कृति - शाखान्तरालानां गगनखण्डाः
कृतिकार - डाॅ हर्षदेव माधव
संपादिका- dr भावना सोनी
विधा - हाइकु काव्यसंग्रह
संस्करण - प्रथम 2024
प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन दिल्ली
पृष्ठ संख्या - 240
अंकित मूल्य - 400
आधुनिक संस्कृत साहित्य में हर्षदेव माधव प्रयोगधर्मी कवि के रूप में सर्वविदित हैं| कविता, उपन्यास, कथा, नाट्य, काव्यशास्त्र आदि अनेक विधाओं में अनेक कृतियों के माध्यम से आप संस्कृत साहित्य को उस स्थान पर लाए हैं जहां वह अन्य भाषाई साहित्य के साथ बिना किसी हिचकिचाहट के बात कर सकता है | हाइकु, तांका, सीजो कविता का बखूबी प्रयोग संस्कृत में माधव जी ने ही संभव करवाया है|
हाल ही में माधव जी का नवीन (31 वां) काव्यसंग्रह प्रकाशित हुआ है शाखान्तरालानां गगनखण्डाः| यह हाइकु विधा में रचा गया है| इस पुस्तक में 3 खंड हैं, जिसके प्रथम 2 खंड हाइकु पर विविध आलेखों पर आधारित हैं और 240 पृष्ठों में से 157 पृष्ठ घेरे हुए हैं| इस तरह यह काव्य संग्रह के साथ लघु समीक्षा ग्रंथ को भी अपने में समेटे हुए हैं|
प्रथम खंड -
इस के 92 पृष्ठों में हर्षदेव जी के 8 आलेख संकलित हैं जो सभी हाइकु कविता के विभिन्न पक्षों पर आधारित है| स्वयं अपनी कविता पर कवि माधव जी को ही क्यों बोलना पड़ा इस का उत्तर वह खुद एक आलेख में देते हुए कहते हैं - "संस्कृत के कवि को अपनी कविता के बातें बोलना पड़े यह विवशता है|" यह विवशता क्या है यह आप उनके आलेखों से गुजरते हुए समझ सकते हैं| संस्कृत के तथाकथित पंडित जो संस्कृत में नए लिखे जा रहे के पक्षधर नहीं हैं, किसी अन्य भाषा की विधा में लिखे गए को देख कर नाक भौं सिकोड़ लेते हैं, उन्हीं मान्यों को जवाब देने के लिए यह आलेख लिखे गए हैं| भवभूति तो किसी समानधर्मा की आस में काव्य रचते गए लेकिन माधव जी ने ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए खुद कमर कस ली है| ऐसा भी नहीं है कि माधव जी को को कोई समानधर्मा मिला ही नहीं| आधुनिक संस्कृत साहित्य के आचार्य समीक्षक श्री राधावल्लभ त्रिपाठी जी नैक बार मुक्तकंठ से कवि माधव जी की कविता की प्रशंसा कर चुके हैं और अनेक उदाहरणों के माध्यम से यह स्थापित कर चुके हैं कि आधुनिक संस्कृत साहित्य में माधव जी सरीखा कवि कोई और नहीं है| अगर किसी आधुनिक संस्कृत कवि के काव्यों के अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सर्वाधिक हुए हैं तो वे निश्चित रूप से माधव जी ही हैं| इसी ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में अनेक समीक्षकों ने माधव जी के हाइकु काव्यों की विशेषताओं को उल्लिखित किया है|
इन आलेखों में माधव जी हाइकु काव्य के झेन तत्त्व को उद्घाटित करते हैं तो साथ ही उनकी व्यंजना को भी प्रकट करते हैं| वे एक आलेख में तीन पंक्ति वाले हाइकु को वामन के तीन डग के माध्यम से समझाते हैं| हाइकु में फोटोग्राफी, चित्रकला आदि कलाएं किस प्रकार गूंथ सकती हैं यह भी दिखाया गया है| एक आलेख में माधव जी के ही अभिनव काव्य शास्त्रीय ग्रंथ वागीश्वरीकंठसूत्र के कुछ संदर्भों से हाइकु कविता को जोड़ा गया है जो दिलचस्प है|
द्वितीय खंड -
इस खंड में कवि माधव जी के हाइकु रचना संसार पर 7 आलेख हैं जिनमें 5 हिंदी भाषा में और 2 अंग्रेजी भाषा में निबद्ध हैं| प्रो मंजुलता शर्मा ने माधव जी के हाइकु काव्यों में विद्यमान कॉलेज कन्या के मनोविज्ञान को बहुत रोचक तरीके।से प्रस्तुत किया है| गौरतलब है कि माधव जी के कई हाइकु के कॉलेज कन्या का चित्रण भिन्न भिन्न दृष्टि से किया गया है| प्रो सुदेश आहूजा ने कवि के हाइकु काव्यों में वर्णित चांद और चांदनी पर चर्चा की है| भरत डी परमार ने बारिश पर आधारित हाइकु काव्यों को प्रस्तुत किया है और उनकी बेहतरीन व्याख्या की है| युवा समीक्षक अरुण निषाद ने इन हाइकुओं को अछूते कोने की कविता कहा है| dr रीता त्रिवेदी ने हाइकु काव्यों के विशेष संदर्भ में माधव जी के सर्जकत्व का परिचय दिया है| राजेश जी ने हाइकु काव्यों में वृक्ष को लेकर अपना आलेख अंग्रेजी में लिखा है और शुभ्रजीत सेन ने इन हाइकु काव्यों में प्रतिबिंबित शहरी जीवन को उल्लिखित किया है|
तृतीय खंड -
इस खंड में माधव जी के प्रत्यग्र 338 हाइकु काव्यों को संकलित कर प्रकाशित किया गया है और साथ में श्रीमती इला घोष जी कृत हिंदी अनुवाद भी दिया गया है | जिस तरह ये संस्कृत हाइकु वेधक हैं उसी तरह हिंदी अनुवाद भी बेहतरीन किया गया है| कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -
सुधापटलैः
क्षरन्ति स्मृतयोऽपि
वृद्धगृहस्य ॥१॥
झर (क्षीण हो) रही है
रेत-चूने के साथ,
यादें भी, बूढ़े घर की
न सन्ति पृष्ठे
मे शत्रुप्रहाराणां
चिह्नानि हन्त ! ॥६६॥
नहीं है,
शत्रु-प्रहारों के चिह्न,
मेरी पीठ पर
(मैं युद्ध से, पीठ दिखाकर नहीं भागा हूँ। मैने अपने वक्षःस्थल पर प्रहारों को झेला है)।
पाशयितुं मां
जल-बिन्दुभिर्मेघैः
कृतं पञ्जरम् ॥२३९॥
मुझे बाँधने के लिये,
मेघों ने जल की बूंदों से,
पिञ्जरा बनाया है
वस्तुतः यह काव्य संग्रह संस्कृत में हाइकु काव्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा| जो कवि संस्कृत में हाइकु रच रहे हैं उन्हें भी इसे पढ़ कर विचार करना चाहिए कि क्या उनके लिखे गए हाइकु हाइकु कविता के इर्द गिर्द भी आ पा रहे हैं या केवल वे 17 अक्षरों की लघु कविता मात्र बन कर रह गए हैं| साथ ही हर लघु कविता को हाइकु कहने वालों को भी हाइकु के तत्त्व को समझने की आवश्यकता है| जो महाकवि हाइकु काव्य को हेय समझते हैं उन्हें देखना चाहिए कि हाइकु महज काव्य ना होकर साधना है| आप महाकाव्य लिखते ही हैं कतिपय हाइकु भी तो लिख के देखिए| संस्कृत में ग़ज़ल उपन्यास आदि लिख के भी हाइकु काव्यों को हेय समझने वाले जो मान्य हैं उनके लिए तो क्या कहें| इति
इस पुस्तक का सार हाइकु का समग्र अनुशीलन है भाई हर्षदेव माधव ने इस विधा को आज सामान्य जन तक पहुंचाने का यह श्रमसाध्य यज्ञ पूर्ण किया है। डॉ इला घोष जी ने उनका हिन्दी रूपान्तरण करके उसे राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर दिया है। . शेष इस ब्लाग के द्वारा डॉ कौशल तिवारी ने इस ज्ञान गंगा को आपके द्वार पर पहुॅचा दिया है। इन सभी साधकों को हार्दिक बधाई
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
Deleteउत्तमम्
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