Saturday, May 30, 2020

आर्याओं का सागर - आर्यार्णवः

कृति - आर्यार्णवः 

विधा - काव्य
रचयिता - डॉ. शिवदत्तशर्मा चतुर्वेदी
प्रकाशक - देववाणी परिषद्, दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 2014
पृष्ठ संख्या - 882
अंकित मूल्य - 500 
       
डॉ. शिवदत्तशर्मा चतुर्वेदी का जन्म 16 अपैल 1934 को जयपुर में हुआ। इनके पिता गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी स्वयं संस्कृत के प्रसिद्ध कवि रहे हैं। डॉ. शिवदत्तशर्मा चतुर्वेदी के प्रकाशित ग्रन्थों में चर्चामहाकाव्यम्, स्फूर्तिसप्तशती विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

                                आर्या छन्द संस्कृत का पारम्परिक छन्द है। आर्यासप्तशती प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में जगन्नाथ पाठक आर्या सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हैं। डॉ. शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी कृत आर्यार्णवः इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है कि इसमें 8 हजार से अधिक आर्याओं में कवि ने अपने कथ्य को प्रस्तुत किया है। आर्यार्णवः का विभाजन 18 वर्गों में किया गया है, जिनमें 224 शीर्षकों में 8453 आर्याएं संकलित हैं। कवि ने भूमि शीर्षक के द्वारा  अपना और आर्यार्णवः की यात्रा का परिचय दिया है। देवर्षि कलानाथ शास्त्री द्वारा अंग्रेजी भाषा में  भूमिका लिख गई है। ग्रन्थ के आरम्भ में अर्वाचीनसंस्कृतम् पत्रिका के प्रधान सम्पादक आचार्य रमाकान्त शुक्ल के सम्पादकीय से ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ के वृहत् कलेवर को देखते हुए दो विश्वविद्यालयों ने इसके प्रकाशन में असमर्थता प्रकट की ।  अतः देववाणी परिषद् की पत्रिका अर्वाचीनसंस्कृतम् के द्वारा इसका प्रकाशन किया गया। पत्रिका के 141 वें अंक से लेकर 158 वें अंक तक संयुक्तांक के रूप में प्रकाशित हुआ, इसी में यह काव्य निबद्ध है।
        कवि ने इसके वर्गो का शीर्षक द्वीप किया है, इस तरह इसमें 18 द्वीप हैं। प्रत्येक द्वीप में भिन्न- भिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत कविताएं संकलित है | प्रारम्भ में गणपति की 21 आर्याओं के माध्यम से स्तुति की है-

गणपतिरस्तु नितान्तं शान्तो दान्तो हृदन्तरे कान्तः।
त्रैलोक्याभराणां सारा स्तुतिरेतदीयैव।।

साथ ही राधा, महालक्ष्मी, सरस्वती, जगदम्बा आदि की भी स्तुति है। आर्या के लिए कहते हैं-

आर्या सैषा रम्या यदि प्रसादं करोति तन्मन्ये।
भावाऽभावाऽभावः सत्वरमेवाऽत्र जागर्ति।।
प्रातः सुषमाकाले कापि नवीना स्मृतिः स्फुरति।
रात्रावथ काऽप्यन्या काले काले नवीनाऽऽर्या।।

वाल्मीकिः, तुलसिदासः, श्रीचन्द्रशर्मागुलेरिः, कालिदासः, भारविः, भवभूतिः, कबीरः पाणिनिः, श्री गोपीनाथकविराजः, भारतेन्दुः आदि के द्वारा संस्कृत, हिन्दी आदि के रचनाकारों पर आर्याएं निबद्ध हैं तो श्रीगिरिधरशर्माणः, कविशिरोमणिः (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), देवर्षिकलानाथाः, बटुकनाथाः आदि के द्वारा आधुनिक संस्कृत कवियों पर भी आर्याएं संकलित हैं। यहां सी.वी. रमणः, श्रीराजेन्द्रप्रसादः, श्रीनेहरुः, डॉ. राधाकृष्णः, वसुसुभाषचन्द्रः, श्रीकरपात्रस्वामी आदि के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध विभूतियों का भी परिचय है। कार्लमार्क्सः पर लिखी गई 100 आर्याएं, जिसे हम कार्लमार्क्सशतक कह सकते हैं, इस संकलन का विशिष्ट भाग है, जो यह प्रकट करता है कि कवि अपने देश से इतर स्थानों/महापुरुषों का भी संज्ञान अपने काव्य में लेता है-

स जयति कार्लो मार्क्सः पीडितजनबन्धुतामाप्तः।
श्रमधनतत्वविवेचनपाण्डित्यं यज्जगद्विदितम्।।
शोषितजनताहृदयस्पन्दमन्दाकिनीस्नातः।
कार्लो मार्क्सः श्वासान् सर्वान् तस्यै समर्पयामास।।

यहां सत्यम्, शिवम्,  सुन्दरम् को कविता के माध्यम से बताने का प्रयास किया गया है तो काव्यकारणम्, काव्यप्रयोजनम् जैसे शीर्षकबद्ध कविताओं से काव्यशास्त्र के विषयों पर भी विचार प्रकट किये गये हैं। कामः, धैर्यम्, उपेक्षा, क्रोधशक्तिः, कुण्ठा, विवशता जैसे मनोवैज्ञानिक विषयों पर भी कवि की लेखनी चली है-

कामात्मता प्रशस्ता नाभिमता जीवने काचित्।
नो लभ्यं संसारे निखिलेऽस्मिन् कामशून्यत्वम्।।

गालीप्रथा कविता में हास्य-व्यंग्य का पुट है। गाली हमारे समाज व संस्कृति का अविभाज्य व महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। गाली की परिभाषा देते हुए कहते हैं-

मनसः स्वतन्त्रता यदि वाण्यां निखिला समागता भवति।
तत्रैव काऽपि धारा सैषा परिकथ्यते गाली।। 

गाली की महिमा गाते हुए कहते हैं कि यदि गाली न हो तो यह समूचा संसार ही सूना हो जायेगा-

निखिलोऽयं संसारः शून्यः सर्वः प्रजायेत।
सा यदि मानसमध्ये नो रचयेद्वाटिकां गाली।।

कवि द्वारा इतनी विपुल मात्रा में रचे गये ये आर्याकाव्य यह सिद्ध कर देते हैं कि पारम्परिक छन्दों में भी विविध विषयों को निबद्ध किया जा सकता है।

Thursday, May 28, 2020

पत्रालयः - बांग्ला से अनूदित नाटक

आधुनिक संस्कृत का एक पक्ष अनुवाद का भी है, जिस पर हम यथासम्भव चर्चा करते आये हैं | विदेशी और भारतीय भाषाओं की अनुपम कृतियों का रसास्वादन हम अनुवाद के माध्यम से कर रहे हैं | कन्नड़, ओड़िया, हिंदी, मराठी, राजस्थानी आदि भाषाओं के साथ बांग्ला जैसी समृद्ध भाषा की रचनाएं संस्कृत में रूपांतरित हुई हैं | नारायण दाश ने "संस्कृतसाहित्ये पश्चिम वंगस्यावदानम्" ग्रन्थ में बंगाल के योगदान को वर्णित किया  है | कथा भारती द्वारा प्रकाशित "अनूदितं रवींद्रसाहित्यम्" में रवींद्र नाथ टैगौर रचित साहित्य के संस्कृत अनुवाद को 29 आलेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है | इन दोनों पुस्तकों का यथासम्भव परिचय ब्लॉग पर उपलब्ध करवाया जाएगा| रवींद्र नाथ टैगौर के एक नाटक डाकघर का संस्कृत अनुवाद पत्रालय: नाम से प्रकाशित हुआ है | यह अनुवाद बनमाली बिश्वाल ने किया है | इसका परिचय प्रस्तुत कर रही हैं पराम्बा श्रीयोगमाया, जो स्वयं भी एक अच्छी अनुवादक हैं |




कृति - पत्रालयः 
विधा - अनूदित संस्कृत नाटक

मूल रचना – विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर
संस्कृत अनुवाद – प्रोफेसर बनमाली बिश्वाल
सम्पर्क सूत्र - 7839908471
प्रकाशक – पद्मजा प्रकाशन, 57, वसन्त विहार, झूसी, इलाहाबाद 211019,
मूल्य – Rs. 300/-
प्रथम संस्करण – 2015
पृष्ठ संख्या – 90 

             प्रोफेसर बनमाली बिश्वाल कवि, कथाकार, अनुवादक तथा समीक्षक के रूप में संस्कृत जगत् में सुपरिचित हैं, जो की मूलतः वैयाकरण हैं । सहज व सरल संस्कृत में संवेदनाओं को उतारना उनके लेखन का विशेषत्व रहा है । समकालिक संस्कृत रचनाओं पर उन्होंने अपने छात्र-छात्राओं से शोध कार्य भी करवाया है । एक कवि के हिसाब से उनका काव्य सङ्गमेनाभिरामा (1996)  छन्दों में छन्दायित है वैसे व्यथा (1997), ऋतुपर्णा (1999), प्रियतमा (1999) आदि मुक्तछन्द से अनुरणित है । कथा साहित्य में संवेदनाओं से धनी उनकी रचनायें पाठक को समाज की स्थिति पर सोचने के लिए विवश कर देती हैं । वर्तमान में प्रोफेसर बिश्वाल राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के श्रीरघुनाथ कीर्त्ति परिसर, देवप्रयाग में व्याकरण विभाग के आचार्य और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत है । उनके और उनके सहयोगिओं के निरन्तर प्रयास और अदम्य उद्योग से समकालिक संस्कृत सर्जनाओं की पहली अनूठी समीक्षा पत्रिका 1999 जनवरी से प्रकाशित होती आ रही थी ।  इसका प्रकाशन फिर से हो ऐसी संस्कृत सर्जकों की आशा है ।


    प्रोफेसर बिश्वाल के रचना संसार में अनूदित नाटक भी सम्मिलित है । रवीन्द्रनाथ टैगोर की बंग्ला रचना ‘डाकघर’  का  संस्कृत अनुवाद एक भिन्न स्वाद की पाठकीय रुचि जगाता है । नाटक का सविशेष तथ्य स्वयं अनुवादक द्वारा प्रारम्भ में दे रखा है । एक चपल और चञ्चल मति बालक का मनोविज्ञान कैसे गम्भीर दार्शनिकता की ओर संकेत करता है – यह विषय इस नाटक में मुख्य रूप से वर्णित है । अमल नाम का एक किशोर अस्वस्थता के कारण घर में बन्द रहने के लिए वैद्य से निर्देशित है । पितृ - मातृ हीन अमल पालक पिता माधवदत्त और उनकी पत्नी के स्नेह से प्रतिपालित है । पर सूर्य किरण और बाहर की वायु उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । वैद्य के द्वारा वह निषिद्ध है बाहर जाने के लिए । उसका शिशु मन तरसता है प्राङ्गण में घुमने के लिए , दही बेचने वाले से दही बेचना सीखने के लिए, मित्रों के साथ खेलने के लिए, फकीर से भिक्षाटन सीखने के लिए, पुलिस से नागरिकों को सचेत कराने की कला सीखने के लिए, उसकी बालिका मित्र सुधा के साथ फूल संग्रह के लिए और अन्त में राजा का पत्रवाहक बनने के लिए । जिन जिन पात्रों के साथ उसकी बात होती है उन पात्रों की गति को वह चाहता है क्योंकि उसकी गति निषिद्ध है ।

   यद्यपि यह एक सामान्य बातचीत और एक व्याधित बालक का मृत्यु का उपस्थापन है पर इस नाटक का अन्तर्निहित अर्थ कुछ गम्भीर है । यहाँ अमल का मन पर्वत, नदी, सुनील आकाश, नक्षत्र और ध्रुव तारा पर निबद्ध है । इस मर्त्य में एक क्षणभङ्गुर शरीर को धारण कर के जी रहा है कब उसको राजा से पत्र मिलेगा । यहाँ राजा शब्द परमात्मा का प्रतीक है । जब संसार से क्रमशः उसका दिन कम होते जा रहे हैं वह सबको पूछता है कि क्या आज पत्रालय में राजा से मेरे नाम का कोई पत्र आया है । आरक्षियों का मुखिया यह बात जानकर ईर्ष्या से भर जाता  है कि एक सामान्य परिवार राजा से सम्पर्क रख रहा है ! बुद्ध को जैसे   सन्यासी  का  चरित्र ने प्रभावित किया था वैसे ही अमल को इस नाटक में एक फकीर प्रभावित करता है । वह उसके साथ अचिन्त्य भ्रमण करके, नदी से पानी पीकर फिर नदी के आर पार जाने की प्रबल इच्छा जताता है । फकीर की तरह संसार बन्धन शून्य है उसका मन । उसका शिशु मन कितना गहन तथ्य बोलता है जिसको अनुवादक ने कहा है –

अस्माकं गृहस्य समीपे उपवेशनेन सः दूरस्थः पर्वतः दृश्यते । मम महती इच्छा भवति यदहं तमुल्लङ्घ्य गच्छेयम् ।... ... अहं तु एतत् सर्वं सम्यग् जानामि यत् पृथिवी भाषितुं न शक्नोति । अतः एवमेव नील-गगनमुद्दिश्य हस्तौ उत्थाय आह्वयति । बहुदूरे ये जनाः गृहाभ्यन्तरे उपविशन्ति तेऽपि निःसङ्ग – मध्याह्ने वनोपान्ते  उपविश्य  एतमाह्वानं  श्रोतुं  शक्ष्यन्ति । अहं  तु विचारयामि यत् पण्डिताः एतत् श्रोतुं न शक्नुवन्ति । (प्रथमदृश्यम्, पृ. सं. 38)

आरक्षी के साथ अपने कमरा जे झरोके से बात करते समय कहता है कि –

कश्चन वदति समयः अतिक्रामन्नस्ति इति । कश्चन अपरो वदति समयः न सञ्जातः । वस्तुतः तव घण्टानादेनैव समयो भविष्यति किल ! (द्वितीयदृश्यम्, पृ. सं. 49) ... तं देशमहं मन्ये न कोऽपि दृष्ट्वा आगतोऽस्ति । मम महती इच्छा भवति यदहं तेन समयेन साकं गच्छेयम् । यस्य देशस्य तथ्यं न कोऽपि जानाति । स देशस्तु बहुदूरे ... ...... ......( द्वितीयदृश्यम्, पृ. सं. 50)

अमल की बालिका मित्र कैसे उसकी मनोयात्रा में सहायिका बनती है, यह भी नाटक में प्रस्तुत किया गया है | उसके साथ जब बाहर जाने के लिए अमल इच्छा प्रकट करता है तब सुधा कहती है -

अहा .. तर्हि त्वं बहिर्न आगच्छ । वैद्यस्य निर्देशः पालयितव्यः । चपलता न करणीया । अन्यथा जनास्त्वा दुष्ट इति वदिष्यन्ति । बहिर्दृष्ट्वा ते मनः व्याकुलितमस्ति । अतः तव अर्धं पिहितं द्वारं पूर्णरूपेण पिदधामि । (द्वितीयदृश्यम्, पृ. सं. 57) 

 बाल सुलभ वचनों से जीव को अंतर्मुखी करके चंचल मन को रोकने का संकेत यहां दिया गया है|

अपनें प्रकोष्ठ में सम्पूर्ण बन्द रहने की अवस्था में वह केवल राजा के पत्र और पत्रवाहक की प्रतीक्षा करता है । फकीर से मिलने के लिए अधीर हो उठता है । अन्त में उसके पितामह फकीर का वेष धारण करके उससे वार्तालाप करते हैं । अन्तिम समय में पत्र आता है शून्य अक्षर होकर साथ साथ राजा उससे मिलने आएंगे यह खबर भी आती है  और वह कहता है की मेरे लिए अब सब उन्मुक्त हो गया । मुझे  कोई कष्ट नहीं है । मैं अन्धकार के उस पार नक्षत्रों को देख रहा हूँ । (तृतीयदृश्यम्, पृ. सं. 86) अन्त में अमल को अमर बनाने के लिए सुधा बोलती है कि उसके कान में एक बात आप लोग बाल दीजिए, सुधा उसे नहीं भूली हैं ।

तदा यूयमेतस्य कर्णयोः एकां वार्तां वदिष्यथ । ... कथयथ यत् सुधा त्वां न विस्मृतवती इति । (तृतीयदृश्यम्, पृ. सं. 90) यहाँ पर सुधा जो शशि नामक मालाकार की पुत्री है अमरता का प्रतीक है ।

यद्यपि नाट्यकार कुछ अंश में पाश्यात्य नाटकों से प्रभावित है जो प्रायः दुःखान्त ही होते हैं फिर भी भारतीयता  को  विश्वकवि नहीं भूले हैं । अतः उनके नाटक का अन्तः विभु प्राप्ति में सुखान्त को दर्शाता है । सांसारिक मिलना न मिलना के छायावाद के साथ साथ सृष्टि के राजा के साथ मिलने की वार्ता रहस्यवाद को भी उजागर करता है इस नाटक में ।

डॉ. पराम्बा श्रीयोगमाया


सहायक आचार्य, स्नातकोत्तर वेद विभाग, श्रीजगन्नाथ संस्कृत   विश्वविद्यालय, श्रीविहार, पुरी 752003, ओडिशा 
सम्पर्क सूत्र - 8917554392


संस्कृत काव्यशास्त्र - आधुनिक आयाम

कृति - संस्कृत काव्यशास्त्र - आधुनिक आयाम

विधा - समीक्षा
प्रधान सम्पादक - प्रो. आनन्दप्रकाश  त्रिपाठी
सम्पादक - डॉ. नौनिहाल गौतम, डॉ. संजय कुमार, डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. शशिकुमार सिंह, डॉ. किरण आर्या
प्रकाशक- अनुज्ञा बुक्स, शाहदरा, दिल्ली - 110032
पृष्ठ संख्या - 199
अंकित मूल्य - 500 

           आधुनिक संस्कृत साहित्य की समालोचना के लिये आधुनिक काव्यशास्त्र की आवश्यकता होना स्वाभाविक है। 17 वीं सदी में पण्डितराज जगन्नाथ कृत रसगंगाधर पर ही काव्यशास्त्र पूर्णता प्राप्त कर विश्राम नहीं लेता है अपितु वह तो नित नई सम्भावनाओं के अनुरूप अपने को परिवर्तित करता रहता है। रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत काव्यलंकारकारिका, ब्रह्मानन्द शर्मा कृत काव्यसत्यालोक, शिवजी उपाध्याय कृत साहित्यसन्दर्भ, राधावल्लभ त्रिपाठी कृत अभिनवकाव्यालंकारसूत्रम्, अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत अभिराजयशोभूषणम्, रहस बिहारी द्विवेदी कृत नव्यकाव्यतत्त्वमीमांसा, हर्षदेव माधव कृत वागीश्वरीकण्ठसूत्रम् आदि अनेक आधुनिक काव्यशास्त्रों के माध्यम से आधुनिक आचार्यों ने अपने काव्यशास्त्रीय विचार हमारे समक्ष रखे हैं। रेवाप्रसाद द्विवेदी एवं राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा अलंकार को पुनः काव्य की आत्मा स्वीकार किया गया है तथा अलंकार पद में अलम् का अर्थ पूर्णता से लिया गया है-अलं ब्रह्म। अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने प्रयोजन आदि पर अपने विचार प्रकट करते हुए साहित्य की नवीन विधाओं के लक्षण करने का स्तुत्य कार्य किया है। हर्षदेव माधव ने साहित्य में प्रचलित वादों को प्रथमतया संस्कृतबद्व करके सोदाहरण प्रस्तुत किया है। ब्रह्मानन्द शर्मा ने सत्य को काव्य की आत्मा माना है। इन काव्यलक्षण, काव्यहेतु, काव्यभेद, अलंकार आदि पर सर्वथा मौलिक विचारों की समीक्षा भी समय समय किया जाना आवश्यक है।

             संस्कृत काव्यशास्त्र - आधुनिक आयाम नामक पुस्तक में आधुनिक काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में कुल 19 लेख संकलित हैं। पहला लेख प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का है, जो स्वयं काव्यशास्त्र के महनीय आचार्य हैं। ‘‘सौन्दर्यशास्त्र की भारतीय परम्परा’’-लेख में प्रो. त्रिपाठी ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध किया है कि सौन्दर्यशास्त्र पर भारतीय परम्परा में विचार ही नहीं किया गया। वे ये तोे स्वीकारते हैं कि हमारे यहां पृथक् से कोई सौन्दर्यशास्त्र नहीं रहा किन्तु साथ ही सप्रमाण यह भी कहते हैं कि अनेक शास्त्रों में प्रसंगवश सौन्दर्य पर बहुत गहनता से विचार किया गया है। उनके अनुसार अलंकार नामक एक समग्र सौन्दर्यशास्त्र प्राचीन भारत में था, जिसे आगे चलकर साहित्यशास़्त्र एवं कलाशास्त्रों में समाहित कर लिया गया। यह एक 48 पृष्ठों का विस्तृत महत्त्वपूर्ण लेख है, जिसमें वैदिक सौन्दर्यशास्त्र, वात्स्यायन का सौन्दर्यविमर्श, नाट्यशास्त्र में सैन्दर्यविमर्श, शैवशास्त्र में सौन्दर्यविमर्श, कवियों तथा आचार्यो की परम्परा में सौन्दर्यविमर्श बिन्दुओं के माध्यम से भारतीय सौन्दर्य विचारधारा को प्रकट किया है।

  •             काव्यप्रयोजन पर स्वतन्त्र रूप से दो लेख हैं- नारायण दाश लिखित - ‘‘आधुनिककाव्यशास्त्रे काव्यप्रयोजनम्’’ और बाबूलाल मीना लिखित - ‘‘आधुनिक संस्कृत साहित्यशा़स्त्र में काव्यप्रयोजन’’। दोनों ही लेखकों ने विस्तारपूर्वक आधुनिक काव्यशास्त्र में वर्णित काव्यप्रयोजनों का वर्णन किया है। अभिनवकाव्यालंकारसूत्रम् ग्रन्थ में मुक्ति को काव्य का प्रयोजन माना गया है- मुक्तिस्तस्य प्रयोजनम्। इस मुक्ति की अवधारणा पर धर्मेन्द्र  कुमार सिंह देव ने ‘‘मुक्तेः काव्यप्रयोजनत्वम्’’ में तथा ऋषभ भारद्वाज ने ‘‘अभिनवकाव्यालंकारसूत्र में मुक्ति’’ लेख में अपने विचार रखे हैं। काव्य से मुक्ति सर्वथा नवीन अवधारणा है, जिसकी अनेक लेखों से  समालोचना भी की जा रही है।

               पूर्णचन्द्र उपाध्याय ने ‘‘आचार्यराधावल्लभीयकाव्यहेतोरभिनवत्वम्’’ लेख के माध्यम से अभिनवकाव्यालंकारसूत्र में वर्णित काव्यहेतुओं की चर्चा की है। काव्यलक्षण पर दो महत्त्वपूर्ण लेख हैं, प्रथम लेख नौनिहाल गौतम का है- ‘‘आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र का काव्यलक्षण-गत वैशिष्ट्य’’ तथा द्वितीय लेख जयप्रकाश नारायण का है -‘‘प्रमुख अर्वाचीन काव्यलक्षण’’, जिन में काव्य के अर्वाचीन  लक्षणों की समीक्षा की गई है।
            रहस बिहारी द्विवेदी का लेख ‘‘काव्याधिकरणानुभूतिविमर्शः’’, रामहेत गौतम का लेख ‘‘लोकानुकीर्तनं काव्यम्’’, शिवपूजन चौरसिया का लेख ‘‘अभिराजयशोभूषणम् में काव्यस्वरूप’’ तथा प्रदीप दुबे का लेख ‘‘काव्यालंकारकारिका के आलोक में अलंकार की काव्यात्मकता’’ अपने-अपने विषयों की पडताल बेहतर तरीके से करते हैं। काव्यसत्यालोक पर दो लेख संकलित हैं - शशि कुमार सिंह का लेख ‘‘काव्यसत्यालोक में व्यंजना’’ एवं माधवी श्रीवास्तव का लेख ‘‘काव्यसत्यालोक में प्रतिपादित सत्य’’। आचार्य ब्रह्मानन्द शर्मा ने प्राकृत, आर्थ  और हृदयज भेद से तीन प्रकार का सत्य बताते हुए आर्थ सत्य को काव्य में प्रमुख माना है। संजय कुमार ने ‘‘संस्कृत की अभिनवरचनाधर्मिता: काव्यशास्त्रीय पक्ष’’ के द्वारा  विभिन्न काव्यशास्त्रीय पक्षों को उकेरा है। नीरज कुमार का लेख ‘‘अभिराजयशोभूषणम् में लोकगीत’’ तथा सत्यप्रकाश का लेख ‘‘अभिराजयशोभूषणम् में गलज्जलिका’’ साहित्य की नवीन विधाओं का परिचय प्रस्तुत करते हैं । हर्षदेव माधव के काव्यशास्त्र का परिचय कौशल तिवारी ने ‘‘वागीश्वरीकण्ठसूत्रम्’’ में प्रस्तुत किया है। राघवेन्द्र शर्मा ने ‘‘विंशशताब्द्यां विरचिताः काव्यशास्त्रीय-शोधप्रबन्धाःः’’ के द्वारा भामह से मम्मट पर्यन्त आचार्यों के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों पर हुए शोधकार्यों का परिचय दिया गया है।
            अपने 19 लेखों के द्वारा यह ग्रन्थ संस्कृत काव्यशास्त्र के आधुनिक आयामों की विवेचना करता है और चिन्तन के नये द्वारों की सम्भावना भी बनाए रखता है।

Wednesday, May 27, 2020

ग़ालिब की ग़ज़लों का रसास्वादन संस्कृत में - आनन्दग़ालिबीयम्

ग़ालिब की ग़ज़लों का रसास्वादन संस्कृत में - आनन्दग़ालिबीयम्

उर्दू फारसी शायरी का संस्कृत में अनुवाद होता आया है | जगन्नाथ पाठक द्वारा किया गया  ग़ालिब की शायरी का अनुवाद ग़ालिबकाव्यम् के रूप में  प्रकाशित है | देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने  भी अपने काव्यसंग्रह कवितावल्लरी में   ग़ालिब, बहादुर शाह जफ़र आदि की शायरी के  कुछ अनुवाद किये हैं| बलराम शुक्ल के काव्यसंग्रहों में भी ऐसे अनुवाद दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्वयं फारसी के अच्छे जानकार हैं और फारसी में काव्य भी लिखते हैं | डॉ परमानंद शास्त्री ने दीवान ए ग़ालिब का संस्कृत अनुवाद किया जो उनके निधन के पश्चात प्रकाशित हुआ है | संस्कृत के रसज्ञों के द्वारा इस अनुवाद को सराहा गया है | ब्लॉग के लिए इसका परिचय डॉ सारिका वार्ष्णेय प्रस्तुत कर रही हैं  | हम उनके आभारी हैं-

ग़ालिब की ग़ज़लों का रसास्वादन संस्कृत में - आनन्दग़ालिबीयम्

कृति -आनन्दग़ालिबीयम्

रचनाकार - डॉ. परमानन्द शास्त्री
विधा- अनुवाद
प्रकाशक- हंसा प्रकाशन, जयपुर
संस्करण-प्रथम, 2018
पृष्ठ संख्या - 481

         डॉ. परमानन्द शास्त्री (31/01/1926-08/01/2007) अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे। आपने संस्कृत साहित्य की विविध विधाओं में रचनाएं लिखी। रा. संस्कृत संस्थान से प्रकाशित परमानन्दशास्त्रिरचनावली से ज्ञात होता है कि डॉ. परमानन्द शास्त्री ने जनविजयम् एवं चीरहरणम् (महाकाव्य), गन्धदूतम् (गीतिकाव्य), परिवेदनम् (शोककाव्य), भारतशतकम् (मुक्मतककाव्य), सरसैयदअहमदखांचरितम् (गद्यकाव्य) आदि की रचना की।

     संस्कृत और हिन्दी के साथ डॉ. परमानन्द शास्त्री का  उर्दू और फारसी पर भी समान अधिकार था। आनन्दग़ालिबीयम् मिर्जा ग़ालिब की शायरी के मशहूर संकलन दीवान-ए-ग़ालिब का संस्कृत अनुवाद है। डॉ. परमानन्द शास्त्री ने यह अनुवाद उसी छन्द में किया है जिसमें ग़ालिब की ग़ज़लें निबद्ध हैं। यह अनुवाद एक और दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि शायरी का सौन्दर्य बरकरार रखने के लिये अनुवादक ने कई स्थानों पर उर्दू के शब्दों को संस्कृत में यथावत् ले लिया है। इसके कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है-


न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता। 
डुबाया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता ।।

किमपि नासीत् ‘ख़ुदा’ऽऽसीत् चेन्न किञ्चित् ‘ख़ुदा’ अभविष्यत्।
हतोऽहं हन्त भवनात् नोऽभविष्यं चेत् किम् अभविष्यत्।।

यहां ख़ुदा शब्द का यथावत् प्रयोग किया गया है। इसी तरह निम्न शेर में बुलबुल शब्द का संस्कृतीकरण किया जा सकता थ किन्तु उन्होंने इसे यथावत् ले लिया है-

बुलबुल के काराबोर पै है खन्दाहाए गुल
कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।।

कुसुमानि बुलबुलस्य क्रियाभारमुपहसन्ति।
यत् प्रेम कथ्यतेऽस्ति विक्षेपः स मस्तिष्कस्य।।

डॉ. परमानन्द शास्त्री ने ग़ज़लों के अनुवाद के साथ साथ  उनकी संस्कृत व्याख्या भी की है। यथा-

नक्श फरियादी है किसकी शोखिये-तहरीर का
काग्जी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का ।।

कस्य रचनाचपलताया वादिचित्रं वर्तते।
कार्गदिकपरिधानधृत् प्रत्येकमिह यद् वर्तते।।

‘‘जन्मैव समस्तभवतापानां कारणं भवति। विधिरपि जन्म प्रदाय न शरीधारिणां भद्रं करोति तस्मादेव दुःखार्ता जना विधिं क्रोशन्ति। स्वीयमिदं मन्तव्यं गालिबश्चित्रं प्रतीकं मत्वा अनुपस्थितं तस्य स्रष्टारं चित्रकारमुपालभ्यते। कथयति, कस्य रचनाचपलताया अस्तित्वमागतं दुःखार्तं चित्रं तस्य विरुद्धं न्यायं याचते? तदर्थमेवानेन कार्गदं परिधानं धृतमस्ति। पुराकाले पारसीकदेशे न्यायं याचमाना वादिनः कर्गदरचितवसनं परिधाय न्यायाधीशसम्मुखं गच्छन्ति स्म इति तदानीन्तनः तत्राचारः। सर्वमस्तित्वं दुःखमित्यर्थः।’’


डॉ. परमानन्द शास्त्री ने अनुवाद इतनी सरल प्रवाहपूर्ण रोचक भाषा में किया है कि साधारण संस्कृत जानने वाला भी इसका आस्वादन ले लेता है-

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई।।

मा श्रुणु चेद् दुर्वदेत् कश्चित्
न कथय दुश्चरेच्चेत् कश्चित्।।

ग़ालिब का संस्कृत अनुवाद स्वागत योग्य है। यह अनुवाद संस्कृतज्ञों को उन ग़ालिब की शायरी का रसास्वादन करा देता है जिन ग़ालिब के लिये स्वयं ग़ालिब कहते हैं-

होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वो अच्छा है पर बदनाम बहुत है।।

अपि कश्चिदस्ति तादृशो यो ग़ालिबं न वेत्ति।
कविरूत्तमोऽस्ति किन्तु दुर्नामास्ति बहुतरम्।।

परिचायिका- डॉ. सारिका वार्ष्णेय

प्रवक्ता एवं विभागाध्यक्षा-संस्कृत विभाग, वूमेन्स कॉलेज, अलीगढ मुस्लिम वि.वि.
सम्पर्क सूत्र-9719177049

Tuesday, May 26, 2020

शाम्भवी

कृति - शाम्भवी

विधा- काव्यसंग्रह
रचयित्री - पुष्पा दीक्षित
प्रकाशक- रा. संस्कृत संस्थान, दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 2012
पृष्ठ संख्या -77
मूल्य- 100 रु.

कवयित्री पुष्पा दीक्षित रचित अग्निशिखा काव्यसंग्रह चर्चित रहा है। इसके कई वर्षों पश्चात् शाम्भवी काव्यसंग्रह रा. संस्कृत संस्थान, दिल्ली की योजना लोकप्रिय साहित्य ग्रन्थमाला -46 के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ है। इस काव्यसंग्रह में 33 कविताएं संकलित हैं। प्रथम कविता में कवयित्री कहती हैं-

धरणी विशालमञ्चो नीलं नभो वितानम्।
सूत्रं दधाति शम्भुर्नरिनर्ति शाम्भवीयम्।।
गगनेऽनिले वा सलिलेऽथवा स्थले वा।
प्रतिकणमहो जगत्यां वरिवर्ति शाम्भवीयम्।।


प्रस्तुत काव्यसंग्रह में कवयित्री भारतभूमि की चिन्ता प्रकट करती हैं तो कहीं वर्तमान समय की विडम्बनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। कहीं हमारे पौराणिक पात्र नई अर्थवत्ता को लिये पाठक के समक्ष आते हैं तो कहीं विलुप्त होती जा रही विश्वबन्धुता की भावना की गवेषणा का प्रयास किया जाता हैै।
         पुष्षा दीक्षित व्याकरण पर असाधारण अधिकार रखती हैं। वे व्याकरण के विशिष्ट प्रयोगों से काव्य को अलंकृत कर देती हैं |नामधातुओं का कितना सुन्दर उपयोग इस अन्त्यानुप्रास युक्त कविता में किया गया है-

वीतरागता यदा तदा गृहं वनायते।
त्वं प्रतीयसे यदा तदा जगत् तृणायते।।
ये कषायवाससोऽपि मानसे कषायिताः।
ते विशन्ति यत्र तत् तपोवनं रणायते।।

यङ्  प्रत्यय में सभी धातुएं ङित्वात् आत्मनेपदता को प्राप्त होती हैं, वैसे ही भाव व कर्म में भी सभी धातुएं आत्मनेपदी में प्रयुक्त होती हैं। वैसे ही लोक में भी व्यक्ति आत्मार्थ पद ग्रहण करते हैं-

यङ्लुकं प्रपद्य धातुभिः परार्थमाप्यते।
आत्मनः पदं तथैव किञ्जनैन्र हीयते।। 

प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी काव्यसंग्रह के पुरोवाक् में कहते हैं- ‘‘दीक्षितमहोदयानां गीतिषु तीक्ष्णव्यंग्यसंवलिता काव्यार्थसुषमा, वक्रोक्तिविच्छितिः, संस्कृतिमूलार्थसंक्रान्तिः, सांस्कृतिकोऽनुरागः, प्राचीनताप्रीतिः, भाषासौष्ठवं, काकुर्वैदग्ध्यभंगीभणितिश्चेति नैके विशेषा विलसन्ति, प्रथयन्ति च तद्वैशिष्ट्यं साम्प्रतिकसाहित्यसंसारे।’’




Monday, May 25, 2020

संस्कृत ग़ज़लसंग्रह - काक्षेण वीक्षितम्

संस्कृत ग़ज़लसंग्रह - काक्षेण वीक्षितम्
कृति - काक्षेण वीक्षितम्

लेखक - महराजदीन पाण्डेय ‘विभाष’
मोबाइल नम्बर-9451027704
पता-गोण्डा-उत्तरप्रदेश
विधा - ग़ज़ल-काव्य संग्रह
प्रकाशक -ज्ञान भारती पब्लिकेशन, दिल्ली
संस्करण - प्रथम -2004, द्वितीय-2016
पृष्ठ संख्या -119
अंकित मूल्य - 395

         संस्कृत में ग़ज़ल विधा की शुरुआत भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से मानी जाती है। इसे गज्जल, गज्जलिका, गलज्जलिका, गीतिका, गजलगीति, द्विपदिका आदि संज्ञाएं भी दी गई हैं। संस्कृत के नये काव्यशास्त्र अभिनवकाव्यालंकारसूत्रम्, अभिराजयशोभूषणम् तथा नव्यकाव्यतत्त्वमीमांसा में इसका लक्षण भी प्रस्तुत किया गया है। महराजदीन पाण्डेय वर्तमान समय के सशक्त ग़ज़लकार हैं।  आप विभाष तखल्लुस से गजले लिखते हैं। महराजदीन पाण्डेय की ग़ज़लों का प्रथम संकलन मौनवेधः 1991 में प्रकाशित हुआ था। काक्षेण वीक्षितम् आपकी ग़ज़लों का द्वितीय संग्रह है।  हाल ही में मध्ये मेघयक्षयोः संवाद काव्य प्रकाशित हुआ है। यहां काक्षेण वीक्षितम् (कनखी से देखना) का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है-
     महराजदीन पाण्डेय की 32 संस्कृत ग़ज़लों का संकलन काक्षेण वीक्षितम् के रूप में प्रकाशित हुआ है। यहां इन ग़ज़लों का हिन्दी अनुवाद भी स्वयं द्वारा प्रस्तुत कर दिया गया है। साथ ही इन ग़ज़लों के अतिरिक्त 9 कविताएं भी संकलित हैं। महराजदीन पाण्डेय ने उर्दू छन्दशास्त्र में प्रचलित सात बह्रों में ये ग़ज़ले कही हैं, यथा- मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन। महराजदीन पाण्डेय प्रेम पर आधारित ग़ज़ल ही नहीं कहते, वे ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों से सम्बद्ध करते हुए उसे आज के समय से भी जोड देते हैं। इसका कारण वह पहली ही ग़ज़ल के मतले (गजल का प्रारम्भिक शेर) में कहते हैं-

औरसेनासृजा पोषिता लेखनी।
लोकरागोष्मणा शोधिता लेखनी।। (पृ.सं.12)

अर्थात् लेखनी को हृदय के रक्त से पोसा है। लोकराग की ऊष्मा से इसका शोधन किया है। जिसकी लेखनी हृदय के रक्त से पोषित होगी वह केवल इश्क की बातें नहीं करेगी और न ही हिज्र की रातों के आंसू टपकायेगी। जब दो जून की रोटी के जुगाड में सारी जिन्दगी रीती जा रही हो तो चालाकी कहां से आयेगी-

चिन्तया रोटिकाया हता चातुरी।
तैल लवणस्य योगे गता चातुरी।। (पृ.सं.20)

परमात्मा का अस्तित्व बहस का मुद्दा रहा है, जिस पर दार्शनिक विचारधाराएं अपने अपने मत रखती हैं। लेकिन कवि को इन दार्शनिक विवादों से क्या मतलब, वह तो सीधा सपाट कह देता है कि जो परमात्मा हमारे काल्पनिक प्रमाणों पर टिका हुआ है वह अन्धे की लकडी मात्र है, अतः उसकी चर्चा व्यर्थ है-

अलं तच्चर्चया लगुडो भवेदन्धस्य परमेशः,
श्रितो नः कल्पनासूते प्रमाणे किं त्वया बुद्धम्! (पृ.सं.22)

महराज दीन पाण्डेय राजनीति पर करारा व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि गाओ  क्योंकि गाने से दो लाभ होंगे,  गाने से राजा खुश तो होगा ही साथ ही उस निर्दयी राजा को सहन करने की शक्ति भी मिलेगी-

गाय गानेन हृष्यते राजा ।
कालकुटिलोऽपि मृष्यते राजा।।
मतान्यदाम सेवकं चेतुं
संसदा नः प्रदिश्यते राजा।। (पृ.सं.70)

हमने वोट तो दिया था समाज सेवक चुनने के लिये लेकिन संसद ने हमे दिया राजा। इस प्रकार की ग़ज़ले हमें हिन्दी के मशहूर शायर दुष्यन्त का स्मरण कराती हैं। अपने उपनाम (तखल्लुस) विभाष का एक ग़ज़ल के मक़ते में बखूबी प्रयोग करते हुए कहते हैं विभाष की वह भाषा ही क्या जो छीले नहीं, शब्द के हिंडोले को झुलाने वाला भी भला कवि होता है-

या न तक्षति विभाषस्य भाषास्ति का
किं कविः शब्दहिन्दोलकं दोलयन्।। (पृ.सं.24)

Saturday, May 23, 2020

अनूठी अनूदित रचना - आंग्लरोमांचम्



अनुवाद के माध्यम से हम अन्य भाषाओं की रचनाओं का आस्वादन ले सकते हैं | अनेक आलोचक तो यहां तक कहते हैं कि अनुवाद का कार्य मौलिक से कठिन है |  दर असल अनुवाद पुनः सृजन जैसा कर्म है | विश्व की प्रायः सभी भाषाओं में अनुवाद होता आया है | संस्कृत  की कृतियों ने तो अंग्रेजी, जर्मन आदि अनेक भाषाओं में अनूदित होकर सम्पूर्ण विश्व को चमत्कृत कर दिया  | संस्कृत में अब अन्य भाषाओं से अनुवाद भी हो रहा है | साहित्य अकादेमी द्वारा 24 भाषाओं में प्रतिवर्ष अनुवाद पुरस्कार भी दिया जाता है, जिनमे संस्कृत भी सम्मिलित है | यहां अंग्रेजी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की कविताओं के अनुवाद के संकलन का परिचय दिया जा रहा है| हमारा प्रयास यह रहेगा कि आपको मौलिक कृतियों के साथ यथा सम्भव अनूदित कृतियों का भी परिचय देते चलें-
अनूठी अनूदित रचना - आंग्लरोमांचम्
कृति- आंग्लरोमांचम्
अनुवादक-डॉ. हरिहर त्रिवेदी
मूल भाषा- अंग्रेजी
मूल लेखक - विविध
प्रकाशक - चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी
संस्करण-प्रथम 1974
पृष्ठ संख्या -81
अंकित मूल्य-15 रू.


अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में जहां एक ओर मौलिक कृतियां सर्वादृत एवं समादृत हो रही हैं, वहीं अनूदित कृतियों के माध्यम से भी संस्कृत पुराणी युवती उषा की भांति नित नवीन सुशेाभित होती है। अगर हम विश्व की नहीं केवल भारत की अन्य भाषाओं कि ओर भी देखें तो हम पाते है कि संस्कृत में उतना अनुवाद कार्य नहीं हो रहा जितना अन्य भाषाओं में होता आया है। सम्भवतः इसके दो कारण रहे, पहला यह कि अनेक कारणो के चलते संस्कृत साहित्यकार अन्य भाषायी साहित्य के बहुत कम सम्पर्क में आये, दूसरा यह कि हमने यह सोचा कि हम ही क्यों अनुवाद करें, हमारे ही ग्रन्थों का अनुवाद अन्य भाषाओं में हो। किन्तु कुछ समय से इस क्षेत्र पर साहित्यकारों का ध्यान गया है। न केवल भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों का संस्कृत में अनुवाद हो रहा है अपितु विदेशी भाषाओं की रचनाएं भी संस्कृत में रूपान्तरित होती दिखाई देती हैं।
             सन् 1974 में डॉ. हरिहर त्रिवेदी एवं उनके सहायक लक्ष्मीनारायण जोषी ने नौ अंग्रेजी कवियों यथा कीट्स, शैले, वर्ड्सवर्थ, बायरन  आदि की बाईस कविताओं का संस्कृत के पारम्परिक छन्दों यथा द्रुतविलम्बित,  स्रग्धरा, वसन्ततिलका, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलविक्रीडित आदि में अनुवाद किया  है। यहां छन्दों के स्वभाव के अनुरूप ही उनका प्रयोग भी किया गया है। इसमें संस्कृत अनुवाद के साथ मूल भाषा में भी कविताएं दी गई हैं|
यहां इन कवियों और उनकी अनूदित कविताओं की सूची भी प्रस्तुत की जा रही है।



कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

in a drear-nighted December,
Too happy, happy tree,
Thy branches ne"er remember
Their green felicity

धन्योऽसि यद्धिमऋतावपि निष्प्रभायां
रात्रावपि प्रमुदितोऽसि महीरुह! त्वम्।
यन्नो स्मरन्ति विषमे ह्यधुना तवैताः
शाखा वसन्तसुषमामनुभूतपूर्वाम्।।
(मूल - कीट्स)

Life ! i~ know not what thou art,
But know that thou and i~ must part,
And when, or how, or where we met
i~ own to me"s a secret yet"

जानामि नाहमयि जीवित ते स्वरूपम्
जाने तथापि भविता ननु नौ वियोगः।
आवां कदा क्व च कथं च समागतौ स्वो
ह्येतत् तु सर्वमधुनापि रहस्यमेव।।
(मूल - बारबाल्ड)