Saturday, June 13, 2020

''नतितति:'(स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य)

'नतितति:'(स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य)
कृति - नतितति:

विधा - स्तुतिपरक मुक्तक चित्रकाव्य
लेखक - पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय
प्रकाशक -पाण्डेय प्रकाशन, जयपुर
सम्पर्क सूत्र - 9829271351 
संस्करण- प्रथम , 2007
पृष्ठ संख्या -
अंकित मूल्य - 100


राजस्थान प्रान्त के जयपुर परकोटे में जन्में राष्ट्रपति सम्मानित वाचस्पति, साहित्य मनीषी पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय संस्कृत साहित्य की निहारिका के कवि की तरह ज्वाज्वल्यमान नक्षत्र हैं जिन्होंने अपने ज्ञान वैदुष्य से नभोमण्डल को प्रकाशित किया । उनके द्वारा रचित यह स्तुति परक चित्रकाव्य संस्कृत जगत् के लिए अनुपम उपहार है। " नति:" शब्द की व्युत्पत्ति पर हम दृष्टिपात करते हैं तो 'नति:' शब्द का अर्थ है प्रणमन। वामन शिवराम आप्टे ने अपने शब्दकोश में नति:(स्त्रीलिंग) शब्द को इस प्रकार प्रस्तुत किया है-  नम्+क्तिन्--झुकाव, झुकना, प्रणमन, वक्रता, कुटिलता, अभिवादन करने के लिए शरीर को झुकाना, प्रणति, शालीनता तथा ज्योतिष में भोगांश में स्थानभ्रंश।'तति:'-तन्+क्तिन्---श्रेणी पंक्ति, रेखा, गण, दल, समूह। इस प्रकार 'नतितति:' का शाब्दिक अर्थ हुआ प्रणमन-शृंखला। कवि ने वैदिक देवताओं से लेकर दशावतार तक ही नहीं, अपितु मानवीय संचेतनाओं तक प्रणमन किया है।

          'नतितति:' में श्रीकृष्ण, वामन, विद्वज्जन, वराह, परब्रह्म, विष्णु, जमदग्नि, टंकेश्वरी, रूद्र, दुण्डिराज(गणेश), तारेश(शिव), अग्निदेव, दुर्गा, शेषनाग, वाग्देवता, भारद्वाज, गणपति, लक्ष्मीपति, कार्तिकेय, सूर्य, हनुमान, क्षमेश, षोडशमातृका, गंगा आदि देवी-देवताओं की प्रभुता तथा गरिमा के गुणों को लेकर रचना की गई है।
     पं० मोहन लाल शर्मा पाण्डेय ने वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर से पद्य के प्रत्येक शब्द के आदि में उसी व्यंजन को रखा है। पद्यों की रचना में वर्णमाला के किसी भी अक्षर का परित्याग नहीं किया है यह भी एक अत्यन्त कठिन कार्य है क्योंकि टवर्ग प्रभृत ऐसे वर्ण हैं जिनमें सम्बधित सार्थक शब्दों की संस्कृत भाषा में अत्यन्त न्यूनता है परन्तु कवि ने सभी वर्णों पर पद्य निर्मित किये हैं। प्रस्तुत काव्य के माध्यम से कवि के प्रौढ़ पाण्डित्य का परिचय प्राप्त होता है।
स्तोत्र साहित्य में एक सुन्दर कड़ी जोड़ने वाले इस ग्रन्थ कि विशेषता है कि इसका प्रत्येक पद्य नागरी वर्णमाला के एक वर्ण को नायक बनाकर लिखा गया है और उस पद्य का प्रत्येक पद उस वर्ण से ही प्रारम्भ होता है। ऐसी कृतियों को सदियों से चित्रकाव्य कहा जाता रहा है। कभी एक पद्य एक ही अक्षर में पूरा गुम्फित होकर 'एकाक्षरचित्रकाव्य' कहा जाता है। यह काव्य इस दृष्टि से चित्रकाव्य भी है, स्तोत्र काव्य भी, मुक्तक काव्य भी।

तकार से प्रारम्भ हुआ एक श्लोक दर्शनीय है--

तारेशस्तापसेशस्तपतपसतमोहन्तृतुल्यत्रितार:,
तेजस्वी तोषतोलस्तनुतुहिनतनुस्तीर्थतोयातितृप्त:।
त्रैकाल्ये तापतप्तान् तमितरितरिकस्त्रायतां तोयतोष:,
तैतिक्षस्तुष्टुतुष्टस्त्रिपुरतपनकस्तत्त्वतस्तुर्यतल्प:॥


एक अन्य उदाहरण द्रष्टव्य है, जिसमें व वर्ण के चमत्कारिक प्रयोग के साथ गणेश-वन्दना की गई है-

वन्दे वन्दारुवृन्दैर्विबुधबुधवरैर्वन्दनीयं वरेण्यं,
वाग्वैदग्ध्यं विकर्णं विधिवरवदनैर्वर्ण्यमानं विशालम्।
विद्यावार्धिं वदान्यं विसृमरवपुषं विघ्नवारैकवेधं,
‘वं’ बीजे विद्यमानं बहुविधवरदं व्यापकं वारणस्यम्।।


प्रत्युत इस काव्य को  संस्कृत जगत् के समक्ष प्रस्तुत करने का ध्येय यही है कि आप इस अमूल्य निधि से रूबरू हो सकें|


  • डॉ तारेश कुमार शर्मा
मोबाइल नम्बर - 9810869055
मेल आई डी - kumartaresh82@gmail.com

दूतककाव्य परम्परा का नवोन्मेष - दूतप्रतिवचनम्

दूतककाव्य परम्परा का नवोन्मेष - दूतप्रतिवचनम् 
कृति - दूतप्रतिवचनम् (प्रणवरचनावली में संकलित)
विधा - पद्यकाव्य
लेखक -डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणव’
प्रकाशक - देववाणी परिषद्, दिल्ली
पृष्ठ संख्या - 505
अंकित मूल्य - 1100 रू


दूतकाव्य परम्परा में कालिदास कृत मेघदूत एक कालजयी कृति है। इस रचना की भावभूमि के आधार पर संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में अनेक रचनाएं होती रही हैं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में भी इस परम्परा में कई रचनाएं सामने आई हैं, जिनमें अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत प्रबोधशतकम् (यहां यक्षिणी को पत्र के माध्यम से संदेश भेजा गया है), हर्षदेव माधव कृत यक्षस्य वासरिका (उपन्यासविधा) प्रमुख हैं। इसी क्रम में डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणव’ ने मित्रदूतम् व दूतप्रतिवनम् की रचना की है।
                                दूतप्रतिवचनम् सर्वप्रथम देववाणी परिषद्, दिल्ली से सन् 1989 में प्रकाशित हुआ। तत्पश्चात् इसका संकलन  प्रणवरचनावली में सुप्रभातम्, प्रणवभागवतम्, बालगीतांजलिः, समुज्जवला आदि के साथ किया गया है| इसमें कुल 62 पद्य हैं, जो आद्यन्त मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध हैं। मेघदूत का मेघ जब यक्षिणी को सन्देश देकर लोटता है तो यक्ष उससे उस भारत के विषय में पूछता है, जिसे उसने मार्ग में देखा है। प्रणव कवि के काव्य में मात्र सुकुमार भावों का ही प्रवाह नहीं हैं वरन् वर्तमान भारत देश की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओं और विसंगतियों भी हैं। काव्य के प्रारम्भ में कवि भारतयक्षों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं -

 हं हो! भारतयक्षा! दूतप्रतिवचनं निशम्य चित्ते।
कुरुथ विचारं सततं देशे  किं तेऽस्ति करणीयम्।।

मेघ यक्षिणी की विरहजनित पीडा का साक्षी बनता है। पति के समीप न रहने  नारी को जो दंश झेलने पडते हैं, कवि मन ने उन्हें अनुभूत किया है। जैसे स्नेह (तेल) के अभाव में बत्ती जल जाती है, उसी प्रकार प्रियतम के स्नेह से रहित प्रियतमा का जीवन नष्ट हो जाता है-

बन्धो! हन्त  त्रुटितमधुना  धर्मचक्रं समन्ताद्,
भिन्नः सेतुः प्रणयसरितो यस्त्वया बद्धपूर्वः।
साधो सर्वं शिथिलमभवत् स्नेहजातं  प्रियाणां 
क्षीणे स्नेहे  ज्वलति विकला वर्तिका नात्रं चित्रम्।।

इस काव्य में वर्तमान में परिवर्तित होते सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का बखूबी वर्णन किया गया है। अब यक्षिणी अपनी आजीविका चलाने के लिये घर से बाहर निकलती है और रास्ते में पुरुषों के द्वारा किये गये अश्लील शब्दों एवं उपहासों को सहन करती है। अब यक्षिणी कृशांगी,विरहिणी नहीं है अपितु वह तो इस प्रकार की हो गई है-

तन्वी श्यामा शिखरिदशना यक्षिणी या त्वदीया,
टी.वी.मध्ये चपलनयना तारिका दृश्यते सा। 
कान्ते स्वांगे विमलवटिकं फेनिलं  लिप्यमाना,
स्नान्त्युन्मुक्ता भवति विविधक्रयवस्तुप्रचारे।।

समाज में प्रदूषित होते वातावरण, शिक्षा के गिरते स्तर, बढती महंगाई व बेरेाजगारी आदि अनेक समस्याओं का वर्णन इस काव्य में प्राप्त होता है, यथा-

गेहे गेहे नगरविपणौ व्याकुलता नो युवानो,
येषां हस्तेष्वलघुभरवनत्यंकपत्राणि सन्ति।
नित्यं प्राप्तुं किमपि धनदां कांचिदाजीविकां ते,
कायार्गारादुवसि निकटे पंक्तिबद्धा भवन्ति ।।


इस काव्य में कवि प्रणव ने सामाजिक स्थिति का ही नहीं वरन् देश की राजनीतिक स्थिति का भी यथार्थ चित्रण किया है। सफेद खादी में धूर्त नेतागण स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं। कवि ने धूर्त नेताओं की तुलना बगुले से की है।  कवि कटाक्ष करते हुए कहते हैं-

योऽसौ दृष्टो धवलवसनो यानमध्ये निविष्टः,
स्टेनोयुक्तश्चपलवचनो मन्त्रिनाम्ना प्रसिद्धः।
सोऽयं नेताऽपहृतविभवो भूतपूर्वे चुनावे,
कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।।

कवि ने यहां मेघदूत की पंक्ति का सुन्दर उपयोग किया है। 
कालिदास के मेघदूत में विदिशा की राजधानी वाला महान् देश दशार्ण अब धनधान्य और शोभा को खोकर दीनहीन हो गया है। बेतवा में जल की धारा भी स्वल्प हो गई है। रेवा नदी पर बांध बांधने के कारण घना वन प्रदेश काटा जा रहा है तथा फैक्टरियों  के कारण नदियों का जल प्रदूषित हो गया है।  सीमेन्ट बनाने के कारण विन्ध्य पर्वत चूर-चूर हो गया है-

रेवा खिन्ना प्रतिदिनमहो बन्धकृद्भिर्विबद्धा, 
ठेकेदारैः परमनुदिनं छिद्यते काननं तत्।
सीमेण्टार्थं कणविरचने यन्त्रशालाऽसुरिभिः,
तुंगो विन्ध्यो व्यथितहृदयश्चूर्ण्यते पिष्यते च ।। 

डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ने गिरते मूल्यों व अपसंस्कृति के विविध चित्रों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। मेघ के माध्यम से कवि ने भारत देश में व्याप्त विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया है। कविकुलगुरु कालिदास की अलंकारयुक्त शैली का अनुगमन करते हुए उपमा, श्लेष, अनुप्रास की त्रिवेणी प्रवाहित की है। कवि ने अपने हृदय की पीडा को मेघ के दौत्य कर्म के माध्यम से व्यक्त किया है। दूतकाव्यों की अभिनवीनता मेें कवि का प्रयास स्तुत्य है।


-डॉ. सुदेश आहुजा
सम्पर्कसूत्र- 9413404463

Thursday, June 11, 2020

कृति - ’टुडे’स्मृतिः

संकलयिता - कविराज जगन्नाथ झा शास्त्री
विधा - हांस्य-व्यंग्य काव्य
प्रकाशक - श्री वैद्यनाथ झा शास्त्री, नेपालराज संस्कृत महाविद्यालय, मटिहानी, जिला दरभंगा
संस्करण - प्रथम, 1957
अंकित मूल्य - 25 नये पैसे

संस्कृत में हास्य - व्यंग्य परक काव्यों की परम्परा प्राचीनकाल से ही रही है। हास्य और व्यंग्य जब मिश्रित होकर काव्य को पोषित करते हैं तो एक तरफ तो वह पाठक/श्रोता के मुख पर हास्य ले आते हैं तो दूसरी ओर वह व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विडम्बनाओं को भी सरलतया उकेर देते हैं। ऐसी ही एक रचना है-’टुडे’स्मृतिः। इस रचना के संकलयिता के रूप  में  कविराज जगन्नाथ झा शास्त्री का नाम दिया गया है, अतः यह कहना मुश्किल है कि यह मूलतः किसकी रचना है, यद्यपि कुछ स्थानों पर इस के रचनाकार के रूप  में कविराज जगन्नाथ झा शास्त्री का ही नाम लिया गया है। इसमें निबद्ध पद्यों के साथ भी रचनाकार का संकेत न होने से यह पुष्ट होता है कि जगन्नाथ झा शास्त्री ही इसके लेखक हैं।

            जगन्नाथ झा शास्त्री का जन्म मिथिला के ग्राम शाहपुर, पो. लोहट जिला दरभंगा में हुआ। ये बाल्काल से ही विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे। विडम्बना यह हुई कि कविराज जगन्नाथ झा शास्त्री मात्र बीस वर्ष की अल्पायु में ही दिवंगत हो गये। इनके द्वारा संकलित पद्यों को इनकी मृत्यु के उपरान्त नेपालराज संस्कृत महाविद्यालय, मटिहानी, जिला दरभंगा ने पुस्तकाकार में प्रकाशित करवाया। इस कृति में मात्र 10 पृष्ठ हैं, उनमें भी पद्य मात्र 6 पृष्ठों में निबद्ध हैं, जिनकी संख्या मात्र 44 हैं। कवि ने अंग्रेजी के शब्दों को प्रचलन के आधार पर ज्यों का त्यों संस्कृत में देवनागरी लिपि में ग्रहण कर लिया है। यह कुछ को अटपटा लग सकता है किन्तु यह शैली इस कृति के अनुकल है क्योंकि कवि को आधुनिक हास्य-व्यंग्य का वातावरण निर्मित करना है। इसमें तीन अध्याय हैं-

1 सामान्यधर्म्मनिरूपणम्-
           यह काव्य प्राचीन शास्त्रों की शैली की तरह रचा गया है, जहां कुछ जिज्ञासाएं लेकर कुछ व्यक्ति किसी विद्वान् के पास जाते हैं और उनसे प्रश्न करते हैं। काव्य के प्रारम्भ में प्रस्तावना में कहते हैं कि महर्षि फैशनाचार्य्य के पास कुछ जैण्टलमैन जाकर  टुडेधर्म (आधुनिक धर्म) के विषय में पूछते हैं-

एकदा ‘चेयरा’ऽऽसीनं ‘टुडे‘ धर्म्मविदांरम्।
महर्षिं ‘फैशनाचार्य्यं’ ‘जैण्टलमैनाः’ समभ्ययुः।।

तब फैशनाचार्य्य कहते हैं-
‘फैशनाचार्य्य’ उवाच-

शृणुताऽवहिताः सौम्याः ! ‘टुडे’ धर्म्मान् कलिप्रियान्।
‘एवोल्यूशनथ्यूर्यां’ ये नित्यं ‘गिर्गिट’रूपिणः।।
(एवोल्यूशनथ्यूर्या-मानव विकास का सिद्धान्त)

धर्म का आधुनिक लक्षण कुछ यूं प्रस्तुत करते हैं-

‘लेडी’ ‘फ्रैण्ड्स’‘समाचाराः’ ‘स्वस्य च प्रियमात्मनः’।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः ‘टुडे’ धर्म्मस्य लक्षणम्।।

2 दिनचर्य्यानिरूपणम्-
             आधुनिक प्रातः स्मरण का निरूपण करते हुए कहते हैं-

करारविन्देन ‘सिगार’वृन्दं
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
‘स्पृंगदार’ सच्-‘चेयर’ केशयानं
‘गौरं’ महः ‘सर्विस’दं नमामि।।

मॉर्डन स्नानविधि का वर्णन करते हैं कि ठण्ड में वीकली स्नान किया जा सकता है और ग्रीष्मकाल में यथारुचि-

साप्ताहिकं शीतकाले ग्रीष्मकाले यथारुचि।
नग्नः ‘टीनटबे’ कुर्य्यात् स्नानं ‘सोप’समन्वितम्।।

3 भक्ष्याऽभक्ष्यनिर्णय-
         आधुनिक भोजन शैली किस प्रकार की होनी चाहिए-

यदुत्त्थानयितुं शक्यं क्षेप्तुं निर्गलितुं तथा।
तत्सर्व्वं ‘नेचुरल’भक्ष्यमभक्ष्यं त्वितरन्मतम्।।
‘टेबुलं- पुरतो धृत्वा ‘चेयर’स्थगुदः पुमान्।
‘सूटिडो’‘बूटिडो’ऽश्नियात् ‘छुरिका-कण्टका’ऽन्वितः।।
‘बराण्डी’‘बिस्सकीं’ ‘पेगं’ मध्ये मध्ये पिबेन्मुहुः।
कुक्कुटाण्डञ्च फलवद् ग्राह्यं सर्व्वेषु कर्म्मसु।।

सही भी है क्योंकि आज भक्ष्य-अभक्ष्य का अन्तर ही समाप्त हो गया है। काव्य के अन्त में आधुनिक शिक्षा पद्धति पर भी करारा व्यंग्य किया गया है-

चातुर्य्यं चाकरीमात्रे कौशलं ‘बूटपालिशे’।
भाले लिखति चैतावत् शिक्षा पाश्चात्यचालिता।।

आज का विद्यार्थी पाश्चात्य शिक्षा को तो ग्रहण कर लेता है किन्तु अपने देश के इतिहास, संस्कृति के बारे में उसका ज्ञान कोरा ही रहता है-

एम.ए.पर्य्यन्तमुत्तीर्ण इतिहासे प्रतिष्ठितः।
छात्रो वक्तुं न शक्नोति भीष्मः कस्य सुतोऽभवत्।।
आंगलानान्तु को राजा कियद्वारं व्यमूत्रयत्।
इति सर्व्वं विजानाति न जानाति स्वकं गृहम्।।

Wednesday, June 10, 2020

जीवनीपरक महाकाव्य-दयानन्ददिग्विजयम्

जीवनीपरक महाकाव्य-दयानन्ददिग्विजयम्
तुलसीदास यद्यपि रामचरितमानस की रचना स्वांत: सुखाय कर रहे थे किन्तु वह है तो जनहित में ही-
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सबकर हित होई।।
आचार्य मम्मट कहते हैं- रामादिवत् वर्तितव्यम् न रावणादिवत् , संस्कृत साहित्य में प्रारम्भ से ही सत्पुरुषों के चरित को आधार बनाकर काव्य रचने की प्रवृत्ति रही है | स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन पर दयानन्ददिग्विजयम्  नामक महाकाव्य अखिलानंद शर्मा ने लिखा है|  दयानन्ददिग्विजयम्  नाम से  ही एक और महाकाव्य की रचना आचार्य मेधाव्रत ने की है, जो बड़ौदा से प्रकाशित है | अखिलानंद कवि के नाम से दयानंद के जीवन पर लिखे एक महाकाव्य दयानंदतिमिरभास्कर: (बुलन्दशहर) का उल्लेख प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने आधुनिकसंस्कृतसाहित्यसन्दर्भसूची में किया है, किन्तु ये वे ही अखिलानंद कवि हैं या कोई दूसरे हैं, यह कहना मुश्किल है| मेधाव्रत पंडित ने दयानंदलहरी नाम से भी एक काव्य लिखा है, जो चित्रकूट से प्रकाशित हुआ है|  अस्तु,अखिलानंद शर्मा कृत दयानन्ददिग्विजयम् का परिचय ब्लॉग के लिए अरविन्द कुमार शास्त्री प्रस्तुत कर रहे हैं, जो लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘पं0 अखिलानन्द शर्मा का साहित्यिक अवदान‘ विषय पर शोधकार्यरत हैं। हम उनके आभारी हैं-

पुस्तक-दयानन्ददिग्विजयम्

विधा-महाकाव्य
रचयिता- पं0 अखिलानन्द शर्मा
सम्पादक-स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
प्रकाशक-आर्य प्रकाशन, 814 कूण्डे वालान, अजमेरी गेट, दिल्ली-1100006
प्रकाशन वर्ष- 1997
पृष्ठ-542
अंकित मूल्य-175 रु.

आधुनिक संस्कृत साहित्य में समाजसुधारक महापुरुषों के चरिताख्यानपरक काव्यों की परम्परा विस्तृत है। अनेक रचनाओं में स्वामी दयानन्द सरस्वती को नायकत्वेन दर्शाया गया है। पं0 गोपालराव हरि के ‘दयानन्ददिग्विजयार्क‘(सम्प्रति अनुपलब्ध) के पश्चात् पं0 अखिलानन्द शर्मा-कृत ‘दयानन्ददिग्विजयमहाकाव्य‘ प्राचीन, प्रामाणिक एवं प्रसिद्ध रचना है। इसका उपलब्ध संस्करण आर्य प्रकाशन, अजमेरी गेट दिल्ली से 1997 ई0 में प्रकाशित है। इससे पूर्व कृति अन्य प्रकाशन से भी प्रकाशित हो चुकी है। सम्पूर्ण महाकाव्य 21 सर्ग तथा 2348 पद्यों के विशाल कलेवर में विस्तृत है।


कविपरिचय-
             कविवर अखिलानन्द शर्मा ने पहले आर्यसमाज तत्पश्चात् सनातनधर्म से सम्बन्धित साहित्य रचना करके  संस्कृत साहित्य को सुसमृद्ध एवं गौरवान्वित किया है। कवि का जन्म गंगा नदी के सुरम्य तट पर स्थित चन्द्रनगर (चन्दूनगला) जनपद- सम्भल उ0प्र0 (भारत) में सनाढ्य ब्राह्मण कुल में वि0सं0 1937 माघ शुक्ला तृतीया को हुआ। जैसा कि स्वयं कवि ने कहा है-

ऋषिवह्निनन्दसोमैर्विरुद्धगत्या समन्विते वर्षे।
मज्जन्मचन्द्रनगरे समभून्माघेसिते तृतीयायाम्।।
(सनातनधर्मविजयमहाकाव्य 25/84)

पं0 भगीरथीलाल इनके पितामह, पं0 टीकाराम जी पिता एवं माता श्रीमती सुबुद्धि देवी थीं। कविवर शर्मा ने पन्द्रह वर्ष की अवस्था से ही पद्य रचना आरम्भ कर दी थी। इन्होंने लघु-वृहद 108 से अधिक ग्रन्थों का प्रणयन किया, जिनकी पद्य संख्या 350000 है। ये कृतियां गद्य, गीति, चम्पू, रूपक तथा लघुकाव्य आदि विधाओं में  है। जिनमें अधिकांश अनुपलब्ध हैं। कवि का विपुल साहित्य शोध एवं अध्ययन की अपेक्षा रखता है। कई शोधकार्य विभिन्न विश्वविद्यालयों में सम्पन्न भी हो रहे है। कवि के पौत्र नरेशचन्द्र पाठक एवं प्रपौत्र अखिल पाठक पूर्ण मनोयोग से इनकी साहित्यिक विरासत का संरक्षण और प्रकाशन का सराहनीय प्रयास कर रहे हैं।

दयानन्ददिग्विजयम्-
                      प्रस्तुत महाकाव्य की रचना अधर्म-विध्वंसक, धर्मध्वजासंवाहक, राष्ट्रोन्नायक, शास्त्रार्थ-विजेता एवं अनुपम संन्यासी के रूप में प्रतिष्ठित स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन-वृत्त को आधार बनाकर की गयी है। उनके काव्य का नायक कोई आश्रयदाता राजा या प्राचीन देवता नहीं अपितु महान् समाजसुधारक स्वामी दयानन्द सरस्वती हैं। जिनका यश शरत्काल के निर्मल चन्द्रमा से भी अधिक शोभित होकर जगत् में व्याप्त अन्धकार का नाश कर रहा है-

यशो यदीयं जगतीतले ततं
तमो नितान्तं तनिमानमानयत्।
शरन्मृगाटादधिकं विशोभते
विशोभितान्तः करणैरभिष्टुतम्।। 1/4

नायक के मुखारविन्द से डार्विन के विकासवाद का सिद्धान्त तथा ‘इवोल्यूशन-हण्टर-लेथब्रिज’ आदि थ्योरीज़ का खण्डन कराके अकाट्य युक्तियों से संस्कृत विद्या की प्रतिष्ठा सिद्ध करायी है। न्यूटन और शोपेनहाॅवर आदि द्वारा प्रदत्त सिद्धान्त ऋषियों ने पूर्व में दे दिये हैं। पदार्थविद्या यहां से अन्य देशों में चली जाने और भारतवर्ष में उसका अभाव दृष्टिगोचर होने का कारण कवि ने भारतीय लोगों की प्रयत्नशून्यता बतायी है। देश की उन्नति के लिए वेदादि शास्त्रों के अनुशीलन को आवश्यक सिद्ध किया है। कवि ने खेद व्यक्त किया है; कि विदेशी हमारे धर्म की खोज कर रहे हैं, और हम निश्चिन्त होकर सोये हैं-

महानयं शोक इहास्ति विस्तृतो 
विदेशजाताः किल धम्र्ममार्गणम्।
प्रकुर्वते देशनिवासिनो जनाः
सुखेन निद्रामधिम्य शेरते।। 13/81

आलोच्य महाकाव्य मेें कवि की काव्य प्रतिभा यत्र-तत्र-सर्वत्र मुखरित हुयी है। नायक की असामयिक मृत्यु के बाद का वर्णन अत्यन्त मार्मिक है। आर्यजनों द्वारा क्रमशः ईश्वर,काल तथा देवों को उपालम्भ देना करुण रस का अनुपम निदर्शन है। कवि शोक विह्वल होकर नायक के गुणों को स्मरण करता है। हे मुनीश्वर! आपका मन्दस्मित,आपका मधुर और आपकी दयालुता कहां चली गयी। आज सरस्वती का हृदयालम्बन उसे छोड गया, मातृभूमि का जीवनाधार वह अनुपम निष्कलट-अमृत किरण अचानक ही अमावस्या में छिप गया। हिन्दी टीका में शाब्दिक क्रीडा करते हुये कहा है कि वेदमन्त्रों में एक-एक पद के ‘विनियोग’ का अलग-अलग गौरव बतलाते हुये आपने आज क्यों वियोग का स्वरूप धारण कर लिया है, आपने मन्त्रों के लिये ‘विनियोग’ बतलाया, विधवाओं के लिये ‘नियोग’ बतलाया, परन्तु हमारे लिये वियोग क्यों बतलाया? हमारे लिये अभागे ‘संयोग’ का ‘प्रयोग’ कहाँ जाकर ‘उपभोग’ पा गया? अब हम क्या ‘उद्योग’ करें? हमारा तो सारा ‘सुयोग’ दैव-‘दुर्योग’ से ‘अभियोग’ में आ गया। यह पद्य भी दर्शनीय है-
पदशः प्रतिपादयिष्यता
निगमानां विनियोग गौरवम्।
भवताद्य कथं वियोगिता
प्रतिलब्धा वद हा यतीम्र!।। 20/51

आलोच्य काव्य कवित्त्व बोधन प्रदर्शन की अपेक्षा सरलता, बोधगम्यता और भावप्रवणता को प्रश्रय दिया गया है, तथापि सहज अलंकारों का वैचित्र्य प्रशंसनीय है। कहीं-कहीं सर्वतोगमन बन्ध, षोडशदलकमल बन्ध, गोमूत्रिका बन्ध, छत्रबन्ध, हारबन्ध, चक्रबन्ध आदि चित्रालंकारों का प्रयोग भी प्राप्य है। सर्वतोगमनबन्ध में लिखे पद्य के दस अर्थ होना पाठकों को आश्चर्यान्वित करता है-

न ते न ते ते न ते न ते न ते न न ते न ते।
न ते न ये ये न ते न ते न ये न न ये न ते।।   14/190

कवि ने उपर्युक्त पद्य के दो अर्थ स्वयं हिन्दी-टीका में देकर अन्य आठ अर्थों को विद्वानों के लिये छोड दिया है।
                यहां नायक की जिस प्रकार शास्त्रार्थ में सर्वत्र विजय दृष्टिगोचर होती है, उसी प्रकार कवि को भी काव्योचित तत्त्वों के संयोजन में विजयश्री प्राप्त हुयी है। यहाँ छन्दों की अलौकिक छटा, रसों की समरसता, प्रसाद गुण की अगाधता, ओज की ओजस्विता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, ललित पदावली एवं अलंकारों की रमणीयता व भाव, भाषा आदि का प्रचुर सौष्ठव प्राप्त होता है।


 
अरविन्द कुमार शास्त्री,
    असिस्टेंट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
संस्कृतविभाग, जे.एस. हिन्दू (पी.जी.) कालेज, अमरोहा, उ0प्र0 
नोट- परिचय लेखक (अरविन्द कुमार शास्त्री) लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘पं0 अखिलानन्द शर्मा का साहित्यिक अवदान‘ विषय पर शोधकार्यरत हैं।

ऋषेः क्षुब्धे चेतसि


कृति – ऋषेः क्षुब्धे चेतसि
विधा – आधुनिक संस्कृत हाइकु, तान्का तथा सिजो कविता संग्रह

कवि – डा. हर्षदेव माधव
संपादक – प्रीतेश शुक्ल
प्रकाशल्क्– श्रीवाणी अकादमी, A – 12, हीरामोती टेनामेन्टस्, सिद्धि कोम्पेक्स समीप, गुलाब-सोप फेक्टरी निकट, चांदखेडा, गान्धीनगर, गुजरात
प्रकाशन समय – जनवरी 2004
पृ. सं. – vi + 110,
मूल्य – 80/- 

   कवि डा. हर्षदेव माधव संस्कृत जगत् में अपने काव्य विधाओं के लिए प्रख्यात यशस्क है । समकालिक संस्कृत जगत् में कवि माधव एक चेतना है जो चाहे काव्य शैली की दृष्टि से हो या फिर विषय वस्तु की दृष्टि से हो, वे आधुनिकता को साव्यस्त करते है । संस्कृत केवल ब्राह्मणों की पूजा पाठ की भाषा या फिर राज सभाओं में सम्वर्धित राजकवियों के विरुद या राजा के गुणगान के लिए नहीं हैं, अपितु संस्कृत भाषा विज्ञान को भी कहती है, सामान्य जनता के दुःख को परिभाषित करती हैं, जनजातियों की संस्कृति को भी बोलती है, विश्व समस्याओं को उठाती है, प्रकृति को पात्र बना कर कहीं उसके सौन्दर्य में खो जाती हैं तो कहीं उसके आसुँओं में अपनी लेखनी भिगोती है ।
             संस्कृत में अभिनव काव्य विधाओं का प्रयोग और प्रतिष्ठा का श्रेय कवि डा. माधव को है । छन्दों की बात करे तो प्राग् गायत्री छन्द ‘मा’ (चार अक्षर), ‘प्रमा’ (आठ अक्षर), ‘प्रतिमा’ (बारह अक्षर), ‘उपमा’ (षोलह अक्षर), ‘संमा’ (विश अक्षर) इन पाञ्चों से वैदिक छन्द प्रारम्भ होते हैं । वैदिक छन्द अक्षराश्रय होते हैं भले ही लौकिक संस्कृत में वही छन्द कुछ परिपाटी के साथ मात्राश्रय क्यों न बन जाये । जैसे की गायत्री को उपजीव्य करके तनुमध्या (पिपीलिकामध्या एक वैदिक छन्द भी है जो विराट् छन्दों का प्रसङ्ग में कहा गया है), शशिवदना, विद्युल्लेखा, वसुमती आदि छन्द हुआ करते हैं । उसी प्रकार उष्णिक् को आधार करके मदलेखा; अनुष्टुप् को आधार करके चित्रपदा, विद्युन्माला, माणवक, हंसरुत, समानिका, प्रमाणिका, बृहती को आधार बनाकर हलमुखी, भुजगशिशुभृता आदि 26 वैदिक छन्दों के आधार पर 110 लौकिक छन्दों को कविओं की लेखनी छन्दायित करती हैं । उसके अतिरिक्त मुक्तक, गजल, सॉनेट्, गीति कविता, लोक गीतों के स्वर और वैदेशिक छन्दों में भी आधुनिक संस्कृत काव्य गतिमान है । संस्कृत भाषा की आधुनिकता प्रतिपादन करने के लिए अब उत्तरपक्ष की आवश्यकता नहीं है जब से संस्कृत इन सारी विधाओं में अनुरञ्जित हुई है ।
         इस क्रम में जापान देशीय काव्य विधा हाइकु और तान्का तथा कोरिआ देशीय काव्य विधा सिजो को संस्कृत काव्य विधा के रूप में प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध कराने का श्रेय कवि हर्षदेव माधव को जाता है । 567 हाइकु, 83 तान्का और 50 सीजो कवितायों का संग्रह है ‘ऋषेः क्षुब्धे चेतसि’ । इसके साथ साथ संपादक का प्राक्कथन ‘विश्वविक्रेता की ओर संस्कृत कविता’, कविताओं के क्रम के वाद संस्कृत हिन्दी अनुवाद के साथ चार आलेख – (i)डा. रश्मिकान्त ध्रुव द्वारा लिखित और प्रो. गोवर्धन बंजरा द्वारा अनूदित ‘हाइकु एवं तान्का काव्य’ (ii) डा. इलाघोष द्वारा लिखित ‘संस्कृत साहित्यस्य नवरूपं हाईकुकाव्यम्’  (iii) डा. जशवन्ती दवे द्वारा लिखित और प्रो. गोवर्धन बंजारा द्वारा अनूदित ‘सिजो काव्य’  एवं (iv) डा. रश्मिकान्त ध्रुव द्वारा लिखित और प्रो. गोवर्धन बंजारा द्वारा अनूदित ‘सीजो (सिजो) काव्य’ काव्यविधायों की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हैं । 

     हाइकु विधा में चार स्तबक हैं । काव्य संग्रह का नामकरण चतुर्थ स्तबक में वर्णित हाइकु संख्या 562 की मध्यम पंक्ति है । प्रथम स्तबक (1970-1974 की कवितायें) ‘लावारसदिग्धाः स्वप्नमयाः पर्वताः’ शीर्षक 1996 में प्रकाशित काव्य का संशोधित पाठ है । कवि ने अपना प्रथम स्तबक को अपनी पत्नी श्रुति हर्षदेव को समर्पित किया है । इस स्तबक में 1 – 202 हाइकु विविध विषयों पर  है । हाइकु विधा 5 – 7 – 5 अक्षरों का (समुदाय 17 अक्षरों का) होता है । इस को नामान्तर में क्या हम प्रजापति छन्द कह सकते हैं ? क्यों की प्रजापति के लिए जो पाञ्च व्याहृतिआँ होती है उनमें कुल 17 अक्षर होते हैं । इसलिए ‘सप्तदशो वै प्रजापतिः...(श. ब्रा. 1. 4. 3. 17)’ कहा गया है । और क्या हम इस छन्द को पाञ्च पादों में व्याहृतिओं की तरह उपस्थापित कर सकते है और अलग नाम दे सकते हैं ? प्रवृद्ध पाठक और कवि गण इस पर समाधान रखेङ्गे यह विनती है । तो त्रिपाद गति युक्त हाइकु कविता त्रिलोचन की स्तुति और त्रिशाखी बिल्व पत्र के उपमा के साथ प्रारम्भ हुआ है । यथा –

हे त्रिलोचन ! 
शमय त्रिँस्तापान् 
त्रिजन्मनां मे ।।  (पृ. सं. 2, हाइकु 1)

और 

बिल्ब-पत्राणि 
त्रिपङ्कितपल्लवानि 
गृहाणेमानि ।।  (पृ. सं. हाइकु 3)    

मनुष्य मन की आस्था और अनास्था के उपर ईश्वर की स्थिति होती है । इस तथ्य को कवि ने कहा है कि-

पाषाण एव
ईश्वरः । ईश्वरस्तु
पाषाण एव
। (पृ. सं. 5, हाइकु 37) 

 कार्यव्यस्त मनुष्य का दिन प्रतिदिन की जीवनचर्या को गाणितीक चिह्नों के माध्यम से व्यंग्य के साथ कवि ने संकेतित किया है की क्या विभाजित होता है क्या गुणित होता है और क्या संयुक्त होता है  - 

आँफिस – चिन्ता
X गृहिणी + उपनेत्रं
÷ क्षयः = जीवितम्
  (पृ. सं. 6, हाइकु 49) 

कहीं पर प्रकृति का सम्मोह संसार बन्ध के रूप में कवि को आमोदित करता है तो कहीं जीवन्मुक्ति का मार्ग अन्वेषण करती हैं कविता की ये पंक्तियां – 

को मां गमनात्
बलात् कर्षति ? गन्धः
शेफालीकानाम् ।।
(पृ. सं. 10, हाइकु 96) 

और

उद्घाटिते वा
बद्धे द्वारे । मुक्तोऽहं
गमनागमनात् ।।
(पृ. सं. 11, हाइकु 112) 

प्रकृति को पात्र बनाकर उनसे अपनी संवेदनाओं को उकेरता हैं कवि, कविता पंक्ति में प्रणय राग में –

आषाढस्पर्शः 
पृथिव्यास्तन्व्याः शरीरे
तृणरोमाञ्चः ।। (पृ. सं. 14, हाइकु 149) 

फिर कवि ने काश्मीर को पृथिवी नायिका को हृदय रूप में अङ्कित किया हैं -  

काश्मीरे ! पृथ्व्याः
कञ्चुलिकायां हृदः
स्पन्दनं त्वं हि ।।
(पृ. सं. 17, हाइकु 178) 

   द्वितीय स्तबक 1992-1999 के बीच लिखित हाइकु है । यह स्तबक कवि नारायण दाश को कवि ने समर्पित किया है । हाइकु 203 से 285 तक इस स्तबक में सज्जित है । शास्त्र पठन से अन्तःकरणों की शुद्धि होती है यह बात कवि हाइकु में इस प्रकार है –
प्राचीनग्रन्थे
हृदयमवगाह्य
भवति शुद्धम् ।।
(पृ. सं. 22, हाइकु 206) 

छायावाद के विप्रलम्भ को कवि ने झरोखों के सूनेपन, इन्तजार में श्रान्त होना और सपनों के मुरझा जाने के द्वारा अङ्कित किया है -

रिक्तो गवाक्षः
श्रान्ता प्रतीक्षा । म्लानः
हृदये स्वप्नः ।।
(पृ. सं. 23, हाइकु 216)

रहस्यवाद का संस्कृत कवि वर्णन न करे यह नहीं हो सकता । इसकी कुछ छटाएँ - 

मन्त्रः । मे घटः
उच्छलति रिक्तोऽपि
चिच्चन्द्रिकया ।।
(पृ. सं. 26, हाइकु 264) 

ऋषिओं के अरण्य ध्यान के माध्यम से कवि ने उस रहस्य की ओर संकेत किया है –

निबिडारण्यम् ।
शृणोमि मौनम् । प्रेक्षे
रहस्यरूपम् ।। (पृ. सं. 27, हाइकु 273)

   कवि ने इस संग्रह के तृतीय स्तबक को कवि अजय कुमार मिश्र को अर्पण किया है । इसमें सन्निवेशित हाइकु 2000 से 2002 के बीच में लिखे हुये हैं । 286 – 402 तक हाइकु इस स्तबक के अन्तर्गत है । कवि का स्वप्न आखों में वैसे ही आमोदित होता हैं जैसे वृक्ष की शाखाओं में पत्र-

पर्णनर्तनं
शाख्यायाम् । नेत्रयोः
स्वप्न-स्पन्दनम् ।।
(पृ. सं. 30, हाइकु 297) 

कार्यक्षेत्र में ईमानदारी से काम न करने वालों के कारण देश की प्रगति नहीं हो पाती है । इस तथ्य को कवि ने कहा है –

आसन्दी रिक्ता
कार्यालये । शरीरं
रुग्णं राष्ट्रस्य ।।
(पृ. सं. 32, हाइकु 313) 

सब ऋतु और आमोद का हर सम्भावना होते हुए भी बालक अपना शैशव या कैशोर नहीं जान पाता । इस बाल श्रमिक प्रथा का विरोध करते हुए कवि ने कहा है कि –

बालश्रमिकः ।
ऋतुत्यक्तं कुसुमं
जडो निर्झरः ।।
(पृ. सं. 34, हाइकु 340)

माँ का हृदय किसी भी तीर्थ या क्षेत्र से अधिक पुण्यप्रद होता है -

मातृ-हृदयम्
कारुण्य-गङ्गोद्भेदः ।
वात्सल्य-काशी ।।
(पृ. सं. 35, हाइकु 349) 

हाइकु का अन्तिम स्तबक चतुर्थ स्तबक कवि राधावल्लभ त्रिपाठी को समर्पित है । कवि इस स्तबक में भग्न मूर्तियों,  चिकित्सालय आदि का वर्णन किया है । हाइकु 403 – 567 तक जो की 2003 की रचनायें हैं,  इस में सम्मिलित है । पातिव्रत्य के महत्त्व को  भारतीय नारियों के  नित्यकर्मवर्णन में  कवि उकेरते हैं-

तुलसी-तले
दीपः पातिव्रत्यस्य
सुरभिर्गृहे ।।
(पृ. सं. 43, हाइकु 422) 

गुरु की तितिक्षा ग्रीष्म में वृक्ष छाया जैसी और विद्यादान अन्धकार में सिक्थ वर्त्तिका जैसा है – इन बिम्बों के साथ कवि वर्णन करते हैं-
 
गुरुः । तमसि
सिक्थवर्तिः, आतपे
वृक्षस्य छाया ।।
(पृ. सं. 44, हाइकु 446) 

ज्ञानधनी और मुक्तिकामी उभय गण से दूर रहना पसन्द करते है । कवि की भाषा में –

जनसम्मर्दात्
मुक्तिः । मयाऽपि प्राप्तं
बुद्धत्वं मम ।।
(पृ. सं. 5, हाइकु 37)

इस स्तबक की निम्न पंक्तियों से काव्य संग्रह का नामकरण हुआ है । वस्तु अपनी स्थिति को खोने में जो विक्षिप्त होता है फिर क्षुभित होता हैं और अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त करता है, इस बिम्ब के माध्यम से कवि समाज को देखना चाहता है -

अब्धौ कौमुदी ।
ऋषेः क्षब्धे चेतसि
मेनकाछविः ।।
(पृ. सं. 55, हाइकु 562) 

    इस चार स्तबकों के हाइकु के बाद  कवि ने काव्य वीणा में तान्का कवितायों का तार संजोया है । 1980 से 1985 के बीच लिखी गये इन तान्काओं को कवि ने डा. इला घोष को समर्पित किया है । तान्का 5 – 7- 5 – 7 – 7 की पंक्ति का एक जापानीय छन्द है । हाइकु इस तान्का से उतरा हुआ एक छन्द है । छोटे छोटे छन्द बिम्बों के माध्यम से, व्यञ्जना से और संकेत से जो मार्मिकता हृदय में भरते हैं कभी कभी इससे चार गुणा अक्षरवाले बडे छन्द नहीं भर पाते हैं । शून्यता में जब आशा की ज्योति होती है तब कवि, कालिदास की आशा पोषण के स्थल रामगिरि से और आशा के स्वप्न स्थल अलका से भी आगे निकल कर सर्वत्र अलकनन्दा का पुण्य प्रवाह देखता है – 

पुनः शून्ये मे
कक्षे प्रणयपत्रं
रोमाञ्चो गात्रे ।
न रामगिरिः । नालका ।
सर्वत्रालकानन्दा ।।
  (पृ. सं. 61, तान्का 32)

   अन्त में कवि ने कोरिया देश के छन्द सिजो की 50 पंक्तियों में काव्य को सीमित किया है । कवि ने 1987 में  ‘सुरभारती’ पत्रिका में प्रथम सिजो कविता लिखी थी  ।  1 – 50 तक सिजो 1985 से 1987 तक लिखी हुई कवितायें हैं । इस गुच्छ को कवि ने शिव कुमार मिश्र को अर्पित किया है । हर्षदेव के काव्य में 15 + 15 + 15 अक्षरों की तीन पंक्तिओं में कुल 45 अक्षर में सिजो दिखने को मिलता हैं जो वैदिक त्रिष्टुप् की याद दिलाता हैं । प्राय: स्वदेश में यह छन्द युद्ध वर्णन का छन्द होता है । संस्कृत कवि युद्ध की भयावहता के वर्णन के साथ अन्य चित्र को चित्रित करने में भी इसका प्रयोग करता है ।Bonglaishan नामक पहाड की चोटी पर सिद्ध ऋषियों का सङ्ग जन्मान्तर में मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता हैं यह भावना इस सिजो में इस प्रकार है - 

बोंगलाइशान सानौ
प्राप्नुयाम् ... चेत् मे स्थानम् ।
ऋष्याश्रमेषु कुर्याम्
किमपि मन्त्राणां गानम् ।
जन्मान्तरे स्रोतोरूपं
आत्मनो भवेत् पानम् ।।
  (पृ. सं. 70, सिजो 1)

विश्व से उपनिवेशवाद का विलोप के लिए जो जो युद्ध विभीषिकायें हुई उनको याद करके कवि दक्षिण अफ्रिका दिवस पर  लिखते हैं  – 

हिरोशिमायां दग्धोऽस्मि
नष्टोऽस्मि गोलिकया ।
वियेतनामे हतः, मे
शब्दः ‘Quit India’
जन्म ग्रहीष्यामि वक्तुं
स्वतन्त्रं ‘Namibia’।।
(पृ. सं. 76, सिजो 50)

कवि के इस संग्रह में कविताओं का संयोजन समय को दृष्टि में रखते हुये किया गया है । हाइकु स्तबकों को लेकर कभी मन कहता है की प्रणय और विप्रलम्भ आदि एक स्तबक, मुक्ति और साधना एक स्तबक, प्रकृति के सौन्दर्य छटा का एक स्तबक एवं सामाजिक समस्या की ओर संकेत एक स्तबक होता तो एक ही भाव में कुछ समय पाठक का मन निमग्न रहता । हर हाइकु पर भाव भूमि बदलना नहीं पडता । हाइकु के मर्मज्ञ कवि हर्षदेव माधव का यह संग्रह संस्कृत काव्य प्रेमियों को जरूर एक नूतन आयाम की ओर ले चलेगा ।

  
प्रस्तुति – डा. पराम्बाश्रीयोगमाया
             सहायक आचार्या, स्नातकोत्तर वेद विभाग,
             श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीविहार, पुरी 752003, ओडिशा ।


Tuesday, June 9, 2020

रेडियो-रूपक संकलन -नवमालती

कृति - नवमालती 
लेखक - डॉ. नोदनाथ मिश्र
विधा - रेडियो नाटक
प्रकाशक - नाग प्रकाशन, जवाहर नगर, दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 1997
अंकित मूल्य -51 रु. 

आधुनिक संस्कृत लेखन में निरन्तर हो रहे नवीन प्रयोग तथा अनवरत साहित्य रचना संस्कृत भाषा के आलोचकों को उत्तर देने में सक्षम है। इस भाषा को मृत कहने वाले व्यक्ति अर्वाचीन काल में संस्कृत के विपुल साहित्य को देखकर आश्चर्यचकित रह जायेंगे। आज संस्कृत में प्रभूत मात्रा में लिखा जा रहा है। जीवन के प्रत्येक पक्ष को विषय बनाकर अनेक विधाओं में सृजन हो रहा है। इन नवीन विधाओं में एक प्रमुख एवं लोकप्रिय विधा रेडियो-रूपक भी है। बीसवीं सदी के मध्य से अब तक न केवल नये रेडियो रूपकों की रचना की गई अपितु पुरानी लोकप्रिय रचनाओं का भी ध्वनि-नाट्य-रूपान्तरण किया गया। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से इन रूपकों का प्रसारण भी हुआ है।
                 अर्वाचीन संस्कृत साहित्यकार पं. नेादनाथ मिश्र रचित लगभग 20 संस्कृत रूपकों का प्रसारण आकाशवाणी के पटना, लखनऊ, वाराणसी, दरभंगा केन्द्रों से हुआ है। पं. नोदनाथ मिश्र का जन्म बिहार के जिलला मधुबनी, ग्राम लालगंज में सन् 1944 को हुआ। लम्बे शिक्षण अनुभव से इन्हें संस्कृत भाषा को रोचक ढंग से सीखाने तथा लेाकप्रिय बनाने के उपाय खोजने की प्रेरणा मिली। इसी प्रयास में आपने संस्कृत रेडियो रूपकों की रचना की। इनके रचित रूपकों में से नौ रेडियो रूपकों का संकलन नवमालती शीर्षक से  पुस्तकाकार में प्रकाशित हुआ।
               
           इन रूपकों की कथावस्तु वर्तमान समाज एवं जन सामान्य से सम्बन्धित है। सभी रूपकों की कथावस्तु कवि कल्पित है। समाज में व्याप्त विभिन्न बुराईयों तथा समस्याओं को लेकर लेखक चिन्तित है, यही चिन्ता इन रूपकों में उभर कर सामने आई है। प्रत्येक रूपक अलग मन्तव्य लेकर चलता है तथापि लेखक सबसे अधिक आहत दहेज नामक सामाजिक बुराई से प्रतीत होते हैं। ऐसा नहीं है कि लेखक ने केवल समस्याओं को ही प्रस्तुत किया है, लेखक ने इन रूपकों में सामाजिक समस्याओं के समाधान का सौरभ मालती कुसुम की तरह विकीर्ण किया गया है, यही इस रचना के नामकरण का आधार भी है। दहेज के अतिरिक्त युवा-असन्तोष, शिक्षित बेरेाजगारी, भ्रष्टाचार, स्त्री-पुरुष असमानता, पुत्र प्राप्ति की अदम्य इच्छा मे कन्या राशि जुटाते जाना आदि सामाजिक विडमबनाओं को कथानक में मुख्य रूप से उकेरा गया है। समस्याओं को प्रस्तुत करते हुए भी कवि अपनी प्रतिभा से कथानक के प्रति श्रोता/पाठक की रुचि बनाये रखने में सफल होते हैं।
     रूपक क्योंकि जनसामान्य से जुडे हैं, अतः स्वभावतः सभी पात्र श्रोता/पाठक को जाने पहचाने लगते हैं। सभी रूपक घटना-प्रधान हैं तथा संदेश देने का प्रयास करते हैं। प्राचीन काव्यशास्त्र-सम्मत रस-चवर्णा इन एकांकियों में न्यूनाधिक रूप में होती हैं। इन सब रूपकों में जो रस उभर कर सामने आता है, वह आधुनिक काव्यशास्त्री आचार्य रहस बिहारी द्विवेदी के मत में प्रक्षोभ रस है-

स्थायीभावोऽस्य संवेगः स च संवेदनात्मकः।
आलम्बनं च सन्तापो दलितानां च पीडनम्।।
उद्दीपनं परौद्धत्यं दीनानां शोषणं छलम्।
अनुभावोऽस्य संघर्षचेष्टा क्लेशसमुद्भवा।।

इसका एक उदाहरण द्रष्टव्य है-
शोभाकान्तः -(सक्रोधम्) वृथा विवादं मा कुरु। त्वमसि नारी, नारीव्रतमाचर। सीमातः बहिर्गम्य वार्ता न करणीया।
सुशीला - (ससम्भ्रमम्) अहमस्मि नारी, किन्तु नहि तव क्रीता दासी। त्वया सममेव जीवनस्य ममाप्यधिकारो वर्तते। ..................त्वत्तः किञ्चित्पृच्छायां क्रोधान्धः भूयाः। किम्मे प्राणाः न सन्ति।

       लेखक की भाषा सर्वत्र सहज, सरल है क्योंकि इन रूपकों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों  की संस्कृत भाषा में रुचि जागृत करना है। इन रूपकों में आम बोलचाल की भाषा के मुहावरों व कथनों का संस्कृतीकरण किया गया है, यथा-

-अधुना कं पर्वतं निपात्यागतोसि

-एतत्तु शोभनं यदावयोः सम्पत्तिः पूर्वमेव वण्टिताऽस्ति

-यावत् श्वासाः तावत् आशाः

-हस्तिनः दन्ताः इव भक्षणस्य अन्यत् प्रदर्शनस्य च अन्यत्

-जामाता तु लक्षेषु एक एव मिलितः

-आः त्यज इमाः कथाः

 यहां हिन्दी के शब्दों का संस्कृतीकरण भी किया गया है, यथा- उद्धारम् (उधार), त्रुटितः जातः (टूट गया हूं)। संस्कृत में नवीन शब्द भी प्रयुक्त किये गये हैं, यथा- प्रातिकृतिकः (फोटोग्राफर)।
                   रेडियो-रूपकों में संवादों लघुकलेवर  व सरलता कथा-प्रवाह को बनाये रखने में सहयोग देते हैं तथा नाटकीय प्रभाव में वृद्धि करते हैं। ये रूपक अभिनय की दृष्टि से भी सफल हैं। स्पष्ट रूप से दिये गये ध्वनि-निर्देशों के कारण ये प्रसारणीय तो हैं ही, इन्हें नुक्क्डनाटक या रंगमंचीय नाटकों के समान भी प्रयुक्त किया जा सकता है। लेखक ने इन्हें लघुसंस्कृतनाटिका भी कहा है।
                             डॉ. साधना कंसल
सह आचार्य - राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा, राजस्थान
                     मोबाइल नम्बर - 9024400927

Monday, June 8, 2020

पशुपक्षिविचिन्तनम् - खण्डकाव्य

पशुपक्षिविचिन्तनम् - खण्डकाव्य
कृति - पशुपक्षिविचिन्तनम्

विधा - खण्डकाव्य
रचयिता - डॉ.हरिनारायण दीक्षित
पृष्ठ संख्या - 195
अंकित मूल्य - 450
संस्करण प्रथम - 2008
प्रकाशक - ईस्टर्न बुक लिंकर्स,देहली

                  संस्कृत खण्डकाव्य की परम्परा में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित 'डॉ.हरिनारायण दीक्षित' कृत 'पशुपक्षिविचिन्तनम्'  उत्कृष्ट कोटि का खण्डकाव्य है। डॉ.दीक्षित संस्कृत साहित्य की सभी विधाओं में काव्यरचना करने में सिद्धहस्त हैं। आपने अभी तक 30 से अधिक मौलिक कृतियों की रचना की है।

                पशुपक्षिविचिन्तनम्' इस खण्डकाव्य को दो भागों में विभक्त किया गया है-1.पशुविचिन्तनात्मक-पूर्वार्द्ध तथा 2.पक्षिविचिन्तनात्मक उत्तरार्द्ध। दोनों भागों में 190-190 पद्य हैं।

कथानक -
पशुविचिन्तनात्मक-   
                  पशुविचिन्तनात्मक नामक पूर्वार्द्ध भाग में विद्याधर नामक एक वैद्य जो पशु-पक्षियों की बोली के जानकार थे; जंगल में जाते हैं तो वहाँ पर हाथी की अध्यक्षता में आयोजित मनुष्यों द्वारा सताए गए सभी प्रकार के पशुओं की सभा को छिपकर देखते हैं। यहाँ पर बकरा,खरगोश,भैंसा,बैल,ऊंट,अश्व, गधा,भेड़,हरिण आदि पशु मनुष्यों द्वारा निर्दयतापूर्वक उनके प्रति किए जाने वाले बुरे व्यवहार को कहते हैं। जैसे कि एक बकरा  हाथी से अपनी व्यथा को प्रकट करता हुआ कहता है कि इस देश में तरह-तरह के स्वाद वालीं अनेक स्वादिष्ट शाक-सब्जियाँ रोज ही पैदा हो रही हैं लेकिन फिर भी हाय यहाँ अधिकांश मनुष्य मांसाहारी हो गए हैं; यह आश्चर्य दु:खद है-

नाना स्वादुषु शाकेषु देशेsस्मिन्नुद्भभवत्स्वपि।
हन्त मांसाशना भूता मनुष्या अधिसंख्यका:।।

      सभी पशुओं द्वारा अपनी व्यथा बताने के पश्चात् जो अपने क्षणिक स्वाद के लिए इन निरीह पशुओं के मांस को खाते हैं,उन लोगों को धिक्कारते हुए अध्यक्ष हाथी कहता है कि उनकी जीभ की चञ्चलता को धिक्कार है,जिसके वश में होकर वे लोग मांस खाते हैं; और उनकी धन कमाने की उस इच्छा को भी मैं धिक्कारता हूँ, जिसके वश में होकर वे मनुष्य पशुओं को मारते हैं-

धिक् तेषां रसनालौल्यं धिक् तेषां धनगृध्नुताम्।
अदन्ति  यद्वशा  मांसं  पशूंश्च  घ्नन्ति  यद्वशा:।।

         वैद्य विद्याधर जी झाडी में छुपकर बैठे हुए यह सारा वृत्तांत सुनकर दु:खी होते हैं और पशुओं के हितार्थ कोई शुभ कार्य करने का संकल्प लेकर घर लौट आते हैं।

पक्षिविचिन्तनात्मक   -
                पक्षिविचिन्तनात्मक नामक उत्तरार्द्ध भाग में विद्याधर वैद्य जी फिर से जडी-बूटी लेने जंगल जाते हैं तो एक बरगद के पेड पर पक्षिराज गरुड की अध्यक्षता में चल रही पक्षियों की सभा को छिपकर देखने लगते हैं।यहाँ पर भी मुर्गा,तीतर,बटेर,गोरैया, मोर,तोता,कबूतर आदि सभी पक्षियों ने अपने-अपने ऊपर मनुष्यों द्वारा किए गए अत्याचारों को बताया है। मुर्गा अपनी व्यथा को प्रकट करता हुआ कहता है कि अपनी कामवासना की गर्माहट में बढोतरी लाने के लिए, अपनी जीभ की संतुष्टि के लिए तथा अपनी तथाकथित आधुनिकता को साबित करने के लिए हाय अपनी सभ्यता के गुणों की हत्या करने वाले असंख्य मनुष्य यहाँ हम मुर्गों को रोज ही खाते हैं-

कामोष्मवृद्ध्यै रसनाभितुष्ट्यै,तथोक्त-नव्यत्व-निदर्शनाय च।
जना असंख्या हतसभ्यतागुणा:,खादन्ति हास्मानिह नित्यमेव।।

  सभी पक्षियों की व्यथाओं को सुनकर गरुड भी दु:खी होते हुए कहता है कि महावीर,गौतम बुद्ध, गुरुनानक और महात्मा गान्धी के इस भारत देश में पक्षियों खाया जा रहा है,इससे बडी दु:ख की बात और क्या हो सकती है-

महावीरस्य  बुद्धस्य , नानकस्य  च  गान्धिन: ।
खगा: देशेsत्र खाद्यन्ते,दु:खं स्यात् किमत:परम्?

   पशु-पक्षियों के दु:ख-दर्द को सुनकर वैद्य विद्याधर  का मन बहुत दु:खी हुआ और पशु-पक्षियों की मर्मान्तक व्यथाओं को पत्र के माध्यम से देश के राष्ट्रपति के पास भेज दिया ताकि वे अच्छे प्रशासनिक निर्णय लेकर पशु-पक्षियों की समस्याओं का निदान कर सकें। इस प्रकार खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

             खण्डकाव्य के माध्यम से डॉ.हरिनारायण दीक्षित न केवल पशु-पक्षियों के ऊपर मनुष्यों द्वारा किए जा रहे निर्दयतापूर्ण व्यवहार को ही बताना चाहते हैं अपितु दया-ममतापूर्वक इस समस्या के निदान के लिए भी लोगों को प्रेरित करना चाहते हैं। इसीलिए डॉ.दीक्षित ने इस खण्डकाव्य को पशु-पक्षियों को खाने वाले लोगों के लिए ही समर्पित किया है ताकि वे इससे कुछ सीख कर परिवर्तन कर सकें-

भूत्वापि मनुजा लोके येsश्नन्ति पशु-पक्षिण:।
अर्पये स्वमिदं  तेभ्य:  पशुपक्षिविचिन्तनम् ।।

   इस ग्रन्थ के द्वारा कवि ने मानवों के हृदय में पशु-पक्षियों के प्रति गहरी संवेदना को उत्पन्न किया है, मनुष्यों में मनुष्यता का परिष्कार किया है। डॉ.दीक्षित ने अपनी अन्य काव्यकृतियों की भांति इस काव्य को भी माधुर्यप्रसादगुण सम्पन्न वैदर्भी शैली के माध्यम से प्रस्तुत किया है। खण्डकाव्य के लिए निर्धारित मानदण्डों की दृष्टि से भी यह ग्रन्थ उत्कृष्ट कोटि का खण्डकाव्य सिद्ध होता है।

डॉ. ललित नामा

असिस्टेंट प्रोफेसर संस्कृत
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