Saturday, July 11, 2020

सिनीवाली

कृति - सिनीवाली

विधा - मुक्तछन्दोबद्धकाव्य
लेखक - प्रो. देवदत्त भट्टि
प्रकाशक - शब्दश्री प्रकाशन आगरा
प्रकाशक - प्रथम, 1986
पृष्ठ संख्या - 128

संस्कृत में प्रयोगशील शैली की कविताओं का  संकलन है सिनीवाली । सिनीवाली शीर्षक से ही डॉ. रामकरण शर्मा का भी एक काव्यसंग्रह प्रकाशित है। प्रो. देवदत्त भट्टि रचित ‘इरा’ और ‘सिनीवाली’ काव्य आधुनिक शैली में निबद्ध कविताओं के लिए चर्चित रहे हैं। सिनीवाली मुक्तछन्द में 115 कविताओं का संकलन है। ये सभी कविताएं प्रायः यथार्थवादी दविचारधारा की हैं। कवि कहता है कि मेरे देश में व्यक्तियों का समाज नहीं है अपितु व्यक्तियों की भीड मात्र है-

मम देशे 
जनानां समाजो नास्ति,
जनसंमर्दोऽस्ति।
मद्देशनागरिकाः
मिथः सहानुभूतिं न कुर्वन्ति,
न चापि तेषु सामाजिकता। 
ते तु 
एकस्य जनसंमर्दस्य 
व्यस्ततां कोलाहलं च 
वर्धमानाः 
मिथोऽसंयुक्ताः
तरसा धावन्तः 
जनाः सन्ति
येषां न किंचित् 
सामान्यम्, युक्तं वा।

 
    आधुनिक संस्कृत कवि एक मनुष्य के रूप में  यह स्वीकारता है कि अभी भी उस में पशुता का अंश शेष है ,जो अवसर पाकर यदा कदा बाहर निकल आता है। जब वह किसी असहाय सुन्दरी को देखता है या किसी निर्बल को सहायता के लिए विवश होते देखता है तो आदि युग में लुप्त उस की पूंछ निकल आती है, सींग पुनः उग आते हैं और वह अपने में केवल पशुता को देखता है, जिसे दूर करने में वह चाह कर भी समर्थ नहीं हो पाता-

अहञ्च 
केवलां पशुतामेव 
मयि पश्यामि।
प्रयतमानोऽपि 
अपगच्छन्तीं मानवताम् 
उपसंहर्तुं न पारयामि। 
रहसा मयि 
प्रविशन्तीं पशुताम् 
अपाकर्तुं नालम्,
खिद्ये चात्मवैवश्ये। 

       कवि कहीं सत्य को समझने की चेष्टा करता है (सत्यम्) तो कहीं धर्म के तथाकथित कर्णधारों को धर्म समझाता है (धर्मः)। कहीं वह इस युग की विडम्बनाओं को प्रकट करता है (कोऽयं युगः) तो कहीं व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान राजनीति की परतें उघाडता है (साप्तपदी)। प्रो. भट्टि की बिम्ब योजना अनूठी है। कवि कहता है कि हम तो तुष मात्र शेष धान हैं, जिनमें चावल नहीं बचे या कि हम छिलकों के रूप में बचे हुए फल हैं, जिनके सार को कीडों ने खा लिया है-

तुषमात्रावशेषाः 
शालयः स्मो वयम्,
येषु तण्डुला न सन्ति।
वल्कलावशिष्टानि 
(त्वङ्मात्रावशेषाणि)
फलानि स्मो वयम्,
येषु सारभूतोऽष्ठीलांशः
कीटैर्भक्षितः।।


        प्रेम के विषय में कवि कहते हैं कि प्रेम न तो स्वर है , न शब्द, न प्रतीक्षा है, न देह की भूख। प्रेम तो अनन्त काल से चली आ रही आत्मा की शाश्वत अनुभूति है, आत्म सौन्दर्य का उत्स है, मन की भाषा का मधुर अनुवाद है प्रेम-

प्रेम तु-
अनन्तकालादागताऽऽत्मनः 
अनुभूतिः शाश्वती,
आत्मबोधस्यात्मसौन्दर्यस्य
चोत्सः
मनसो भाषायाः
मध्वनुवादः।।

Thursday, July 9, 2020

कवि की भाव तरंगों का व्यक्तिकरण - लहरीदशकम्

कृति - लहरीदशकम्

विधा - लहरीकाव्य
लेखक - राधावल्लभ त्रिपाठी
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण - प्रथम-1986, द्वितीय-2003
पृष्ठ संख्या -156
अंकित मूल्य - 300 

     अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में प्राचीन काव्यविधाओं के साथ-साथ नवीन काव्यविधाओं में भी रचनाएं लिखी जा रही हैं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्यकारों ने कुछ प्राचीन काव्यविधाओं को नवीन रूप में भी प्रस्तुत किया हैं। ऐसी ही एक काव्यविधा है-लहरीकाव्यविधा। प्राचीन संस्कृत साहित्य में ऐसे खण्डकाव्य उपलब्ध होते हैं जिनमें ‘लहरी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जैसे शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी और आनन्दलहरी, पण्डितराज जगन्नाथ कृत अमृतलहरी, करुणालहरी, सुधालहरी, गंगालहरी आदि। ये लहरीकाव्य प्रायः देवभक्ति पर ही आधरित हैं, जैसे सौन्दर्यलहरी में भगवती त्रिपुरसुन्दरी की, अमृतलहरी में यमुना की, करुणालहरी में विष्णु की तथा सुधालहरी में भगवान् भास्कर की स्तुति है। यही कारण रहा  की संस्कृत साहित्य के इतिहासकारों ने इन काव्यों की गणना स्तोत्र- साहित्य के अन्तर्गत ही की।


                   अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में लहरीकाव्यविधा ने अपना एक पृथक् स्थान बना लिया है। यहां ध्यातव्य है कि अर्वाचीन लहरीकाव्यों में मात्र देवभक्ति ही नहीं की गई है अपितु कवि अनेक विषयों को आधार बनाकर इन लहरीकाव्यों की रचना कर रहा है, जैसे अभिराज राजेन्द्र मिश्र रचित विस्मयलहरी, वेलणकर रचित विरहलहरी, भास्कर पिल्लै रचित प्रेमलहरी, श्रीभाष्यम् विजय सारथी रचित विषादलहरी, श्रीधर भास्कर वर्णेकर रचित मातृभूलहरी आदि। युगानुरुप इस काव्यविधा का लक्षण देने का प्रयास भी आधुनिकसंस्कृत-काव्यशास्त्रियों ने किया है। प्रो. रहसबिहारी द्विवेदी ने लहरीकाव्यविधा का लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहा है-

देवे देशे निसर्गे वा प्रिये वस्तुनि भक्तिमान्।
कविर्यत्कुरुते काव्यं लहरीत्यभिधियते।।
स्वतोऽपि पूर्णपद्यानि चैकस्मिन् विषयेऽन्वितिम्।
दधते तानि काव्येऽस्मिन् कल्लोला इव वारिधौ।।
(दूर्वा पत्रिका, अंक-अपैल-जून 2005,पृष्ठ-94)

         प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र  ने खण्डकाव्य का ही एक भेद लहरीकाव्य को मानते हुए कहा है कि जैसे सागर में लहरियां एक दूसरे के साथ जुडी रहती हैं तथा नाना प्रकार की भंगियों को उत्पन्न करती हुई परस्पर अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार भक्ति एवं शृंगार के सन्दर्भ अथवा अन्यान्य प्रवृत्तियां जब परस्पर भिन्न होती हुई भी मूलभाव को समपुष्ट करती हैं तो उसे लहरीकाव्य कहते हैं-

लहरीकाव्यमप्येतत्  खण्डकाव्यं समुच्यते।
प्रतिपाद्यं यदा काव्ये लहरीसन्निभं भवेत्।।
परस्परं समासक्ता लहर्यो जलधौ यथा।
भंगिव्रगजं जनयन्त्यो यान्त्यद्वैतस्वरूपताम्।।
भक्तिशृंगारसन्दर्भाः काव्येऽन्येऽपि तथा यदा।
भिन्ना: सन्तोऽपि पुष्णन्ति मूलभावं पुनः पुनः।।
लहरीसन्निभा भाषाविच्छितिं जनयन्ति च।
नयनाऽसेचनं भूरि वितन्वन्ति निरन्तरम्।।
(अभिराजयशोभूषणम्,पृष्ठ-224)

        आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी इस सन्दर्भ में कहते हैं कि चेतनारूप समुद्र में भावरूप तरंगे उठती हैं और परस्पर टकराती हैं, उनका व्यक्तीकरण ही लहरीकाव्य है-
 
पारावारे चेतसि उद्गच्छन्ति च मुहुः संघट्टन्ति ।
भावतरंगास्तेषां व्यक्तीकरणं भवेल्लहरी।।
(अभिनवकाव्यालंकारसूत्र,पृष्ठ-338;जगदीश संस्कृत पुस्तकालय, जयपुर)

         लहरीेकाव्य के उपर्युक्त नवीन लक्षणों से स्पष्ट ही है कि लहरीकाव्यों का विषय केवल देव-स्तुति ही न होकर कोई भी भाव हो सकता है., किन्तु यह भाव सम्पुष्ट होकर काव्य में उभरना चाहिए।
           आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रणीत ’लहरीदशकम्‘ आधुनिक लहरीकाव्य-परम्परा में अन्यतम है। इसमें दस लहरीकाव्यों का संकलन किया गया है। कवि ने विषय-वस्तु के आधार पर ही इन लहरियों का नामकरण किया है, यथा-वसन्तलहरी, निदाघलहरी, रोटिकालहरी इत्यादि। कवि ने अपने चेतना समुद्र में उठ रहीं भावतरंगों के व्यक्तिकरण के लिए माध्यम चुनना था और लहरीकाव्य विधा से उत्तम माध्यम कोई और हो नहीं हो सकता था।

         वसन्तलहरी में वसन्त ऋतु का चित्रण परम्परागत संस्कृत कविता से भिन्न है। निरन्तर विनाश की और अग्रसर पर्यावरण एवं सतत् वृद्धि को प्राप्त प्रदूषण के मध्य वसन्त के अवतरण-काल में व्यथित कवि के मन में उठने वाले भाव सहसा यहां कविता का रूप लिए हुए दृष्टिगोचर होते हैं, यथा-

सायं त्ववाप्य समयं भ्रमणाय यातो
गच्छामि निर्जनपथे नतमस्तकोऽहम्।
द्वित्रान् स्थितान् निभृतमत्र विलोकयामि
वृक्षान् विषण्णहृदयानिव सज्जनांस्तान्।।

सायं के समय
निकलता हूँ
निर्जन पथ पर
सिर झुकाएं
घूमने के लिए,
पाता हूँ वहां
दो-तीन वृक्षों को
खडे हो जैसे
खिन्न-मन सज्जन।।

        कवि का भ्रमण के समय सिर झुकाएं निकलना, वहां मात्र दो-तीन वृ़क्षों का विद्यमान होना तथा उनकी उपमा खिन्न-मन सज्जनों से देना स्वयमेव प्रदूषण की सारी कथा प्रकट कर देता है। यहां समसामयिक समस्याएं भी वसन्त-वर्णन के व्याज से प्रस्तुत की गई हैं। ये कविताएं मात्र वसन्त ऋतु की मादकता का वर्णन करने के लिए नहीं लिखी गई हैं अपितु इनके माध्यम से कवि अपने पूरे युग को जी लेता है, यही सच्चे अर्थों में आधुनिकता है।
         कवि नेे एक स्थान पर मेघ की तुलना मंचस्थ नेता से की है जो गरजता तो है किन्तु काम नहीं करता। ऐसी स्थिति में यदि कवि मेघ को दूत बनाए तो कैसे बनाए-

  कुतो यक्षः कुतो मेघः सन्देशप्रापणः कुतः ।
  विच्छिन्नाभ्रविलायं तल्लयं याति मनोजगत् ।।
 
   यदि पर्यावरण की स्थिति ऐसी ही विकृत बनी रही तो सम्भवतः आगामी समय में गरजने के लिए भी मेघ उपलब्ध नहीं होगा।
       एक पद्य में कवि ने अभिनव कल्पना की है-

रोमांचकण्टकैर्जुष्टा तुष्टा वन्या वसुन्धरा ।
लब्ध्वा पर्जन्यसंस्पर्शं समुछ्वसिति कोरकैः।।

 
रोमांच के कांटों से भरी
वन्य-वसुन्धरा
पाकर मेघ का स्पर्श
श्वास ले रही है
पुष्पों की कलियों से।।

      प्रावृट् लहरी में प्रयुक्त श्यामनववधू, पूर्वरंग, परिघट्टना, प्रावेशिकी ध्रुवा, छलितनाट्य आदि शब्दों के प्रयोग से कवि का नाट्यशास्त्रीय ज्ञान भी प्रकट होता है।
         धरित्रीदर्शनलहरी में किसी पथिक द्वारा की गई भारत से जर्मनी तक की यात्रा का वर्णन किया गया है।  कवि ने अपनी हवाई-यात्रा के ही अनुभव यहां काव्य के रूप में प्रस्तुत किये हैं। कवि को कहीं आकाश के मध्य लटका विमान त्रिशंकु के समान लगता है तो कहीं पक्षीराज गरुड के समान। विमान से दिखती पृथिवी का भी हृदयावर्जक वर्णन उपलब्ध होता है। विषयानुरूप कई शब्दों का संस्कृतीकरण भी किया गया है, जैसे-पारपत्र(पासपोर्ट),प्रवेशाधिकार(वीसा),व्योमबाल  (एअरहोस्टेस),यानाध्यक्ष(केप्टन)। यहां मेघदूत की कुछ पंक्तियों का प्रयोग सुन्दर बन पडता है,यथा यात्री को विमान देखकर कवि को वैसा ही अनुभव होता है,जैसा अनुभव मेघ को देखकर यक्ष को हुआ था-

कृत्वा पूर्णं विहितविधिना तं च यात्रोपचारं
शालामन्तः प्रचुरविशदां स प्रविष्टो विशालाम्।
आसीनोऽत्र स्थितमधितलं सम्मुखीनं विमानं
वप्रक्रीडापरिगणितगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।


     यहां ध्यातव्य है कि विमानयात्रा के अनुभवों को कविता के रूप में निबद्ध करने को ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र ने एक नवीन काव्य विधा मानकर उसका नामकरण ‘विमानकाव्य-विधा’ किया है, यथा प्रभाकर नारायण कवेठकर की कविता ‘भूलोकविलोकनम्’, हरिदत्त शर्मा की कविता ‘चल चल विमानराज रे’, ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र रचित ‘विमानयात्राशतकम्’ नामक खण्डकाव्य आदि।
         भारतीय जनता को केन्द्र रख कर कवि ने 50 पद्यों के माध्यम से जनतालहरी में भारतीय गणतन्त्र की वर्तमान स्थिति की भी खबर ली है। भारतीय जनता की स्तुति कवि क्यों कर रहा है, जबकि स्तुति-प्रशस्ति के विषय देवता, महापुरुष आदि अन्य प्राचीन विषय उपलब्ध हैं ही? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए कवि कहते हैं कि हमारे लिए तो भारतीय जनता ही सर्वोपरी है अतः हम उसी की स्तुति कर रहे हैं-

केचिद् भक्तिपरायणा भवभयादर्चन्ति देवांस्तवैः
केचिच्चाटुरताः खलांश्चलधियो नेतृन् प्रभूंछ्रीमतः।
अस्माकं तु निसर्गतः स्थितिलयाविर्भावहेतुः परं
योगक्षेमविधायिनीह जनता राष्ट्रस्य सा स्तूयते।।

         कवि का यह वक्तव्य उचित ही है क्योंकि आधुनिक संस्कृत कवि कोई ऐसा दरबारी कवि नहीं है जो किसी प्रलोभन या विवशता के चलते किसी नेता या तथाकथित महापुरुष की स्तुति करे, अपितु वह तो अपने देश की मिट्टी से जुडे व्यक्ति को ही अपने काव्य का नायक बनाना चाहता है।
            कवि ने यहां उच्चपदासीन नेताओं, अधिकारियों में फैले भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग्य किये हैं। दिल्ली में जाकर बैठ गये किन्तु अपने क्षेत्र की सुध न लेने वाले नेता की उपमा कवि ने दक्षिण दिशा में गये अगस्त्य मुनि के प्राचीन आख्यान से दी है और बेचारी जनता विन्घ्य के समान प्रतीक्षारत है। किन्तु कवि की आशावाहिनी दृष्टि लोकतन्त्र में अब भी बनी हुई है-

होतारो वयमृत्विगस्तु जनताशक्तेर्महासंगमः
सुप्रातः सुदिवाः सुसन्धिसमयः सुश्वा जनो जायताम्।
यज्ञेऽस्मिन् प्रविभज्यतां प्रतिजनं निर्वाचने शासनं
ह्यालोकः प्रसरीसरीतु सुभगश्चालोकतन्त्राध्वनः।।

         उपनिषद् साहित्य में एक स्थान पर अन्न को ही ब्रह्म कहा गया है-‘‘अन्नं वै ब्रह्म’’। यह एक आधिभौतिक सत्य का कथन है क्योंकि अन्न के बिना जीवन निर्वाह सम्भव नहीं हैं। इस के आलोक में ही कवि ने रोटिकालहरी लिखी है, जिसमें रोटी अन्न किंवा ब्रह्म की प्रतीक है-

यद् रसो  वै च सेति श्रुतौ प्रोच्यते
ब्रह्मरूपं तथाऽन्नं  च जेगीयते।
वर्तते सर्वमेतत् तु सर्वंकषं
गूहीतं विस्मृतं रोटिकागौरवम्।।


       प्रतिदिन के व्यवहार में हम भी देखते हैं कि जो भी व्यापार किया जा रहा है उस के मूल में रोटी ही है। अतः यदि रोटी को काव्य का विषय बनाया जाता है तो इसमें कोई दोष नहीं है। रोटी यहां नायिका का रूप ले लेती है, ऐसी नायिका जिसका आस्वाद कितनी भी बार क्यों न लिया जाए, फिर भी वह नये स्वाद वाली ही बनी रहती है(तुलनीय वैदिक पुराणी युवती उषा से)। शकुन्तला दुष्यन्त के लिए अखण्ड पुण्यों का फल हो सकती है किन्तु साधारण मनुष्यों के लिए तो रोटी ही अखण्ड पुण्यों का एकमात्र प्रकृष्ट फल है-

रोटिका राजते पूर्णमुक्ताकृतिः
स्वादिता चापि नित्यं नवास्वादिता।
मानवानामखण्डस्य पुण्यस्य सा
केवलं चैकमस्ति प्रकृष्टं फलम्।।

     कवि ने 55 पद्यों के माध्यम से नर्मदालहरी में नर्मदा नदी की देवी के रूप में स्तुति की गई है। एक स्थल पर ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृग्गोचर होता है, जहां कवि कहता है कि हे नर्मदे! जब सृष्टि समुल्लसित नहीं हुई थी तब भी तुम्हारे जल का पारावार श्वांस ले रहा था-

नो सद् बभूव न किल चापि बभूव वाऽसत्
सृष्टिर्यदा न च समुल्लसिता पुराऽऽसीत्।
निर्वात एव च समुच्छ्वसिति स्म चैकः
शून्यस्य गह्वरगतस्तव वारिराशिः।।



          कवि ने यहां नर्मदा नदी से सम्बन्धित आख्यानों, ऐतिहासिक वृत्तान्तों को भी उद्घाटित किया है, जैसे- बलि-आख्यान, सहस्रार्जुन-आख्यान, रावण का वृत्तान्त, पाण्डवों के वनवास का वृत्तान्त, मण्डन मिश्र का वृत्तान्त आदि। कवि की नर्मदा के प्रति जो भक्ति है वह सर्वत्र अपना प्रवाह बनाए रखती है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कवि ने नर्मदा नदी की संस्कृति को जीया है।

          मानव कहीं भी रहे किन्तु उसमें उसके देश की मिट्टी की सौंधी महक सदैव महकती रहती है। मृत्तिकालहरी में वर्णित मिट्टी अपने देश, गांव की भूमि, जडों की प्रतीक है। प्रत्येक मनुष्य मिट्टी की गोद में पला बडा है। मिट्टी के घर बनाना, खेल-खेल में मिट्टी खा लेना आदि बाल्यकाल की घटनाएं किसके मन को आह्लादित नहीं कर देती हैं? यह लहरी आपको आपके बचपन में ले जाती है, कुछ खट्टी-मिठी यादों को ताजा कर देती है-

प्रधावितं च शैशवेऽत्रमृत्तिकाचितेऽंगणे।
विनिर्मितानि गेहकानि तानि सैकतानि वा।।
अलक्ष्यदन्तकुड्मलाः कुटुम्बिभिर्गवेषिताः।
अभक्षयाम मृत्तिकां तदा निलीय कोणके।।

       कवि ने यहां मिट्टी को अक्षुण्ण बताया है क्योंकि सभी वस्तुओं में निहित यह मिट्टी वस्तुओं के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती, वस्तुओं के भिन्न होने पर भी अभिन्न रहती है। यहां मिट्टी शाश्वत सत्य के रूप में उभर कर सामने आती है। कवि मिट्टी को ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करते प्रतीत होते हैं।
            अद्यापिलहरी में जीवन के सातत्य व गत्यात्मकता का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। यहां 50 पद्य हैं, जिनमें  प्रायः ‘अद्यापि’ पद की आवृत्ति होती है। कवि के अनुसार पद ‘अद्यापि’ की आवृत्ति इस बात की सूचक है कि सम्पूर्ण जटिलताओं के बीच अभी भी आशा व विश्वास बचे हुए हैं। यह लहरी काव्य तमाम विसंगतियों, विडम्बनाओं, निराशाओं के मध्य जीवन में आशा व आस्था की खोज करती है। यह मानव जीवनकी जिजीविषा की प्रतीक है। कवि उस संजीवनस्पर्श को अपने शब्दों से खोज रहा है, जो जीवन के जटिल, कण्टकित मार्गों पर कहीं खो गया है-

स्पर्शः पुरा परिचितो नियतं य आसीत्
संजीवनश्च मनसश्च रसायनं यत्।
लुप्तोऽधुना जटिलजीवनजीर्णमार्गेऽ-
द्यापीह गीर्भिरिह तंच गवेषयामि।।

                यहां कवि कहीें अपने आस-पास के वातावरण की सुध लेते दिखलायी देते हैं तो कहीं पर्यावरण के विनाश के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं। कहीं मन्दिर-मस्जिद विवाद को व्यर्थ बताते हैं तो कहीं शाकुन्तल-कथा को वर्तमान सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बीच भी कवि की जिजीविषा समाप्त नहीं हुई है-

एते भवन्ति पलिता अधिमस्तकं मे
केशास्तथापि विरता न जिजीविषेयम्।
अद्यापि दक्षिणकरस्य दृढो ग्रहो मे
यावल्लिखामि कलमेन च कम्पहीनः।।

            संग्रह के अन्तिम लहरी काव्य प्रस्थानलहरी के 52 पद्यों में कवि ने प्रस्थान वेला का चित्रण किया है। जहां एक ओर कवि अज्ञात को सम्बोधित करते हुए प्रस्थान की वेला में धीरज धरने को कहते है, वहीं दूसरी ओर कवि स्वयं चिन्ताकुल दिखलायी देते हैं-

अग्रे पदं यावदितः प्रकुर्यां
कश्चित् पदं कर्षति मे तु पृष्ठात्।
सिन्धोः प्रवाहो गिरिणेव रुद्धो
नाग्रे प्रयातोऽस्मि न संस्थितोऽहम्।।

   कहीं यह प्रस्थान की वेला महाप्रस्थान के भाव को भी प्रकट करती दृष्टिगोचर होती है-

एषा जरोपैति यमस्य दूती
केशं गृहीत्वा पलितं स्वहस्ते।
शब्दापयन्ती किल कर्णमूले
प्रस्थानवेला नु समागतेति।।
 










Tuesday, July 7, 2020

पत्रदूतम् -पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय

पत्रदूतम् -पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय
 कृति - पत्रदूतम्

लेखक - पं. मोहनलाल शर्मा पांडेय
विधा - ऐतिहासिक खण्डकाव्य
प्रकाशक - पांडेय प्रकाशन, खजाने वालों का रास्ता, जयपुर
संस्करण - 2005
अंकित मूल्य - 80 रु.

         राजस्थान प्रान्त के जयपुर परकोटे में जन्मे, कभी व्यवसाय तो कभी अध्यवसाय, कभी पौरोहित्य तो कभी पाण्डित्य और कभी साहित्य सर्जन के प्रति अनवरत साधना वाग्वादिनी की अनुकम्पा से वाग्वैदग्ध्य के शिखर को चूमने वाले गुणिगुणगुरु कविवर्य पं० मोहन लाल शर्मा  पाण्डेय का स्थान संस्कृत जगत् में अद्वितीय है। मुक्तक रचनाओं के क्रमिक विकास के साथ साथ सम सामयिक सन्दर्भों में पण्डित जी के कवि हृदय के संवेगों से आपूरित किया और इनके भीतर जन्म लेने वाले संवेग का परिणाम है इनका प्रथम काव्य-पत्रदूतम्।


               संस्कृत साहित्य में दूतकाव्यों की एक सुदीर्घ परम्परा का इतिहास रहा है। समय परिवर्तन के साथ कवियों के कथानक भी परिवर्तित हुये हैं। वैदिक और पौराणिक आख्यानों के कथानकों को छोड़कर आज का कवि तात्कालिक समाज में व्याप्त होने वाली कथावस्तु को अपने काव्य में गुम्फित करता है। संस्कृत साहित्य की यह एक ऐसी प्रथम रचना है , जो कि विश्वजनीन एवं सार्वभौमिक बिन्दु को लेकर आगे बढ़ी है, जिसने पौराणिक या आख्यान परम्परा की सीमाओं को लांघकर मुक्त आकाश को देखने का प्रयास किया है।
।

             इस काव्य की कथा का आधार खाड़ी युद्ध है। सन् 1990 में ईराक द्वारा विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत कुवैत पर कब्जा करने तथा अमानवीय कृत्यों की बर्बरता के कारण समूचा विश्व संकटापन्न अवस्था में था। तब अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के साथ ईराक के विरोध करने का दुस्साहस किया। अमेरिका का वायुसेनाध्यक्ष अपने माता-पिता की आज्ञा और प्रिय भार्या के हृदय को कोमल वृत्ति से आप्लावित करने वाले भावों को अपने में सिञ्चित कर प्रस्थान करता है। युद्धगत होने वाले विवरणों और शीघ्र ही मिलन की चिर अभिलाषा में अवगाहन करने वाले कथानकों को पत्र के माध्यम से अपनी प्रिया को प्रेषित करता है। इस कथानक को कवि ने अपनी कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा से रोचक बना दिया है जो सहृदयजनों को अपनी ओर बरबस आकर्षित करता है।

        कवि ने "मंगलादीनि मंगलमध्यानि मंगलान्तानि च शास्त्राणि..." कथनानुसार काव्य की निर्विघ्नता पूर्वक समाप्ति के लिए सर्वप्रथम गणेश, सरस्वती और आद्या शक्ति स्वरूपा दुर्गा का नमस्कारात्मक मंगलाचरण किया है। नायक और नायिका के पाश्चात्य संस्कृति से सम्पृक्त बिम्बपरक चित्रण, मार्ग वर्णन, कुवैत में कुकृत्य, युद्ध की विभीषिका आदि अनेक स्थल कवि के प्रौढ़ पाण्डित्य के अनुपम उदाहरण हैं।



         पाण्डेय जी की यह विशेषता है रही है कि जब वे वर्णन करने लगते हैं तो सम्बन्धित शब्दकोष से जो कुछ चुन सकते हैं ,सहजतापूर्वक चुन लेते हैं और सफलता के साथ  अपने वर्ण्य-विषय से उसे सम्पृक्त कर देते हैं। इसी काव्य में समुद्री चित्रण के प्रसंग में जल-जीवों का चित्रण करते हुए मछलियों की विभिन्न जाति एवं उपजातियों तक के नाम एवं प्रकृति को प्रस्तुत कर देते हैं--

   राजीवान् रोहितान् मद्गुरशकुलतिमीन् शालपाठीननक्रा-
   नुद्रान् शङ्कून्कुलीरान् मकरकमठकान् ग्राहगण्डूपदादीन्।
   श्रृंङ्गीशिल्यादियुक्तान् परमरसमयान् केलिलग्नान् विशालान्
    दृष्ट्वा९तुष्यं विहङ्गानिव सलिलचरान् व्योम्नि नीले समुद्रे।।

  इसी प्रकार जल-जीवों के साथ पक्षियों का भी चित्रण हुआ है। यहाँ कलहंस, राजहंस, बक, कुरर, चक्रवाक, चक्राङ्ग आदि अनेक पक्षियों की जातियों के नाम गिनाये हैं--

  प्रालेयाच्छन्नशैलात् पतितझरजलै: पूरितायां सरस्यां
  कादम्बा राजहंसा बककुररगणाश्चक्रवाका: सुरम्या: ।
  चक्राङ्गा धार्तराष्ट्रा विमलजलचरा: सारसा मल्लिकाक्षा:
  क्रीडासक्ता: प्रियाभिर्विविधकलरवै: प्राहरन् मानसम्मे।।

    कवि अस्त्र-शस्त्रों के वर्णन में भी निपुण हैं--

 रात्रौ राकेटमुक्तै: प्रहरणफलकैर्हेलिकाप्ट्रादियान-
क्षिप्तैरग्निप्रपिण्डैर्विकटभटवरा: सास्रवाहा: सुरङ्गा:।
वह्नेश्चूर्णप्रपूर्णा: प्रहरणततयो वर्मनद्धाष्ट्रकाख्या:
सेनावाहा: प्रणष्टा रिपुदलदमनैर्मित्रसैन्यै: कुवैते॥

  कवि की अद्भुत कल्पना देखने योग्य है कि इस काव्य का नामकरण जिस संज्ञा से अभिधीत किया है उस शब्द का प्रयोग अनूठा है--

युद्धादिष्टीप्सवस्ते निजनिजशिविरं प्रावसञ्जैत्रयोधा: 
सेनाध्यक्षेण तत्र प्रखरमतिजुषा निर्मिता व्यूहभेदा: ।
युद्धाभावादिदानीं बहुसमयवशात् सर्ववृत्तान्तपूर्णं
जीवाधारं प्रियायाः शुभवचनमयं प्रेष्यते "पत्रदूतम्"॥

(सभी सैनिक युद्ध की प्रतिक्षा में, अपने अपने शिविरों में सुसज्जित, युद्ध के लिए प्रस्तुत ,तीक्ष्ण बुद्धि वाले सेनाध्यक्ष द्वारा व्यूह रचना को समझ रहे थे। युद्ध न होने की स्थिति में इस समय अपने समय को व्यतीत करने के लिए सभी सामयिक समाचारों के साथ जीवनाधार प्रियतमा को शुभ वचनों के सहित नायक "पत्रदूत"  प्रेषित कर रहा है।)

    युद्ध विराम होने पर नायक अपने मित्रों के साथ रात्रिभोज और उसमें परोसे गये व्यंजनों का आस्वादन करके अन्त में अपनी प्रिया के सम्भोग में आनन्द के क्षण जीता है। काव्यान्त में कवि अपना वंश परिचय देता है। प्रस्तुत काव्य कुल 121 श्लोकों में स्रग्धरा छन्द में निबद्ध है। स्रग्धरा छन्द इनके लिए इतना सहज हो गया है कि मानों ये स्वयं ही इसके ऋषि रहे हों।

 पाण्डेय जी की भाषा घटनानुसार प्रसादगुणसम्पन्न है किन्तु युद्ध वर्णन में ओजत्व का समावेश स्वाभाविक है। अभिनव शब्दों के प्रयोग के प्रति कवि का काव्य मोह रहा है। यथा- मौरेय:, मुदिरा:, विसारा:, कुवेणी, द्विङ्विराम:, विताता:, जालाहैमा:, गदहरणपदे आदि।

  प्रो० ताराशंकर शर्मा पाण्डेय ने जो योग्य पिता के योग्य पुत्र होने के नाते पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय के सर्वदा प्रमुख सहायक रहे हैं, विषमपदटिप्पणी में उन शब्दों को स्पष्ट किया है जिन्हें पाठक अपने आप में समझने मे कठिनाई का अनुभव करता है।

  काव्य का नायक और नायिका ईसा मसीह के आगे विनम्रता से सिर झुकाकर "वसुधैव कुटुम्बकम्", " सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामयाः" के भाव भरते हैं। कवि की ओर से भरत वाक्य के रूप में काव्य का अवसान होता है।


  • डॉ तारेश कुमार शर्मा
मोबाइल नम्बर - 9810869055
मेल आई डी - kumartaresh82@gmail.com

Wednesday, July 1, 2020

सीताभ्युदयम् नाटक


कृति - सीताभ्युदयम्

विधा - नाटक
लेखक - रामजी उपाध्याय
प्रकाशक - भारतीय संस्कृति संस्थान, महामनापुरी, वाराणसी
संस्करण - प्रथम, 1968
पृष्ठ संख्या - 16+30+38
अंकित मूल्य - 

 
    रामायण हमारे साहित्य में महत्त्वपूर्ण उपजीव्य काव्य के रूप में प्रतिष्ठित है।  अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में रामायण के आधार पर कई काव्य लिखे गये हैं। इनमें से कई काव्यों में सीता को केन्द्र में रखकर भी काव्य रचे गये हैं, यथा रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत उत्तरसीताचरितम्, अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत जानकीजीवनम्। प्रो. रामजी उपाध्याय रचित सीताभ्युदयम् सीताचरितपरक काव्यों में महत्त्वपूर्ण है। यह एक नाटक है, जिसके छः अंकों में सीता की कथा को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। नाटक की प्रस्तावना में ही जब मारिष से सूत्रधार कहता है कि आज काशी के राम नामक कवि के सीताभ्युदय नाटक का अभिनय करना है तो मारिष कहता है कि उसे इस नाट्य के अभिनय में कोई रूचि नहीं है क्योंकि परवर्ती कवि रामायण की उन घिसी-पिटी प्रक्षिप्त कथाओं को भी अपनी कथावस्तु में संजो देते हैं, जो सहृदयों को चुभती है। इस कारण ऐसे काव्यों में नाट्योचित सरसता दिखाई नहीं देती। तब सूत्रधार कहता है कि इस नाटक में कवि ने औचित्य-निष्ठ वक्रोक्ति के द्वारा सभी प्रक्षिप्त कथांशों का संशोधन कर दिया है, नये-नये कथांशों को जोडा है और अनर्गल कथांशों को तिलांजलि देकर कथावस्तु में सरसता निष्पन्न की है- सीताभ्युदय औचित्यानुबद्धवक्रोक्तिधिया तादृशां प्रक्षिप्तांशानां परिमार्जनं सुकृतम्। तदर्थमभिनवकथांशानामागमादेशविधिना सौष्ठवं सन्निहितम्।

                              इस नाटक में एक नई शैली अपनाई गई है, ग्रन्थ के आरम्भ में ही नाटक से पूर्व सोलह पृष्ठों में गद्य में सीता का वक्तव्य आत्मकथा के रूप में दिया गया है। इस आत्मकथा के द्वारा पाठकों को इस कथा की अभिनवता का साक्षात् पूर्व में ही हो जाता है। अंकानुसार इस नाटक की कथावस्तु संक्षिप्त रूप में इस प्रकार है-

प्रथमांक - नाटक की कथा राम के राज्याभिषेक के पश्चात् आरम्भ होती है। यहां ब्रह्मा एवं ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के  मध्य वार्तालाप दिया गया है। ऋषि वसिष्ठ ब्रह्मा से कहते हैं कि आपने राम के जीवन में कष्ट ही कष्ट लिखे हैं-आजन्म कष्टं कष्टं महाकष्टं ललाटे भवता लिखितं रामस्य। तब ब्रह्मा कहते हैं कि ये सब लोकहित के लिये ही हो रहा है। यही पर ज्ञात होता है कि भृगु ऋषि द्वारा विष्णु को दिये गये शाप के कारण अभी राम को सीता का और वियोग सहन करना है। यही ब्रह्मा स्पष्ट करते हैं कि आसन्नप्रसवा सीता को युगल पुत्र की मंगलमयी प्रसूति वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में होगी, ऐसी व्यवस्था उन्होंने कर दी है।

द्वितीयांक - वसिष्ठ ऋषि के आश्रम में राम एवं सीमा का प्रवेश होता है। वसिष्ठ ऋषि राम को बताते है कि उन्हें जुडवां पुत्र की प्राप्ति होने वाली है लेकिन उनका जन्म अभुक्तमूल में होने से 12 वर्ष तक उनका मुख-दर्शन परिवार के सभी लोगों के लिये अनिष्टकारी सिद्ध होगा, अतः इन वर्षों में गंगा व तमसा के संगम पर स्थित वाल्मीकि के ऋषि के आश्रम में रहना चाहिए। राम व सीता लोकहित को देखते हुए इसके लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं-
सीता - (सोल्लासम्) रम्याः संकल्पा मां महामुनिशरणे गंगाधिष्ठितप्रदेशे त्वरयन्ति। इदानीं तु नित्यं पुष्पहारादिना पूजापरायणा मातुर्गंगाया उत्संगे निषीदन्तीमात्मानं कल्पयामि। 

तृतीयांक - इस अंक का स्थान वाल्मीकि ऋषि का आश्रम है, जहां राम सीता के साथ जाते हैं। यही वाल्मीकि राम  से कहते हैं कि वे राम के चरित को आधार बनाकर काव्य लिख रहे हैं, जिसमें अब सीता भी रामचरित के प्रकरणों को बतलाकर उनकी सहायता करेगी। राम लोकल्याण एवं देवताओं की के कार्यों को सिद्ध  करने के लिये सीता को वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में छोडकर लौट जाते हैं- अपरं च चावयोश्चारुचर्येण किं वैकैकेन देवानां बहूनि कार्याणि साध्यानीति स्वजीवनसाफल्यं संविज्ञातमेव। ब्रह्मादिदेवानां नियोगे नास्ति मादृशां विकल्पावसरः। 

चतुर्थांक - वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में सीता सभी प्राणियों का ध्यान रखती हुई अपने पुत्रों का पालन कर रही है। उन्हें पुत्र-पालन के साथ  इस बात की भी चिन्ता रहती है कि क्यारियां सींची गई या नही, पशु-पक्षियों के लिये जलकुण्ड भरे गये या नहीं, चीटियों के लिये अन्नकण बिखेरे गये या नहीं- अनुपमे, किमाश्रमकुमारिकाभिः पुष्प-लता-क्षुपाणां केदारिका अभिषिक्ताः? किं वा पशु-पक्षिणां प्रपाः पूरिताः? उताहो  पिपीलिकाभ्योऽन्नकणा वितीर्णाः? 
        इसी अंक में सीता इच्छा प्रकट करती है कि अब वे पाताल लोक में जाकर माता पृथिवी से मिलना चाहती हैं, क्योंकि अब इस लोक में  उनका कार्य पूर्ण हो चुका है।


पंचमांक - इस अंक का स्थान वरुण लोक है, जहां वरुण देव पृथिवी देवी के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। माता पृथिवी भी सीता की प्रतीक्षा कर रही है। नारद सूचना देते हैं कि सीता का मातृभूमि में लौट आने का समय हो गया है।

षष्ठांंक  - ब्रह्मा और वरुण देव की इच्छा जानकर राम स्वयं सीता को पाताललोक जाने की अनुमति दे देते हैं- अहं तु सीतापतिः स्वीय प्रभारूपेण सीतैव वारुणे लोके जगदखिलं राममयं विधास्ये। एतदर्थं सीतायास्तत्र पाताले प्रयाणं वरुणप्रस्तावानुवर्तनेनानुमोदयामि। अन्त में राम भरत वाक्य कहते हैं-

मानवा भूतिमन्तः स्युः सौहार्दं स्यात् परस्परम्।
पराभ्युदययोगस्तु प्रकृतिः सर्वदेहिनाम्।।

      यह नाटक सीता विषयक प्रक्षेपकों का समाधान बडे सुन्दर और नाटकीय तरीकों से कर देता है, जिससे वे समस्त घटनाएं, जो उनके घटने के तरीकों से अनुचित सी जान पडती थी, वे सब लोककल्याण के लिये होती हुई प्रतीत होती हैं और राम एवं सीता का वह उदात्त चरित और अधिक उभर कर सामने आता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य लोकमंगल है |

Tuesday, June 30, 2020

आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री: (श्रीमद्रामज्युपाध्यायाभिनन्दनग्रन्थ:)

कृति - आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री: 
(श्रीमद्रामज्युपाध्यायाभिनन्दनग्रन्थ:)

सम्पादकद्वय - प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ. रमाकांत पांडेय
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन, 29/5, शक्तिनगर, दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 2001
पृष्ठ संख्या - 28+366+33
अंकित मूल्य - 750 


             अर्वाचीन संस्कृत में श्री रामजी उपाध्याय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है |  उपाध्याय जी के अभिनंदन ग्रन्थ के रूप में आधुनिकसंस्कृतसाहित्यश्री:  ग्रन्थ का प्रकाशन प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ. रमाकांत पांडेय के सम्पादन में हुआ है | प्रस्तुत ग्रन्थ को तीन खण्डों में विभक्त किया है-


1. प्रथम खण्ड - प्रथम खण्ड में रामजी उपाध्याय का परिचय दिया गया है | इसमें 4 लेख संकलित हैं | राधावल्लभ त्रिपाठी ने श्रीमद्रामज्युपाध्यायचरितम् आलेख में रामजी उपाध्याय के व्यक्तित्व , उनके संस्कृत सेवा के कार्यों, शिष्यपरम्परा, अनुसंधान में  अवदान पर प्रकाश डाला है | रामजी उपाध्याय  का जन्म 1 जुलाई 1920 को उत्तरप्रदेश के एक ग्राम मलैजी में हुआ | 1 जुलाई 1920 से 17 जनवरी 2011 तक की जीवन यात्रा में रामजी उपाध्याय ने जो कार्य संस्कृत के क्षेत्र में किये, वे सदैव स्मरणीय रहेंगे | रामजी उपाध्याय  की शिष्य परम्परा में डॉ. हीरालाल शुक्ल, पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. कुसुम भूरिया, डॉ. रामलखन पांडेय, श्रीमती वनमाला भवालकर आदि विशेष रूप से  उल्लेखनीय हैं|  इसी खण्ड में रामजी उपाध्याय के ग्रन्थों का नामोल्लेख के साथ परिचय है तथा रामजी उपाध्याय के  सागरिका पत्रिका में प्रकाशित लेखों/ ग्रन्थों का उल्लेख संकलनकर्ता डॉ. धर्मेंद्र कुमार के द्वारा किया गया है | साथ ही रामजी उपाध्याय  के निर्देशन में सम्पन्न 45 शोध प्रबन्धों और उनके शोधकर्ताओं का परिचय भी दिया गया है, जो शोध के क्षेत्र में विशेष महत्त्व रखता है | डॉ. रमाकांत पांडेय ने अपने आलेख में रामजी उपाध्याय के साहित्य की समीक्षा की है | आपने रामजी उपाध्याय की कृतियों को तीन भागों में विभक्त किया है- 1. भारतीयसंस्कृतिसम्बन्धिनो ग्रन्था:, 2. नाटकोपन्यासग्रन्था:, 3. समीक्षा ग्रन्था: अनुसन्धानग्रन्थाश्च
रामजी उपाध्याय ने दो नाटक सीताभ्युदयम् और कैकयीविजयम् की रचना की | आपके द्वारा रचित दो उपन्यास द्वासुपर्णा और सत्यहरिशचंद्रोदयम् पारम्परिक कथाओं में युग के अनुरूप कथ्य प्रस्तुत करते हैं |



2. द्वितीय खण्ड - द्वितीय खण्ड में विभिन्न लेखकों के 33 आलेख संकलित हैं, जो अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करते हैं | अर्वाचीन संस्कृत की विविध विधाओं, विषय परिवर्तन, नवीन कथ्य और शिल्प आदि को जानने के लिए ये आलेख विशेष रूप से पठनीय हैं |


3. तृतीय खण्ड - तृतीय खण्ड में 3 व्याख्यान संकलित हैं | प्रथम व्याख्यान पूर्व राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा जी का है, जो केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के दीक्षांत महोत्सव में दिया गया था | यह व्याख्यान महात्मा बुद्ध के दर्शन और आधुनिक विश्व पर आधारित है | दो व्याख्यान पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी के हैं |  इनमें एक व्याख्यान बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन में संस्कृत के सार्वभौमत्व पर है और दूसरा व्याख्यान संस्कृत, विज्ञान और वर्तमान विश्व पर है, जो विश्व संस्कृत सम्मेलन के उद्धाटन के अवसर पर अध्यक्षीय भाषण के रूप में दिया गया था | सुखद तथ्य यह है कि ये तीनों ही व्याख्यान संस्कृत भाषा में ही दिए गए थे |


शोध पत्रिका- सागरिका

शोध पत्रिका- सागरिका

आरम्भ- विक्रम संवत् 2019 (1962 ई.)
प्रकाशक- सागरिका समिति, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) 470003
भाषा- संस्कृत
आवृत्ति- त्रैमासिक
विधा- शोधपत्रिका
संस्थापक संपादक- प्रो. रामजी उपाध्याय
प्रधान संपादक- प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
संपादक- प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी
प्रबन्ध संपादक-डॉ. शशिकुमार सिंह
संपादक मण्डल- डॉ. नौनिहाल गौतम, डॉ. संजय कुमार, डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. किरण आर्या
आईएसएसएन- 2229-5577


संस्कृत की प्राचीन पत्रिकाओं में सागरिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रकाशन सुविधाओं के अभाव और संचारसाधनों की न्यूनता के बावजूद संस्कृत की पत्रिका का प्रकाशन साहसपूर्ण कार्य था। शुरुआत में इसका मुद्रण वाराणसी या प्रयाग से करवाया जाता था। आरम्भ में यह पत्रिका षाण्मासिक थी जो बाद में त्रैमासिक हो गयी। इसका प्रकाशन भारतीय तिथियों  के अनुसार प्रतिवर्ष चैत्र, आषाढ, आश्विन और पौष माह में होता है। आरम्भिक अंकों में पत्रिका में संपादकीय, शोधपत्र, काव्य, संस्कृत वृत्त, ग्रन्थ समीक्षा, सागर विश्वविद्यालय में जारी शोधकार्य स्तम्भ होते थे। वर्तमान में इसमें केवल शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। सागरिका का पहला अंक डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, श्री जीवन्याय तीर्थ, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, श्री मंगलदेव शास्त्री, श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य, श्री धीरेन्द्र वर्मा, श्री सत्यव्रत सिंह, कृष्णनम्पूतिरिपाद, श्री कृष्णदत्त वाजपेयी, श्री गणपति शुक्रु, श्री व्रतीन्द्रकुमार सेनगुप्त, श्री रामकिशोर मिश्र, श्री शिवचन्द्र भट्टाचार्य, श्री मंजुलमय कपंतुल, श्री रुद्रदेव त्रिपाठी, श्रीमती वनमाला भवालकर, श्री विश्वनाथ शास्त्री और श्री रामगोपाल मिश्र के लेख, काव्य और संस्कृत वृत्त से समन्वित होकर प्रकाशित हुआ था। पिछली शती के विद्वान् आचार्यों, लेखकों और शोधार्थियों के गंभीर चिन्तनपरक लेख इसकी गरिमा के परिचायक हैं। एक ओर स्थापित विद्वानों को इस पत्रिका में आदर मिला वहीं दूसरी ओर शोधरत छात्रों को भी प्रकाशन का अवसर प्राप्त हुआ। पण्डित वायुनन्दन पाण्डेय, आचार्य अमरनाथ पाण्डेय, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, पं. बच्चूलाल अवस्थी, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया था। आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का सीताचरितमहाकाव्य प्रथमतः सागरिका में ही प्रकाशित हुआ था। देश के प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों को एक साथ पढ़ना विद्यारसिकों के लिए आनन्ददायक होता है। संस्कृतवाङ्मय के शास्त्रीय विषयों पर इसमें लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जैसे श्री गोपीनाथ कविराज का लेख ‘शाक्तदृष्ट्या सृष्टितत्त्वविमर्शः’। इसमें प्रकाशन हेतु भाषा की अर्हता रही है, वह है संस्कृत। विषयानुकूल होने पर अन्य भाषा में प्रकाशित लेखों को संस्कृत में अनूदित करके भी प्रकाशित किया गया है। विषयानुकूल लेखों का पुनः प्रकाशन भी किया गया है। इसके प्रकाशन की लगभग साठ वर्षों की अवधि में प्रो. रामजी उपाध्याय, डॉ. वनमाला भवालकर, डॉ विश्वनाथ भट्टाचार्य, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. रामगोपाल मिश्र, डॉ. मनोरमा त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया ने सम्पादन के दायित्व का निर्वहन किया है। प्रो. अच्युतानन्द दाश कुछ वर्षों तक प्रबन्ध संपादक रहे। काव्यशास्त्र विशेषांक के अतिथि संपादक प्रो. रमाकान्त पाण्डेय हैं। इकतालीसवें वर्ष में डॉ. शीतांशु त्रिपाठी संपादनसहायक रहे हैं। इसके अब तक सोलह विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं जो संग्रहणीय हैं। उनका विवरण इस प्रकार है-

राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक (महामहिम राष्ट्रपति) - प्रथम वर्ष में
भारतीय संस्कृति विशेषांक -  द्वितीय वर्ष में
विश्व संस्कृत सम्मेलन विशेषांक - दशम वर्ष में
कालिदास विशेषांक- द्वादश त्रयोदश वर्ष में
ज्योतिष विशेषांक- षोडश वर्ष में
नाट्यवेद विशेषांक- सप्तदश वर्ष में
मध्ययुगीन संस्कृत नाटक विशेषांक- अष्टादश वर्ष में
भट्टतौत विशेषांक- बाईसवें वर्ष में
रजत जयन्ती विशेषांक- पच्चीस वें वर्ष में
प्राचीन भारतीय समाज दर्शन विशेषांक- उनतीसवें वर्ष में
मनुस्मृति विशेषांक- तैंतीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत साहित्य विशेषांक- पैंतीसवें वर्ष में
संस्कृत गौरव विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
संस्कृत व्याकरण विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत गद्यकाव्य विशेषांक- सैतीसवें वर्ष में
काव्यशास्त्र विशेषांक- उनतालीसवें वर्ष में
आचार्यरामजीउपाध्यायस्मृतिविशेषांक- बयालीसवें वर्ष में

                       इनके अतिरिक्त अंक 47.1-4 में केवल महाकवि कालिदास से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित हैं, इसी प्रकार अंक 48.4 में महाकवि भास व भवभूति पर केन्द्रित शोधपत्र प्रकाशित हैं। अंक 48.1-2 में केवल डॉ. पूर्णचन्द्र उपाध्याय का बृहत् शोधकार्य ‘अर्वाचीनाचार्यराधावल्लभीयसंस्कृतसाहित्ये पार्यावरणचेतना’ प्रकाशित है।
              आईएसएसएन युक्त यह पत्रिका यूजीसी एप्रूव्ड जर्नल में सूचीबद्ध रही है। इसमें शोधपत्रों का प्रकाशन निःशुल्क होता है। आरम्भ से ही शोधपत्र लेखकों को लेखकीय प्रति निःशुल्क दी जाती रही है। इस पत्रिका का सदस्यता शुल्क 25रू प्रति अंक, 100 रू वार्षिक, 1000 रू प्रतिव्यक्ति आजीवन, 2000 रू. प्रति संस्था आजीवन है। आजीवन सदस्यता ग्रहण करने पर पुराने उपलब्ध अंक निःशुल्क दिये जाते हैं।
                     अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका सागरिका संस्कृत पत्रकारिता में एक प्रतिष्ठापूर्ण नाम है। सागर की यह सागरिका शोधपत्रिका शोधार्थियों के लिए ‘गागर में सागर’ की तरह अत्यन्त उपादेय है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत जगत् के लिए गौरव का विषय है।

Monday, June 29, 2020

सूर्यगेहे तमिस्रा (भारतीयदलितकविता)

कृति - सूर्यगेहे तमिस्रा (भारतीयदलितकविता)

अनुवादक व सम्पादक - डॉ. ऋषिराज जानी
प्रकाशक - गुजराती दलित साहित्य अकादमी, अहमदाबाद
संस्करण - प्रथम, 2018
पृष्ठ संख्या - 130
अंकित मूल्य -200 रू.
मोबाइल नम्बर- 9712375112
मेल आईडी - rushpharma@yahoo.co.in 

              संस्कृत साहित्य में अब वे स्वर भी अपना स्थान पा रहे हैं, जो कभी प्रायः उपेक्षित से रहे। विभिन्न भाषाओं के साहित्य के  समान अब प्रगतिवाद, यथार्थवाद, स्त्रविमर्श, दलितविमर्श आदि के आधार पर रचनाएं लिखी जा रही हैं एवं उनको आलोचना के स्तर पर परखा भी जा रहा है। दलितविमर्श एक ऐसा ही विमर्श है। संस्कृत में दलितचेतना का निरूपण मौलिक कविता के रूप में धीरे - धीरे स्थान बना रहा है। आचार्य हर्षदेव माधव अपने नवीन काव्यशास्त्र वागीश्वरीकण्ठसूत्रम् में दलितचेतनानिरूपण का लक्षण करते हुए कहते हैं कि शोषित, दलित लोगों की पीडा, व्यग्रता, रोष आदि का निरूपण दलित चेतना है-

शोषितदलितजनगतानां पीडाव्यग्रता-
रोषादीनां निरूपणं दलितचेतना ।।

                  डॉ. ऋषिराज जानी कविता, कथा एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। डॉ. जानी ने  सूर्यगेहे तमिस्रा के रूप में अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। इस संग्रह में डॉ. जानी ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में लिखी गई दलित विमर्श की कविताओं का संस्कृत अनुवाद किया है। डॉ. जानी ने इन कविताओं का चयन, सम्पादन एवं अनुवाद करके संस्कृत के पाठकों को भारतीय भाषाओं की दलित विमर्श की कविताओं के स्वर को पढने, सुनने का अवसर प्रदान किया है।

                       प्रस्तुत संग्रह में कुल 36 कवियों की कविताएं संकलित हैं। इन कवियों 34 कवि ं विभिन्न भाषाओं के हैं तो 2 कवियों की कविताएं मूल रूप से संस्कृत की हैं -

गुजराती कविता - अनुवादक ने संग्रह की 29 कविताएं गुजराती भाषा से ली हैं, जो 14 कवियों की रचनाएं हैं। इनमें पथिक परमार, जयन्त परमार, भी.न. वणकर, प्रवीण गढवी जैसे दलित विमर्श के महत्त्वपूर्ण रचनाकार सम्मिलित हैं। गुजराती साहित्य में दलित विमर्श की कविताएं प्रभूत मात्रा में लिखी जाती रही हैं। ऋषिराज जानी स्वयं भी गुजराती भाषा में कविताएं रचते हैं। यशवंत वाघेला की एक कविता द्रष्टव्य हैं, जिसमें वे वाल्मीकि से प्रश्न करते हैं-

हे वाल्मीके!
निषादकृतेन
क्रौंचवधेन
भवतः शोकः
श्लोकत्वं प्राप्नोत्
अपि च
रामायणस्य रचना जाता।
किन्तु
अस्माकं
प्रतिदिनं
एभिरार्तनादैः
चीत्कारैश्च
किं रचितं
भविष्यति?

हिन्दी कविता - इस भाग  में 15 हिन्दी कवियों की कविताओं का संस्कृत रूपान्तरण दिया गया है। जिनमें जयप्रकाश कर्दम, मलखान सिंह, असंगघोष, सतनाम सिंह, पूरन सिंह आदि कवि सम्मिलित हैं। मोहनदास नैमिश्राय शम्बुक के तीव्र आर्तनाद को विषय बनाकर कहते हैं-

शम्बुकस्य तीव्रार्तनादानां
प्रतिध्वनयः
अधुना अवशिष्टाः,
यथा हि दलितानां पृष्ठे व्रणचिह्नानि।।

डॉ. गोवर्धन बंजारा का एक हाइकु गागर में सागर भरने वाला है-

एकलव्यस्य
छिन्नोऽंगुष्ठः, लक्ष्यते
शिवलिंगवत्।।

मराठी कविता - इस भाग में दया पंवार की एक कविता का अनुवाद दिया गया है।

असमिया कविता - अनुवादक ने असमिया भाषा से पीताम्बर दास एवं हरेन्द्र कुमार मछहारी की दो कविताओं का अनुवाद किया है। हरेन्द्र कुमार मछहारी की कविता में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से बातचीत करता है-

त्वं मनुष्यः
अहञ्च।
आवामीश्वरस्यैव सन्तती।
वस्तुतः आवां संलग्नौ परस्परं
किन्तु आवयोर्नास्ति परिचयः।

पंजाबी कविता - पंजाबी भाष से द्वारका भारती की तीन कविताएं अनूदित की गई हैं। लज्जा कविता बडी मार्मिक कविता है-

कथम् एवं भवति
यत्
कस्यापि धर्मस्थानस्य समीपे
बहुधा गच्छतो मम शिरः
अवनमति
न श्रद्धया,
किन्तु
लज्जया?

बंगला कविता - इस भाग में बांगला भाषा की कवयित्री मंजूबाला की एक कविता का अनुवाद सम्मिलित है।

संस्कृत कविता - संस्कृत में भी मौलिक कविता के रूप में दलित विमर्श पर रचनाएं लिखी जा रही हैं, यद्यपि ये संख्या में अल्प ही हैं। यहां दो कवियों की चार संस्कृत कविताएं संकलित की गई हैं, जिनमें हर्षदेव माधव की तीन कविताएं तथा ऋषिराज जानी की एक कविता है। हर्षदेव माधव की कविता अहमस्मि तमिस्रा का एक अंश प्रस्तुत है-

अयं व्रणो
ब्राह्मणानां कूपाद् जलमानेतुं
गतयोश्चरणयोरपराधः
हस्ते यो दृश्यते
स तु
अपक्वरोटिकां दृष्ट्वा
मात्रा तप्तसन्दशिकाचिह्नेन
कृतोऽस्त्यनैपुण्यसूचकः।



यह अनुवाद संकलन संस्कृत भाषा में ई उम्मीदें जगाता है। अभी भारतीय भाषाओं में दलितविमर्श की कवितााओं का अधिकांश ऐसा है, जिसका अनुवाद करके संस्कृत में उतारना चाहिए। इस संकलन में सम्मिलित होने से शेष रही अनेक भाषाएं हैं, जिनमें ये स्वर अंकित हैं।