम भारतीय आदिवासी कविताओं का संस्कृत में अनुवाद किया गया है एवं द्वितीय विशेषता यह कि इस संकलन में हिन्दी, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के  साथ- साथ ऐसी विभिन्न भाषाओं के साहित्य से किया गया अनुवाद भी है, जो भाषाएं आदिवासियों द्वारा ही बोली जाती है,यथा-मुण्डारी, कुखुड, सन्ताली, हो, कुंकुणा, धोडी, गामीत इत्यादि। यह भी प्रथम बार ही हुआ है कि इस प्रकार की आदिवासी भाषाओं के साहित्य का रसास्वादन संस्कृत भाषा के माध्यम से किया Kकेजा सकेगा।  

             आदिवासी किसी भी देश के मूल निवासी को कहा जाता है। भारत में ये आदिवासी मुख्य धारा से कटकर जंगलों एवं पहाडी प्रदेशों में रहा करते हैं। आदिवासी विमर्श की कविताएं इन्हीं आदिवासियों के भोगे हुए यथार्थ एवं उनकी समस्याओं को बयां करती है। इस प्रकार की कविताओं में यह वर्णन दो प्रकार के कवि करते हैं, एक वे जो स्वयं आदिवासी के रूप में इन अनुभवों से गुजरते हैं और दूसरे वे जो इन्हें देखकर अपनी कविता का विषय बनाते हैं। प्रस्तुत संकलन धनुरातनोमि में दोनों ही प्रकार की आदिवासी विमर्श की कविताएं हैं। धनुरातनोमि के अनुवादक एवं सम्पादक डॉ. ऋषिराज जानी हैं, जो स्वयं युवा संस्कृत कवि के रूप में अपनी विशिष्ट पहिचान बना चुके हैं।  इससे पूर्व डॉ. जानी भारतीय दलित विमर्श की कविताओं का संस्कृत में अनुवाद सूर्यगेहे तमिस्रा के रूप में कर चुके हैं। आदिवासी विमर्श की कविताएं अनुवाद के रूप में संस्कृत में क्यों उतारी जा रही हैं, इस विषय में स्वयं अनुवादक पुरो वाक् में अपनी बात रखते हुए कहते हैं- यद्यपि संस्कृता भगवती जनसाधारणानां वेदनां शब्दबद्धाम् अकरोत्, तथापि ये जनाः संस्कृतं न जानन्ति स्म ते दूरकक्ष एव स्थिता आसन्। संस्कृता वाक् तु लोकमाता आसीत् अस्ति च युगे युगे सर्वेषां जननी अस्त्येव। सा राजपुरुषाणाम् अनुचरी कथं भवेत्? उद्योगीकरणं, नगरीकरणं, भौतिकवादः-इत्यादिभिः शनैः शनैः वनानि, वनजीवनं, वनसंवेदना,वनवासिनः - एते सर्वे प्रभ्रष्टा जाताः। तेषां वेदनां संवेदनां च प्रकटीकर्तुं भगवत्या वाग्देवतया अहं प्रेरितः अपि च मया भारतीय-आदिवासी-कविताम् अनूदितां कर्तुं संकल्पः कृतः।


        इस संग्रह में 17 भाषाओं की कविताओं का अनुवाद किया गया है। ये कविताएं 33 कवियों की हैं। ये कविताएं आदिवासियों की व्यथा के साथ नागरी सभ्यता के दुष्प्रभावों का भी आकलन करती हैं। झारखण्ड प्रदेश की मुण्डारी भाषा की एक कविता में कवि पण्डुक पक्षी (कपोत की एक जाति) के साथ, मत्स्य के साथ वार्तालाप करते हुए कहता है-

पर्वतः तु प्रज्वालितः, पण्डुकः!

आवां कुत्र तृणानि मार्गयिष्यावः?

जलं मार्गयिष्यावः?

वापिका तु भग्ना कृता मुग्धमत्स्य!

आवां कुत्र तीर्त्वा

जिविष्यावो निवत्स्यावश्च? (मूल-दुलायचन्द्र मुण्डा)


    यहां यह स्वतः प्रकट हो जाता है कि किस प्रकार एक आदिवासी प्रकृति से सीधा जुडाव रखता है और यह भी कि नागरी सभ्यता प्रकृति और मनुष्य के इस अकृत्रिम सम्बन्ध को छिन्न भिन्न कर रही है। झारखण्ड प्रदेश की ही कुडुख भाषा में ही कवि व्यंग्य करते हुए कहता है कि 26 जनवरी को तो ये आदिवासी आपको अच्छे लगते हैं किन्तु तत्पश्चात् आपकी दृष्टि परिवर्तित हो जाती है, आप उन्हें उग्रवादी, बुद्धिहीन मानने लग गये हो क्योंकि उन आदिवासी जनों में अब एक दुर्गुण आ गया है कि वे अब सोचने लगे है-

जनवरीमासस्य षड्विंशतितमायां तारिकायां

राजधान्या मार्गेषु नृत्यपर्यन्तं

प्रतिभान्ति ते जनाः

अतिनिर्दोषा अपि च अतिभद्राः

किन्तु

अधुना ते तव दृष्टौ

जाता दुष्टाः,

उग्रवादिनः, सन्त्रासवादिनः,

दिग्भ्रान्ताः, बुद्धिहीनाः

अपि च न जाने

के के ते जाताः सन्ति।

आम्! अधुना तेषु आगत एको दुर्गुणः।

ते किञ्चित् किञ्चिद्

विचारयन्ति,

किञ्चित् किञ्चिद् वदन्ति।

किञ्चित् किञ्चिद् याचन्ते। (मूल-महादेव टोप्पो)


   ढूंढाडी भाषा राजस्थान प्रदेश की आदिभाषा है। इस भाषा का कवि कहता है कि हम आदिवासी आदिम थे तो अन्त में भी हम ही रहेंगे-

एतस्यां धरित्र्यांI

मानवस्य प्रथमांशाः स्मो वयम्।

आदिमा अपि स्मो वयम्।

अपि च अन्तेऽपि वयं स्थास्यामः। (मूल-हीरा मीणा)

        आदिवासी महिलाओं की पीडा को, भय को प्रकट करते हुए हिन्दी भाषा का कवि कहता है कि अकेली आदिवासी कन्या घने सुनसान जंगल में जाने से नही डरती किन्तु वह शहर के हाट (साप्ताहिक बाजार) में जाने से डरती है-

एकाकिनी आदिवासीकन्या

निबिडं वनं गन्तुं न बिभेति,

व्याघ्रसिंहेभ्यो न बिभेति,

किन्तु

मधूकपुष्पाणि नीत्वा ‘गीदमप्रदेशविपणीं’ गन्तुं बिभेति। (मूल-विनोद कुमार शुक्ल)


                     शहर ने आदिवासी संस्कृति का नाश तो किया ही है। हमने आदिवासियों की सुरक्षा के नाम से कदाचित् उनका शोषण भी किया है। हिन्दी भाषा का कवि इस पीडा को व्यंग्य में इस प्रकार प्रकट करता है-

चिपिटा नासिका,

स्थूलोष्ठौ,

मशीसदृशो वर्णः,

कुरूपता,

एतत् सर्वं तेषां परिचायकमासीत्।

(तव दृष्टौ)

अधुना तेषां  सन्ततयः

गौरववर्णाः,

दीर्घनासाः

तन्वोष्ठाः

अपि च सुरूपाः भवन्त्यः सन्ति।

पुलिसरक्षकदलमेकम् आगत्य

निवसदस्ति

तेषां वसतेः समीपे

तेषां रक्षणार्थम्। (मूल-तरुण मित्तल)

  इस संकलन के परिशिष्ट में डॉ. हर्षदेव माधव, कौशल तिवारी और ऋषिराज जानी की मूल रूप से संस्कृत भाषा में ही निबद्ध कविताएं भी सम्मिलित की गई हैं, जिससे प्रमाणित हो जाता है कि संस्कृत भाषा में आदिवासी विमर्श की कविताएं भी लिखी जा रही हैं। डॉ. हर्षदेव माधव की अपरिचिता मार्गाः कविता आदिवासी जनों के लिये वर्तमान विडम्बना को वर्णित करती है-

कोऽयं रोगः खलु

येन

वनवासिनो वयं

वनेभ्यो बिभीमः?

कस्माज्जाताः

सुहृदो नो व्याघ्राः

शत्रवः?

कस्मान्न दृश्यन्ते

परिचिताः जना

ये

गता नगरमायाबद्धाः?


   आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रस्तुत संकलन की शुभाशंसा में  इन कविताओं को आरण्यकगीतों का नवीन रूप बतलाते हुए कहते हैं कि प्रकृति से ऐसा तादात्म्य अब दुर्लभ हो गया है-  एताः कविताः क्वचित् ऋग्वेदस्य अरण्यानीसूक्तं स्मारयन्ति क्वचित् पर्जन्यसूक्तम्। वन्यजीवनेन एतादृशं तादात्म्यं साम्प्रतिके जीवने सर्वथा स्पृहणीयं जातम्। वनवासिनो जानाति यदहं वनस्यैवविस्तारोऽस्मि-एतादृश्यः अनुभूतयोऽन्यत्र दुर्लभाः सन्ति।

    संग्रह का नामकरण अनुवादक ने सम्भवतः ऋग्वेद के वाक्सूक्त के एक मंत्र के आधार पर किया है- अहं रुद्राय धनुरातनोमि-----आदिवासियों का धनुष से गहन सम्बन्ध है|  आदिवासी कविता वाग्देवी के बाण है । वाग्देवी ही कदाचित् प्रकृति के रूप में कल्पित है और आदिवासी उसके रक्षक| प्रकृति  विकृत किये जाने पर रौद्र रूप भी धारण कर लेती है|

        इस संग्रह में कविताओं के साथ उनके भावों के अनुरूप  कुछ चित्र भी दिये गये हैं, जो स्वयं अनुवादक ने बनाये हैं। ये चित्र वारली चित्रशैली में है, जो महाराष्ट्र की वारली जनजाति में प्रचलित है। निश्चित ही यह संग्रह संस्कृत साहित्य में विमर्श के नवीन वातायन उद्घाटित करेगा।

Saturday, August 1, 2020

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का संस्कृत को योगदान

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का संस्कृत को योगदान


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य में प्रसिद्ध हैं ही, किन्तु भारतेन्दु गाहे-बगाहे संस्कृत में भी लिखते रहे। भारतेन्दु की संस्कृत रचनाएं अत्यल्प हैं किन्तु वे व्यंग्य की शैली में लिखे गये संस्कृत काव्यों से अपनी एक अलग पहचान संस्कृत काव्य जगत् में बनाते हैं। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी भारतेन्दु के संस्कृत कृतित्व के विषय में लिखते हैं कि - ‘‘स्तोत्र की विधा में उपहास या उत्प्रास की शैली मिलाकर भारतेन्दु ने    संस्कृत रचना में भी प्रतिभा की प्रत्यग्रता का परिचय दिया।’’

 1874 से 1878 के मध्य रचे गये स्तोत्रपंचरत्न में संकलित पांच स्तोत्रों में से तीन स्तोत्र वेश्यास्तवराज, मदिरास्तवराज तथा अंग्रेजस्तव संस्कृत में निबद्ध हैं। कवि ने इन स्तोत्रों में व्याज निन्दा शैली का प्रयोग किया है। हरिश्चन्द्र इन स्तोत्रों के विषय में आरम्भ में लिखते हैं-यद्यपि ये स्तोत्र हास्यजनक है तथापि विज्ञ लोग इनसे अनेकहों उपदेश निकाल सकते हैं। वेश्यास्तवराज को वे महासंस्कृत में  लिखा हुआ बताते हैं-
(महासंस्कृत)
ओं अस्य श्री वेश्यास्तवराज महामाला मंत्रस्य भण्डाचार्यः श्री हरिश्चन्द्रो ऋषिः द्रव्यो बींज मुखं कीलकं वारवधू महादेवता सर्वस्वाहार्थं जपे विनियोगः।अथ अंगन्यासः। द्रव्य हारिण्यै हृदयाय नमः जेरपायी धारिण्यै शिरसे स्वाहाचोटी काटिन्यै शिखायै वषट् प्रत्यंगालिंगन्यै कवचाय हुं कामान्ध कारिण्यै नेत्राभ्यां विषयार्थिन्यै अस्त्र त्रयाय फट्

स्तोत्र प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-

नौमि नौमि  नौमि देवि रण्डिके।
लेाकवेदसिद्धपंथखण्डिके।।

     कवि ने इन व्यंग्यात्मक स्तोत्रों में असंस्कृत शब्दों का प्रयोग बहुधा किया है-

मद्यप प्रमोद पुष्ट पीढिका।
एनलाइटेंड पंथ सीढिका।।
पेशवाज अंग शोभितानना।
गिलटभूषणा प्रमोद कानना।।

मदिरास्तवराज में मदिरा की महिमा का परिचय कुछ यूं प्रस्तुत करते हैं-

कायस्थकुलसंपूज्याऽऽभीराभिल्लजनप्रिया।
शूद्रसेव्या राजपेया  घूर्णाघूर्णितकारिणी।।

मदिरा के बहुरूपों का वर्णन करते हुए भारतेन्दु कहते हैं-

मुजेल ह्विस्की मार्टल औल्डटाम हेनिसी शेरी।
बिहाइव वैडेलिस् मेनी रम् बीयर बरमौथुज।।
दुधिया दुधवा दुद्धी दारु मद दुलारिया।
कलवार-प्रिया काली  कलवरिया निवासिनी।।

इस प्रकार के स्तोत्रों के पाठ का फल भी अन्त में वर्णित करते हैं-


यः पठेत् प्रातरुत्थाय नामसार्द्धशतम्मुदा ।
धनमानं परित्यज्य ज्ञातिपंक्त्या च्युतो भवेत्।।
निन्दितो बहुभिर्लोकैर्मुखस्वासपरांगमुखैः।
बलहीनो क्रियाहीनो मूत्रकृत् लुण्ठते क्षितौ।
पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावल्लुंठति भूतले।
उत्थाय च पुनः पीत्वा नरो मुक्तिमवाप्नुयात्।।
   
   अंग्रेजस्तव में कवि हिन्दी मे व्याजनिन्दा करके संस्कृत में तीन श्लोक रचता है-


दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानयागादिकाः क्रिया।
अंग्रेजस्तवपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्।।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थीं लभते गतिम्।।
एककालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत्।
भवपाशविनिर्मुक्तः अंग्रेजलोकं संगच्छति।।

  यहां यह भी ध्यातव्य है कि भारतेन्दु ने अंगेजों की प्रशंसा में लिखे गये दो काव्यसंकलनों के प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। 1870 में प्रकाशित सुमनोंजलिः An Offering Of Flowers में 14 कवियों की संस्कृत रचनाएं तथा दो कवियों की हिन्दी कविताएं संकलित हैं। इसका प्रकाशन ड्यूक ऑफ एडिनबरा के भारत आगमन के अवसर पर हुआ था। मानसोपायन 1888 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारतवर्ष में आगमन पर भारतेन्दु के सम्पादन में प्रकाशित हुआ। जिसमें संस्कृत सहित विविध भाषाओं के कवियों की कविताएं संकलित थी। इसके आरम्भ में स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र लिखते हैं- ‘‘युवराज श्री प्रिंस ऑफ वेल्स के भारतवर्ष में शुभागमन के महोत्सव में हिन्दी, महाराष्ट्री, बंगाली आदि विविध देश भाषा फारसी, अंगरेजी आदि विदेश भाषा और संस्कृतछन्दों में अनेक कवि पंडित चतुर उत्साही  राजभक्त जन निर्मित कविता संग्रह रूपी उपायन भारत राजराजेश्वरी नन्दन युवराज कुमार प्रिंस ऑफ वेल्स के चरणकमलों में संस्कृत भाषादि अनेक कविता ग्रन्थाकार तथा श्रीयुत राजकुमार ड्युक ऑफ एडिनबरा को सुमनोंजलिः समर्पणकर्ता हरिश्चन्द्र समर्पित तथा तद्वारैव संग्रहीत और प्रकाशित।’’ दरअसल भारतेन्दु सेठ अमीचन्द के वंश में हुए थे, जो अंग्रेजों के विविध स्तरों पर सहायक रहे। भारतेन्दुसमग्र में सम्पादक हेमन्त शर्मा के कथन से स्पष्ट हो जाता है कि भारतेन्दु एक तरफ तो अपने वंश की निष्ठा के कारण मजबूर थे तो दूसरी तरफ वे अपने देश की दुर्दशा देख कर व्यथित भी थे, उनकी कई कविताओं में यही कसमसाहट दिखाई देती है। एक तरफ तो वे प्रिंस के भारत आगमन पर प्रशस्तिपरक कविता लिखते हैं-

दृष्टि नृपति बलदल दली दीना भारत भूमि।
लहि है आज अनंद अति तव पंकज चूमि।।

तो दूसरी ओर वे अंग्रेजियत के विरोधी भी हैं-

भीतर भीतर सब रस चूसै
बहर से तन मन धन मूसै
जहिर बातन में अति तेज
क्यों सखि साजन, नहिं अंग्रेज।।

                भारतेन्दु ने हिन्दी आदि भाषाओं में साहित्य की अनेक विधाओं में लिखा। प्रहसनपंचक का चौथा प्रहसन संड भंडयोः संवादः संस्कृत में रचित प्रहसन है। संड और भंड नामक दो पात्रों के  संवाद के द्वारा हास्य की सृष्टि की है-

संड- कः कोऽत्र भोः?
भंड-अहमस्मि भंडाचार्यः।
सं.-कुतो भवान्?
भं.-अहं अनादियवनसमाधित उत्थितः।
सं.-विशेषः?
भं.-कोऽभिप्रायः?
सं.-तर्हि तु भवान् वसंत एव।
भं.-अत्र कः संदेहः केवलं वसन्तो वसन्तनन्दनः।
सं.-मधुनन्दनो वा माधवनन्दनो वा?
भं.-आः! किं मामाक्षिपसि! नाहं मधोः कैटभाग्रजस्य नंदनः।अहं तु हिंदूपदवाच्य अतएव माधवननदनः।

          यहां भंड मधु का अन्य अर्थ  राक्षस ले लेता है। यहां भारतेन्दु तात्कालीन भारत की दुर्दशा को भी पात्रों के मुख से व्यक्त करवाते हैं-

सं.-हहा! अस्मिन् घोरसमयेऽपि भवादृशा होलिका रमणमनुमोदयति न जानासि नायं समयो होलिकारमणस्य? भारतवर्षधने विदेशगते क्षुत् क्षामपीडिते च जनपदे किं होलिकारमणेन?

     भारतेन्दु ने भक्तिपरक काव्य भी रचे हैं। 1871 में लिखी गई प्रेममालिका  नामक हिन्दी की रचना का आरम्भ वे इन दो पद्यों से करते हैं-

संचिन्त्येद्भगवतश्चरणारविन्दं,
वज्रांकुशध्वजसरोरुहलांछनाढ्यम्।
उत्तुंगरक्तविलाससन्नखचक्रवाल,
ज्योतस्नाभिराहरमहद्धृदयान्धकारम्।।
यच्छौचनिसृतसरित्प्रवरोदकेन,
तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोभूत्।
ध्यातुर्मनश्शमलशैलनिसृष्टवज्रं,
ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम्।। 

        भारतेन्दु ने श्री राज-राजेश्वरी देवी की स्तुति में पांच संस्कृत पद्य रचे । 1879 में रचित श्री सीतावल्लभ स्तोत्र मे 30 पद्य निबद्ध हैं। कवि सीता की वन्दना करते हुए कहते हैं -


श्रीमद्राममनः कुरंगदमने या हेमदामात्मिका
मंजूषा सुमणे रघूत्तममणेश्चेतो लिनः पद्मिनी।
या रामाक्षिचकोरपोषणकरी  चान्द्रीकला निर्मला 
सा श्रीरामवशीकरी जनकजा सीताऽस्तु मे स्वामिनी।।

    अष्टपदी हिन्दी में गीत परम्परा में प्रसिद्ध है, जिसमें आठ पद होते हैं । भारतेन्दु ने कृष्ण व राधा को आधार बनाकर सुन्दर अष्टपदी की रचना की है, जिसकी सुन्दर पदावली आकर्षित करती है-

सीमन्तिनी कोटिशतमोहनसुन्दरगोकुलभूपं
स्वालिंगनकण्टकिततनुस्पर्शोदितमदनविकारं

       भारतेन्दु ने संस्कृत में कजली/कजरी गीत भी लिखे। कजरी पूर्वी उत्तरप्रदेश में प्रसिद्ध लोकगीत है। इसे विशेष रूप से सावन माह में गाया जाता है। प्रायः कजरी गीतों में वर्षा ऋतु का विरह वर्णन तथा राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अधिक मिलता है। भारतेन्दु लिखित संस्कृत की कजली कृष्ण-राधा की लीला पर आधारित है-

हरि हरि हरिरिह विहरत कुंजे मन्मथ मोहन बनमाली।
श्री राधाय समेतो शिखिशेखर शोभाशाली।
गोपीजन-विधुबदन-वनज-वन मोहन मत्ताली।
गायति निजदासे ‘हरिचंदे’गल-जालक माया-जाली।।
हरि हरि धीरसमीरे विहरति राधा कालिंदी-तीरे।
कूजति कलकलरवकेकावलि-कारंडव-कीरे।
वर्षति चपला चारु चमत्कृत सघन सुघन नीरे।
गायति निजपद-पद्मरेणु-रत कविवर ‘हरिश्चन्द्र’ धीरे।।


            भारतेन्दु ने संस्कृत में लावनी गीत भी लिखा, जो 1874 में हरिश्चन्द्र मैगजीन में प्रकाशित हुआ। लावनी महाराष्ट्र की लोकप्रिय कला शैली है, जिसमें संगीत, कविता, नृत्य और नाट्य सभी सम्मिलित हो जाते हैं। लावनी शब्द सम्भवतः संस्कृत के लावण्या शब्द से बना है, जो सौन्दर्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है-

कुंज कुंज सखि सत्वरम्
चल चल दयितः प्रतीक्षते त्वां तनोति बहु-आदरम्।...........
परित्यज्य चंचलमंजीरं
अवगुण्ठ्य चन्द्राननमिह सखि धेहि नीलचीरं
रमय रसिकेश्वरमाभीरम्

         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनुवाद के द्वारा भी संस्कृत क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आपने श्रीहर्ष कृत रत्नावली के कुछ अंशों का हिन्दी में अनुवाद किया। कृष्ण मिश्र के प्रबोधचन्द्रोदय नाटक के तीसरे अंक का अनुवाद पाखंडविडम्बन नाम से तथा मुद्राराक्षस नाटक का अनुवाद भी किया। भारतेन्दु ने संस्कृत के धनंजयविजय नामक नाटक का भी हिन्दी अनुवाद किया, जिसके रचयिता का नाम कांचन पंडित बताया गया है। भारतेन्दु ने संस्कृत व अंग्रेजी के नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर नाटक अथवा दृश्य काव्य सिद्धान्त विवेचन नामक ग्रन्थ भी लिखा। साथ ही शांडिल्य ऋषि के भक्तिपरक सौ संस्कृतसूत्रों पर हिन्दी भाष्य तथा नारद कृत सूत्रों पर बृहत् भाष्य की भी रचना की। 



Tuesday, July 21, 2020

सुहासिका

कृति - सुहासिका 

विधा - हास्य व्यंग्य काव्य
लेखक - डॉ. शिवस्वरूप तिवारी 
प्रकाशक - कुमार प्रकाशन, हरदोई, उ.प्र..
संस्करण - प्रथम, 2010
पृष्ठ संख्या -88
अंकित मूल्य - 150 रू.

         
     संस्कृत साहित्य में हास्य- व्यंग्य काव्यों की दीर्घ परम्परा उपलब्ध है। अर्वाचीन काव्यकारों में प्रशस्यमित्र शास्त्री, इच्छाराम द्विवेदी प्रणव, हर्षदेव माधव इत्यादि उल्लेखनीय हैं। डॉ. शिवस्वरूप तिवारी रचित सुहासिका काव्यसंकलन भी इसी परम्परा को आगे बढाने वाला काव्य है। प्रस्तुत काव्यसंग्रह के तीन भाग किये गये हैं-
प्रथम भाग - हास्यव्यंग्यकाव्यम्
                    हास्यव्यंग्यकाव्यम् भाग में 29 शीर्षकों में निबद्ध हास्य एवं व्यंग्य परक कविताएं हैं। कवि मंगलाचरण में गणेश का स्मरण  हास्य की शैली में ही करते हैं-

नमस्तस्मै गणेशाय योऽतिभीतः पलायते।
मूषकं वाहनं वीक्ष्य प्लेगाशंकाप्रपीडितः।।


        जब चूहों से होने वाला प्लेग महामारी के रूप में फैला तो गणेश भी अपने वाहन मूषकराज से सम्भावित रोग की आशंका से डर कर भाग लिये। यह संस्कृत कवि की विनोदप्रियता ही है, जिसके दायरे में वह अपने ईश को भी ले आता है और उससे भी परिहास कर लेता है। चायस्तोत्र 11 पद्यों में चाय देवी की स्तुति है। चाय तो सब को आनन्द, ज्ञान, शक्ति देने वाली देवी है। ऐसी चाय जहां बनाई और पिलाई जाती हो ऐसी चायशाला टीस्टॉल को अगर कवि एकता बढाने वाली और भेदभाव मिटाने वाली कहते हैं तो इसमें कैसी अतिशयोक्ति-

चायशाला महाधन्याराष्ट्रियैक्यविधायिनी।
भेदभावहरे नित्यं चायदेवि! नमोऽस्तु ते।।


     16 पद्यों में निबद्ध मत्कुणस्तोत्र आपके मुख पर हास्य की लकीर खींच देता है। कवि को मच्छर का डंक इंजेक्शन की तरह  प्रतीत होता है, अतः वह उसे चिकित्सक के समान मानता है-

यस्य मनोहरस्तुण्डो इन्जेक्शनमिव शोभते।
तस्मै त्रैलोक्यजेतारं मत्कुणाय नमो नमः।।

सूक्तिसौन्दर्यम् कविता के 15 पद्यों में कवि ने संस्कृत में प्रचलित प्राचीन सूक्तियों को हास्य-व्यंग्य से पूर्ण कर परिवर्तित कर दिया है। यथा-

येषां न कुर्सी न पदं न कारम्
बैंकेषु क्षिप्तं प्रचुरं धनं वा ।
ते  राजमार्गेषु विनैव बीमां 
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।

यहां कुर्सी, बैंक आदि शब्दों को संस्कृत में यथावत लिया गया है। हास्य-व्यंग्य की कविताओं में यह प्रवृत्ति प्रायः देखने को मिलती है क्योंकि इनका संस्कृतीकरण किये जाने पर हास्य रस के आस्वादन की प्रक्रिया में वह तीव्रता नहीं रह पाती है।
       विद्यार्थी के पंच लक्षण अब पुराने हो चुके हैं। वर्तमान युग के विद्यार्थी के लक्षण भी युगानुरूप दिये गये है-

बसट्रेनेषु फिल्मेषु त्यक्त्वा स्वाध्यायन्तु यो
विनैव टिकटं याति विद्यार्थीति निगद्यते।
नकलं योग्यता यस्य चन्दा चैव धनार्जनम्
कट्टाधारी मनुष्योऽयं विद्यार्थीति निगद्यते।।


हास्य कवि का परिचय कुछ यूं प्रस्तुत किया गया है-

मम काव्यधारायां निमज्जनेन शीघ्रमेव
मृृत्युलोकतस्तु मुक्तिमेव परिलभ्यते।
रोगिणो हसन्ति स्वस्थमानवा म्रियन्ते चैव
पण्डितेष्वपण्डितेष्वभेदो परिलक्ष्यते।।

द्वितीय भाग - काव्यविविधा
               काव्यविविधा भाग में 14 शीर्षकों में निबद्ध विविध विषयक कविताएं हैं। प्रारम्भ में बालकृष्ण को प्रणाम किया गया है। राष्ट्रीय एकता की बात करते हुए कवि कहते हैं कि -

यत्र घण्टाध्वनिर्मन्दिरे-मन्दिरे
मस्जिदेष्वप्यजानध्वनिः श्रूयते।
गान्धिनो रामराज्यस्य संकल्पना
यत्र सम्भाव्यते नौमि तं भारतम्।।

यहां संस्कृत की स्तुति की गई है तो वाल्मीकि को भी नमन किया गया है। यहां प्राकृतिक सौन्दर्य का भी वर्णन सूर्योदयः, प्रावृट्-गीतम्, शारद-शोभा आदि कविताओं में प्राप्त होता है।

तृतीय भाग - वार्ताः
                वार्ताः भाग में मूर्ख-लक्षणानि एवं संस्कृतवांग्मये राष्ट्रैक्यभावना ये दो गद्य निबन्ध संकलित हैं।