Wednesday, May 29, 2024

नवीन संस्कृत गजल संग्रह _ संगता

कृति - संगता 

लेखक - राजकुमार कुमार मिश्र कुमार

विधा - ग़ज़ल संग्रह

प्रकाशक - सत्यम पब्लिशिंग हाउस , नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष -2021

पृष्ठ संख्या - 106

अंकित मूल्य - 400रु/-

                


               संस्कृत के युवा कवियों में राजकुमार मिश्र सुपरिचित नाम है| युवा कवि को साहित्य अकादेमी का युवा पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त हैं| कवि मिश्र पारंपरिक छंदों के साथ साथ ग़ज़ल, लोकगीत आदि की शैली में भी काव्य रचते हैं| संस्कृत युवा ग़ज़लकारों में भी राजकुमार मिश्र लोकप्रिय हैं| कुमार तखल्लुस (उपनाम) से लिखने वाले कवि राजकुमार के दो ग़ज़ल काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं| प्रथम संकलन 2020 में अभिज्ञान नाम से प्रकाशित हुआ,जिसमें 60 ग़ज़ल संकलित हैं| प्रस्तुत संकलन में 40 ग़ज़ल हैं| आत्मोद्गार में कवि कहता है कि संस्कृत ग़ज़ल रचना संसार में युगकवि अभिराज राजेंद्र मिश्र के पश्चात वह ही ऐसे ग़ज़ल कार हैं जिन्होंने संस्कृत में 100 ग़ज़ल लिखी हैं _

                                 अस्मिन् काव्यसङ्ग्रहे चत्वारिंशद् गलज्जलिकाः सङ्कलिताः सन्ति। यथाऽहं विभावये संस्कृतगलज्जलिकारचनासंसारे शताधिकगलज्जलिकानां स्चयिता इदानीं राष्ट्रे केवलः कविवरो युगकविः अभिराजराजेन्द्रमिश्रोऽस्ति। काममिदानीम् अनेके कवयो गलज्जलिकाविधायामस्यां प्रभूतं लिखन्ति तथापि कोऽपि अन्यः कविः गलज्जलिकालेखने शतं संख्यां न स्पृशति, दिष्ट्या अभिराजानन्तरम् अहं सञ्जातोऽस्मि इदानीं शतं संख्याकानां गलज्जलिकानां द्वितीयो रचयिता।

                         संग्रह की शुभाशंसा में dr राजेंद्र त्रिपाठी रसराज कवि के दावे को स्तुत्य और सराहनीय बताते हैं| किन्तु 1987 में प्रकाशित पिपासा नामक ग्रंथ में dr जगन्नाथ पाठक की 200 संस्कृत ग़ज़ल संकलित हैं तथा कवि महेश झा का संग्रह गलज्जलिकाशतकम 2014 में प्रकाशित हो चुका है| पिपासा के प्रकाशन के समय तक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री और जानकीवल्लभ शास्त्री जी प्रसिद्ध संस्कृत ग़ज़लकार थे जिनका नाम उल्लेख स्वयं कवि पाठक जी ने किया है| अस्तु 



                                    संग्रह का प्रारंभ तस्मै नमश्शम्भवे शीर्षक युक्त ग़ज़ल से होता है| दूसरी ग़ज़ल में सत्मार्ग पर चलने जैसी नीति की बातें सरस तरीके से कही गई हैं_


दूर्जनान् दूरतो नमेर्बन्धो ! 

मन्त्रमेनं सदा जपेर्बन्धो ! ।।

नाऽधुनाऽस्मिन् वने निजः कश्चित् 

वीक्ष्य कण्टान् ततस्सरेर्बन्धो !॥


श्रवणं न वरम् शीर्षक ग़ज़ल के एक शेर में कवि बड़ी प्यारी बात कहता है_


न शिक्षितं चेत् काऽपि हानिर्नो 

हठात् परं ते तरणं न वरम्॥

          अर्थात् यदि तुम्हे तैरना नहीं आता तो कोई बात नहीं पर तुम्हारा इस तरह हठ पूर्वक तैरना ठीक नहीं| पितर्दुःखितोऽहम् ग़ज़ल मार्मिक है, जो elegy यानी शोकगीत की श्रेणी में भी आती है| कवि ने अपने पिता के मृत्यु के पश्चात् उनका स्मरण करते हुए यह ग़ज़ल लिखी है_

                 


अनाथान् विधाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् 

श्रुतो नाऽन्तिमस्ते स्वरो भावपूर्णः पितर्दुःखितोऽहम्।।

जगन्नीरसं हा श्मशानायमानं मुहुर्भावयेऽहम् 

अकस्माद् विहाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् ।।


            कवि कहीं अन्योक्ति की शैली का भी प्रयोग करता है_


मानसं गन्तुकामोऽप्यसौ हंसराट्

पल्वले स्थातुकामोऽद्य चित्रा स्थितिः॥

नैव पूर्वं रुचिर्यस्य तस्मिन् बके 

तस्य सङ्गे स लीनोऽद्य चित्रा स्थितिः॥


     संग्रह की एक ग़ज़ल कोरोना के विभीषिका पर भी आधारित है_


इदानीं जीवनं विश्वे विपर्यस्तं हि विश्वस्मिन् 

विषं सर्वत्र सूतेऽयं विषाणुर्हा करोनाख्यः ।।

समस्ते मानवे यत्रेश्वरस्याऽऽसीत् पुरा वासः 

समन्तात् तत्र सञ्जातो विषाणुर्हा करोनाख्यः॥

 बहिस्स्थानां कथा का स्यात् सृताऽऽत्मभ्यो जनेभ्यो भीः

 विधत्ते किन्न दुर्दृश्यं विषाणुर्हा करोनाख्यः ॥



          कवि को शैली प्रायः अभिराज राजेंद्र मिश्र की ग़ज़ल शैली से मिलती है, जिसका संकेत शुभाशंसा में राजेंद्र त्रिपाठी रसराज ने भी किया है| इन ग़ज़ल का साथ में हिन्दी अनुवाद भी स्वयं कवि द्वारा किया गया है,‌जो इसकी उपादेयता को बढ़ा देता है| संस्कृत ग़ज़ल संग्रहों की वृद्धि करने वाले इस संकलन का आगमन स्वागत योग्य है| 

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