Sunday, May 26, 2024

सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)

कति - सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)



कृतिकार  - रीता त्रिवेदी

विधा  - मुक्तछंद काव्यसंग्रह 

संस्करण  - प्रथम 2010

प्रकाशक - प्रकाशक वितरक डॉ. रीता त्रिवेदी 903, सत्यम् एपार्टमेन्ट, स्वामीनारायण सर्कल के पास, ठाकोरद्वार रांदेर रोड, सूरत – ३९५००९ 

पृष्ठ संख्या -84

अंकित मूल्य - 120



             अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में यूं तो बहुत मात्रा में काव्य रचे जा रहे हैं  किंतु महिला कवि अत्यल्प है| रीता त्रिवेदी गुजराती में तो कविता और कथाएं लिखती ही हैं साथ ही संस्कृत में भी उनकी कविताएं प्रकाशन में आई हैं| प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि की प्रायः मुक्त छंद की कविताओं का संकलन है, जो विविध विषयों पर आधारित हैं| इन  कविताओं के साथ हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है| हिंदी और गुजराती में अनुवाद स्वयं कवि ने किया है| अंग्रेजी अनुवाद चैतन्य देसाई आदि 5 अनुवादकों ने किया है| इस तरह तीन भाषाओं के साथ मूल संस्कृत की इन कविताओं का यह संग्रह चतुर्भाषा काव्यसंग्रह बन जाता है| 



                                   प्रथम कविता अतीत: में कवि भित्ति के आवरण को नहीं खोदने के लिए कहती हैं क्योंकि उसके पीछे फूत्कार है वासुकि नाग की -

मा खनतु 

इदं भित्तेरावणम् । 

तस्य पृष्ठतः 

फुत्कारः वासुकेः । 

त्वम् दाह्यसि, 

भस्मीभूतो भविष्यसि च । 

शनैः शनैः वासुकिस्त्वामवलोकयिष्यति, 

तस्य जिह्वया 

आस्वादयिष्यति, 

तीक्ष्णदंशं दास्यति ।

 त्वं भ्रमिष्यसि 

मोहयिष्यसि, 

विषादे प्रवक्ष्यसि कर्गजनौका इव ।

 पश्य ! वासुकिस्त्वां पश्यति

घटिका यन्त्रे....


            यहां अतीत को नहीं कुरेदने के लिए कहा जा रहा है क्योंकि कई बार अतीत रूपी बेताल वर्तमान के कांधों पर चढ़कर आपको असमंजस में डाल सकता है| वासुकि नाग जो शिव के गले में विराजता है यहां काल का प्रतीक बन जाता है| कविताओं में कहीं कोमल भावनाओं से सिक्त प्रणय निवेदन है तो कहीं स्त्री मुखर होकर कहती है कि विश्वास पुष्प गुच्छ तो नहीं है कि उसे तुम्हारे चरणों में रख दूं| एक कविता में वह अहल्या बन गौतम से प्रश्न करती दिखती हैं कि वह तो मुग्धा थी, इंद्रजाल को नहीं समझ सकी किंतु गौतम तो ज्ञानवृद्ध थे  - 

अहं शिला वा अहल्या ! 

न जानामि । 

स्थिताऽस्मि

 मुक्तावकाशे।

 गौतम ! तव दोषोऽपि कः। 

स्वजनेम्य क्रोधः 

इति सार्वत्रिकी रीतिः, 

किन्तु शल्या मम हृदये इति, 

कथं न पृच्छसि तां कथा। 

किमिति ! किमिति ! 

ऋजुहृदया ! मुग्धा ! न जानाम्यहम् 

ऐन्द्रजालबन्धनम् । 

किन्तु ज्ञानवृद्धः त्वम्

 त्वमपि न जानासि ! 


        ज्योतिष शास्त्र में सूर्य रेखा का वर्णन मिलता है| सूर्य रेखा अनामिका उंगली के एकदम नीचे होती है।  जो सबसे छोटी व मध्यम उंगली के बीच में होती है।  इस अनामिका के नीचे उभरते क्षेत्र को सूर्य पर्वत और इस पर्वत से नीचे हृदय रेखा की तरफ जाने वाली रेखा ही सूर्य रेखा कहलाती है।जिस किसी व्यक्ति की हथेली में सूर्य रेखा जीवन रेखाके पास से आरंभ होती है, उसके लिये यह रेखा उन्नति और यश बढ़ाने वाली मानी गयी है। सुख से आंख मिचौली खेलती कवि अपनी हथेली में सूर्य रेखा खोजती हुई उस से सुख की व्याख्या पूछती है_


सूर्यरेखे हे ! 

अन्विष्यामि त्वाम्।

 करतलं सम्पूर्णम्

इतस्ततः कृत्वा 

अन्विष्यामि त्वमेव । 

श्रुतम्, 

तव शासने सुखमस्ति ।

 मम स्थम्भितं रुधिरं वा

 'इन्हेलर' सहायेन 

अस्तित्वमयं मयाश्वासे 

सुखस्य व्याख्यां 

बोधयितुं शक्नोसि किम् !

     


                 चार भाषाओं का यह काव्य संग्रह पठनीय है| 





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