Friday, June 21, 2024

आधुनिक संस्कृत कविताओं का उत्कृष्ट संग्रह _ समष्टि:

कृति _ समष्टि:



कृतिकार - आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी

विधा _ मुक्तक काव्य

प्रकाशक_ देववाणी परिषद् दिल्ली

संस्करण_ 2014 प्रथम

पृष्ठ संख्या _ 110

अंकित मूल्य_ 200



         आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी का सारस्वत कार्य बहुमुखी है| साहित्य की प्रायः प्रत्येक विधा में आपकी रचनाएं हैं ही, साथ ही शास्त्रों में भी आपकी समान गति है| संस्कृत साहित्य के समग्र इतिहास के द्वारा आपने हाल ही में वैदिक युग से लेकर 21 वीं सदी के प्रारंभ तक के संस्कृत साहित्य के इतिहास को ग्रंथबद्ध किया है| समष्टि: नाम से आचार्य त्रिपाठी जी का छठा काव्य संग्रह प्रकाशित है, जिसमें 30 कविताएं हैं| प्रायः ये कविताएं मुक्तछंदोबद्ध हैं, किंतु कुछ कविताएं पारंपरिक छंदों में भी हैं| 

      


    संग्रह का नामकरण प्रथम कविता समष्टि: के आधार पर किया गया है| लहरों, भंवरों, विवर्तों की समष्टि में कभी कभी एक बुलबुला बन जाता है| बुलबुले के आत्मकथन के माध्यम से कवि कहते हैं_


बुद्बुदस्य जीवनमेव कियत् 

वीचीनामावर्तानां विवर्तानां समष्टौ 

बुद्बुदो बुभूषति 

परन्तु भवति वा न भवति वा 

भवत्यपि यदि, क्षणाय तिष्ठति 

तिष्ठति च एतैः सर्वैः धारितः 

अथ स्फुटति लीयते च । 

कदाचित् क्वचित् एवमपि भवति यत् 

एकस्मै क्षणाय स्थिते बुद्बुदे 

निमेषमात्रं स्वकरैः स्पर्शच्छरणं विधत्ते रविः 

तेन क्षणार्धं विरच्यते बुद्ध्दान्तः 

सप्तवर्णच्छवि इन्द्रधनुः ।


बुलबुले का जीवन ही कितना 

लहर से लहर 

आवर्त से आवर्त 

विवर्त से विवर्त

 इन सबके मिलने से 

वह बन सकता है, 

नहीं भी बन सकता है 

बन भी जाये तो एक क्षण ठहरता है बस

 इन सब के बीच 

फिर फूट कर विलीन हो जाता है। 

कदाचित् कभी ऐसा भी हो जाता है 

कि एक क्षण के लिये टिक गये बुलबुले को 

पलक की झपक के बराबर समय के लिये 

सूरज अपनी किरणों से छू भर देता है 

तब आधे क्षण के लिये बुलबुले के भीतर रच जाता है

 सतरंगी आभा वाला इंद्रधनुष। (कविताओं का अनुवाद स्वयं कवि द्वारा)


              मनुष्य जीवन भी तो बुलबुले के समान ही है, क्षणभंगुर है| लेकिन कभी कभी किसी मनुष्य को एक क्षण के लिए उस परम शक्ति का स्पर्श मिल जाता है और उसका पूरा अस्तित्व बुद्ध के समान खिल उठता है| शब्दालंकार: कविता में शब्दों के लिए कहा गया है कि वे देहली दीप न्याय से कार्य करते हुए अंदर और बाहर दोनों तरफ उजाला करते हैं| बीजानि कविता एक तरफ तो बीजों की अवस्था का चित्रण करती है तो दूसरी तरफ वह मानवों का भी प्रकारान्तर‌ से वर्णन करती दिखती है| मानव भी तो बीजों की जी भांति होता है, हर मानव अपना पूरा विकास चाहता है किंतु कुछ मानवों को प्रतिभा अनुकूल वातावरण के अभाव में विकसित नही होती तो कुछ की प्रतिभा बचपन से ही बलात दबा दी जाती है तो कुछ की प्रतिभा जैसे ही निखरने लगती है वैसे ही उसे दमित कर दिया जाता है_


कानिचिद् बीजानि 

कुशूलकोणे शिष्टानि 

उत्कायन्ते स्म - 

किमर्थं न वयं क्षिप्ताः कस्मिश्चित् केदारे 

कश्चिदस्मान् स्वहस्ते उत्थापयेद् 

अस्मानपि उच्छाल्य उच्छाल्य वपेत् क्षेत्रे

 वयमपि अङ्कुरायामहे, पल्लवायामहे, पत्रायामहे, 

वयमपि शस्यनिवहे आत्मानं विकिरामः

 भवामश्च पुनरपि बीजमेव।

 तेषां स्वप्नाः दिवास्वप्नायिताः।


कुछ ऐसे बीज थे जो गोदाम में पडे पड़े 

अकुलाते रह गये कि

 हमें भी डाल दिया होता किमी क्यारी में 

कोई हमें हाथ में उठाता 

और खेत में उछाल कर फैंकता, 

हम भी अँकुरा लेते 

हम में होते नये पात 

हम अपने आप को फसलों में बिखेर पाते 

और हम फिर से बीज हो जाते।

 उनके सपने दिवा स्वप्न बन कर रह गये।

       


      

शनै: शनै: कविता ग़ज़ल गीत की शैली में रची गई है| वार्धक्यम् कविता एक दीर्घ कविता है जिसमें कवि बुढ़ापे की स्थिति का एक अलग ही तरह का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बुढ़ापा अभिशाप नहीं है| वे देवताओं को अभागा मानते हैं क्योंकि वे चिर युवा होने से बुड्ढे नही हो सकते हैं_


यक्षाणाम् अलकाया 

अतिशेरते 

अस्माकम् इयं पृथिवी 

यस्यां वार्धक्यभावापत्तिः 

अद्यापि सम्भावना वर्तते।


अपक्वानि फलानि पच्यन्ते 

त्यजन्ति वृन्तं स्वं 

यौवनवृन्तं त्यक्त्वा 

मधुरतरं जायते जीवनफलं

 वार्धक्ये स्वीये पर्यवसाने।


यक्षों की अलका से 

कितनी अच्छी है यह धरा हमारी 

जिसमें बूढा हो पाना 

अभी भी संभावना है 

कच्चे फल पक कर 

छोड़ देते हैं 

अपना वृंत 

यौवन का वृंत छोड़ कर 

और मधुर होता जाता है 

जीवन का फल 

बुढापे के पकाव में


 मालवी शीर्षक वाली कविता में कवि इस बात से हैरान हो जाते हैं कि पत्नी से बात करते हुए उनके मुंह से अचानक उनकी मातृभाषा मालवी (जो मध्यप्रदेश के मालव अंचल में बोली जाती है) के कुछ एक वाक्य कैसे फूट पड़ते हैं? भवनस्य छदौ वाटिका कविता में महानगरों में स्थान की कमी के कारण घर की छतों पर बनाए जाने वाले बगीचों का वर्णन है तो प्रस्तरस्थले नगरे कविता पत्थर हो चुकी सभ्यता में पत्थरों के नगरों की विडंबना से भरी दशा का चित्रण करती है_


 प्रस्तरस्य उद्यानानि 

प्रस्तरस्य प्रासादाः 

प्रस्तरशरीराणि 

प्रस्तरस्य मनांसि


प्रस्तर इव अहङ्कारः 

यत्र गम्यते तत्र प्रस्तराः 

प्रतिमानिर्माणाय स्थापिताः 

प्रस्तराणां निचयाः 

प्रस्तराणां प्रतिमाः 

प्रस्तराणां समाधयः 

प्रस्तरायितानि मनांसि 

प्रस्तरायिता बुद्धिः

प्रस्तरनिचये

क्रन्दन्ती पृथिवी।


पत्थरों के उद्यान

 पत्थरों के मकान

 पत्थरों के शरीर 

पत्थरों के मन

 जहाँ देखो पत्थर

 पड़े हुए बुद्धि पर, मन पर

 पत्थरों की प्रतिमाएँ 

पत्थरों की समाधियाँ 

बुत बनाने के लिये पत्थरों के ढेर

पत्थरों के भार तले 

कराहती धरती


       देहल्यां मेट्रोयाने – दृश्यचतुष्टयी कविता में चार दृश्य हैं| दिल्ली में मेट्रो के सफ़र के माध्यम से कवि वर्तमान के किसी बिंदु पर खड़े हुए भूतकाल और भविष्य दोनों का चित्रण करते हैं शायद कवि इसलिए ही क्रांतदर्शी कहे गए हैं| यहां संवेदना शून्य हो चुके हमारे समाज का यथार्थ वर्णन है|

     

 संस्कृत को कवि एक अगाध सरोवर की भांति मानते हैं जिसमें वे स्वयं एक छोटी सी मछली जैसे हैं जो कभी कभी अपनी मुंडी बाहर निकाल कर उन्मुक्त आकाश को देख लेते हैं| किंतु कितने है ऐसे? संस्कृतस्य अगाधे सरसि कविता में इसी का वर्णन करते हुए कवि ठहरे हुए प्रवाह वाले संस्कृत सरोवर के लिए बेबाकी से जो कहते हैं शायद वह तथाकथित पंडितों को पसंद नहीं आए पर कवि तो निरंकुश कहे गए हैं_


संस्कृतस्य अगाधे सरसि 

अवरुद्धः प्रवाहः

 क्वचिद् उत्तिष्ठते शीर्णो दुर्गन्धः 

केचन अस्य सरोवरस्य तटे 

स्थिताः 

गणयन्ति शास्त्रविवर्तान् 

केचन मापयन्ति अस्य गहनताम् 

केचन उत्तानं मुखं कृत्वा

अनवलोक्य सरोवरं

सरोवरविषये कुर्वन्ति प्रवचनम्।

अपरे लग्नाः 

मुहूर्तगवेषणे 

श्रीसत्यनारायणकथावाचने 

तानसौ दुर्गन्धो न प्रतिभाति।


संस्कृत के अगाध इस सरोवर में 

ठहरा हुआ प्रवाह

 फूटती है सड़ी दुर्गंध 

कुछ लोग इसके किनारे खड़े 

शास्त्रों के विवर्त गिन रहे हैं 

कुछ माप रहे हैं इसकी गहराई

 कुछ इसे देखे बिना 

ऊपर मुख किये 

कर रहे हैं प्रवचन

 देख रहे हैं मुहूर्त

 या बाँच रहे हैं श्रीसत्यनारायणकथा

 उन्हें यह दुर्गंध नहीं आती।


    कवि ने परंपरा और समसामयिकता को अपने काव्यों में इस तरह गूंथा है कि वे आधुनिकता की प्रतिनिधि कविताएं बन जाती हैं| कवि कृत हिन्दी अनुवाद भी इसमें साथ में प्रकाशित किया गया है| इस काव्य का प्रकाशन देववाणी परिषद की पत्रिका अर्वाचीनसंस्कृतम् में भी भी किया गया है


Thursday, June 20, 2024

माटी के पुतले की कहानी _ मृत्कूटम्

कृति _ मृत्कूटम् 

कृतिकार -डाॅ भास्कराचार्य त्रिपाठी

विधा _ खण्डकाव्य 

प्रकाशक_गंगानथ झा केन्द्रीय विद्यापीठ, इलाहाबाद 

संस्करण_ 1992 प्रथम

पृष्ठ संख्या _ 50 (+भूमिका और चित्र)

अंकित मूल्य_ मूल्य  अंकित नहीं




         डाॅ भास्कराचार्य त्रिपाठी अर्वाचीन संस्कृत  साहित्य जगत के प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं| दूर्वा के संपादन के साथ साथ आपके लघु रघु, अजाशती, स्नेहसौवीरम्‌ जैसे काव्यों की रचना से आपने महती ख्याति अर्जित की | मृत्कूटम् आपके काव्यों में मुख्य है| यह एक शतक काव्य है, जिसमें 100 श्लोक निबद्ध हैं| इसका अपर नाम मानवशतक भी है| कवि ने इसमें मानव जीवन की भ्रूण अवस्था से लेकर उसके मृत्यु के द्वार तक पहुंचने की यात्रा को दस भागों में बांटकर श्लोकों की रचना की है| प्रत्येक भाग में दस श्लोक हैं_ भ्रूण,  शिशु, किशोर, तरुण, गृहस्थ, प्रवासी, भृतक, प्रौढ़, जरठ,‌मुमूर्षु


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           जब जीवात्मा इस संसार में आती है तब उसे एक शरीर की आवश्यकता होती है| इस हेतु वह भ्रूण के रूप को ग्रहण कर मां के गर्भ में अवस्थित हो जाती है| कवि ने गर्भ में भ्रूण की स्थिति का वर्णन करते हुए अदभुत कल्पना की है कि वह मां के गर्भ में रहता हुआ मानों दस अवतारों को ही ग्रहण कर लेता है_


मीनो नीरप्रचारी निचुलितकमठः कम्रघोणो वराहः 

कालेनाविद्धरोमा नरहरिरपरो विग्रही वामनश्च, 

मातुः पीडाप्रदायी परशुनखधरः प्रीणनो रामभद्रः 

कृष्णो दामोदरश्रीरयमिह सुगतः कल्किरेको विभाति ।

        यह अकेला ही दस अवतारों का बाना अपनाता है-पानी में तिरता मीन, खोल में दुबका कछुआ, भड़कीली नासिका वाला शूकर, रोम-राजियों से युक्त नरसिंह, एक बौना आदमी, उपजते नाखूनों से माँ के लिए कष्टदायी परशुराम, उसके अन्तर्मन में हुलास भरने वाला राम, पेट में रस्सियों से जकड़ा बढ़ता आ रहा कृष्ण, सर्वज्ञ बुद्ध और (शस्त्रपाणि) साक्षात् कल्कि । (अनुवाद स्वयं कवि कृत)

              यहां कवि ने भ्रूण को सात परत के गर्भजाल में बंधने। वाला कहा है_ कामं सप्तच्छदान्तः प्रवलितगुरुणा गर्भजालेन बद्ध:| 

            भ्रूण  रूप से जब मानव इस पृथ्वी पर जन्म लेकर आता है तब शिशु  रूप में वह सब का मन मोह लेता है| वह सब का दुलारा बन जाता है किंतु  उसके लिए पूरा विश्व ही मां के रूप में सिमट आता है_



मात्रा वाङ्नेत्रमैत्री सहजपरिचितो मातृवात्सल्यगन्धः

 संलापो मातृभाषा-प्रचलितवचनच्छायया कम्रकाकुः, 

मात्रङ्के स्तन्यपानं कपिकुलकलया सर्पणं मातृभूमौ

 विश्वं मातुः स्वरूपे भवति परिणतं गर्भरूपाय तस्मै ।


        माँ से बतियाने और टुकुर टुकुर निहारने की लगन, अपने आप चोन्ही गई उसकी दुलार-सुगन्ध, बोलने में मातृभाषा के ही आरोह-अवरोह, माँ की गोद में दूध पीना और मातृभूमि पर बंदर की तरह सरकना... नन्हें बालक के लिए सारा विश्व ही माँ के स्वरूप में सिमट आता है। 

           जब मनुष्य युवा होता है तब वह अपने यौवन के मद्य में मस्त रहता है | उसे संसार की अन्य वस्तुओं को अपेक्षा नहीं रहती| वह एक मदमत्त गज के समान अपनी गर्वयुक्त चाल से दूसरों की उपेक्षा करते हुए  चलता है| मानव की तरुण अवस्था का चित्रण करते हुए कवि कहते हैं कि यदि कुबेर यौवन और धन में से एक का चयन करने के लिए कहे तो वह निश्चित ही यौवन का वरण करेगा| _



साक्षादग्रेऽवतीर्णो यदि नवयुवकं राजराजोऽनुयुङ्‌क्ते

 किन्ते प्रेयो नितान्तं वद भयरहितो यौवनं वा धनं वा, 

तत्तूर्णं सोऽभिदध्यात् प्रथमचयनिका रोचते देव मह्यं

 यत्ते वस्तु द्वितीयं तदु निजवसतौ किन्नरेभ्यः प्रदेयाः ।


            यदि कभी कुबेर सामने आकर नवयुवक से पूछे कि निर्भय होकर बताना - तुम्हें क्या अधिक प्रिय है, यौवन या धन ? तो बह शीघ्र ही कह देगा-देव मुझे पहले का चयन अच्छा लगता है, जो आपकी दूसरी बस्तु है- उसे अपनी बस्ती में किन्नरों को बाँट दीजिए ।

‌‌                     किंतु यही तरुण जब गृहस्थ बन जाता है तो वह एक तरह से अपनी नववधू के समक्ष आत्म समर्पण ही कर देता है_


एकाकिन्या भ्रुवाऽयं वरयति तरुणो भाविनीमंकलक्ष्मी- 

मेकस्मात् कम्प्रशब्दाद् भवति च विजितो निष्प्रतीकार एव, 

एकान्तस्वप्नशीलः प्रथमयुगलिका-कौतुकाकृष्टचेता 

एकस्मिन् ग्राम्यगीते गतिमयचरणो जायतेऽसौ गृहस्थः ।


         एकान्त-स्वप्नदर्शी तरुण एक भौंह के इशारे से भावी अंकलक्ष्मी का वरण करता है, एक लरजते शब्द से बेबस आत्म-समर्पण कर देता है और (आदि मानव के) युगलकौतूहल से आकर्षित एक देसी धुन पर पैर चलाता हुआ गृहस्थ बन जाता है।



         क्रमशः जीवित रहता हुआ मनुष्य जब वृद्धावस्था  से जब मुमूर्षु अवस्था में पहुंचता है तब उसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ने लगता है| एक श्लोक में कवि ने शरीर को वेदनाओं का छंद शास्त्र कहते हुए वंशस्थ , मंदाक्रांता भुजंगप्रयात आदि छंदों का नाम श्लेष के माध्यम से लिया है| तो एक स्थान पर कवि ने मुमूर्षु अवस्था को सर्वाहारी लोप वाले क्विप प्रत्यय के समान बताया है क्योंकि इसके एक एक करके सब साथ छोड़ने लगते हैं_

ज्ञानं प्राज्याभिमानं भजति भिदुरतां सन्धिभिः कीकसानां 

कोषस्थं स्वापतेयं व्रजति ननु समं श्लेष्मभिर्नालिकासु, 

सम्पन्ना मित्रमाला त्यजति परिचयं कृच्छ्रनिःश्वासकम्पैः

 कालोऽयं क्विप्चरित्रो यजति न किमरे विश्वजित् सत्रमेव ।



        अस्थि-सन्धियाँ और अभिमान भरे ज्ञान एक साथ दरक रहे हैं, कोष- संचित धन और कफ आदि विकार नालियों में बह रहे हैं, मित्र मण्डली और बीवा भरी साँसें संग-संग पहचान छोड़ रही हैं। (सर्वापहारी लोप वाले) निवषु प्रत्यय की तरह, लगता है, यह अवस्था (नशेष दान का) विश्वजित् यज्ञ कर डालेगी ।

‌ ‌ ‌ ‌                     आखिर में माटी का पुतला माटी में में ही मिल जाता है_

मृत्स्नायाः संप्रजातः सुचिरमवकलन्मृत्तिकाभिर्विनोदं 

मृत्सार्थं सस्पृहोऽभूदुचितमनुचितं सर्वमर्थं व्यतार्षीत्, 

सम्प्रत्येवंच लोष्टैरपिहितविवरे चत्वरेऽसौ मृदायाः 

शेते विश्रान्तबोधो निपतति नियतं मृत्तिकायां मृदंशः ।


माटी से उपजा, माटी के खेल खेले। एक चिकनी मिट्टी पर ललचाया । अपनी-पराई धन-संपदाएँ लुटा दीं। अब तो ढेलों से ढंकी गई खाई पर बने माटी के ही चबूतरे में यह संज्ञाहीन होकर लेट गया है। मिट्टी का प्रत्येक आकल्पन मिट्टी में मिलने को बाध्य होता है।



       माटी के पुतले की यह कथा कवि के कथ्य में आकर कविता का रूप ले लेती है| यह ही मानव जीवन की विभिन्न दशाओं का सत्य है, जिसे कवि ने बखूबी अपने काव्य में प्रकट किया है| 



   

Wednesday, June 19, 2024

जीवन दृष्टि से युक्त मुक्तककाव्य _ जीवनमुक्तकम्

कृति _ जीवनमुक्तकम्

कृतिकार - शंकर देव अवतरे 

विधा _ मुक्तक काव्य 

प्रकाशक_साहित्य सहकार , दिल्ली

संस्करण_ 1990 प्रथम

पृष्ठ संख्या _ 303

अंकित मूल्य_ 120 रुपए 





       संस्कृत साहित्य में मुक्तककाव्य विधा में अनेक काव्य रचे गए हैं| इनके विषय प्रायः सूक्ति, स्तुति, प्रशस्ति, शृंगार आदि पर आधारित होते हैं| किंतु कवि अब इन काव्यों में समसामयिक विषयों पर भी कविताएं लिख रहा है| शंकर देव अवतरे की रचनाएं हिन्दी और संस्कृत दोनों में ही प्राप्त होती है| नारीगीतम् नाम से इनका एक काव्य अत्यंत प्रसिद्ध रहा है| जीवनमुक्तकम् काव्य संग्रह में कवि ने जीवन संबंधी स्फुट पद्य लिखे हैं, जो परस्पर निरपेक्ष हैं| इस संग्रह में पारंपरिक छंदों में लिखे गए 375 पद्य निबद्ध हैं| संग्रह के प्रारंभिक पद्यों में भक्ति भावना से युक्त श्लोक हैं, कवि कहता है कि  भाषा के रूप में जब सरस्वती ज्ञान विज्ञान के बोझ से थक जाती है तो भक्ति रूपी गंगा के प्रवाह में स्नान करके ही उसे शांति प्राप्त होती है_


ज्ञानविज्ञानभारेण परिश्रान्ता सरस्वती 

भक्तिगंगाप्रवाहेण क्षालिता शान्तिमृच्छति ||

 



         कविता मात्र शब्दों का जोड़ तोड़ नहीं है अपितु वह तो कवि की संवेदनाओं में सिक्त होकर ही अपनी अर्थवत्ता प्रकट करती है_



न वसुधा वसुधान्यवती न या 

न रजनी रजनीश्वरवञ्चिता 

न दयिता दयितासुरसा न चेत्

न कविता कवितापविवर्जिता ||


       अर्थात्  वह भूमि बेकार है जिसमें धन-धान्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। वह रात्रि अच्छी नहीं लगती जिसमें चन्द्रमा का प्रकाश नहीं है। वह प्रिया नहीं है जो अपने प्रिय को प्राणों (जीवन) का रस नहीं दे सकती  और वह कविता भी नहीं के बराबर है जो कवि की हार्दिक वेदना या संवेदना से अछूती होती है| यहां यमक अलंकार का भी सुंदर प्रयोग किया गया है, जो द्रुतविलंबित छंद में निबद्ध है| 

             वर्तमान समय में सहिष्णुता प्रायः विलुप्त हो चुकी है| लगता है हम अपनी धर्म निरपेक्षता को कहीं ताक पर रख कर भूल गए हैं| ऐसी स्थिति में कवि का कर्तव्य बनता है कि वह अपने पाठकों, श्रोताओं को उसका स्मरण कराता रहे_


 कस्यापि धर्मस्य मतावलम्बिना

 परस्य धर्मो न कदापि गर्ह्यताम्

 विश्वासमन्यस्य सदैव विश्वसे - 

दियं समाजस्श्रितिरौपपत्तिकी ||

                      अर्थात्  किसी भी धार्मिक सिद्धान्त को मानने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी दूसरे के धर्म की निन्दा न करे। क्योंकि धर्म तात्त्विक रूप में विश्वास का ही पर्याय है इसलिए एक दूसरे के विश्वास पर विश्वास करना ही चाहिए तभी एक-दूसरे के धर्म का सन्मान हो सकता है। सामाजिक मर्यादा का यही तकाजा है, अन्यथा समाज तितर-बितर हो जाएगा। 

        कवि ने वर्तमान राजनीति की दशा पर भी चिंता प्रकट की है| प्रजातन्त्र मे जनशक्ति, धनशक्ति  और पदशक्ति से प्रभावित होकर वोट दिया जाता है, उसी का परिणाम यह होता है कि नेता नाट्यशास्त्र के धृष्ट नायक के समान प्रजातंत्र का गला घोंट देता है_


जनस्य शक्तिश्च धनस्य शक्तिः

 पदस्य शक्तिश्च मतग्रहेषु 

व्यक्तेः प्रमाणीक्रियते न वृत्तम्

कृता प्रजातन्त्रविडम्बनेयम्  ||


प्रार्थयन् यो मतात् पूर्वं पश्चाल्लोकं कदर्थयन् 

धृष्टनायकवन्नेता स प्रजातन्त्रघातकः ||


एक श्लोक में मनुष्य जाति पर व्यंग्य किया गया है जो पहले महापुरुषों को मारकर  उनकी समाधि बनाती है फिर उन पर रोती  है_


पूर्व स्वेनैव हत्त्वा निजयुगपुरुषान् निघृणा मर्त्यजातिः

 पश्चात् तेषां समाधिं रचयति रचयन्त्यश्रुधारां मुखाग्रे

 पुंश्चल्या वृत्तमेतद् रहसि निजपतिं यत् स्वयं मारयित्त्वा

 पश्चात् पिण्डेन सार्धं समुचितविधिना सा सतीत्त्वं प्रयाति ||


अर्थात् यह नृशंस मानव जाति पहले तो अपने युगपुरुषों को अपने हाथ से मार देती है और पीछे मुंह पर आंसू बहाती हुई उन्हीं महापुरुषों की समाधि  बनवाया करती है। यह कुछ-कुछ उस कुलटा स्त्री के समान है जो पहले तो एकान्त में अपने पति की हत्या करती है परन्तु पीछे उसकी ल्हाश के साथ विधिपूर्वक सती होने का ढोंग करती है।



   कवि ने नारी विषयक अच्छे श्लोकों की रचना की है, जिनमें दांपत्य का भी सुंदर चित्रण किया गया है| कुछ श्लोक प्राचीन श्लोकों की भांति सूक्तिपरक हैं| श्लोकों के साथ उनका हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में अनुवाद भी दिया गया है| 




Tuesday, June 18, 2024

ऐतिहासिक खंडकाव्य _श्रीमदूधमसिंहचरितम्

कृति _ श्रीमदूधमसिंहचरितम्



कृतिकार _ ऋषिराज पाठक

विधा _ खंडकाव्य 

प्रकाशक_देववाणी-परिषद्, दिल्ली आर-६, वाणीविहारः, नवदिल्ली-११००५९ (भारतम्) ०११-२८५६१८४६

संस्करण_ 2019 प्रथम

पृष्ठ संख्या _ 76

अंकित मूल्य_ 300 रुपए 



संस्कृत साहित्य में खंडकाव्य की सुदीर्घ परंपरा रही है| विविध विषयों पर अर्वाचीन साहित्य में भी अनेक खंडकाव्य रचे जा रहे हैं| युवा कवि ऋषिराज पाठक गीत, संगीत और साहित्य रचना में सतत संलग्न रहते हैं| युवा कवि का प्रथम काव्य संग्रह खंडकाव्य विधा में प्रकाशित हुआ है| यह एक ऐतिहासिक खंडकाव्य है| स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुख ऊधम सिंह के जीवन और उनके स्वतंत्रता आंदोलन में किए गए योगदान से परिचित करवाने के लिए यह काव्य रचा गया है| 


                 13 अप्रैल 1919 को हुआ जलियांवाला बाग हत्याकांड इतिहास के घोर नृशंस हत्याकांडों में से एक है| प्रस्तुत खंडकाव्य में इस हत्याकांड के समय ऊधम सिंह द्वारा की गई प्रतिज्ञा और उसकी पूर्ति को केंद्र में रखा गया है| खंडकाव्य में 60 श्लोक हैं जो अनुष्टुप छंद में हैं| 

                                  कवि भारतभूमि को नमन करता हुआ कहता है कि वह राष्ट्र के जनमानस में क्रांति का संचार करने वाले चरित का वर्णन कर रहा है_


देशभक्तिरसस्नातान् 

मातृभूमिसुतान् भटान्। 

वीरान् नत्वा तथा कुर्वे 

चरितं वीरतामयम्॥


श्रीमदूधमसिंहस्य 

राष्ट्रभक्तिप्लुतं महद्। 

वन्द्यं संक्रान्तिसंचारं

 राष्ट्रमानाभिवर्धकम् ॥

  


कवि आगे वर्णन करता है कि 1899 में पंजाब प्रांत में पटियाला भूमि के सुनाम नामक गांव में सिक्ख परिवार में ऊधम सिंह का जन्म हुआ| इनके बचपन का नाम शेरसिंह था_


शेरसिंहाभिधानोऽयम् 

ऊधमोऽपि प्रकीर्तितः। 

आदरः सरदाराणाम् 

उदारः शत्रुदारणः ॥


यहां अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है| माता और पिता की जल्द ही मृत्यु हो जाने से ये एक अनाथालय में रहे और वहीं सिक्ख धर्म की शिक्षा ग्रहण की| जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय इनकी आयु महज 20 वर्ष थी| ऊधम सिंह उस हत्याकांड के समय वहीं उपस्थित थे| जनसमूह रोलेक्ट एक्ट का विरोध करने के लिए वहां एकत्रित हुआ था| कर्नल डायर के आदेश से सैनिकों ने बर्बरता पूर्वक जनसमूह का संहार किया_


यदाङ्ग्लो डायरो दुष्टो

विद्रोहं ज्ञातवानिमम्। 

तदादिशद् विघाताय 

निःशस्त्राणां सभामहे ॥


डायरादेशतस्तत्र 

सेनया प्रहृतं ततः। 

चक्ररूपभुशुण्डीभिर् 

अग्निगोलकवृष्टिभिः॥



लोगों के भागने के लिए एक दरवाजा था इस भी बंद कर दिया गया और प्राण बचाने के लिए कुंए में कूद गए और मारे गए_


अनेके कूर्दिताः कूपे 

प्राणरक्षाकृते जनाः। 

शवानां पर्वतस्तत्र 

क्षणे कूपे स्थितः परम्॥


इस नरसंहार से आहत होकर ऊधम सिंह ने डायर को मारने की प्रतिज्ञा की_


नरसंहारसंभारं 

दृष्ट्वा भीष्मप्रतिज्ञया। 

ऊधमसिंहवीरोऽसौ 

संकल्पं कृतवान् दृढम्॥


डायरं मारयिष्यामि 

नूनमेष दृढव्रतः। 

एतदेवास्ति लक्ष्यं मे 

चिन्तयामास तद्गतः॥

       

            

                        ऊधम सिंह ने इस दौरान हथियार जुटाने के लिए भी परिश्रम किया | इस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा| अंततः कई मुसीबतों को झेलते हुए, विदेशी यात्राएं करते हुए 13 मार्च 1940 को अर्थात हत्याकांड के लगभग 21 वर्ष बाद लंदन के किंगस्टन शहर में डायर को मौत के घाट उतार दिया और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की_


समारोहस्य तस्यान्ते

 तूर्णं स्वीयासनादसौ। 

उत्थाय डायरे तिस्रो 

गोलिकाः प्रजहार ह॥


डायरान्ते जगादोऽसौ 

वाक्यमेतत्प्रहर्षितः । 

प्रतिज्ञातो मया पूर्वः 

संकल्पः पूरितोऽधुना ॥



लंदन में ही 31 जुलाई को वीर शहीद को फांसी दे दी गई| 

        यहां गौरतलब है कि रेजिनल्ड् एडवई हैरी डायर और माइकल ओ डायर, दोनों भिन्न-भिन्न थे। रेजिनल्ड् एडवर्ड हैरी डायर जलियाँवाला बाग की क्रूर हिंसा का मुख्य अपराधी था, जबकि माइकल ओ डायर, जिसने इस हत्याकाण्ड की प्रशंसा की थी, मुख्य सैन्याध्यक्ष था। रेजिनल्ड् एडवर्ड हैरी डायर २४ जुलाई १९२७ को मस्तिष्क आघात से मृत्यु को प्राप्त हो गया तथा श्री ऊधमसिंह जी ने १३ जुलाई १९४० ई. को लन्दन में जाकर माइकल ओ डायर का वध कर दिया। इस काव्य में इन दोनों के पार्थक्य का उल्लेख न करते हुए दोनों के लिए मात्र एक ही 'डायर' शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका संकेत स्वयं कवि ने काव्य के प्रारंभ में प्राग्वाचिकम् में किया है किंतु काव्य के श्लोकों में कहीं भी इसका संकेत नहीं है| इसको स्पष्ट करते हुए कथा को और आकार दिया जाना चाहिए था| 



          खंडकाव्य को मूल संस्कृत के साथ हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया गाय है| हिंदी अनुवाद मुनिराज पाठक ने, अंग्रेजी अनुवाद सत्यार्थ ग्रोवर ने और पंजाबी अनुवाद गुरदीप कौर ने किया है| परिशिष्ट में काव्य की कथा से संबंधित चित्र भी दिए गए हैं| सत्य घटना पर आधारित यह ऐतिहासिक खंडकाव्य स्वागतयोग्य है| 


 



Wednesday, May 29, 2024

नवीन संस्कृत गजल संग्रह _ संगता

कृति - संगता 

लेखक - राजकुमार कुमार मिश्र कुमार

विधा - ग़ज़ल संग्रह

प्रकाशक - सत्यम पब्लिशिंग हाउस , नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष -2021

पृष्ठ संख्या - 106

अंकित मूल्य - 400रु/-

                


               संस्कृत के युवा कवियों में राजकुमार मिश्र सुपरिचित नाम है| युवा कवि को साहित्य अकादेमी का युवा पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त हैं| कवि मिश्र पारंपरिक छंदों के साथ साथ ग़ज़ल, लोकगीत आदि की शैली में भी काव्य रचते हैं| संस्कृत युवा ग़ज़लकारों में भी राजकुमार मिश्र लोकप्रिय हैं| कुमार तखल्लुस (उपनाम) से लिखने वाले कवि राजकुमार के दो ग़ज़ल काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं| प्रथम संकलन 2020 में अभिज्ञान नाम से प्रकाशित हुआ,जिसमें 60 ग़ज़ल संकलित हैं| प्रस्तुत संकलन में 40 ग़ज़ल हैं| आत्मोद्गार में कवि कहता है कि संस्कृत ग़ज़ल रचना संसार में युगकवि अभिराज राजेंद्र मिश्र के पश्चात वह ही ऐसे ग़ज़ल कार हैं जिन्होंने संस्कृत में 100 ग़ज़ल लिखी हैं _

                                 अस्मिन् काव्यसङ्ग्रहे चत्वारिंशद् गलज्जलिकाः सङ्कलिताः सन्ति। यथाऽहं विभावये संस्कृतगलज्जलिकारचनासंसारे शताधिकगलज्जलिकानां स्चयिता इदानीं राष्ट्रे केवलः कविवरो युगकविः अभिराजराजेन्द्रमिश्रोऽस्ति। काममिदानीम् अनेके कवयो गलज्जलिकाविधायामस्यां प्रभूतं लिखन्ति तथापि कोऽपि अन्यः कविः गलज्जलिकालेखने शतं संख्यां न स्पृशति, दिष्ट्या अभिराजानन्तरम् अहं सञ्जातोऽस्मि इदानीं शतं संख्याकानां गलज्जलिकानां द्वितीयो रचयिता।

                         संग्रह की शुभाशंसा में dr राजेंद्र त्रिपाठी रसराज कवि के दावे को स्तुत्य और सराहनीय बताते हैं| किन्तु 1987 में प्रकाशित पिपासा नामक ग्रंथ में dr जगन्नाथ पाठक की 200 संस्कृत ग़ज़ल संकलित हैं तथा कवि महेश झा का संग्रह गलज्जलिकाशतकम 2014 में प्रकाशित हो चुका है| पिपासा के प्रकाशन के समय तक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री और जानकीवल्लभ शास्त्री जी प्रसिद्ध संस्कृत ग़ज़लकार थे जिनका नाम उल्लेख स्वयं कवि पाठक जी ने किया है| अस्तु 



                                    संग्रह का प्रारंभ तस्मै नमश्शम्भवे शीर्षक युक्त ग़ज़ल से होता है| दूसरी ग़ज़ल में सत्मार्ग पर चलने जैसी नीति की बातें सरस तरीके से कही गई हैं_


दूर्जनान् दूरतो नमेर्बन्धो ! 

मन्त्रमेनं सदा जपेर्बन्धो ! ।।

नाऽधुनाऽस्मिन् वने निजः कश्चित् 

वीक्ष्य कण्टान् ततस्सरेर्बन्धो !॥


श्रवणं न वरम् शीर्षक ग़ज़ल के एक शेर में कवि बड़ी प्यारी बात कहता है_


न शिक्षितं चेत् काऽपि हानिर्नो 

हठात् परं ते तरणं न वरम्॥

          अर्थात् यदि तुम्हे तैरना नहीं आता तो कोई बात नहीं पर तुम्हारा इस तरह हठ पूर्वक तैरना ठीक नहीं| पितर्दुःखितोऽहम् ग़ज़ल मार्मिक है, जो elegy यानी शोकगीत की श्रेणी में भी आती है| कवि ने अपने पिता के मृत्यु के पश्चात् उनका स्मरण करते हुए यह ग़ज़ल लिखी है_

                 


अनाथान् विधाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् 

श्रुतो नाऽन्तिमस्ते स्वरो भावपूर्णः पितर्दुःखितोऽहम्।।

जगन्नीरसं हा श्मशानायमानं मुहुर्भावयेऽहम् 

अकस्माद् विहाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् ।।


            कवि कहीं अन्योक्ति की शैली का भी प्रयोग करता है_


मानसं गन्तुकामोऽप्यसौ हंसराट्

पल्वले स्थातुकामोऽद्य चित्रा स्थितिः॥

नैव पूर्वं रुचिर्यस्य तस्मिन् बके 

तस्य सङ्गे स लीनोऽद्य चित्रा स्थितिः॥


     संग्रह की एक ग़ज़ल कोरोना के विभीषिका पर भी आधारित है_


इदानीं जीवनं विश्वे विपर्यस्तं हि विश्वस्मिन् 

विषं सर्वत्र सूतेऽयं विषाणुर्हा करोनाख्यः ।।

समस्ते मानवे यत्रेश्वरस्याऽऽसीत् पुरा वासः 

समन्तात् तत्र सञ्जातो विषाणुर्हा करोनाख्यः॥

 बहिस्स्थानां कथा का स्यात् सृताऽऽत्मभ्यो जनेभ्यो भीः

 विधत्ते किन्न दुर्दृश्यं विषाणुर्हा करोनाख्यः ॥



          कवि को शैली प्रायः अभिराज राजेंद्र मिश्र की ग़ज़ल शैली से मिलती है, जिसका संकेत शुभाशंसा में राजेंद्र त्रिपाठी रसराज ने भी किया है| इन ग़ज़ल का साथ में हिन्दी अनुवाद भी स्वयं कवि द्वारा किया गया है,‌जो इसकी उपादेयता को बढ़ा देता है| संस्कृत ग़ज़ल संग्रहों की वृद्धि करने वाले इस संकलन का आगमन स्वागत योग्य है| 

Tuesday, May 28, 2024

परमानन्दशास्त्रिरचनावलिः

कृति - परमानन्दशास्त्रिरचनावलिः

लेखक - परमानन्द शास्त्री

प्रधान सम्पादक - प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री

सम्पादक  - सत्यप्रकाश शर्मा

प्रकाशक - राष्टिय संस्कृत संस्थान , नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष -2016

पृष्ठ संख्या - 22 +,882

अंकित मूल्य - 720रु/-



                 अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के सुपरिचित कवि परमानन्द शास्त्री नूतन विधाओं और नूतन कथ्य के लिए सुपरिचित हैं | परमानन्द शास्त्री‌ जी की रचनाओं को एक स्थान पर लाने का सुकार्य किया है राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ने और संपादन का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है सत्यप्रकाश शर्मा जी ने| रचनावली के प्रारंभ में सत्यप्रकाश जी ने परमानन्द शास्त्री जी लें जीवन और कर्तृत्व का संक्षिप्त परिचय दिया है, जिससे ज्ञात होता है कि कवि परमानन्द शास्त्री जी का जन्म उत्तरप्रदेश के मेरठ मंडल के अनवरपुर गांव में  हुआ था| विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ाते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कवि ने लंबे समय तक कार्य किया और यही से सेवानिवृत्त हुए| कवि ने संस्कृत के साथ हिंदी में भी लेखन कार्य किया है| प्रस्तुत रचनावली में 2 संस्कृत महाकाव्यों के साथ अन्य 12 रचनाओं का संकलन हैं| कुछ काव्यों का हिंदी अनुवाद भी साथ में दिया गया है| इन रचनाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है




1 जनविजयम्

                         यह महाकाव्य विधा में रचा गया है| स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में हुई कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को लेकर कवि ने महाकाव्य का कथानक रचा है| यह 15 सर्गों का महाकाव्य है, जिसमें भारत में लागू हुए आपातकाल के समय की घटनाओं का वर्णन मुख्य रूप से किया गया है| इसका प्रथम प्रकाशन 1978 में हुआ था| अंतिम सर्ग में कवि का उद्बोधन भी है_

'रे पीडकाः ! क्रीडथ राजनीत्या, सभासु चाश्वासनदानदक्षाः! 

नेतार आलक्ष्यमतान्धमुग्धाः !, निबोधतादेष जनो ब्रवीति  ।


कियच्चिरं वेत्स्यथ मूढकं मां, कियच्चिरं लुण्ठथ मे मतानि ? 

भाग्येन खेला च कियच्चिरं मे, कियच्चिरं ब्रूत विशोषणं च ॥

                   कवि ने हड़ताल के लिए हठतालम्, नसबंदी के लिए शिराबन्धः, बंकर के लिए गुप्तसैन्यकक्ष शब्दों का प्रयोग किया है| 


2 चीरहरणम्

                       12 सर्गों का यह महाकाव्य यूं तो महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की घटना पर आधारित है किंतु इसमें हमारा वर्तमान समाज भी प्रतिबिंबित होता है| 11 वें सर्ग में द्रौपदी के मुख से भारतीय नारी की दशा दिखलाई गई है-

दृढतरं कुशलं पुरुषा व्यधुर्यदबलाचरणे बहुशृङ्खलाः।

 शिथिलयन्ति गतः किमुदारतामतितरां कतिचिन्न तदुत्सवे ।।

                         पुरुषों ने नारी के पाँव में कुशलता और दृढता के साथ जो बहुत सी शृङ्खलाएँ डाली हैं, उनमें से कुछ को वे उदार (?) बनकर उत्सवों में किसी प्रकार शिथिल कर देते हैं|


'प्रकृतिहीनगुणास्म्यबला मृदुः पुरुषसेव्यतया विधिना कृता।'

 इति बलादनुभावयताङ्गना बत नरेण कदा नहि वञ्चिता।॥

                                  'मैं स्वभाव से ही हीनगुण हूँ, अबला हूँ, विधि ने मुझे पुरुष की सेवा के लिए ही बनाया है' बलात् इस प्रकार का अनुभव कराते हुए पुरुष ने नारी को कब नहीं ठगा? 


3 गन्धदूतम्

                     मेघदूत की शैली में लिखे गए इस दूतकाव्य में पूर्वगंध और उत्तरगंध नाम से दो भाग हैं|  इनमें क्रमशः 78 और 82 श्लोक हैं| प्रथम भाग में किसी पति के विषम चरित्र को देख कर पत्नी पीहर चली जाती है| पति आत्मग्लानि से भरकर वाराणसी में स्थित अपनी पत्नी के पास संदेश भेजने के लिए गंध को दूत बनाता है_ 

सौम्यामोद ! त्वमसि विदितो मोददायीति लोके 

सर्वत्रापि प्रसरसि मरुद्द्यानरूढो जगत्याम्। 

वाराणस्यां वसति दयिता मानिनी मन्मदीया

 सन्देशं मे नय घटयितुं द्वन्द्वमद्यावयोस्त्वम्।।

               अर्थात् सौम्य आमोद ! तुम संसार में प्रसन्नता प्रदान करने वाले (के रूप में) प्रसिद्ध हो। वायु पर सवार होकर संसार में सर्वत्र विचरण करते हो। मेरी रूठी हुई प्रियतमा वाराणसी में रह रही है। हम दोनों का मिलन करने के लिए तुम मेरा संदेश ले जाओ ।। 

                     यहां पति के निवास स्थान से वाराणसी की यात्रा का मार्ग बतलाया गया है| फरीदाबाद, आगरा, फिरोजाबाद, कानपुर, प्रयाग होते हुए गंध को वाराणसी पहुंचना है| मार्ग में आए ताजमहल का वर्णन कवि कुछ यूं करता है_

पाषाणेषु स्फुटविलसनं शिल्पिनां कल्पनायाः 

स्नेहव्यक्तेः प्रणयिमनसो व्योमचुम्बि-प्रकारम्। 

सौन्दर्यस्य प्रसभमचलोद्‌भेदमुद्यत्प्ररोहम्

 मृत्योर्जेत्रं कुमुदविशदं चाट्टहासं कलायाः ।



गत्वा ताजं तत उपवने शीतकुल्या विगाह्य 

मोदस्पन्दं सुभग ! विहरेर्वाटिकायां सुमानाम्। 

प्राप्ते सर्वः परममुदितो जायते ज्ञातिबन्धौ 

पाराध्यैकव्रतिनि ललिते किं पुनस्त्वादृशे तु ॥

                         अर्थात् ताजमहल जहाँ पत्थरों में शिल्पियों की कल्पना का विलास फूट पड़ा है, जो प्रेमी-हृदय का स्नेह व्यक्त करने का एक आकाशचुम्बी ढंग है, अटल पृथ्वी को फोड़कर निकलता हुआ सौन्दर्य का अङ्‌कुर है और कुमुद के समान निर्मल मृत्युञ्जय अट्टहास है-उस ताजमहल में जाकर (वहाँ) उपवन की शीतल नहरों का अवगाहन कर सुगन्ध और आनन्द की थिरकन के साथ पुष्पवाटिका में विहार करना। अपने जाति-बन्धुओं के आने पर सभी प्रसन्न होते हैं फिर सदा परोपकार का ही व्रत धारण करने वाले तुम जैसे ललित व्यक्ति के आने की तो बात ही क्या

           उत्तरगंध में वाराणसी का वर्णन करते हुए पति अपना संदेश पत्नी को सुनाता है और अपने कृत्य की क्षमा याचना करता है| यहां कवि शराबी लोगों की दुर्दशा का वर्णन भी करते हैं|  यहां प्रसिद्ध संस्कृत विश्वविद्यालय और हिंदू विश्वविद्यालय का भी वर्णन प्राप्त होता है| लंका नामक प्रसिद्ध मुहल्ले का भी वर्णन है| 



4 परिवेदनम् _

                     ‌‌यह खंड काव्य शोकगीत elegy की श्रेणी में आता है| इसकी रचना 1980 में उस  समय की गई थी जब इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हुई थी| प्रस्तुत काव्य में 105 श्लोक हैं_

अयि राष्ट्रविचिन्तनामते ! 

तव शोको न ममैव केवलम्।

 इह कोऽपि मृतो गृहे गृहे

 सकलो लोक इवाद्य रोदिति ।


5 वानरसंदेश:_

                      दूतकाव्य (संदेश काव्य) की विधा में लिखा गया यह काव्य एक तरफ तो कालिदास की शैली का स्मरण करवाता है तो दूसरी और वर्तमान राजनीतिक वातावरण की विडंबना पर प्रहार करता हुआ उसे आईना दिखाता है|  काव्य का नायक  वानर को दूत बनाकर उसे अलीगढ़ से दिल्ली भेजना चाह रहा है और उसकी प्रेयसी है कुर्सी_ 


आस्ये हास्यं कथमिह सखे प्रेयसीत्थं निशम्य 

बाढं साऽऽस्ते मम खलु, वदाम्येहि, भूयः शृणुष्व। 

आसन्दीति प्रकृतिपुरुषैरद्य नव्यैश्च कुर्सी- 

त्याख्याता सा खलु मयि रता स्यान्नवा ऽहं रतोऽस्याम् ।।


           आज की राजनीति का एक चित्र इस प्रकार खींचा गया है_


शास्यो लोकः कपिवर ! सदा भेदनीतिं प्रयुज्य 

मीनानां संतरणमिव नो जन्मजातः स्वभावः । 

देशप्रेम्णो बहु विदधतो गीतगानं समन्तात् 

स्वार्थेप्साया विकटघटनामादधाना अटामः ||

             प्रस्तुत संकलन में 187श्लोक हैं| 



6 मन्थनम्

                   प्रस्तुत खण्ड काव्य का विभाजन 5 चक्रों में किया गया है| इसका प्रथम प्रकाशन 2001 में हुआ था| यह खण्डकाव्य शकुंतला की कथा पर आधारित है किंतु कवि की कुशलता कथा के बुनावट में साफ दिखलाई देती है| स्त्री विमर्श  का स्पर्श भी इसमें प्राप्त होता है| देवता अप्सराओं को एक अस्त्र की तरह प्रयुक्त करते हैं_

अहो समाजे पुरुषप्रधाने नार्यास्तु काचिद्गतिरेव नास्ति ।

 भेदे प्रयुक्ता छलिराजनीत्यां सदाऽसहाया प्रभुसत्सहाया ।


स्वार्थाय देवैरपि कूटनीत्यां विलासकार्ये च वयं प्रयुक्ताः।

 प्रयुक्तभुक्तं स्वमनोविरुद्धं महाभिशापश्चिरयौवनं नः ॥


प्रवर्तितः श‌िङ्कभिरेव देवै- यौनप्रयोगो भुवि कूटनीत्याम्। 

गतास्ततोऽग्रे मनुजाः कृतं यत् सुधाधराणां विषकन्यकात्वम्  ॥


7 कौन्तेयम् ॒-

                     यह खंडकाव्य भी महाभारत के कथानक पर आधारित है| इसमें 4 भाग हैं_ कर्णः, कुन्ती, अर्जुनः‌ और कृष्णः| 


8 भारतशतकम् -

                                114 श्लोकों में विभक्त यह खंडकाव्य प्राचीन भारत के गौरव का स्मरण करवाता है, वर्तमान की उपलब्धियों का वर्णन करता है और साथ ही भविष्य की आशा भी जगाता है_



नेतारो जनसेवका अपि जनश्चारित्र्यसन्नागर- 

श्चारित्र्यं विनयान्वितं च विनयो विद्याविलासैः कृतः। 

विद्या चार्थकरी तथार्थगरिमा त्यागानुविद्धः पुन-

 स्त्यागो दम्भमृतेऽत्युदारमनसा भूयान्नृणां भारते ॥


9 परमानन्दसूक्तिशतकम् -

                                     इस शतक काव्य में  कवि रचित 108 सूक्तियों का संकलन कवि कृत अनुवाद के साथ किया गया है| 


10 अन्योक्तितूणीरम् -

                                  आचार्य बच्चूलाल अवस्थी जी से प्रेरित होकर कवि ने जिन अन्योक्तियों की रचना की, उनका संकलन कर अन्योक्तितूणीरम् के नाम से 2008 में प्रकाशित करवाया था| यहां साथ में कवि कृत पद्य अनुवाद भी दिया गया है_


भ्रातर्हंस जनैर्वकेषु गणितः किं तावता खिद्यते 

नीर-क्षीर-विवेकि ! हेम तुलितं लोकेन गुंजाफलैः । 

यत्रान्धो नृपतिः पुरी तिमिरिता, भेदो न कृष्णे सिते 

मध्ये काककुलस्य यन्न गणितः श्रेष्ठं हि ते तत् कियत् ? ॥


बगुलों में गिनते लोग तुम्हें इससे मत हंस ! दुखी होना 

हे नीर-क्षीर-मर्मज्ञ ! यहाँ गुंजाफल से तुलता सोना

 अन्धेर नगर चौपट राजा, काला सफेद सब एक जहाँ, 

फिर भी कौओं में नहीं गिना क्या यह कम है उपकार यहाँ ।।


11 विप्रश्निका -

                 कवि ने परमानंद शास्त्री ने एक नूतन काव्य विधा का सृजन किया है, जिसे देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी ने प्रश्नकाव्य कहा है| कवि ने प्रति पद्य एक प्रश्न प्रस्तुत करके पाठक को सोचने के लिए प्रेरित किया है_


संस्थासु ये शीर्षगताः स्वबन्धून् बलादयोग्यानपि योजयन्ति।

 त्यजन्ति योग्यानपरांश्छलेन ते केन वाच्याः सुधियां पदेन ?।।


12  सन्तोषसुरतरुः_

                        प्रस्तुत कृति में 108 पद्य हैं, जो अनुष्टुप् छंद में हैं| इसमें कवि  कृत ब्रज भाषा दोहा अनुवाद भी साथ में दिया गया है_


नाना कामाः प्रजायन्ते कल्पवृक्षस्य सेवया।

 निष्कामं जायते चेतः संतोषतरुसेवया


कल्पवृक्ष की सेव तें उपजत नाना काम।

 तरु संतोस सेवा कियें चित्त सदैव अकाम 


13 स्वरभारती ( प्रथम भाग) _ 

                                       इस भाग में संकलित कविताएं संस्कृत के पारंपरिक छंद में नही हैं| कहीं हिंदी_ उर्दू के छंदों का प्रभाव है तो कहीं लोकगीतों की लय का| यहां 123 शीर्षको में कविताएं संकलित हैं_ 


उपालम्भः कस्य केन च दीयताम्, 

पातिता कूपेऽत्र विजया विद्यते।

हन्त ! 'आनन्दः' खपुष्पमजायत। 

वाङ् निरुद्धा हृदयमन्तः खिद्यते।


यहां उर्दू कविता का प्रभाव देखा जा सकता है| पातिता कूपेऽत्र विजया विद्यते भाषा में प्रचलित उक्ति  कुएं में भांग पड़ी है का संस्कृत रूपांतरण है| 



14 स्वरभारती ( द्वितीय भाग) _  

                     इसका अन्य शीर्षक आनन्दगीतिका भी दिया गया है| इसमें 15 कविताएं संकलित हैं| 






           


                          

 



Monday, May 27, 2024

गंगा के बेटे की मार्मिक कथा _ गंगापुत्रावदानम्

कृति - गंगापुत्रावदानम्

कृतिकार - डां निरंजन मिश्र

विधा - महाकाव्य

संस्करण - प्रथम 2013

प्रकाशक - मातृसदनम्, जगजीतपुरम्, कनखलः, हरिद्वारम्

फोन नं. : 01334-246241, 245333

पृष्ठ संख्या - 348

अंकित मूल्य - अंकित नहीं

            डां निरंजन मिश्र अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में सुपरिचित हैं| हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं में रचना करने वाले कवि मिश्र जी।की।संस्कृत साहित्य में अनेक पुस्तके प्रकाशित हुई हैं| आप महाकाव्य , खंडकाव्य, गजलकाव्य, बालकविता, कथा, नाट्य आदि नैक विधाओं में लिखते हैं| गंगापुत्रावदानम् कवि मिश्र का महाकाव्य विधा में लिखा गया ग्रंथ है जिसे 2017 में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार से भी पुरस्कृत किया गया है| 

       




          गंगापुत्रावदानम् महाकाव्य का अपर नाम स्वामिनिगमानन्दचरितम् है क्योंकि इस महाकाव्य के नायक स्वामी निगमानन्द जी हैं| स्वामी निगमानन्द को गंगापुत्र के नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त थी| कवि ने किसी अलौकिक दिव्य पात्र को नायक न बनाकर लौकिक किंतु दिव्य पात्र को नायक बनाया है| क्योंकि स्वामी निगमानन्द अपने कर्मों से दिव्य ही थे| पर्यावरण संरक्षण, भागीरथी गंगा की स्वच्छता और भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के संकल्प को लेकर स्वामी निगमानन्द ने अपने प्राणों की भी आहुति दे दी| यह महाकाव्य सत्य घटना पर आधारित है| कवि ने स्वयं इसकी अधिकांश घटनाओं को घटते हुए देखा है| मिथिला अंचल में जन्म लेने वाले स्वामी निगमानन्द जी की कर्मभूमि और तपोभूमि बना हरिद्वार स्थित मातृसदन नामक आश्रम| लेखक ने स्वयं लिखा है कि नायक के संन्यास लेने के पूर्व की कथा कल्पना पर आधारित है किंतु बाद की कथा सत्य घटनाओं को कहती है - संन्यासग्रहणात्प्राक्तनीया कथा यथाश्रुति वर्णिता वर्तते। कथासंयोजनाय कल्पना भवति बलीयसी कवीनामित्यत्रापि न संशयः । संन्यासिनः पूर्वजन्मविषये कल्पनैवाधारत्वमर्हति। कल्पनायामस्यामपि तन्मुखाद्गलित वचनमेव प्रमाणम् । 



                         वीर रस प्रधान इस महाकाव्य में 23 सर्ग हैं| कवि ने प्रथम सर्ग में उत्तरांचल का मनोहारी वर्णन किया है_

घनो घनस्तिष्ठति यत्र गेहे सौदामिनी यत्र करोति नृत्यम् । 

गभीरनादो गगने घनस्य गुहासु शैलस्य हरेश्च नित्यम् ॥

          अर्थात्  जहाँ घना मेघ घर में निवास करता है। (मेघ लोगों के घरों में प्रवेश कर जाता है।) सौदामिनी (विद्युत्) जहाँ अपना नृत्य प्रस्तुत करती है। जहाँ आकाश में मेघ का और पर्वत की गुफाओं में सिंहों का गम्भीर नाद नित्य हुआ करता है। (यह वही भूमि है।)

               द्वितीय सर्ग में हरिद्वार का विशिष्ट वर्णन प्राप्त होता है| किंतु कवि वर्तमान में धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म से भी आहत है_ 

तीव्रध्वनिर्भवति देवसमर्चनायां स्तोत्रेण तुष्यति न दुष्यति कर्णरन्यम् ।

लोकस्य दुःखमुपपाद्य कथं कदा वा लोकेश्वरस्य चरणेऽस्तु रतिर्न जाने ।।

           अर्थात्  यहाँ देवताओं की अर्चना में तीव्र ध्वनियाँ होती हैं। इन स्तोत्रपाठों से देवता तो तुष्ट होते नहीं, कर्ण रन्ध्र दोषपूर्ण अवश्य हो जाता है। लोगों के दुःखों को उत्पन्न कर लोकेश्वर के चरणों में प्रीति कैसे होगी, यह समझ में नहीं आता है।

                     तृतीय सर्ग में नायक की कर्म स्थली मातृ सदन का वर्णन किया गया है| चतुर्थ सर्ग से नायक की कथा शुरू होती है| नायक सीता, विद्यापति आदि की भूमि में जन्म लेते हैं जहां उनका नाम स्वरूपम् रखा जाता है| पंचम और षष्ठ सर्ग में नायक के आध्यात्मिक विचारों से अवगत कराया गया है| सातवें सर्ग से तेरहवें सर्ग तक की कथा में बतलाया गया है कि किस तरह स्वरूपम संन्यास लेकर स्वामी निगमानन्द बन जाता है-

शिष्यस्य चारुचरितेन गुरुः प्रसन्नः

 सेवाविधौ नियमनं च चकार तस्य ।

 संन्यासधर्ममधिगत्य नवीननाम्ना 

लोके स्वरूपमवटुर्निगमाभिधोऽभूत् ॥ भूत् ॥ 

                    अर्थात् शिष्य के सुन्दर चरित्र से गुरु ने प्रसन्न होकर अपनी सेवा विधि में उसका नियमन कर दिया। अर्थात् अपनी सेवा में लगा लिया। संन्यास धर्मा, विष को ग्रहण कर यह स्वरूपम नवीन नाम से निगमा (निगमानन्द सरस्वती) हो गया।

                     14 वें सर्ग में 63 श्लोकों के माध्यम से गंगा के मुख से ही गंगा की दुर्दशा का वर्णन किया गया है_ 

मलं सदा क्षालयतीह गङ्गा श्रुत्वेति वाक्यं स्वमलप्रवाहम् ।

विसर्जयन्त्यत्र हि मच्छरीरे रक्षन्ति देहे मनसो मलं ते ॥



           15 वें सर्ग से 23 वें सर्ग तक की कथा में बतलाया गया है कि किस प्रकार गंगा की रक्षा के लिए वाहनों के प्रतिबंध को लेकर और कुंभ की।भूमि को खनन मुक्त करवाने के लिए आश्रम वासी अनशन करते हुए आंदोलन करते हैं| कई बार उनकी बात मान ली जाती है किंतु फिर से गंगा को प्रदूषित करने और खनन करने का कार्य शुरू हो जाता है| इससे आहत होकर स्वामी निगमानन्द अनशन करते हैं जिसमें सरकार और पत्रकार उदासीन रवैया अपनाते हैं| यही पर वर्णन मिलता है कि उन्हे अस्पताल में धोखे से जहर दिया जाता है जिससे वह ब्रह्मलीन हो जाते हैं_

मध्येमार्ग कृतं यत्तैस्तत्फलं स्वामिनो मुखात् ।

निर्गतं फेनरूपेण तरङ्गिण्या यथा मलम् ॥

                 अर्थात्      इस बीच रास्ते में इन लोगों ने जो किया उसका परिणाम यह हुआ कि उस स्वामी (निगमानन्द) के मुख से फेन निकलने लगा। जैसे तरंगिणी अपनी का मल फेन रूप में निकलता है।

     अर्वाचीन संस्कृत महाकाव्यों में गंगापुत्रावदानम् निश्चित ही महत्वपूर्ण महाकाव्य है जिसमे एक साधु चरित को आधार बनाकर महाकाव्य का ताना बाना बुना गया है साथ ही हमारे समय के समाज के दोगलेपन का भी मार्मिकता से वर्णन किया गया है| नदियों को मां कहने वाले हम उन्हें किस तरह बर्बाद कर रहे हैं और उनकी रक्षा का व्रत लेने वालों की क्या स्थिति कर दी जाती है, इसका सच्चा परिचय यह महाकाव्य देता है| काव्य की।भाषा का प्रवाह प्रशंसनीय है| विविध अलंकारों के प्रयोग में कवि ने अपनी कुशलता प्रदर्शित की है और छंद प्रयोग भी श्लाघनीय है|