Thursday, June 4, 2020

संस्कृत के अर्वाचीन साहित्य के विकास में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का योगदान

संस्कृत के अर्वाचीन साहित्य के वि
कास में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का योगदान

पुस्तक- संस्कृत के अर्वाचीन साहित्य के विकास में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का योगदान
लेखक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज
जन्मतिथि- 12 जनवरी 1981
जन्मस्थान- सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- मो. 9685390891, 8982249787, ईमेल bharadwajrishabh81@gmail.com
प्रकाशक- सत्यम् पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
आईएसबीएन- 978-93-83754-02-1
पृष्ठ संख्या- 804
अंकित मूल्य- 1300रू.
संस्करण- 2014 प्रथम


लेखक- संस्कृत साहित्य के अध्येता एवं पाण्डुलिपियों के ज्ञाता डॉ. ऋषभ भारद्वाज ने उच्च शिक्षा सागर विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। वे पाण्डुलिपियों के क्षेत्र में पिछले डेढ़ दशक से कार्य कर रहे हैं। इसी सिलसिले में वे कई महीनों तक कश्मीर में रहे। तब उन्होंने अपने प्रथम ग्रन्थ ‘कश्मीर इतिहास और संस्कृति’ (2008 ई.) से अपनी लेखकीय प्रतिभा का परिचय कराया था। उन्होंने 21000 पद्यों के रचयिता पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के साहित्य पर शोधकार्य किया है। द्विवेदी जी के अप्रकाशित साहित्य को संपादित कर प्रकाशित कराने का उनका कार्य स्तुत्य है। अपने अनुसन्धेय और गुरुजनों के प्रति उनकी श्रद्धा देखते ही बनती है। उनके तीन मौलिक आलोचना ग्रन्थ, आठ संपादित ग्रन्थ और पच्चीस शोधपत्र प्रकाशित हैं। उन्हें संस्कृत के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु पं. गोविन्द प्रसाद शास्त्री संस्कृत विद्वत् सम्मान, कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन से व्यासपुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। वर्तमान में वे पाण्डुलिपि संसाधन केन्द्र, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में कार्यरत हैं।

                            डॉ. ऋषभ भारद्वाज

पुस्तक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज ने 2011 में डॉ. कुसुम भूरिया के निर्देशन में संस्कृत के अर्वाचीन साहित्य के विकास में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का योगदान विषय पर पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की थी। इसे 2014 में पुस्तकाकार में प्रकाशित किया गया है। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का प्राक्कथन और प्रो. कुसुम भूरिया की शुभाशंसा है। लेखक का मुख्य उद्देश्य विशाल साहित्य को एक साथ समाज के सामने लाने का रहा है। बहुत संक्षेप करने पर भी शोधग्रन्थ बृहदाकार हो गया है। लेखक ने कवि के परिचय, काव्यों के परिचय और काव्यगत-अनुवादगत समीक्षा कर निश्चित रूप से श्रमसाध्य कार्य किया है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने लेखक के कार्य को सराहा है। अप्रकाशित होने के कारण कुछ रचनाएं इस ग्रन्थ में नहीं आ सकी हैं, अतः वे अभी भी अनुसन्धेय हैं। इस पुस्तक में दस अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जीवन-दर्शन, द्वितीय अध्याय में संस्कृत की अनूदित काव्य परम्परा, तृतीय अध्याय में अनूदित काव्यधारा में श्रीमद्रामचरितमानसम् का समीक्षात्मक अध्ययन, चतुर्थ अध्याय में स्तुतिकुसुममाला का समीक्षात्मक अध्ययन, पंचम अध्याय में सौन्दर्यसप्तशती का समीक्षात्मक अध्ययन, षष्ठ अध्याय में अनूदित कवितावली का समीक्षात्मक अध्ययन, सप्तम अध्याय में अनूदित वैदिक सूक्तों का तुलनात्मक अध्ययन, अष्टम अध्याय में मौलिक लघुकाव्यों का परिचय तथा विवेचन, नवम अध्याय में अनूदित लघुकाव्यों का परिचय तथा विवेचन, दशम अध्याय में हिन्दी साहित्य के अनूदित काव्यों का परिचय तथा विवेचन दिया गया है। अन्त में उपसंहार और सन्दर्भ ग्रन्थ सूची हैं। सारस्वत साधक पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के व्यक्तिपक्ष और कृतिपक्ष से परिचय कराने में यह ग्रन्थ नितान्त उपादेय है।


डॉ नौनिहाल गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा

वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा


पुस्तक- वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा
लेखक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- सत्यम् पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-93-85981-97-5
पृष्ठ संख्या- 505
अंकित मूल्य- 1100रू.
संस्करण- 2018 प्रथम

कवि- संस्कृत वाङ्मय के गंभीर अध्येता और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना कर साहित्य की श्रीवृद्धि की है। उन्होंने गुरुओं से शास्त्रों का विधिवद् अध्ययन किया था। उन्होंने परम्परागत अध्ययन करते हुए शास्त्री, आचार्य, काव्यतीर्थ उपाधियाँ प्राप्त कीं। अध्ययन हेतु काशी वास के समय उन्होंने स्वामी करपात्री जैसी विभूतियों को देखा-सुना था। कुछ समय उन्होंने संसार से विरक्त होकर यायावर जीवन जिया था। सागर लौटकर उन्होंने आधुनिक पद्धति से इण्टमीडियट, बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. उपाधियाँ प्राप्त कीं। इस प्रकार उन्होंने परम्परागत एवं आधुनिक दोनों विधाओं में अध्ययन किया था। महापुरुषों की संगति और सत्साहित्य के अध्ययन का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे स्वयं अपने मन, वचन और कर्म से शास्त्रीय आचार का पालन करते थे। धवल धौत वस्त्रों से परिवेष्टित सुदृढ दीर्घ काया उनके व्यक्तित्व को उभारती थी। उनके व्यक्तित्व में भारतीय संस्कारों की गहरी छाप थी। उनका आचरण एवं व्यवहार शास्त्रीय आचारों से अनुशासित था। गौ सेवा और गोदुग्ध का पान उनकी जीवन चर्या के आजीवन अभिन्न अंग रहे। संस्कृत सेवा हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और रामचरितमानस के संस्कृत पद्यानुवाद हेतु साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं, जो उन्हें मिले।



पुस्तक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 1964 में डॉ. वनमाला भवालकर के निर्देशन में पीएच.डी. उपाधि हेतु ‘वैष्णवपुराणों में आचार-समीक्षा’ शोधप्रबन्ध प्रस्तुत किया था। इसे पुस्तकाकार में 2018 में प्रकाशित किया गया है। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का प्राक्कथन, प्रो. कुसुम भूरिया की शुभाशंसा, प्रो. रमाकान्त पाण्डेय का पुरोवाक्, डॉ. धर्मेन्द्र कुमार सिंहदेव की शुभाशंसा, संपादक डॉ. ऋषभ भारद्वाज का निवेदन और पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जीवन-परिचय दिया गया है। इस पुस्तक में बारह अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में पुराण समालोचना, द्वितीय अध्याय में आचार समालोचना के अन्तर्गत आचार की परिभाषा और महत्त्व आदि हैं। तृतीय अध्याय में सदाचार के प्रेरक तत्त्वों का निरूपण है। चतुर्थ अध्याय में आचार के मूल तत्त्वों में सत्य, अहिंसा, शौच, अस्तेय, दम या मनःसंयम या इन्द्रिय संयम, दया, अनसूया, अकाम, अक्रोध और अलोभ का निरूपण है। पंचम अध्याय में वर्णों के आचार के अन्तर्गत वर्णों के आचारों को प्रोत्साहन, चारों वर्णों के आचार, आचारों से वर्णों का उत्थान, आचार के उत्कर्ष से अन्य जन्म में भी उच्च वर्ण प्राप्ति, कुत्सित आचारों से उच्च वर्ण से पतन, वर्णों का परस्पर व्यवहार और शिष्टाचार का निरूपण है। शष्ठ अध्याय में ब्रह्मचर्याश्रम के आचार के अन्तर्गत अध्ययन में आचार की आवश्यकता, ब्रह्मचारी के नित्य आचार, ब्रह्मचर्य साधन के नियम और ब्रह्मचारी के गुण आदि का निरूपण है। सप्तम अध्याय में वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के आचार के अन्तर्गत वानप्रस्थ को तप का महत्त्व, यम, नियम और योगादि आचार, संन्यास ग्रहण को अपेक्षित आचार, संन्यासियों के विभाजन में आचार का महत्त्व, संन्यासी का सांसारिक आचार, चिन्तन, अव्यक्त लिंग संन्यासी, परोपकार आदि का निरूपण है। अष्टम अध्याय में गृहस्थाश्रम के नित्य आचारों का निरूपण है। इसमें गृहस्थाश्रम का आचार की दृष्टि से महत्त्व, शौचादि कृत्य, देवपूजन, पंच महायज्ञ, भोजन, अर्थोपार्जन और शयन आदि को बताया गया है। नवम अध्याय में गृहस्थाश्रम के पारिवारिक आचार तथा सामान्य शिष्टाचार हैं। इसमें आचार पालन में दम्पती, गृहिणी के कर्तव्य, माता पिता के प्रति पुत्रों का आचार, परिवार में पुरुष वर्ग का नारी के प्रति कर्तव्य, रक्षण, आदर, अवध्यता, सामाजिक सच्चरित्रता, पुरुष वर्ग की सच्चरित्रता, गृहस्थ के सामान्य शिष्टाचार और निषिद्ध आचार, गृहस्थ के रहन-सहन वेष-भूषा आदि का वर्णन है। दशम अध्याय में संस्कार, मृत्यु, श्राद्ध, प्रायश्चित्त संबंधी नैमित्तिक आचार  हैं। एकादश अध्याय में अन्य नैमित्तिक व आध्यात्मिक आचारों का निरूपण है जिनमें यज्ञ, दान, पूर्त, व्रत, तीर्थ, आध्यात्मिक आचारों का वर्णन है। द्वादश अध्याय में उपसंहार है। अन्त में आधार ग्रन्थ सूची दी गयी है। द्विवेदी जी दूरूह विषयों को भी सरल रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। वैदिक साहित्य, धर्मशास्त्र, आर्षकाव्य, पुराण साहित्य और अन्य ग्रन्थों के सन्दर्भों से यह ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक तथा उपादेय बन गया है। विभिन्न प्रकार की कुण्ठाओं और अतिचार से पीड़ित समाज को प्रामाणिक शास्त्रीय मार्ग दिखाने में समर्थ यह ग्रन्थ नितान्त उपयोगी होने से पठनीय और संग्रहणीय है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने इसके प्राक्कथन में लिखा है कि ‘इस कृति में उन्होंने वैष्णव पुराणों में प्रतिपादित आचारों की सर्वांगीण विवेचना तो की ही है, सदाचार के प्रेरक तत्त्वों तथा मूल तत्त्वों की गवेषणा भी करते हुए आचारमूलक जीवन के निष्कर्ष तथा ध्येयों की भी पहचान करायी है।’

डॉ नौनिहाल गौतम
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

तुलसीदास कृत हनुमद्बाहुक का संस्कृत रूपांतरण -श्रीमद्हनुमद्बाहुकम्

तुलसीदास कृत हनुमद्बाहुक का संस्कृत रूपांतरण -श्रीमद्हनुमद्बाहुकम्


पुस्तक- श्रीमद्हनुमद्बाहुकम्
अनुवादक- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- एजुकेशनल बुक सर्विस, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-81-86541-28-4
पृष्ठ संख्या- 55
अंकित मूल्य- 150रू.
संस्करण- 2018 प्रथम

कवि- भक्ति साहित्य के गंभीर अध्येता और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना की है जिनमें अधिकांश हिन्दी कवियों के काव्यों का संस्कृत पद्यानुवाद है। पं. द्विवेदी संस्कृत काव्य परम्परा के गंभीर अध्येता थे लेकिन उन्होंने हिन्दी  भक्ति साहित्य का भरपूर आलोडन किया था। काशी वास के समय उन्होंने स्वामी करपात्री जैसी विभूतियों को देखा-सुना था। कुछ समय उन्होंने संसार से विरक्त होकर यायावर जीवन जिया था। शास्त्रज्ञान के साथ ही वे तैराकी और मल्लविद्या में दक्ष थे। धवल धौत वस्त्रों से परिवेष्टित सुदृढ दीर्घ काया उनके व्यक्तित्व को उभारती थी। गौसेवा और गोदुग्ध का पान उनकी जीवन चर्या के आजीवन अभिन्न अंग रहे। संस्कृत में अनुवाद करना उन्हें अच्छा लगता था, यही उन्होंने जीवन भर किया भी। भारतीय ज्ञान-परंपरा के मौन साधक द्विवेदी जी की अनुवाद कार्य में प्रवृत्ति ‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा’ की तरह थी। उनका अधिकतर साहित्य मृत्यूपरांत प्रकाशित हुआ। राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं जो उन्हें मिले।



पुस्तक- श्रीमद्हनुमद्बाहुकम् में भूमिका के रूप में सम्पादक डॉ. ऋषभ भारद्वाज का निवेदन और कवि-परिचय है। द्विवेदी जी ने तुलसीदास जी के प्रायः सभी काव्यों का अनुवाद किया है। उनमें से एक है-  हनुमद्बाहुक। इसके अनुवाद के अन्त में द्विवेदी जी ने गोस्वामी तुलसीदास के प्रति श्रद्धा प्रकट की है। इस पुस्तक में पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत पद्यानुवाद, उसके नीचे गोस्वामी तुलसीदास के हनुमद्बाहुक का मूल पाठ और फिर हिन्दी भावार्थ दिया गया है। इसमें पाठक मूल हिन्दी पाठ, संस्कृत पद्यानुवाद और हिन्दी भावार्थ का एक साथ आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। द्विवेदी जी की भी भावना इसी प्रकार के द्विभाषी (मूल व अनुवाद एक साथ) संस्करण की रही होगी। आस्था तर्क से परे हुआ करती है। स्वयं द्विवेदी जी ने इसके पाठ को कष्टनिवारण का साधन बतलाया था। भावपूर्ण मन से इसका उच्चारण एक अपूर्व ऊर्जा का संचार करता है। मल्लविद्या के अभ्यासी होने के कारण उनका श्री हनुमान् जी महाराज के प्रति आस्थावान् होना स्वाभाविक ही है। अनुवाद के लिए चुने गये काव्य भी अनुवादक की साहित्यिक रुचि को प्रकट करते हैं। द्विवेदी जी के अनुवाद में मूल काव्य का रसास्वाद किया जा सकता है। पद्यानुवाद में गेयता है। कहीं कहीं मूलकाव्य की लय में ही अनुवाद को भी पढ़ा जा सकता है। संस्कृत के विशाल शब्दकोष के ज्ञान से द्विवेदी जी के लिए अनुवाद कार्य सुकर रहा। साहित्यरसिक अनुवाद और मूलकाव्य देखें।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

सगौरीकः सानुचरः शूलपाणिर्लोकपालाः
सीतारामलक्ष्मणाश्च सदानुकूलास्तस्य
लोकस्य परलोकस्य कस्यापि भूमिपालस्य
तुलसी वदति हृदये लालसा न तस्य।
बन्धमोक्षस्वामिनः करुणामहार्णवस्य
केशरिकिशोरकस्य कृपया कपीशस्य
देवसिद्धमुनयस्तं बालमिव लालयन्ति
यस्य हृदि हनुमतो हुंकारो वायुपुत्रस्य।।
 श्रीमद्हनुमद्बाहुकम्, छन्द 13

मूल पाठ-

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, 
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी।
केसरीकिसोर बंदीछोरके नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की।
बालक ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, 
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की।।

डॉ नौनिहाल गौतम

असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

रेडियोनाटक संकलन - डॉ. हरिराम आचार्य कृत पूर्वशाकुन्तलम्

कृति- पूर्वशाकुन्तलम्
लेखक - डॉ. हरिराम आचार्य
विधा - रेडियो नाटक
प्रकाशक - हंसा प्रकाशन, जयपुर
संस्करण -प्रथम, 2002
पृष्ठ संख्या - 100
अंकित मूल्य - 100 रू.

               आधुनिक संस्कृत नाट्य साहित्य का फलक इतना विस्तृत है कि उस पर नैक विधाओं रूपी चित्रों को उकेरा गया है। 19 वीं सदी के आरम्भ में पारसी थियेटर का प्रभाव, सूचना-क्षेत्र में क्रान्ति, विश्व साहित्य का सम्पर्क आदि कई कारणों के चलते संस्कृत नाट्य साहित्य में कई नवीन विधाओं ने प्रवेश किया, यथा- नुक्कड-नाटक, गीतिनाट्य, नृत्यनाटिका, संवादमाला, रेडियो रूपक आदि। अब नाट्य रंगमंच की परिधि में खेले जाने वाला खेल मात्र नहीं रह गया है अपितु यह अपनी सीमाओं को त्यागकर सर्वथा मुक्ताकाश में विचरण कर रहा है।
     संचार माध्यमों के क्षेत्र में जब रेडियो का आविष्कार हुआ तो नाट्यकारों को अपने नाट्यों की प्रस्तुति के लिये एक नया मंच मिल गया। इस प्रकार रूपक साहित्य में युगानुरूप रेडियो रूपक नामक विधा का अवतार सम्भव हो पाया। रेडियो रूपको के कारण नाट्य दृश्य से श्रव्य कि ओर उन्मुख हुआ क्योंकि रेडियो पर संवादों के श्रवण मात्र से नाटक की प्रस्तुति दी जाती है। इस प्रकार इस विधा में संवादों का अत्यन्त महत्त्व है। नाट्य की इस विधा में वाचिक अभिनय पर बल दिया जाता है। प्राचीन आचार्यों ने रूपकों के लिये वस्तु, नेता और रस नामक  तीन तत्त्व बतलाये हैं, उन्हीं में ध्वनि नामक एक और तत्त्व रेडियो रूपकों के लिये जोड दिया जाता है। आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले इन ध्वनि प्रधान संवादात्मक रूपकों को रेडियो रूपक, ध्वनिनाटक, ध्वनिरूपक, नभोवाणी नाट्य, श्रव्यनाटक आदि भी कहा जाता है। संस्कृत नाट्यकारों ने अन्य भारतीय भाषाओं में प्रचलित इस विधा से प्रेरणा प्राप्त कर संस्कृत में कई रेडियो रूपकों की रचना की तो अभिराज राजेन्द्र मिश्र, रहस बिहारी द्विवेदी जैसे अर्वाचीन काव्यशास्त्रियों ने इसके लक्षण भी प्रस्तुत किये। संस्कृत में मौलिक और अनूदित दोनों ही प्रकार के रेडियो रूपक उपलब्ध हैं।

पूर्वशाकुन्तलम् - डॉ. हरिराम आचार्य जयपुर में निवास करते थे। आप संस्कृत, हिंदी, प्राकृत, उर्दू, राजस्थानी आदि भाषाओं के जानकार थे | गौरतलब है कि डॉ. हरिराम आचार्य ने फिल्मों के लिए भी गीत लिखे|  गम-ए-दिल किस से कहूं, कोई भी गमख्वार नहीं' जो मुकेश ने गाया था, उसे सुनकर आलोचकों को हैरानी हुई।  आपने  'भूल न जाना' (1971), मेहंदी रंग लाएगी (1981), बवंडर (2000) फिल्मों के लिए हिन्दी और उर्दू में गीत लिखे। 

आपके द्वारा रचित अनेक संस्कृत काव्यों में मधुच्छन्दा, नचिकेतकाव्यम्, पूर्वशाकुन्तलम् प्रसि़द्ध रहे हैं। पूर्वशाकुन्तलम् सात एकांकियों का संकलन है, जो अपनी शैली के कारण रेडियो रूपक हैं। ये सब रेडियो रूपक मौलिक हैं, रूपान्तरित नहीं। नाट्यकार ने ये रूपक आकाशवाणी केन्द्र जयपुर से प्रसारण के लिये लिखे थे, बाद में इनका संकलन कर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करवाया गया। डॉ. हरिराम आचार्य ने ध्वनि-रूपक-विधा के आविष्कार और उसके लक्षणों पर भी विचार किया है। इन सात रेडियो रूपकों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

1.पूर्वशाकुन्तलम् - यह महाभारत के शकुन्तला उपाख्यान पर आधारित है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के प्रथम अंक में अनसूया-दुष्यन्त संवाद के द्वारा शकुन्तला के जन्म का वृतान्त ज्ञात होता है, अतः इसका नामकरण पूर्वशाकुन्तलम् किया गया है। कुशिकवंशी राजर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका वृतान्त और शकुन्तला की उत्पत्ति  और कण्व को शकुन्तला की प्राप्ति तक का कथानक इसमें वर्णित है। यहां मेनका का वात्सल्य प्रकट होता है-

मेनका- मा रोदीः वत्से (सपुच्चकारम्) अलं अलं क्रन्देन। त्वं मे हृदयम्, त्वं मे प्राणाः, त्वं में उत्संग-रत्नम्, त्वं सौभाग्यमणिः, त्वां प्रसूय अयं मम अपराधोऽपि पुण्यरूपेण परिणतः। वत्से। पुत्रिके। (वत्सा पुनः रोदिति) अले-ले-ले-पश्य, अयं मयूरः, अयं शुकः, इयं सारिका, अयं चित्रमृगः

2.गंगालहरी - पण्डितराज जगन्नाथ एवं लवंगी से सम्बद्ध कथा को आधार बनाकर यह रूपक रचा गया है। दाराशुकोह के गुरु एवं संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान्  पं. जगन्नाथ यवनी कन्या लवंगी के प्रेम में आसक्त होकर उससे विवाह करते हैं तो वे काशी के अप्पय दीक्षित प्रभृति विद्वानों के कोप के भाजन बनते हैं। पं. जगन्नाथ पर यवनी-संसर्ग-दूषित का आक्षेप लगाया जाता है। लवंगी के द्वारा आत्महत्या करना, पं. जगन्नाथ द्वारा गंगाजल में विसर्जन के लिये लवंगी के शरीर को ले जाना, धार्मिकों द्वारा रोकना, 52 सीढियों के ऊपर बैठकर गंगालहरी की रचना करना आदि वर्णित है। दाराशुकोह और पं. जगन्नाथ के वार्तालाप में नाट्यकार कहते हैं-

दाराशिकोह- यवनभाषासंसर्गेण दूषिताः मा भवेयुरिमे पवित्रा मन्त्राः।
जगन्नाथ- मंत्रस्तु स्यमेव पावनः भवति। अपि च, न  काऽपि  भाषा अस्पृश्या सदोषा त्याज्या वा। एतैः संकीर्णैः विचारैः मा करु कलुषितं स्वचित्तम्। 

3.न हि भोजसमो नृपः - धारा नगरी के राजा का चरित न जाने कितनी किंवदन्तियों से भरा पडा है। राजा, कवि, पण्डितों के आश्रयदाता, सहृदय मित्र न जाने कितने रूपों में भोज हमारे सामने आते हैं। बल्लालसेन ने तो भोजप्रबन्ध ग्रन्थ में महाकवि कालिदास को भी उनकी सभा का रत्न बताया है।एक किंवदन्ती के अनुसार किसी बात के कारण कालिदास भोज के राज्य से निर्वासित होते हैं। फिर भिक्षुवेश वाले राजा भोज से कालिदास सुनते हैं कि भोज दिवंगत हो गये तो पुनः किस प्रकार उनका मिलन होता है, यह इसमें वर्णित किया गया है-

अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवंगते।।

वेश्या विलासवती व कालिदास के वार्तालाप के व्याज से नाट्यकार वेश्याओं के विषय में समाज को उद्घाटित करते हैं-

विलासवती - नैव नाथ! केवलम् एका क्षुद्रा गणिका अस्मि, रूप -यौवन-विक्रेत्री पण्यस्त्री.................
कालिदास-विलासवति! पाप-पंकिला दोषदूषिता हि तेषां दृष्टिः, ये खलु अपूर्वसौंदर्यविभूषितायाम् अपि त्वयि केवलं वारांगनां पश्यन्ति

4 आषाढस्य प्रथम-दिवसे - पद्मपुराण में वर्णित हेममाली यक्ष व विशालाक्षी यक्षिणी की कथा तथा कालिदास रचित मेघदूत को आधार बनाकर इस रूपक की रचना की गई है। यहां यक्ष की दशा जानकर कुबेर उसे क्षमा कर देते हैं, पुष्पकविमान  से यक्ष अलकापुरी आता है और यक्षिण से उसका पुनर्मिलन हो जाता है।

5. सत्यमेव जयते - रामायण के युद्धकाण्ड की कथा व रावणवध को इस रूपक में विशेषरूप से निबद्ध किया गया है।

6. वेताल-कथा- सोमदेव रचित कथासरित्सागर में वेतालकथा पद्यबद्ध दी गई है। उनमें 25 वीं कथा को आधार बनाकर यह रूपक रचा गया है।

7. नेत्रदानम्- इस एकांकी में शुभा नामक बौद्धभिक्षुणी की कथा वर्णित है, जिसके सौन्दर्य से आकर्षित होकर ब्रह्मपुर नरेश काममोहित हो जाता है। वह उसके सुन्दरनेत्रों की प्रशंसा करता है। उसकी सौन्दर्यपिपासा को शान्त करने के लिये शुभा अपने नेत्र निकालकर उसे दे देती है और मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। उपगुप्त नामक भिक्षु पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहे राजा को सान्त्वना देकर तथागत की शरण में जाने के लिये प्रेरित करता है। 


Wednesday, June 3, 2020

अर्वाचीनसंस्कृतम्-संस्कृत पत्रिका

अर्वाचीनसंस्कृतम्-संस्कृत पत्रिका

प्रकाशनकालावधि - त्रैमासिक
प्रधानसम्पादक-डॉ. रमाकान्त शुक्ल
संयुक्तसम्पादक-डॉ. अभिनव शुक्ल
प्रकाशनस्थान- नयी दिल्ली
प्रकाशक-डॉ.रमाकान्त शुक्ल
प्रकाशक का पता-देववाणी परिषद् दिल्ली, आर्-6, वाणी विहार, नयी दिल्ली
प्रकाशक का सम्पर्क सूत्र- arvacheenam@gamil.com 
मोबाइल नम्बर- 9560532392
शुल्क-100 रू. वार्षिक


अर्वाचीन संस्कृत के प्रचार-प्रसार  में संस्कृत पत्र-पत्रिकाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। संस्कृत पत्र-पत्रिकाओं के इस योगदान को रेखांकित करते हुए डॉ. बलदेवानन्द सागर तथा डॉ. लालाशंकर गयावाल ने महत्त्वपूर्ण शोधकार्य किये हैं। आज भी अर्वाचीन संस्कृत के क्षेत्र में होने वाले शोधकार्यों में शोधार्थी इन पत्र-पत्रिकाओं से  बहुत सहायता प्राप्त करते हैं। ये पत्र-पत्रिकाएं एक तरह से अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास के दस्तावेज हैं। दैनिक समाचारपत्रों से लेकर वार्षिक पत्रिकाओं तक संस्कृत पत्र-पत्रिकाओं की सुदीर्घ सूची है।

        अर्वाचीनसंस्कृतम् एक ऐसी ही पत्रिका है जो प्रकाशित सामग्री के कारण अपना अन्यतम स्थान रखती है। देववाणी परिषद्, दिल्ली से इसका प्रकाशन निर्बाध रूप से हो रहा है। प्रधानसम्पादक डॉ. रमाकान्त शुक्ल के अथक प्रयासों से यह पत्रिका 42 वर्षों से प्रकाशित हो रही है। इसके अभी तक 167 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। हाल ही में इसका 164 से 167 का संयुक्तांक आया है, जो जनवरी 2020 से अक्टूबर 2020 की अवधि का है।  इस प्रकार इस पत्रिका के अंक निर्धारित कालावधि के पूर्व ही प्रकाशित हो जाते हैं। इस संयुक्तांक में 500 पृष्ठ हैं। यह पत्रिका न केवल काव्यों से समृद्ध होती है अपितु इसमें उत्कृष्ट शोधपत्र, नवप्रकाशनर्चा, संस्कृतजगद्वार्ता, देववाणी-परिषद्वार्ता आदि स्तम्भ भी समाविष्ट होते हैं। अर्वाचीनसंस्कृतम् पत्रिका में कई महत्त्वपूर्ण संस्कृत काव्य एवं ग्रन्थ भी प्रकाशित हुए हैं, जैसे- डॉ. रमाकान्त शुक्ल कृत भाति मे भारतम्, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी कृत समष्टिः, आचार्य शिवदत्त शर्मा कृत आर्यार्णवः, डॉ. अभिनव शुक्ल लिखित श्रीधरभास्करवर्णेकरकृत श्रीशिवराज्योदयम् महाकाव्य का साहित्यशास्त्रीय अध्ययन   आदि।

प्राच्यविद्याशताब्दीयम् -

                        वर्तमान अंक में डॉ. रमाकान्त शुक्ल रचित प्राच्यविद्याशताब्दीयम् नामक ग्रन्थ 260 पृष्ठों में संकलित है। इसके चार खण्ड हैं- प्राच्यविद्याधिवेशनम्, प्राच्यविद्याशताब्दीयं नागपूराधिवेशनम्, अध्यक्षीयभाषणानि, अ.भा.प्राच्यविद्यासम्मेलनस्य पञ्चाशत्तमेऽधिवेशने पठितो लेखः। प्रथम खण्ड में 475 श्लोक हैं, साथ ही प्राच्यविद्याधिवेशन के पुराने चित्रों के माध्यम से इसे रोचक बनाया गया है। द्वितीय खण्ड में 268 श्लोक हैं और साथ में नागपुर में हुए प्राच्यविद्याधिवेशन से सम्बद्ध चित्र भी योजित किये हुए हैं।  तृतीय व चतुर्थ खण्ड में डॉ. रमाकान्त शुक्ल द्वारा प्राच्यविद्याधिवेशन के अवसरों पर दिये गये भाषण व लेख हैं, जो अपने - आप में अर्वाचीन संस्कृत साहित्य का पूरा लेखा-जोखा हैं। ये लेख शोध करने वालों के नितान्त उपादेय हैं।

कोराना-रचनावलिः -   
                     संस्कृत समाज में सर्वादृत एवं समादृत यह पत्रिका विशेष रूप से समसामयिक रचनाओं के प्रकाशन के लिये जानी जाती है। कारगिलयुद्ध हो कि निर्भयाकाण्ड, जो भी घटनाक्रम हमारे मानव समाज को प्रभावित करता है, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जो काव्य प्रस्फुटित होता है, वह प्रथमतया अर्वाचीनसंस्कृतम् पत्रिका में ही अवकाश पाता है। वर्तमान में कोराना नामक वायरस के चलते सम्पूर्ण विश्व पीडित है। संस्कृत रचनाकार भी इससे कैसे अछूता रह सकता है। उसने कोराना पर भी काव्य रचे, उन्हीं को संकलित करके इस अंक में प्रकाशित किया गया है। प्रायः 182 पृष्ठों में कोराना पर आधारित काव्यों को कोराना-रचनावलिः के नाम से प्रकाशित किया गया है। इसमें 27 कवियों की रचनाएं संकलित हैं।  इस रचनावलि के आरम्भ में  अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित कोरानाशतकम् प्रस्तुत है। जिसमें वे सीधे चीन देश को इसका जिम्मेवार ठहराते हुए वहां की खानपान की शैली पर आपत्ति दर्ज करते हैं-

अपक्वः खलु यो मांसः पिशितं हि तदुच्यते।
अश्नन्ति पिशितं ये वै पिशाचाश्चैव ते मताः।।
चीना दृष्ट्या तया नूनं पिशाचा एव मानिताः।
यतः कृशानुकल्पास्ते दृश्यन्ते सर्वभक्षिणः।।

डॉ. माधव देशपाण्डे कृत कोरोना-विडम्बन-शतकम् अंग्रेजी अनुवाद के साथ दिया गया है। हास्य-व्यंग्य पूण विडम्बन शैली में यह लिखा गया है-

न पाणिग्रहणं कुर्यां यावत्स्पर्शभयं मम।
इत्युक्त्वा निर्गतः कोऽपि मण्डपात् सत्वरं वरः।।

Saying “I will not take your hand as long as I am scared of touch,” the groom quickly eñited the wedding hall.


डॉ. निरंजन मिश्र कृत जय जय चीनसुते, डॉ. अरविन्द तिवारी रचित कोरोनादण्डकम्, डॉ. नवलता रचित कोरोनोन्मूलक्रतुः जैसी रचनाएं समसामयिकता के साथ कोरानाकाल के मानव समाज पर पडे प्रभाव को व्यक्त करती हैं। डॉ. रामविनय सिंह तो कोराना पर एक गजल ही रच देते हैं-

परीक्षा जीवनस्यैषाऽवलोक्या।
युगान्धैर्वादिता वाद्याऽवलोक्या।।
स्वगेहे देवता अपि निस्सहायाः,
करोना पिशाची प्रबलाऽवलोक्या।।

डॉ. रमाकान्त शुक्ल की आशावाहिनी दृष्टि इस काव्य में दृष्टिगोचर होती है जो हम सब को इस काल में आश्वस्त करती है-

भूमिभारो यदाधिक्यभावं व्रजेत्
स्यात्प्रकृत्याः प्रकोपः प्रवृद्धस्तदा।
भूमिमातुः सपर्यां कुरुध्वं समे
शान्तिमायास्यतीयं करोणा ध्रुवम्।।





Tuesday, June 2, 2020

ग़ालिबकाव्यम् - दीवाने ग़ालिब का अद्भुत अनुवाद

कृति - ग़ालिबकाव्यम्

मूल - मिर्जा असदुल्लाह खां ग़ालिब
अनुवादक - डॉ. जगन्नाथ पाठक 
प्रकाशक - दाश पब्लिशर्स, इलाहाबाद
संस्करण - प्रथम, 2003
पृष्ठ संख्या- 637
अंकित मूल्य - 630


अर्वाचीन संस्कृत साहित्य को पल्लवित - पुष्पित करने में आर्यासम्राट् डॉ. जगन्नाथ पाठक का अपना विशेष स्थान है। इन्होंने कापिशायनी, मृद्विका, पिपासा, विच्छित्तिवातायनी, आर्यासहस्ररामम्, जगन्नाथसुभाषितम्, आदि अनेक रचनाओं का सृजन कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाया है। जगन्नाथ पाठक को न केवल संस्कृत भाषा पर अपितु हिन्दी, उर्दू, फारसी, प्राकृत आदि भाषाओं पर भी पूर्ण अधिकार प्राप्त है। उनकी रचनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि भारतीय संस्कृति की प्राणभूता संस्कृत भाषा में युगोपरान्त भी वही ग्रहण क्षमता है जो शाश्वत जीवन मूल्यों को अपनी ऊर्जा प्रदान कर रही है।

          ग़ालिबकाव्यम् डॉ. जगन्नाथ पाठक का प्रथम प्रकाशित अनूदित काव्य है। इसमें उर्दू साहित्य के महाकवि मिर्जा असदुल्लाह खां ग़ालिब के दीवाने ग़ालिब की 240 ग़ज़लों का संस्कृत में अनुवाद किया है। पुस्तक के प्रारम्भ में कवि ने 9 श्लोकों में ग़ालिबकाव्यम् की भूमिका प्रस्तुत की है-

पूछते हैं वह, कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ, कि हम बतलाये क्या

ग़ालिब-नामा कोऽसाविति पृच्छन्नास्ति हन्त सैष जनः।
अभिदध्यादिह कोऽपि स्वयमभिदध्याम किन्नु वयम्।।

       किसी भी रचना का अन्य भाषा में अनुवाद बहुत ही कठिन कार्य है। स्वयं जगन्नाथ पाठक लिखते हैं - ग़ालिबकाव्यमिदं दीवानेग़ालिब इत्यस्य आर्याछन्दसि संस्कृतानुवादः। प्रतिपदं गम्भीरस्य काव्यस्यास्य कस्याञिचदन्यस्यां भाषायामनुवादः। सोऽपि पद्यानुवादः। कश्चन दुष्करः प्रयासः।
    यहां ध्यातव्य है कि ग़ालिब की ग़ज़लों का यह अनुवाद आर्या छन्द में निबद्ध है। डॉ. जगन्नाथ पाठक उर्दू की ग़ज़ल को संस्कृत के छन्दों विशेषकर आर्या छन्द में उतारने की कला के पारखी हैं, अतः इन्हें आर्या सम्राट् की उपाधि से भी अलंकृत किया गया है।
ग़ालिब की ग़ज़लों के अनुवाद का एक उदाहरण स्थालीपुलाकन्याय  से उद्धृत है-

नक्श फरियादी है, किसकी शोखि-ए-तहरीर का
कागजी है पैरहन, हर पैकर ए तस्वीर का

काव-ए-काव ए सख्त जानिहा ए तन्हाई, न पूँछ
सुबह करना शाम का, लाना है जू-ए-शीर का

जज्ब:-ए-बे इख़्तियार-ए-शौक देखा चाहिये
सीन:-ए-शमशीर से बाहर है, दम शमशीर का

आगही दाम-ए-शानिदान, जिस कदर चाहे, बिछाये
मुद्द'आ अंका है, अपने आलम ए तक़रीर का

बसकि हूँ, गालिब, असीरी में भी आतश जेर-ए-पा
मू-ए-आतश दीद:, है हल्क: मिरी जंजीर का

संस्कृतानुवाद-
कार्यार्थि कस्य तावद् रचना सौन्दर्यचिह्नमेतदहो।
कार्गदपरिधानधरा सर्वा चित्राकृतिर्भाति।।

मा पृच्छ कष्टमस्मानेकान्ते यापनस्य कठिनस्य।
सन्ध्याप्रभातकरणं दुग्धस्रोतः सभानयनम्।।

प्रबलमस्याकलनं हृदयावेगस्य कार्यमेतर्हि।
खड्गस्य वक्षसो ननु बहिर्गता खड्गधारा हि।।

प्रतिभानं श्रवणाख्यं विधिना केनापि जालमातनुयात्।
तात्पर्यं काल्पनिको रचनाजगतः खगः स्वस्य।।

कारागतस्य वह्निर्ज्वलति ममाङिघ्रद्वयस्य तलदेशे।
ग़ालिबं केशो ज्वलितो मम बन्धनशृंखला तावत्।।

संस्कृत पद्यानुवाद में कवि ने ग़ालिब के भावों को हूबहू उतारा है। प्रत्येक ग़ज़ल के अनुवाद के नीचे अनुवादक ने कठिन शब्दों के अर्थ पाद टिप्पणी में दिये हैं, जिससे उर्दू न जानने वाला पाठक भी ग़ज़लों का आनन्द ले सके।  देवर्षि कलानाथ शास्त्री के अनुसार - ‘‘पाठक जी एक अभ्युक्ति में तो नहीं समेटे जा सकते किन्तु वे संस्कृत जगत् में बांग्ला की भाव प्रवण संवेदना-तरल प्रसन्न शैली और उर्दू के अंदाजे बयां (भणिति-भंगी) का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः उन्हें संस्कृत का ग़ालिब या रवीन्द्रनाथ कहा जा सकता है। पिपासा की गजलों में उर्दू का भावबोध और अन्दाजे बयां पाठक जी के पाठकों को गुदगुदाता रहता था, अब तो उन्होंने ग़ालिब के भाव को आर्याओं के चषकों में उतारकर पूरा मयखाना ही खोल दिया है।’’ डॉ. जगन्नाथ पाठक द्वारा किया गया एक और अनुवाद द्रष्टव्य है-

कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया 
दिल कहाँ कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ' पाया 

इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया 
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया 

दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम 
आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया

सादगी ओ पुरकारी बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी 
हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया 

ग़ुंचा फिर लगा खिलने आज हम ने अपना दिल 
ख़ूँ किया हुआ देखा गुम किया हुआ पाया 

हाल-ए-दिल नहीं मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी 
हम ने बार-हा ढूँडा तुम ने बार-हा पाया 

शोर-ए-पंद-ए-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का 
आप से कोई पूछे तुम ने क्या मज़ा पाया 

संस्कृतानुवाद-
हृदयं यदि चेल्लब्धं क्वचन न दास्यामि तदिति यद् वदसि।
यदपह्रियेत  हृत् क्व त्वदभिमतं तन्मयाऽवगतम्।।

प्राणैराप्तः कोऽपि प्रणयादिह हन्त जीवनानन्दः।
पीडौषधमुपलब्धं पीडा लब्धा त्वसाध्यैषा।।

हृदयं शत्रोर्मित्रं कथमिव कुर्यां नु तत्र विश्वासम्।
प्राप्तुमसक्तो रहितः प्रभावतश्चार्तनादो मे।।

आर्जवमथ चातुर्यं तथाऽऽत्मविस्मृतिरथाप्रमादश्च।
सौन्दर्यमध्युपेक्षं साहससंवर्धकं लब्धम्।।

कलिका पुनः स्फुटन्ती वर्तत एषा, मया निजं हृदयम्।
आहतमासीद् यदितो दृष्टं भ्रष्टञ्च तत्प्राप्तम्।।

नाहं हृदयस्थितिमिह जाने बत किञ्चिदेतदिव जाने।
भूयो मया गवेषितमवाप्तमेतत् त्वया भूयः।।

उपदेशरणरणकतो व्रणे विकीर्णं ममेह लवणमिव।
कोऽपि भवन्तं पृच्छेद् भवता लब्धः किमानन्दः।।

      बच्चूलाल अवस्थी ग़ालिबकाव्यम् के विषय में लिखते हैं कि कवि पाठक ने पहले ग़ालिब के काव्य को पढा। वैखरी की उस अभिव्यक्ति की भावना में उतारा। वहां से उसे अपनी मेधा में ले गये कि वागर्थ की प्रतिपत्ति के समीप पहुंच सके और प्रतिभा के उन्मेष के साथ जो तन्मयता मिली, वह सहृदय रसिक की तन्मयता है जो उसे कविता के मूल तक पहुंचा देती है और वह तल्लीन  होकर जो अद्वैत संवेदना प्राप्त करता है, वहां वह कवि के साथ अभेद प्राप्त करता है। यही चमत्कार है, यही संविद् विश्रान्ति है।

-डॉ. सुदेश आहुजा

सम्पर्कसूत्र- 9413404463

Monday, June 1, 2020

किसानों की कथा - तपस्विकृषीवलम्

कृति - तपस्विकृषीवलम्

विधा - काव्य
लेखक - हरिहर शर्मा अर्याल
प्रकाशक -दिल्ली संस्कृत अकादेमी की आर्थिक सहायता से प्रकाशित
प्राप्ति स्थान - श्रीरामशंकर सांगवेदविद्यापीठम्, कबीरनगर, उ.प्र.
संस्करण - प्रथम, 2000
पृष्ठ संख्या - 62
अंकित मूल्य - 30

       संस्कृत साहित्य में प्राचीन काल से ही दो प्रकार की परम्पराएं प्रचलित रही हैं- एक आभिजात्य परम्परा और दूसरी लोकधर्मी परम्परा । प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपनी  पुस्तक संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा  में संस्कृत की लोकधर्मी परम्परा को विस्तार से सोदाहरण स्पष्ट किया है। आधुनिक संस्कृत साहित्य में इस परम्परा का बखूबी निर्वाह किया जा रहा है।  अब संस्कृत साहित्यकार अपनी प्रतिभा को नख-शिख वर्णन मात्र में ही नहीं खपा रहा है अपितु उसकी दृष्टि  अपने काव्यों में उस समाज पर भी पडती है, जो है तो हमारा अविभाज्य अंग किन्तु सदियों से वह उपेक्षित सा रहा है।

      हरिहर शर्मा अर्याल कृत तपस्विकृषीवलम् सम्भवतः किसानों पर स्वतन्त्र रूप से कन्द्रित  एकमात्र काव्य है। 100 पद्यों के माध्यम से कवि ने किसानों की दशा को अपने काव्य में प्रकट किया है, साथ ही इनका हिन्दी अनुवाद भी स्वयं कवि ने प्रस्तुत कर दिया है। जब काव्य किसानों पर है तो कवि मंगलाचरण के श्लोक में वन्दना भी उन्हीं से सम्बद्ध करता हुआ कहता है कि -

प्रचण्डं सन्तापं स्फुरदसुहरीं शीतलहरीं 
विजित्याऽऽधिं व्याधिं सुखमसुखमेकीकृतवताम्।
स्वयं तापं तापं जगदुदरशापं शमयतां
स केषाञ्चिद्धन्यो बबबततकारो विजयते।।

अर्थात् ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूपों, प्राणों के स्पन्दन बन्द कर देने वाली भयंकर शीतलहरियों, मन की वेदनाओं तथा शारीरिक कष्टों की तनिक भी प्रवाह न करने वाले, सुख एपं दुःख दोनों को समझने वाले तथा स्वयं नानाविध कष्टों को झेलते हुए अखिल जगत् की जनता के भूख की ज्वाला शान्त करने वाले किन्हीं विशिष्ट तपस्वियों का वह ब.....ब........ब......त.........त ओ.............न ओ आदि स्वर धन्य तथा सर्वोत्कृष्ट है।

               दिन-रात को एक समान करके जो सतत अन्न उत्पादन में लगा रहता है, ऐसा किसान तपस्वी ही तो कहा जायेगा। देवता भी किसान की ओर ही आशा भरी दृष्टि लगाये रखते हैं-

अहो! स्वाहोच्चारैर्वितरितबलिं लब्धुमनसां
त्वदन्नायत्तानाममरनिकरणामयि! दृशः।
घृताचीं चुम्बन्ति क्षणमपि तु ते भूरि सतृषं
श्रयन्ते दोर्मञ्चे नटनपटु-कुद्दालसुषमाम्।। 

अर्थात् कृषक्- तपस्विन्! आश्चर्य है कि स्वाहा मन्त्र उच्चारण पूर्वक दी गई हवि पाने की उत्कट इच्छा वाले तथा तुम्हारे अन्नों के अधीन रहने वाले देवताओं की दृष्टि एक ही क्षण के लिये घृताची अप्सरा की ओर घूमती है, किन्तु दूसरे ही क्षण पुनः सतृष्ण होकर तुम्हारे बाहु रूपी मंच पर नृत्य करते हुए कुदाल की शोभा का स्थिर आश्रय ग्रहण करती है, यह सोचकर कि हमारी तृप्ति के हेतु तो कुदाल से सुशोभित किसान के बाहुयुगल ही हैं |

           कवि अपनी पदावली से पाठक का मन हर लेते हैं। किसानों का वर्णन करते हुए वे अनूठे बिंब भी रचते हैं। एक स्थान पर महानगरों के आवासों तथा किसान की कुटिया की तुलना करते हुए कहते हैं कि महानगरों की तंग गलियां तो दया की पात्र हैं क्योंकि वहां सूरज की किरणों आदि की पहुंच नहीं किन्तु गावं में तो गिरी हुई दीवार वाले किसान के घर में चांद हालिक दम्पत्ति का नर्म सचिव बन बलभी पर उपस्थित हो जाता है-

दयार्हा सा वीथी यदुपरि न सूर्योऽपि दयते, 
जगत्प्राणो नाहो नहि नहि विधुर्नैव प्रकृतिः।
कुटीरः पर्णानां स तु पतितकुड्यो जयति यद्-
रहः साचिव्यं ही वहति वलभीस्थोऽमृतकरः।।

यहां चन्द्रमा के लिये प्रयुक्त अमृतकरः विशेषण कितना उपयुक्त प्रतीत होता है, यही तो कवि की वक्रोक्ति है। काव्य में कहीं पीले सरसों के खेत लहलहाते दिखते हैं तो कहीं गेहूं की फसल देवताओं के रूप में चित्रित है। कहीं किसान के द्वारा जिह्वा के जडता विकार को दूर करने के लिये प्रयुक्त इमली की चटनी, गुड आदि का वर्णन प्राप्त होता है तो कहीं किसान द्वारा बताशे के टुकडे से ही जिह्वा को सरस करने का वर्णन कवि ने किया है, क्योंकि किसान के लिये तो सभी रस समान हैं-

स्मं त्वं त्यक्त्वा तत्त्वधिपुरि बताशैकशकलं 
रसज्ञां दत्त्वाऽज्ञां सरसयसि साधो! समरसः।।

प्रस्तुत काव्य में किसानों की दुर्दशा का वर्णन है तो  गांव की महिमा भी निबद्ध है। फसलों की महक लिये ये पद्य आपको सुवासित कर देंगे बशर्ते आपकी नासिका अभी तक महानगरीय कंकरीट की बू से आप्लावित नहीं हुई हो तो।