Sunday, May 26, 2024

सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)

कति - सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)



कृतिकार  - रीता त्रिवेदी

विधा  - मुक्तछंद काव्यसंग्रह 

संस्करण  - प्रथम 2010

प्रकाशक - प्रकाशक वितरक डॉ. रीता त्रिवेदी 903, सत्यम् एपार्टमेन्ट, स्वामीनारायण सर्कल के पास, ठाकोरद्वार रांदेर रोड, सूरत – ३९५००९ 

पृष्ठ संख्या -84

अंकित मूल्य - 120



             अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में यूं तो बहुत मात्रा में काव्य रचे जा रहे हैं  किंतु महिला कवि अत्यल्प है| रीता त्रिवेदी गुजराती में तो कविता और कथाएं लिखती ही हैं साथ ही संस्कृत में भी उनकी कविताएं प्रकाशन में आई हैं| प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि की प्रायः मुक्त छंद की कविताओं का संकलन है, जो विविध विषयों पर आधारित हैं| इन  कविताओं के साथ हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है| हिंदी और गुजराती में अनुवाद स्वयं कवि ने किया है| अंग्रेजी अनुवाद चैतन्य देसाई आदि 5 अनुवादकों ने किया है| इस तरह तीन भाषाओं के साथ मूल संस्कृत की इन कविताओं का यह संग्रह चतुर्भाषा काव्यसंग्रह बन जाता है| 



                                   प्रथम कविता अतीत: में कवि भित्ति के आवरण को नहीं खोदने के लिए कहती हैं क्योंकि उसके पीछे फूत्कार है वासुकि नाग की -

मा खनतु 

इदं भित्तेरावणम् । 

तस्य पृष्ठतः 

फुत्कारः वासुकेः । 

त्वम् दाह्यसि, 

भस्मीभूतो भविष्यसि च । 

शनैः शनैः वासुकिस्त्वामवलोकयिष्यति, 

तस्य जिह्वया 

आस्वादयिष्यति, 

तीक्ष्णदंशं दास्यति ।

 त्वं भ्रमिष्यसि 

मोहयिष्यसि, 

विषादे प्रवक्ष्यसि कर्गजनौका इव ।

 पश्य ! वासुकिस्त्वां पश्यति

घटिका यन्त्रे....


            यहां अतीत को नहीं कुरेदने के लिए कहा जा रहा है क्योंकि कई बार अतीत रूपी बेताल वर्तमान के कांधों पर चढ़कर आपको असमंजस में डाल सकता है| वासुकि नाग जो शिव के गले में विराजता है यहां काल का प्रतीक बन जाता है| कविताओं में कहीं कोमल भावनाओं से सिक्त प्रणय निवेदन है तो कहीं स्त्री मुखर होकर कहती है कि विश्वास पुष्प गुच्छ तो नहीं है कि उसे तुम्हारे चरणों में रख दूं| एक कविता में वह अहल्या बन गौतम से प्रश्न करती दिखती हैं कि वह तो मुग्धा थी, इंद्रजाल को नहीं समझ सकी किंतु गौतम तो ज्ञानवृद्ध थे  - 

अहं शिला वा अहल्या ! 

न जानामि । 

स्थिताऽस्मि

 मुक्तावकाशे।

 गौतम ! तव दोषोऽपि कः। 

स्वजनेम्य क्रोधः 

इति सार्वत्रिकी रीतिः, 

किन्तु शल्या मम हृदये इति, 

कथं न पृच्छसि तां कथा। 

किमिति ! किमिति ! 

ऋजुहृदया ! मुग्धा ! न जानाम्यहम् 

ऐन्द्रजालबन्धनम् । 

किन्तु ज्ञानवृद्धः त्वम्

 त्वमपि न जानासि ! 


        ज्योतिष शास्त्र में सूर्य रेखा का वर्णन मिलता है| सूर्य रेखा अनामिका उंगली के एकदम नीचे होती है।  जो सबसे छोटी व मध्यम उंगली के बीच में होती है।  इस अनामिका के नीचे उभरते क्षेत्र को सूर्य पर्वत और इस पर्वत से नीचे हृदय रेखा की तरफ जाने वाली रेखा ही सूर्य रेखा कहलाती है।जिस किसी व्यक्ति की हथेली में सूर्य रेखा जीवन रेखाके पास से आरंभ होती है, उसके लिये यह रेखा उन्नति और यश बढ़ाने वाली मानी गयी है। सुख से आंख मिचौली खेलती कवि अपनी हथेली में सूर्य रेखा खोजती हुई उस से सुख की व्याख्या पूछती है_


सूर्यरेखे हे ! 

अन्विष्यामि त्वाम्।

 करतलं सम्पूर्णम्

इतस्ततः कृत्वा 

अन्विष्यामि त्वमेव । 

श्रुतम्, 

तव शासने सुखमस्ति ।

 मम स्थम्भितं रुधिरं वा

 'इन्हेलर' सहायेन 

अस्तित्वमयं मयाश्वासे 

सुखस्य व्याख्यां 

बोधयितुं शक्नोसि किम् !

     


                 चार भाषाओं का यह काव्य संग्रह पठनीय है| 





 !

मौन की गूंज _ नीरवतायाः प्रतिध्वनिः

कृति   - नीरवतायाः प्रतिध्वनिः Echo of Silence

कृतिकार - पराम्बा श्रीयोगमाया

विधा - मुक्तछंद काव्यसंग्रह 

संस्करण - प्रथम 2020

प्रकाशक - cyberwit net allahabad 

पृष्ठ संख्या - 202

अंकित मूल्य - 300






पराम्बा श्रीयोगमाया आधुनिक संस्कृत साहित्य की कतिपय महिला कवियों में प्रमुख हैं| डॉ. परम्बा श्री योगमाया एक वैदिक विदुषी हैं और भारत के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय में वेद विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उनके शोध के अन्य क्षेत्रों में इंडोलॉजी, महाकाव्य और पुराण, दर्शन और धर्म, और समकालीन संस्कृत साहित्य शामिल हैं। अपने शैक्षणिक रुझान के अलावा, वह कविताएं, लघु कथाएँ और निबंध ज्यादातर संस्कृत में, लेकिन अंग्रेजी, उड़िया और हिंदी भाषाओं में भी लिखती हैं और इन भाषाओं के साहित्य का संस्कृत में अनुवाद करती हैं। अब तक उनकी पांच पुस्तकें, एक निबंध संग्रह, एक अनुवादित विज्ञान कथा, एक कविता पुस्तक, एक लघु कहानी पुस्तक और एक शोध पुस्तक संस्कृत में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें 2014 में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा संस्कृत के लिए 'युवा पुरस्कार' और  2013 में भाओ राव सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा संस्कृत के लिए प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान भी प्राप्त हुआ है| 

                                     पराम्बा का नवीन काव्य संग्रह नीरवतायाः प्रतिध्वनिः शीर्षक से प्रकाशित हुआ है| यह मुक्त छंद विधा में रचा गया है| प्रस्तुत संकलन में कवि की 100 कविताओं निबद्ध हैं|  जिनका अन्य भाषाओं के लोगों की समझ के लिए कवि ने स्वयं अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है। इस पुस्तक का विषय जीवन में असफलताओं और उनसे सफलतापूर्वक निपटने और जीवन की यात्रा में आगे बढ़ने के बारे में कवि का आत्मनिरीक्षण है। इन कविताओं के माध्यम से कवि  संदेश देना चाहती है कि मन का दार्शनिक मिश्रण और आत्मा की आध्यात्मिक शक्ति हमें जीवन की नाव को असफलताओं के उबड़-खाबड़ पानी से निकालकर जीवन के अंतिम लक्ष्य के किनारे तक ले जाती है। कविताओं में वैदिक, भारतीय दार्शनिक प्रणालियां और जगन्नाथ पंथ की कुछ छवियाँ परिलक्षित होती हैं।



             राजनेता विकास की बहुत बात करते हैं लेकिन विकास सच्चे मायनों में क्या होता है यह समझाते हुए कवि लिखती हैं -


विकसितराष्ट्रस्य स्वप्नः 

साक्षात्कारसाफल्यपरिणामः

 प्रथमश्रेण्यां प्रथमछात्रस्य हर्षः 

प्राचुर्योल्लसितः कृषकः 

अन्नाहजारे-आदीनां विप्लवसमाप्तौ विश्रामः ।। 

जोषीमठशिख्गुरुद्वारे इस्लामभ्रातृणां नमाजपाठः

 वियुक्तपञ्चपञ्चाशत्तापमाने सियाचीने सैन्यं रक्षाकवचम् ।

 नक्सलमाओवादीनां सामूहिकात्मसमर्पणं 

लघूद्योगेन स्वात्मनिर्भरत्वम् ।

मध्याह्न भोजनद्विचक्रिकावितरणं विहाय 

शिक्षाया गुणात्मकत्वम् । 

दारिद्यापनोदनाय स्वदेशीद्रव्याणामुत्पादनम् ।।



Development


The dream of a developed nation 

Is like

 The success in an interview for job, 

The contentment of a laborious student 

When he/she stands first.

The gladness of a farmer 

When he cultivates a lot of crops, 

It's like taking rest after the revolution of

 Anna Hazare and others.

It's the 'Namaz' by Muslim brothers

 In Joshi Math and Gurudvara there

 As rainwater flooded the mosque,

 The bravery of the military troops at Siachen

 In -50 degree temperature,

 Surrender of the Maos and Naxals at a time 

And engaging themselves in short-term

 entrepreneurships.

Steps to maintain the quality education are needed

 Rather than the mid-day meals and distributing bicycles 

And more indigenous products can eradicate poverty.


  वस्तुतः सच्चा विकास तभी तो होगा जब वह जात पात धर्म आदि की सीमाओं से ऊपर उठकर सब के लिए समान रूप से लागू होगा| जो वंचित अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते हुए नक्सली माओवादी बन गए वे आत्मसमर्पण करें और मुख्यधारा में लौट आएं, ऐसी कामना भी कवि करती हैं तो साथ ही विद्यालय शिक्षा में मिड डे मील साइकिल वितरण जैसी योजनाएं संचालित होती हैं उनके स्थान पर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दी जाएं यह भी सही विकास होगा, कवि यह कहना चाहती है| 

          पलाश नामक कविता में पलाश  सुंदर किंतु गुणों से हीन पुरुष का प्रतीक बन जाता है -


सुरभिरहितः पलाशकुसुमः 

गुणहीनो रूपवान् पुरुषः

अन्तःसारहीनत्वं परिज्ञायते नितरां 

शीघ्रं भवतु वा विलम्बः ।।



स्फटिकः कविता में कवि चाहती है कि जिस तरह वह स्वच्छ है उसी तरह से अन्य भी स्वच्छ हृदय, स्वच्छ मन वाले बने,‌अन्यथा वह स्वयं भी कलुषित हो सकती है_



नाहं किञ्चिदपि कांक्षे

 तव स्वच्छहृदयं विना ।

 न धनं नालङ्कारं

 न मानं न पुरस्कारं 

न जनं न कोलाहलं

 त्वत् स्वच्छमानसं विना ।।

न म्लानयतु मां

 त्वहृदयकालुष्येण 

न जालयतु मां त्वन्मनसः कषायेण

 स्फटिकोऽहं शुभ्रोज्वलः ।।

कांक्षे सूर्यमयूखान् 

कांक्षे चन्द्राभाः 

कांक्षे आकाशविस्तारं

 कांक्षे आधारमपि धरातलम् ।।

सर्वेषां प्रतिबिम्बनं 

मन्मध्ये भवति यादृच्छिकं 

तन्न मन्मौलिकत्वम् ।।

शुद्धः स्फटिकोऽहं 

स्वच्छः स्फटिकोऽहं 

जानामि जगत्स्वरूपम् ।।


 स्फटिक बन के ही जगत के सही स्वरूप को जाना जा सकता है| पुलवामा अटैक के बाद सर्जिकल स्ट्राइक पर भी कवि ने अपने भाव कविता के माध्यम से व्यक्त किए हैं जो संस्कृत कवि की समकालीन जागरूकता को प्रदर्शित करती है_ 


अहं भारतदेशः 


यदि नेच्छसि समरं

तर्हि किमर्थं मत्सैन्यबलं मारितम् ??

यदि सैन्यमृत्यौ नास्ति ते भूमिका

 आतङ्किभिर्मारिताः 

तह्यतङ्कीनां हनने 

त्वत्प्रतिवादस्य का कथा ??

आतङ्कवादस्य निर्मूलनम- 

स्मदीयं सामान्यमेकादर्शभूतं

 शान्तिप्रीतिबन्धुत्वस्य विशालभूखण्डमा- 

वयोर्मेलनायोद्दिष्टम् ।।



परांबा ने प्रस्तुत काव्य संग्रह में अपने भावों को अभिव्यक्त करते हुए विभिन्न विषयों को छुआ है| वे मानव मन की कवि हैं| मुक्त छंद में कवि के मुक्त मन के भाव अविरल रूप से प्रवाहित हुए हैं| 

          


Saturday, May 25, 2024

नवीन संस्कृत हाइकु काव्य संग्रह

कृति   - शाखान्तरालानां गगनखण्डाः

कृतिकार - डाॅ हर्षदेव माधव

संपादिका- dr भावना सोनी 

विधा - हाइकु काव्यसंग्रह

संस्करण - प्रथम 2024

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन दिल्ली 

पृष्ठ संख्या - 240 

अंकित मूल्य - 400




आधुनिक संस्कृत साहित्य में हर्षदेव माधव प्रयोगधर्मी कवि के रूप में सर्वविदित हैं| कविता, उपन्यास, कथा, नाट्य, काव्यशास्त्र आदि अनेक विधाओं में अनेक कृतियों के माध्यम से आप संस्कृत साहित्य को उस स्थान पर लाए हैं जहां वह अन्य भाषाई साहित्य के साथ बिना किसी हिचकिचाहट के बात कर सकता है | हाइकु, तांका, सीजो कविता का बखूबी प्रयोग संस्कृत में माधव जी ने ही संभव करवाया है| 



               हाल ही में माधव जी का नवीन (31 वां) काव्यसंग्रह प्रकाशित हुआ है शाखान्तरालानां गगनखण्डाः| यह हाइकु  विधा में रचा गया है| इस पुस्तक में 3 खंड हैं, जिसके प्रथम  2 खंड हाइकु पर विविध आलेखों पर आधारित हैं और 240 पृष्ठों में से 157 पृष्ठ घेरे हुए हैं| इस तरह यह काव्य संग्रह के साथ लघु समीक्षा ग्रंथ को भी अपने में समेटे हुए हैं| 



प्रथम खंड - 

                   इस के 92  पृष्ठों में हर्षदेव जी के 8 आलेख संकलित हैं जो सभी हाइकु कविता के विभिन्न पक्षों पर आधारित है| स्वयं अपनी कविता पर कवि माधव जी को ही क्यों बोलना पड़ा इस का उत्तर वह खुद एक आलेख में देते हुए कहते हैं - "संस्कृत के कवि को अपनी कविता के बातें बोलना पड़े यह विवशता है|" यह विवशता क्या है यह आप उनके आलेखों से गुजरते हुए समझ सकते हैं| संस्कृत के तथाकथित पंडित जो संस्कृत में नए लिखे जा रहे के पक्षधर नहीं हैं, किसी अन्य भाषा की विधा में लिखे गए को देख कर नाक भौं सिकोड़ लेते हैं, उन्हीं मान्यों को जवाब देने के लिए यह आलेख लिखे गए हैं| भवभूति तो किसी समानधर्मा की आस में काव्य रचते गए लेकिन माधव जी ने ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए खुद कमर कस ली है| ऐसा भी नहीं है कि माधव जी को को कोई समानधर्मा मिला ही नहीं| आधुनिक संस्कृत साहित्य के आचार्य समीक्षक श्री राधावल्लभ त्रिपाठी जी नैक बार मुक्तकंठ से  कवि माधव जी की कविता की प्रशंसा कर चुके हैं और अनेक उदाहरणों के माध्यम से यह स्थापित कर चुके हैं कि आधुनिक संस्कृत साहित्य में माधव जी सरीखा कवि कोई और नहीं है| अगर किसी आधुनिक संस्कृत कवि के काव्यों के अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सर्वाधिक हुए हैं तो वे निश्चित रूप से माधव जी ही हैं| इसी ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में अनेक समीक्षकों ने माधव जी के हाइकु काव्यों की विशेषताओं को उल्लिखित किया है| 

        इन आलेखों में माधव जी हाइकु काव्य के झेन तत्त्व को उद्घाटित करते हैं तो साथ ही उनकी व्यंजना को भी प्रकट करते हैं| वे एक आलेख में तीन पंक्ति वाले हाइकु को वामन के तीन डग के माध्यम से समझाते हैं| हाइकु में फोटोग्राफी, चित्रकला आदि कलाएं किस प्रकार गूंथ सकती हैं यह भी दिखाया गया है| एक आलेख में माधव जी के ही अभिनव काव्य शास्त्रीय ग्रंथ वागीश्वरीकंठसूत्र के कुछ संदर्भों  से हाइकु कविता को जोड़ा गया है जो दिलचस्प है| 



द्वितीय खंड - 

                  इस खंड में कवि माधव जी के हाइकु रचना संसार पर 7 आलेख हैं जिनमें 5 हिंदी भाषा में और 2 अंग्रेजी भाषा में निबद्ध हैं| प्रो मंजुलता शर्मा ने माधव जी के हाइकु काव्यों में विद्यमान कॉलेज कन्या के मनोविज्ञान को बहुत रोचक तरीके।से प्रस्तुत किया है| गौरतलब है कि माधव जी के कई हाइकु के कॉलेज कन्या का चित्रण भिन्न भिन्न दृष्टि से किया गया है| प्रो सुदेश आहूजा ने कवि के हाइकु काव्यों में  वर्णित चांद और चांदनी पर चर्चा की है| भरत डी परमार ने  बारिश पर आधारित हाइकु काव्यों को प्रस्तुत किया है और उनकी बेहतरीन व्याख्या की है| युवा समीक्षक अरुण निषाद ने इन हाइकुओं को अछूते कोने की कविता कहा है| dr रीता त्रिवेदी ने हाइकु काव्यों के विशेष संदर्भ में माधव जी के सर्जकत्व का परिचय दिया है| राजेश जी  ने हाइकु काव्यों में  वृक्ष को लेकर अपना आलेख अंग्रेजी में लिखा है और शुभ्रजीत सेन ने इन हाइकु काव्यों में प्रतिबिंबित शहरी जीवन को उल्लिखित किया है| 


तृतीय खंड - 

            इस खंड में माधव जी के प्रत्यग्र 338 हाइकु काव्यों को संकलित कर प्रकाशित किया गया है और साथ में श्रीमती इला घोष जी कृत हिंदी अनुवाद भी दिया गया है | जिस तरह ये संस्कृत हाइकु वेधक हैं उसी तरह हिंदी अनुवाद भी बेहतरीन‌‌ किया गया है| कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -


सुधापटलैः 

क्षरन्ति स्मृतयोऽपि 

वृद्धगृहस्य ॥१॥


झर (क्षीण हो) रही है 

रेत-चूने के साथ, 

यादें भी, बूढ़े घर की 


न सन्ति पृष्ठे 

मे शत्रुप्रहाराणां 

चिह्नानि हन्त ! ॥६६॥


नहीं है, 

शत्रु-प्रहारों के चिह्न, 

मेरी पीठ पर  

(मैं युद्ध से, पीठ दिखाकर नहीं भागा हूँ। मैने अपने वक्षःस्थल पर प्रहारों को झेला है)।


 पाशयितुं मां 

जल-बिन्दुभिर्मेघैः

 कृतं पञ्जरम् ॥२३९॥


मुझे बाँधने के लिये, 

मेघों ने जल की बूंदों से, 

पिञ्जरा बनाया है 



 वस्तुतः यह काव्य संग्रह संस्कृत में हाइकु काव्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा| जो  कवि संस्कृत में हाइकु रच रहे हैं उन्हें भी इसे पढ़ कर विचार करना चाहिए कि क्या उनके लिखे गए हाइकु हाइकु कविता के इर्द गिर्द भी आ पा रहे हैं या केवल वे 17 अक्षरों की लघु कविता मात्र बन कर रह गए हैं| साथ ही हर लघु कविता को हाइकु कहने वालों को  भी हाइकु के तत्त्व को समझने की आवश्यकता है|  जो महाकवि हाइकु काव्य को हेय समझते हैं उन्हें देखना चाहिए कि हाइकु महज काव्य ना होकर साधना है| आप महाकाव्य लिखते ही हैं कतिपय हाइकु भी तो लिख के देखिए| संस्कृत में ग़ज़ल उपन्यास आदि लिख के भी हाइकु काव्यों को हेय समझने वाले जो मान्य हैं उनके लिए तो क्या कहें| इति 









 

Friday, May 24, 2024

आधुनिक संस्कृत साहित्य की समीक्षा का नवीन ग्रंथ

कृति - आधुनिक संस्कृत साहित्य अभिनव प्रयोग एवं संभावनाएं

कृतिकार - प्रो मंजूलता शर्मा

विधा - आलोचना

संस्करण - प्रथम 2024

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन दिल्ली 98911 43247

पृष्ठ संख्या - 250

अंकित मूल्य - 550




आधुनिक संस्कृत साहित्य में रचनाएं तो प्रभूत मात्रा में लिखी जा रही हैं, किंतु उनकी समीक्षा उस रूप में नहीं हो पा रही है जिस तरह होनी चाहिए| कुछ एक समीक्षक ही हैं जो रचना के साथ न्याय कर पाते हैं| साहित्य जिस रूप में लिखा गया है, जिस विधा में लिखा गया है, उस की तह तक पहुंच कर उस कृति पर लिखना कठिन कार्य है| नवीन साहित्य की समीक्षा के लिए नवीन काव्यशास्त्र भी रचे जा रहे है , यथा अभिनवकाव्यालंकारसूत्र, अभिराजयशोभूषण, काव्यालंकारकारिका, वागीश्वरीकंठसूत्र आदि| किंतु इन ग्रंथों और संस्कृत से भिन्न भारतीय आदि भाषाओं के साहित्य की आलोचना को पढ़ कर नवीन संस्कृत साहित्य की समीक्षा बहुत कम की जाती है, जबकि यह बहुत आवश्यक है | 



                        प्रो मंजुलता शर्मा‌‌ आधुनिक संस्कृत साहित्य की समीक्षीका के रूप में सर्वविदित हैं| विभिन्न पत्रिकाओं आदि में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं| मंजुलता जी के आधुनिक संस्कृत साहित्य पर इस से पूर्व भी कई ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं को सहृदयों द्वारा सराहे गए हैं , यथा अर्वाचीन संस्कृत साहित्य दशा और दिशा, आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, आधुनिक संस्कृत साहित्य के नए भाव बोध आदि| इसी वर्ष आपका नया आलोचना ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है आधुनिक संस्कृत साहित्य अभिनव प्रयोग एवं संभावनाएं | इसकी शुभाशंसा वरिष्ठ आलोचक इला घोष जी ने लिखी है और साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त प्रो अरुण रंजन मिश्र जी ने भी अंग्रेजी भाषा में इस कृति पर अपने विचार प्रकट किए हैं| 

            प्रस्तुत कृति में 16 लेखों का संकलन किया गया है जो आधुनिक संस्कृत की विभिन्न भावों को उद्घाटित करते हैं | ललित निबंध से हम परिचित हैं किंतु देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी ने इसी के रूप को कुछ परिवर्तित करते हुए एक नवीन विधा का सूत्रपात किया और उसे नाम दिया ललित कथा| कलानाथ जी की पुस्तक ललितकथाकल्पवल्ली की ललित कथाओं का परिचय देते हुये मंजुलता जी ने इस विधा से भी बहुत अच्छे से परिचित करवाया है| आधुनिक संस्कृत कविता में किस प्रकार वेदांत दर्शन प्रतिबिंबित हो सकता है इसका बखूबी परिचय देते हुए आलेख है- वेदांत को आत्मसात करती आधुनिक कविताएं | राधावल्लभ त्रिपाठी, हर्षदेव माधव,‌ सीतानाथ आचार्य आदि की कविताओं से यहां उदाहरण भी दिए गए हैं| अरुण रंजन मिश्र संस्कृत में उत्तर आधुनिकता के लिए जाने जाते हैं| उत्तर आधुनिक कविता का नया पड़ाव आलेख में मिश्र जी के दो काव्य संग्रहों से उदाहरण देते हुए उन्हें उत्तर आधुनिक संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ सर्जक के रूप में प्रदर्शित किया है, जो यथोचित भी है| हर्षदेव माधव के स्मृतकथा संग्रह स्मृतीनां जर्जरितानि पृष्ठानि पर एक सुंदर आलेख संकलित हैं | स्मृतियों की जुगाली करते हुए इंसान अपने अतीत का अपने तरीके से स्मरण करता है, उन्हे सहेजता है|



                     जनार्दन प्रसाद पांडेय मणि जी की कृति सौरभेयी, सर्वाधिक प्रतिभाशाली युवा कवि ऋषिराज जानी के संस्कृत के प्रथम वैज्ञानिक उपन्यास अंतरिक्षयोधा, हरिदत्त शर्मा रचित वैदिशिकाटनम्, कौशल तिवारी के काव्य संग्रह गुलिका पर भी पृथक से आलेख संकलित किए गए हैं| युवा प्रखर कवि प्रवीण पंड्या जी के विभिन्न काव्यों से उदाहरण देते हुए समीक्षिका ने पंड्या जी की कविता के मर्म को बेहतर तरीके से परत दर परत खोला है | 

         आधुनिक संस्कृत काव्य में प्रसिद्ध मुक्तछंद, स्त्रीविमर्श, मोनोइमेज, लोकधर्मीछंद, नवीन अलंकार एवं बिंब, 21 शताब्दी की नई कविताआदि पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक की विशेषता है| 



          यह संकलन उन के लिए उपयोगी है जो आधुनिक संस्कृत साहित्य में लिखे गई रचनाओं से परिचित होना चाहते हैं, शोध करना चाहते हैं, उसके मर्म को, व्यंजना को।समझना चाहते हैं| मंजुलता जी की सरस शैली आपको कहीं भी रिक्तता का अनुभव नहीं करवाती| आलेख की भाषा पाठक को थामे रखती है| यह ग्रंथ निश्चित ही आधुनिक संस्कृत साहित्य के दस्तावेज के रूप में याद किया जाएगा| 



Sunday, October 22, 2023

संस्कृत में नवीन ग़ज़ल संग्रह प्रतिप्रवाहम्

कृति - प्रतिप्रवाहम्



कृतिकार - महराजदीन पाण्डेय ‘विभाष’

विधा - गजल संग्रह

संस्करण - प्रथम संस्करण 2022

प्रकाशक - रचनाकार पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली

पृष्ठ संख्या - 112

अंकित मूल्य - 300/-

    अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में जो विधा इधर खूब फली - फूली है, वह है ग़ज़लविधा। उर्दू-फारसी की परम्परा से निकली यह विधा हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं के साथ संस्कृृत में भी अत्यन्त लोकप्रिय हुई है। महराजदीन पाण्डेय ‘विभाष’ आधुनिक संस्कृत साहित्य में अपनी रचनाओं से सर्वादृत हैं। ‘मौनवेधः’ और ‘काक्षेण वीक्षितम्’ इन दो संस्कृत ग़ज़ल संग्रह के उपरान्त प्रतिप्रवाहम् नाम से कवि विभाष का तृतीय ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत संग्रह को चार भागों में बांटा गया है।

1. ग़ज़लम् - इस भाग में कवि विभाष रचित 16 संस्कृत ग़ज़ल हिन्दी अनुवाद के साथ संकलित की गई हैं। इन ग़ज़लों  का छन्दशास्त्रीय परिचय  स्वयं ग़ज़लकार ने संग्रह के अन्त में दे दिया है। कवि विभाष अपनी ग़ज़लों में विभिन्न भावबोधों के समावेश के लिए जाने जाते हैं। व्यंग्यार्थ का पुट इन ग़ज़लों की सम्प्रेषणीयता को बढ़ा देता है। साथ ही समकालीन बोध भी इनकी ग़ज़लों में देखने को मिलता है। चुनाव के मौसम का बखूबी वर्णन करते हुए महराजदीन पाण्डेय कहते हैं-

                निर्वाचनस्य रंगे नटितेन तेन मुषितम्।

                कस्यापि तेन रुदितं कस्यापि तेन हसितम्।।

       निर्वाचन के रंगमंच पर उसने अपने अभिनय से किसी की हंसी चुरा ली  तो किसी का रोना। नेता को चुनावी रंगमंच का अभिनेता बताकर ग़ज़लकार ने चुनावी वायदों की हकीकत बयान कर दी है। 

        संस्कृत में एक सुभाषितांश प्रचलित है- गतस्य शोचनं नास्ति, जिसे हिन्दी में कहते हैं - बीती ताहि बिसार दे। इसी भाव को गतं गतं तत (गया सो गया) इस रदीफ के माध्यम से नवीन कथ्य के साथ प्रस्तुत किया गया है-

               हृदये हृते न बन्धो विलपेद् गतं गतं तत्।

               वंशो न को नु वंशीं ध्वनयेद् गतं गतं तत्।।

               जीवेन महार्घेण क्रीणीत को नु मोक्षम्

               आक्रीय तं न भूयो कृश्येद् गतं गतं तत्।।

   मन की चोरी हो जाने पर रोना नहीं, गया सो गया

   बांस नही तो बांसुरी कौन बजाये,  गया सो गया

   मंहगे जीवन के बदले कौन ले मोक्ष भला

   पर जब सौदा कर ही लिया तो गया सो गया



        कोराना काल की विभिषिका को कई कवियों ने  अपने काव्यों में अभिव्यक्ति दी है। विभाष अपनी एक ग़ज़ल में कोराना के भय से पीडित होते हुए सब को अपनी रक्षा करने का आह्वान कर रहे हैं ताकि हम स्मृति शेष न रह जाएं-

                 स्वं रक्ष रक्षणीयास्त्वामाश्रिताः कियन्तः।

                 नेचेदरुन्तुदाः स्युर्दिवसाः स्मृताः कियन्तः।।

वे उस समय की सोशल डिस्टेंसिंग सामाजिक दूरी से भी आहत हैं-

                 एकत इहावमर्शे नहि गुण्ठनेऽस्ति मानः,

                 परतो मुखा इहापदि पटमुद्रिताः कियन्तः।।

                 विरहोऽसहो यदीयस्तद् दूरताऽद्य पथ्यम्,

                 धातस्त्वयापि कीला हृदि कीलिताः कियन्तः।।

      यहां पटमुद्रित शब्द का प्रयोग मास्क के अर्थ में किया गया है। 

                   विभाष की ग़ज़लों में कई बार भाव उसी भूमि पर आ जाते हैं, जहां से उर्दू फारसी की रूमानीयत भरी ग़ज़लें प्रस्फुटित होती रहती हैं -

          अभिभाषितुं किमपीहितं मुखतोऽन्यदेव तु निःसृतम्।

          प्रतिवारमेवमभूद् यदपि पूर्वं न किन्नु सुनिश्चितम्।।

          स उपैति चेत् किमुपालभेऽहमितिस्थितो विमृशन् चिरम्

          तदुपागमे स्मरितुं क्षमे न किमावयोः समुदीरितम्।।

          प्रेमी के सामने आने पर जो सोचा गया था, वह बोला न जा सका, यही भाव इन दो शेरों में प्रकट हुआ है। किन्तु कवि विभाष के कथ्य में पुनः पुनः साम्प्रतिक राजनीति को उलाहना, दबे-कुचले लोगों की दशा, किसानों की व्यथा आदि प्रवेश कर ही जाते हैं, यथा-

            जगतीयमग्रतोऽग्रे यातीति याति सततम्

            शंकेऽसि वासि नो वा कृष्टः कृषिश्रितस्त्वम्।।

       कवि किसान को पुकारता हुआ कह रहा है कि दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है और खेती पर आश्रित तुम वहीं के वहीं रह गये हो। 

               विभाष उर्दू-फारसी ग़ज़ल परम्परा के अध्येता रहे हैं। वे उर्दू शायर निदा फाजली के एक शेर के आधार पर अपना शेर रचते हुए उनका स्मरण करते हैं-

        न देहि कर्णौ बुधोपदेशे कदापि मुग्धोऽपि भवे रसाय

        द्वयोर्द्वयोश्च न चत्वारि नाम वदामि सर्वत्र संचयः स्यात्।।

दो और दो जोड हमेशा चार कहां होता है

सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला।। (निदा फाजली)

ये गजले कहीं छोटी बहर में हैं तो कहीं बडी बहर में। तखल्लुस (उपनाम) ‘विभाष’ का प्रयोग कवि बहुत कुशलता के साथ करते हैं-

                        अत्र कुत्राप्यरिर्विभाषो मे

                        आह्वयन्ती पुनः श्रुतिः का वा।।

    महराजदीन पाण्डेय अपनी ग़ज़ल यात्रा में तीन बार तखल्लुस को बदल चुके हैं। वे पहले ‘महाराजो वात्स्यायनः’ नाम से लिखते रहे, फिर ‘ऐहिक’ उपनाम धरा और वर्तमान में ‘विभाष’ तखल्लुस से लिख रहे हैं। कवि ने इन ग़ज़लों का नामकरण नहीं किया है, जैसा कि प्रायः संस्कृत के ग़ज़लकार कर रहे हैं। इसका कारण बतलाते हुए वे लिखते हैं कि यह परम्परा विरुद्ध है। भिन्नाशयों के अनेक शेरों में से कोई आपकी दृष्टि से अधिक महत्त्व का हो सकता है तो दूसरे की दृृष्टि में कोई दूसरा शेर। इसलिए ग़ज़ल का कोई शीर्षक न देने का चलन है, जो माना ही जाना चाहिए।


2. गीतम् - इस भाग में चार संस्कृत गीत हिन्दी अनुवाद के साथ संकलित हैं।  कवि कहीं अर्थ को ही परम पुरूषार्थ मानते हुए चार्वाक मत का अनुसरण करते दिखते हैं तो कहीं आरक्षण की व्यवस्था पर सवाल खडा करते हैं। यहां किसी गीत में वे सहिष्णुता को कोस रहे हैं तो कहीं वे नंगी तलवार वाले मूर्तिभंजकों से हमें सावधान करते दिखते हैं-

                   इमे मूर्तिमर्दाःक्व नग्नासिहस्ताः

                   क्व मूर्त्तो जगत्प्राणिमोदोऽप्रमेयः।

                   यदैतस्तदैतोऽधुना नैति कश्चित्

                   स्वयं रक्षितुं कोऽपि यत्नो विधेयः।।

      यदि महराजदीन पाण्डेय की काव्ययात्रा को सिलसिलेवार ध्यान से पढा जाये तो आप पाएंगे कि इधर उनकी कविता का स्वर शनैः शनैः बदल रहा है।


3. मुक्तकम् - इस भाग में 37 मुक्तक संकलित हैं। कवि गांव के वातावरण के साथ जुडा हुआ है। उसका यह जुडाव गाहे बगाहे उनकी कविता में चला आता है-

                  अन्तेऽमू राजिकाराजयः पीताः

                  मध्ये चातसिबाह्वोश्चणकाः प्रीताः

                  पुरतः कलायलतिकास्पृड्भिर्वातैः

                  विद्मो न कुत्र वा वयं क्षणं नीताः।।

      सीमान्त पर राई (सरसों) की पंक्तियां, बीच में अलसी की बांहों में प्रसन्न चने और मटर की लताओं का स्पर्श करके बहने वाले वायु के साथ मैं नहीं समझ पाया कि क्षणभर के लिए कहां चला गया। इस भाग में से कुछ मुक्तक कितआ या कता में आते हैं, जो उर्दू शायरी में प्रसिद्ध है। 


4.वृत्तगन्धि वृत्तम् - इस भाग में तित्वरी जिजीविषा शीर्षक से 10 मुक्तछन्दोबद्ध कविताएं संकलित हैं। यथा-

प्रतिधारं दोर्भ्यां मनुष्यस्तरति 

द्वैधे क्षिपति जीवितम्

किंचैतस्य जिजीविषापि चित्रम्

विषमेऽपि नो नश्यति

अन्वाच्योत्थायोपविश्य सोढ्वा प्रतिघातमुद्वेजनम्

लोकस्यास्य विसंष्ठुलोपलतले

स्थातुं जुहोति स्वताम्।।



   महराजदीन पाण्डेय की कविताएं एक और रूमानियत से भरी हुई हैं तो दूसरी और वे कविता की लोकधर्मी परम्परा का निर्वाह भी करते चलते हैं। विधाओं की विविधता उनके काव्य का एक अन्य उज्ज्वल पक्ष है।

Sunday, April 9, 2023

जानन्तु ते - संस्कृत गजल में नवीन प्रयोग

कृति - जानन्तु ते



रचयिता - डॉ. हर्षदेव माधव

सम्पादक - डॉ. प्रवीण पण्ड्या

विधा - संस्कृत गजल

प्रकाशक - संस्कृति प्रकाशन, अहमदाबाद

संस्करण - प्रथम, 2003

पृष्ठ संख्या - 99

अंकित मूल्य - 100/-

     साहित्य में गजलविधा खूब फली - फूली है। विभिन्न भाषाओं में अभिव्यक्ति को मुखर करती यह विधा पसन्द की जाती रही है। उर्दू और हिन्दी में तो गजल एवं गजलकारों को अच्छा -खासा मुकाम हासिल है। इधर केवल गजल के प्रशंसक ही नहीं अपितु नेता भी अपनी बात को दमदार तरीके से रखने के लिए गजल के शेरों का प्रयोग करते दिखलाई देते हैं। संस्कृत में जो विधाएं आयातित हैं, उनमें गजल सर्वाधिक पसन्द की जाती रही है। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री, बच्चूलाल अवस्थी, जगन्नाथ पाठक, अभिराज राजेन्द्र मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, पुष्पा दीक्षित, हर्षदेव माधव, महराजदीन पाण्डेय, लक्ष्मीनारायण पाण्डेय जैसे वरिष्ठ गजलकारों ने जहां संस्कृत गजल की विकास यात्रा को नवीन आयाम दिए वहीं आज रामविनय सिंह, प्रवीण पण्ड्या, बलराम शुक्ल, कौशल तिवारी, राजकुमार मिश्र, ऋषिराज जानी आदि नई पीढी के गजलकार भी सक्रिय हैं। 



        भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के पश्चात्  यदि संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक नवीन प्रयोग किसी ने किये हैं तो निःसन्देह वह डॉ. हर्षदेव माधव हैं। संस्कृत गजल को नवीन रूपों में ढालती उनकी कृति ‘जानन्तु ते’ हाल ही में प्रकाशित होकर आई है। कवि माधव कविता के साथ-साथ  काव्यसंग्रहों के नामकरण में भी अपनी अद्भुत प्रतिभा दिखलाते हैं। प्रयोगधर्मी कवि भवभूति की काव्यपंक्तियों के अंशों के माध्यम से कई बार डॉ. हर्षदेव माधव ने अपने काव्यों का नामकरण किया है, जो इनके काव्यसंकलनों के मिजाज पर खरा उतरता है। भवभूति ‘‘जानन्तु ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः’’ के माध्यम से अपने उन समकालीनों पर कटाक्ष करते हैं जो उनकी कविता को उस समय समझ नहीं पा रहे थे तो कवि माधव भी अपने ऐसे ही समकालीनों को अपने काव्यसंकलन के माध्यम से उत्तर देते हुए संग्रह का नाम रखते हैं - जानन्तु ते। 

             यह कवि माधव की प्रत्यग्र 55 संस्कृत गजलों का संकलन है। सभी गजलें अपने आप में अनूठी हैं। वे गजल का संविधानक तो अपनाते हैं लेकिन साथ ही अपने कथ्य को कहने के लिये संस्कृत के पारम्परिक छंदों का भी आश्रय लेते हैं। आपकी गजलें वसन्ततिलका, उपजाति, अनुष्टुप्, स्रग्धरा, वंशस्थ, शार्दूलविक्रीडित, द्रुतविलंबित, मालिनी, शिखरिणी,मन्दाक्रान्ता जैसे लोकप्रिय संस्कृत छन्दों में तो उतरती ही हैं, साथ ही विद्युन्माला, मणिमाला, पंक्ति, प्रहर्षिणी, भ्रमरविलसिता, प्रबोधिका मदलेखा, मत्तमयूर जैसे अल्प प्रचलित छन्दों के प्रवाह में भी गजल डुबकी लगा लेती हैं। यहां छोटी बहर की तो गजल हैं ही जैसे कि शशिवदना छन्द के अनुसरण में यह गजल -

अचलशिवोऽहम्

चपलशिवोऽहम्।।

पुनरथ माया-

शबलशिवोऽहम्।।

     तो सवैया छन्द की लय में बडी बहर की गजलें भी यहां मिलती हैं। कवि माधव हर बार अपनी नई राह पकडते हैं। वे तयशुदा रास्तों पर कभी नहीं चलते। शववाहकों पर उनकी शान्त रस से सिक्त मार्मिक गजल कवि के जीवनदर्शन को अभिव्यक्ति देती है-

रिक्ता कृत्वा गृहं सर्वं गच्छन्ति शववाहकाः।

रामनाम्नः कदम्बेन चलन्ति शववाहकाः।।

गृहस्वामी गतो दूरं विहाय धनसम्पदः,

मृत्तिकां तु शरीरस्य वहन्ति शववाहकाः।।

     कवि अपनी गजलों में समसामयिक समाज को परखता है, उसका बखान करता है, पुराने समय से आज के समय की तुलना भी वह करता है-

क्व नु सुरमुनिसेव्या सा पवित्रा धरित्री

क्व च मलिनतरेयं रंकदीना धरित्री ।।

क्व नु पुलकितगात्री शस्यरम्या धरित्री

क्व च मनुजबुभुक्षा-खिन्नचित्ता धरित्री ।।



आध्यात्मिक गजल -  कवि माधव संस्कृत में आध्यात्मिक गजल लिखने वाले प्रथम गजलकार हैं। संकलन की कतिपय गजल इस श्रेणी में आती हैं। दर्शन में हंस प्रतीक है आत्मा का, उस प्रतीक को लेकर कवि माधव ने आध्यात्मिक गजल का ताना-बाना बुना है-

स्वान्तः क्लेशैर्दूयते नैव हंसः।

भावाभावैर्दूष्यते नैव हंसः।।

मुक्ताकाशे स्वैरयात्राऽस्ति मुक्त्यै

कारागारै रुध्यते नैव हंसः।।

      सामने आकाश मुक्त है और यात्रा मुक्ति की है लेकिन वह यात्रा स्वैच्छिक है और जब यात्रा स्वैच्छिक हो तो भला गहन समुद्र में डूबने का भय किसे होगा, सुविधाजनक यात्रा पर चलने वाले मंजिल पर पहुंचने का आस्वादन नहीं ले पाते या कि सच्चा आनन्द यात्रा का ही है, गन्तव्य का नहीं -

अब्धौ भीतिर्मज्जनस्यापि नास्ति,

नौकार्भिवा नीयते नैव हंसः।।

   आत्मन्!, दीपः, घटः, वृन्दावनम् आदि शीर्षकों से युक्त गजलें भी आध्यात्मिक गजलों की श्रेणी में आती हैं। 


मर्शिया गजल-  मर्सिया मूल रूप से एक अरबी शब्द है जो रिसा से बना है। मर्सिया काव्य में किसी के अभाव में विलाप किया जाता है। संस्कृत गजल के क्षेत्र में कवि हर्षदेव माधव प्रथम ऐसे गजलकार हो गये हैं, जिन्होंने मर्सिया शैली का प्रयोग गजल में किया है। मर्शियागझलगीतिः में कवि किसी व्यक्ति विशेष के अभाव में मर्सिया नहीं लिख रहा है अपितु वह स्वप्न, उत्सव आदि के अभाव में मर्सिया लिखता है-

अद्य मे सूर्यो गतश्चन्द्रो गतः।

अद्य मे रात्रिर्गता स्वप्नो गतः।।

जीवितं जीर्णं वनं मे संवृतम्,

उत्सवो यातो निजानन्दो गतः।।

पादपे छिन्ने कथं जीवेल्ल्ता,

जीवनाधारो हि मे श्वासो गतः।।


निरोष्ठ्यवर्णा गजलगीति -      शिवविभूतियोग शीर्षक से युक्त गजल में कवि माधव ने दण्डी कवि के समान ओष्ठ्य वर्णों का प्रयोग नहीं किया है। दण्डी रचित दशकुमारचरित में प्रिया के द्वारा किये गये दन्तक्षत के कारण मन्त्रगुप्त ओष्ठ्य वर्णों का प्रयोग नहीं कर पाता । स्रग्विणी छन्द में प्रस्तुत गजल भी निरोष्ठ्य वर्णों से युक्त है-

श्रीधरे शंकरः।

शंकरे शंकरः।।

अष्टधा दर्शने,

सुन्दरे शंकरः।।

खेचरे केचरे

गोचरे शंकरः।।


शकारस्य गजलगीति -    शूद्रक रचित मृच्छकटिकम् में शकार नामक पात्र विचित्र प्रकार का प्रतिनायक है। वह अपने कथनों में स वर्ण के स्थान पर श वर्ण का प्रयोग करता है अतः उसका नाम ही शकार रख दिया गया है। प्रयोगधर्मी कवि हर्षदेव माधव शकार की उक्तियों को लेकर गजल तो रचते ही हैं, साथ ही सम्पूर्ण गजल में स वर्ण के स्थान पर श वर्ण का ही प्रयोग करते हैं-

धावशि याशि च शभयं श्वशिषि च कुत्र. गमिष्यशि वशन्तशेणे!।

मुक्तमयूरी त्वं यमराजं श्वयं वरिष्यशि वशन्तशेणे!।।

श्वा इव हरिणीं त्वां च कपोतीं बिडाल इव गृह्णामि शवेगम्,

अबले! हरामि शीघ्रमवशिके किं नु करिष्यशि वशन्तशेणे!।।

    शकार पात्र की एक और विशेषता है कि वह प्राचीन कथाओं के पात्रों को असंगत रूप से जोड देता है। कवि ने अपनी गजल में इसका भी बखूबी प्रयोग किया है-

अश्निह्यत् कुन्त्यां कंशो वा रामो द्रौपद्यामश्निह्यत्,

श्निह्याम्येवं मधुरान् शब्दान् त्वमपि वदिष्यशि वसन्तशेणे!।। 



स्त्रीपुरुषोक्तिगजल (दीर्घगजल) -    कवि माधव ने गजलसंग्रह के अन्त में एक दीर्घ गजल को प्रस्तुत किया है। इस दीर्घ गजल में 33 शेर माधव जी द्वारा रचे गये हैं। इस गजल की दीर्घता तब और बढ जाती है, जब इसमें 7 कवि उसी शैली में अपने द्वारा रचे गये शेरों को जोडते हैं। यह संस्कृत गजल के क्षेत्र के साथ-साथ साहित्य में भी अभिनव प्रयोग है। इस गजल की एक और विशेषता यह है कि इसमें स्त्री और पुरुष दोनों की उक्तियों को परिवर्तनशील रदीफ-काफिए के साथ प्रयुक्त किया गया है, इस तरह यह स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप  से घटित होती है। भुजंगप्रयात छन्द में लिखी गई यह गजल कई मायनों में अद्भुत बन पडी है-

मृजामो वयं किं लिखन्तः/लिखन्त्यः।

सदा विस्मरामस्स्मरन्तः/स्मरन्त्यः।।

गृहं नास्ति, गन्तव्यदेशः सुदूरे,

स्वयात्रां त्यजामश्चलन्तः/चलन्त्यः।।



     प्रस्तुत संकलन में कई अप्रचलित या अल्पप्रचलित धातुओं का भी प्रयोग किया गया है। प्रयोगशील इस गजल संकलन का आधुनिक संस्कृत साहित्य में सर्वथा स्वागत किया जाना चाहिए।

Saturday, February 18, 2023

काव्य यात्रा _ विदग्धा लोकयात्रेयम्

कृति - विदग्धा लोकयात्रेयम्


लेखक - डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय

विधा - संस्कृतगजलसंकलन

प्रकाशन वर्ष - 2022

प्रकाशक - सत्यम् पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 208

अंकित मूल्य - 795/-

                अर्वाचीन संस्कृत  साहित्य में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री, जो कि ‘मंजुनाथ’ तखल्लुस से भी जाने जाते हैं, ने गजलगीतियों को उतारा। तब से 21 वीं सदी के तृतीय दशक के आरम्भ तक अनेक संस्कृत कवियों ने इस विधा में अपने कहन को अभिव्यक्ति दी है। मध्यप्रदेश निवासी डॉ0 लक्ष्मीनारायण पाण्डेय को हम फेसबुक आदि सोशल मीडिया के माध्यम से पढते रहे हैं। अब उनकी संस्कृत गजलों का संकलन 2022 के जाते - जाते छप कर आया है। यह स्वयं कवि की लोकयात्रा को तो प्रतिबिम्बित करता ही है, साथ ही संस्कृत गजल की लोकयात्रा के भी नये पडावों को अभिव्यक्त करता है। प्रस्तुत संकलन में कवि की 101 संस्कृत गजलों को निबद्ध किया गया है। 



              संकलन के आरम्भ में शिव को समर्पित मंगलाचरण के लिये भी कवि प्रकृतानुसार गजलविधा का ही आश्रय लेता है-

                नास्ति यस्यादिर्न चान्तः तन्नुमः।

भस्मना महितं महान्तं  तन्नुमः।।

                 अष्टधाप्रकृतेः स्वरूपं शाश्वतम्,

                  पार्वतीकान्तं सुकान्तं तन्नुमः।।



   कहीं कवि अन्योक्ति का आश्रय लेता हुआ कहता है कि मैं उस की गाथा लिख रहा हूं, जिसे अपनों ने ही लूट लिया-

               पद्मानि लुण्ठितानि यस्य द्विरेफचौरैर्

                गाथामहं लिखामि तस्य सरोवरस्य।।

       तो कहीं इसी दीर्घ गजल में वे उन कवियों की भी खबर लेते दिखाई देते हैं, जिनकी दृष्टि सुन्दर शरीरों पर तो जाती है लेकिन उन्हें भूखे लोगो की पीड़ा दिखाई नहीं देती-

               देहेषु चिक्कणेषु दृष्टिस्तथा कवीनां

             केनापि लिख्यते किं पीडा बुभुक्षितस्य।।

      देश के शासक को व्यंग्य की शैली में कवि क्या खूब तरीके से देश के हालात बयां कर रहा है-

                        देशे सकलं रुचिरं राजन्।

                       प्रायो वहते रुधिरं राजन्।।

                          रागो द्वेषो दलनं छलनं

                    सञ्जातं खलु सुकरं राजन्।।

             संस्कृत कवियों में ऐसा साहस कम ही मिल पाता है। प्रायः कवि तो शासक की प्रशंसा करने में ही अपनी लेखनी को खपाएं रखते हैं और उन पर शतककाव्य, महाकाव्य रचते रहते हैं। लेकिन इसमें उनकी विवशता भी सम्भवतः कारण होती है, क्योंकि वे शासन को खुश करके ही तो अपने लिये पुरस्कार और अवसर जुटा पाते हैं। 

                गजल में किसी शायर के रदीफ का प्रयोग कभी - कभी दूसरे शायर से मिल जाता है, लेकिन उनका अंदाजे बयां अलग होता है। शनैः शनैः रदीफ का प्रयोग संस्कृत के प्रसिद्ध गजलकार अभिराज राजेन्द्र मिश्र जी के साथ  अन्य कवियों ने भी किया है। कवि पाण्डेय भी इस रदीफ का प्रयोग करते हुए कहते हैं-

                    पीडा नवैव जायतेऽधुना शनैः शनैः।

                   दाहस्तथैव भासतेऽधुना शनैः शनैः।।

                   संवर्द्धिता विषाक्तवल्लरी वनक कुतो

                   मन्माधवः कषायतेऽधुना शनैः शनैः।।

कवि कहीं कहता है कि आश्चर्य कि बात यह है कि जिसने कभी नदी में डुबकी नहीं लगाई, वह तट पर खडा होकर नदी की कथा लिख रहा है-

                         आश्चर्यमेतदेव ये सर्वदा तटस्था

                  दूरादहो लिखन्ति नद्याः कथामिदानीम्।।

        आजकल हो भी यही रहा है। अनुभूत सत्य के स्थान पर केवल कल्पना मात्र से लिखा गया कथ्य लेखन को लम्बे समय तक जीवित नहीं रख सकता है। और यह भी सही है कि जब सूर्य के वंशज दिखलाई नहीं पडेंगे तो कवि खद्योतसम हो ही जाने हैं-

                  जाने न निर्गताः क्व सूर्यस्य वंशजास्ते,

                 खद्योत एष ब्रूते दीप्तेः कथामिदानीम्।।

 कवि की छोटे - छोटे बन्ध की गजल भी अनेक स्थानों पर गहरे भाव बोध लिये हुए दिखती है-

                       आकण्ठं यस्तृप्तो जातः।

                     सोऽयं मूको बधिरो जातः।।

      जो परम तत्त्व से सन्तुष्ट हो जाता है, वह फिर मूक बधिर सा हो ही जाता है। समुद्र सी गम्भीरता, आकाश सी शून्यता उसमें प्रविष्ट हो जाती है। 

           कहीं - कहीं काफिया गजल में लुप्त मिलता है, जो कि गजल के संविधानक के अनुरूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि  गजल में काफिया केन्द्र बिन्दु माना जाता है। जैसे कि इस गजल में काफिया की स्थिति नहीं बन रही है-

             अनन्ततामयेऽखिले भवे विचित्रतामिता।

         यथास्य कल्पना तथा विभाति कामरूपता।।

                अयन्तु दृष्टिविभ्रमःकुतश्च किं समीप्सितं

            त्वया चित्ता कदर्थना मया चितातिरम्यता।।

         यहां अन्तिम ‘ता’ छोटा रदीफ है, उसके पहले काफिया नदारद है। रदीफ का शाब्दिक अर्थ होता है, जो घोडे पर मुख्य सवार के पीछे बैठता है। यहां मुख्य सवार ही नहीं है, इससे जिसे पीछे बैठना चाहिए, वह मुख्य जान पडता है।

    कहीं पर कवि की कहन शैली चमत्कृत करती है, यथा-

                      पद्मपत्रे लिखित्वा प्रतीक्षाकथां

                       सालसा शर्वरी निर्गता वर्तते।।

         तो कहीं कवि नवीन विषयों पर भी गजल रचते हैं, यथा निर्धन बालक छोटु पर लिखी गई यह गजल-

            प्रातः सायं यतस्ततः किं गच्छति छोटुरयम्,

              द्वारं-द्वारं विनोपानहा गच्छति छोटुरयम्।।

               बाल्यं किं तन्नो जानाति किं क्रीडनकं वा,

           स्कन्धे जीर्णस्यूतं धृत्वा विचरति छोटुरयम्।।



     संस्कृत गजल क्षेत्र में यह संकलन सर्वथा स्वागत योग्य है।कवि की, काव्य की यह यात्रा चलती रहें। स्वयं कवि के शब्दों में-

               असारेऽपारसंसारे चलन्ती लोकयात्रेयम्।

             तमिस्रातीर्णगन्तव्ये नयन्ती लोकयात्रेयम्।।

                कदारब्धा न जानेऽहं तथारब्धा कुतश्चैषा,

           कदा पूर्णा भविष्यत्यन्तहीना लोकयात्रेयम्।।