Wednesday, May 13, 2020

सप्तशतीसङ्ग्रहः - पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः

सप्तशतीसङ्ग्रहः- पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः 


पुस्तक- सप्तशतीसङ्ग्रहः (पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः द्वितीयो भागः)
रचयिता- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-93-82091-07-3
पृष्ठ संख्या- 206
अंकित मूल्य- 135रू.
संस्करण- 2012 प्रथम


कवि- सागर में जन्मे, अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना की है। उन्होंने हिन्दी के प्रायः सभी बड़े कवियों की रचनाओं को संस्कृत में अनूदित किया है। उन्होंने जीवन भर अध्यापन किया और अनुवाद भी। उनकी रचनाएं दूर्वा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। उन्होंने भारतीय कवियों के साथ ही विदेशियों की रचनाओं का भी सुललित संस्कृत भाषा में पद्यानुवाद किया। पारम्परिक पण्डित होते हुए भी वे रूढिवादी नहीं थे। महापुरुषों के प्रति उनके मन में सम्मान था। वे स्वयं भी आचरण एवं व्यवहार से महात्मा थे। उन्हें 2005 ई. में राष्ट्रपति पुरस्कार और मृत्यूपरान्त 2009 ई. में श्रीमद्रामचरितमानसम्  पर साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार प्रदान किया गया।

पुस्तक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली की लोकप्रिय साहित्य ग्रन्थमाला के अन्तर्गत क्रमांक-35 पर सप्तशतीसङ्ग्रह ग्रन्थ प्रकाशित है। भूमिका के रूप में संस्थान के कुलपति और प्रधान संपादक आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी का पुरोवाक् और डॉ. ऋषभ भारद्वाज का सम्पादकीय है। इस ग्रन्थ में दो सप्तशतियाँ प्रकाशित हैं- सदुक्तिसप्तशती और सौन्दर्यसप्तशती।

सदुक्तिसप्तशती- महापुरुष प्रकाशपुंज की तरह होते हैं। वे ज्ञान रूपी प्रकाश से लोक को प्रकाशित करते हैं। पुण्यभूमि भारत में वाल्मीकि, व्यास, महावीर, बुद्ध, रामानुज, निम्बार्क, वल्लभाचार्य, मध्व, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, नानक, कबीर, सूर, तुलसी, तुकाराम, रामदास, रामतीर्थ, रामकृष्णपरमहंस, विवेकानन्द आदि महापुरुष हुए हैं। इसी तरह बाहर भी सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, फ्रांसिस, लात्शे, कन्फ्युशियस आदि महापुरुषों ने ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने महापुरुषों की सदुक्तियों को सन्तवाणी नाम से संग्रहीत किया था। द्विवेदी जी ने उनमें से 706 लोकोपयोगी सदुक्तियों का संस्कृत में पद्यानुवाद कर ‘सदुक्तिसप्तशती’ नाम दिया है।
पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद द्रष्टव्य है-

महत्सङ्गं सदा कुर्यात् सुखार्थमिह बुद्धिमान्।
महावृक्षे खगाश्छायां लभन्तेऽथ फलानि च।।
अविश्वासी चलो भीरुश्चिन्तावानिन्द्रियानुगः।
संशयात्मा कदाचित् किं स्वप्नेऽपि सुखवान् भवेत्।। 

सदुक्तिसप्तशती, श्लोक 591, 592

सौन्दर्यसप्तशती- सप्तशती परम्परा में गाथासप्तशती और आर्यासप्तशती लोकप्रिय ग्रन्थ हैं। कवि बिहारी ने बिहारीसतसई से जो ख्याति पायी, वह प्रसिद्ध ही है। यह सौन्दर्यसप्तशती बिहारी की सतसई का संस्कृत पद्यानुवाद है। इसकी संक्षिप्त भूमिका स्वयं द्विवेदी जी ने लिख रखी थी। अनुवाद करते समय द्विवेदी जी मूल काव्य में निहित अर्थ की तह तक जाते हैं। कवि की विवक्षा अर्थात् कवि के कथन के अभिप्राय को आत्मसात् करके ही अनुवाद किये गये हैं। अनुवाद सहज भाव से किये गये हैं। द्विवेदी जी ने शिष्यों को बताया था कि कवि हृदय में छन्द सहज उतरता है, जबकि खींचतान से कृत्रिम लगता है।
दुरति न कुच विच कंचुकी, चुपरी सारी सेत।
कवि आँखन के अरथ लौ, प्रगटि दिखाई देत।।

बिहारी के इस दोहे का पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

विशुभ्रशाट्यां नवचोलवस्त्रे स्थूलावुरोजौ परिदीव्यतः स्म।
कविप्रयुक्तेषु यथा सुवर्णेष्वर्थः स्वयं प्रस्फुटितोऽस्ति काव्ये।।

सौन्दर्यसप्तशती, श्लोक 189

कनक कनक तैं सौ गुनी मादकता अधिकाय।
उहि खाये बौरातु है, इहिं पाऐं बौराई।।

इसके पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद में मूल काव्य का सौन्दर्य और शब्दालंकार सुरक्षित बना रहा है-

उक्तं ध्रुवं शतगुणं कनकान्मदस्य संवर्धनाय कनकं ह्यधिकं जगत्याम्।
एकं नरस्तु मदवान् किल भक्षयित्वा लब्ध्वैव चैकमपरं भवति प्रमत्तः।। 

सौन्दर्यसप्तशती, श्लोक 192

डॉ नौनिहाल गौत्तम

असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

Tuesday, May 12, 2020

युवा मन के उड़ान की अभिव्यक्ति : सहपाठिनी


संस्कृत कथा साहित्य जहां एक ओर पंचतंत्र, विक्रमवेतालकथा, शुकसप्तति, आदि के लिए जाना जाता है वहीं दूसरी ओर आधुनिक संस्कृत साहित्य इनसे इतर विश्वकथा साहित्य के साथ बढ़ने का प्रयास कर रहा हैं | वह अपने कथ्य, शैली, कहन के तरीके सब में बदलाव कर रहा है | प्रमोद भारतीय रचित सहपाठिनी इसी तरह का कथा संग्रह है | युवा मन के उद्दाम भावों की अभिव्यक्ति के साथ यहां प्रणय के कोमल क्षण भी हैं तो हमारे आधुनिक समाज की हकीकत भी बयां की गई है | डॉ भारतीय ने लीक से हटकर जो प्रयोग किये हैं वे आलोच्य हैं ही | यह समय ही बताएगा कि वे प्रयोग संस्कृत समाज किस प्रकार स्वीकृत या अस्वीकृत करता है| डॉ. अरुण कुमार निषाद इस कथा संकलन का परिचय ब्लॉग के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं-

रचना-सहपाठिनी (संस्कृत कथा संग्रह),
लेखक-डॉ.प्रमोद भारतीय,
प्रकाशन- माणिकप्रकाशन अम्बालाछावनी (हरियाणा), 
संस्करण-प्रथम संस्करण 1999 
 पृष्ठ संख्या- 92


युवा मन के उड़ान की अभिव्यक्ति : सहपाठिनी
मनुष्य के उतार-चढ़ाव भरे जीवन में एक क्षण ऐसा भी आता है जब उसे दुनिया की हर चीज रंगीन दिखाई देती है । यह अवस्था होती है किशोरावस्था के तुरन्त बाद की अवस्था अर्थात् युवावस्था  । जीवन की ऐसी अवस्था में प्रकृति के कण-कण में मनुष्य को सौन्दर्य परिलक्षित होता है । ऐसी अवस्था में विपरीतलिंगी के प्रति आकर्षण कोई नयी बात नहीं है । सृष्टि रचना के पश्चात् से ही ऐसा होता चला आया है और जब तक स्त्री और पुरुष की रचना इस पृथ्वी पर होगी ऐसा होता रहेगा ।किसी के सपने टूटेंगे तो किसी के फलित होंगे ।
ऐसे ही युवा मन के भावों को छुने का प्रयास किया है आधुनिक संस्कृत साहित्य के कथाकार डा.प्रमोद भारतीय ने अपने कथा संग्रह “सहपाठिनी” में । इस कथा संग्रह में कुल बारह कहानियां हैं, जो कि आत्मकथा शैली में निबद्ध हैं ।
प्रत्येक युवक-युवती की यह दिली इच्छा होती है कि कोई विपरीत लिंगी उसकी तरफ आकर्षित हो । वह उसके साथ समय बिताये, उसकी भावनाओं को समझे और उन भावनाओं का सम्मान करें । ‘पक्षपात:’ कहानी में लेखक भी मोहिनी नाम की एक युवती के प्रति आकर्षित होता है ।
प्रथमा कन्या रजनी किंचित् श्यामवर्णी आसीत् परं द्वितीयाया: कन्याया: कटाक्षस्य कथा तु शनै: शनै: सर्वेषु छात्रेषु प्रसारिता । तस्या नामपि आसीत् मोहिनी । परिणामतयाऽस्माकं मध्ये मोहिन्या: मोहजालमीदृशं सुदृढ़ं जातं यत् सर्वेषां छात्राणामवधानं न पठने आसीत् न भोजने न शयने वाऽऽसीत् । क: पूर्वाह्ण: को मध्याह्ण: कश्च अपराह्ण:, छात्रा: समयं विस्मृत्य सदैव तस्या: दर्शनोत्सुका: ।
कोई विरला ही पुरुष होगा जो किसी महिला के किसी प्रस्ताव को ठुकरा दे । यह पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी होती है । अपने सैकड़ों नुकसान करके भी वह स्त्री सहायता को तत्पर हो जाता है । भले ही बाद में पछताना पड़े । मधुमिता जब लेखक से दस मिनट का समय मांगती है तो वह उसे इंकार नहीं कर पाता है ।
“यदि भवत: अध्ययने बहुर्बाधा न भवेत्, दशनिमेषाणां कृते सम्मुखे पर्णांगणे आगमिष्यामि किम्?”
“अवश्यम् । किमर्थं नैव! अहं मधुमिताया: निमंत्रणं परित्यक्तुं नैव समर्थ: । तस्या: अवरे न जाने किमाकर्षणमासीद्‍ यदहमात्मानं रोद्धुं नापारयम्....।”
यह सार्वभौम सत्य है कि-प्रेम प्रस्ताव सदैव पुरुष की ओर से होता है । लेखक भी मधुमिता के समक्ष प्रेम प्रस्ताव रखता है ।
त्वं मम हृदये तु वसस्येव, इदानीमहं त्वां स्वकीयगृहेऽपि आनेतुमिच्छामि ।
मन की अभिलाषा पूर्ण होने पर भला कौन प्रमुदित नहीं होता । मधुमिता भी यही चाहती थी । उसकी भी यह आन्तरिक इच्छा थी कि वह किसी के घर की कुलवधू बने । परन्तु चूंकि वह वेश्या पुत्री थी तो उसे यह आशंका थी कि वधू के रुप में उसे कौन अपनायेगा । जब लेखक उसे बताता है कि लेखक की मां ने मधुमिता को अपनी बहू स्वीकार कर लिया है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता है  और वह खुशी के मारे लेखक के गले से लिपट जाती है ।
“किं सत्यम्?” मधुमिताया: हर्षस्य नासीत् काऽपि सीमा । सा सद्य: ममांकमागत्य मम ग्रीवा स्वकीयहस्तयो: मालां प्रदत्तवती-कामं मया संसारस्य सर्वं सुखं लब्धम् । 
आजकल होटलों में क्या-क्या उपलब्ध होता है । इसका बड़ा ही सजीव वर्णन डा. प्रमोद भारतीय ने किया है । वासना की पूर्ति के युवक-युवती किस स्तर तक गिर गये है इसका उदाहरण इस कहानी में है ।
“साहब, भवतां प्रमोदायात्र षोडसी, अष्टादशी, द्वाविंशद्वर्षीया वा-सर्वं प्राप्येत । भवतां केवलम् आदेशस्य विलम्ब....|”
“गृहे रात्रे त्रिवादनपर्यन्तं जागरणं जातं सुचित्राया: कल्पनायाम्। न जाने किमिन्द्रजालं तया कृतं ममोपरि”|
पार्क, रेस्टोरेंट और बस स्टैण्ड आदि पर किसी नवयुवक या नवयुवती द्वारा एक-दूसरे का इंतजार करना कोई नई बात नहीं है । सुनीता लेखक को बताती है कि वह उसके मित्र कमलनाथ तिवारी का इंतजार कर रही है ।
“कमलस्यैव प्रतीक्षा करोमि । पंचवादन तु जातम्, इदानीं पर्यन्तं स: नागत:, न जाने कुत्रास्ति । तस्या: स्वरे चिन्ताया: लक्षणं स्पष्टरुपेण दृष्टम्”|
मित्र मौका मिलने पर एक-दूसरे चुहलबाजी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते ।
“वनिते! मह्यमपि आइसक्रीम रोचते यदा-तदा!” मया प्रोक्तमासीत् ।
“गृह्णातु!” तस्या: मुखमवनतमासील्लज्जया ।
प्रेम का स्थायित्व वहीं है जब कोई अपने प्यार के लिए बिना गलती के भी गलती स्वीकार कर ले । रिश्ता निभाने के लिए गर्व दिखाने के बजाए झुक जाए ।
“आई एम सारी बाबा! इत: पश्चात् त्वयैव सार्द्धं स्थास्यामि, लोकव्यवहारंच ज्ञातुम चेष्टां विधास्यामि।” मल्लिका मम हस्तमेकं स्वकीयहस्तयो: नीत्वा उक्तवती ।
रात्रे: दशवादनं जातम्, भयं न लगति? मम क्रोध: विलुप्त: जात: आसीत् ।
भवादृश: वीरपुरुष: यदा सार्द्धं वर्तते तर्हि भयं किमर्थम् ?
मिलन के पश्चात् विक्षोभ हो और वेदना न उत्पन्न हो ? शिरीष के हृदय मे भी मल्लिका से बिछड़ने का दर्द है । वह अपने मित्र से कहता है-
“शिरोवेदना तु गता....। इदानीं तु हृदयवेदना आरब्धा ।” 
परिस्थितियां चाहे जो करवा दें परन्तु कोई भी प्रेमी या प्रेमिका अपने पहले प्यार को भूल नहीं सकता है ।
त्वं बहुनिष्ठुर: ! द्वादशवर्षेषु त्वया कदापि मम स्मरणं न कृतम् ।”
“नहि सरिते ! अहं भागलपुरस्य प्रायश: सर्वाणि मित्राणि पृष्टवान् तव विषये परं न साफल्यं लब्धवान् । केनापि कथितं यत्तव विवाह: सम्पादित: ।”
प्राय: युवतियों की यह आदत होती है कि-किसी पुरुष से एक बार यदि बातचीत हो जाए तो दुबारा मिलने पर यह शिकायत अवश्य करेंगी कि आपने तो मुझे भुला दिया, कोई और मिल गई होगी मुझसे अच्छी ।
“भो मधुपमहोदय! भवान् तु मां विस्मृतवान् एव ।”
नवयुवक-नवयुवतियों की यह बहुत ही बड़ी कमजोरी है कि-अगर एक ने जरा सा भी प्रेम प्रदर्शित किया तो दूसरा बिना किसी देरी के यह कहते नहीं हिचकिचाता कि-वह उसके बगैर जीवित नहीं रह सकता ।
“आम् वाटिके! सम्प्रत्यहं त्वां विना न जीवितुं पारयिष्यामि । अहं त्वया सह सद्य: विवाहं कर्तुमिच्छामि ।”
प्रत्येक युवक-युवती की यह इच्छा होती है कि कोई उसके मनोभवों को बिन कहे जाते समझे । उसे अपना माने केतकी की भी यह अभिलाषा थी जिसे वह लेखक के समक्ष प्रकट करती है ।
“पाटल! अहमीदृशी सौभाग्यशालिनी नास्मि। मां कोऽपि प्रेम्णा न द्रक्ष्यति न मया सह कोऽपि परिणय करिष्यति ।” 
प्रतीत होता है कि विद्योतमा के वाक्य की तरह केतकी का यह वाक्य लेखक के लेखन का उत्स है –
सहपाठिनी केवलं सहपाठिनी भवति, सहजीविनी न भवति ।”
इस प्रकार हम देखते हैं कि-डा.भारतीय ने युवाओं के मन की नब्ज को पकड़ने का जो प्रयास किया है उसमें वे पूर्ण रुप से सफल भी रहे हैं । आत्मकथा शैली में लिखी इन कहानियों को पढ़ते समय कभी-कभी पाठक को धोखा भी हो जाता है कि-इन कहानियों का वास्तविक नायक सचमुच में लेखक ही तो नहीं हैं । बहरहाल जो भी सच्चाई हो, पर कथा शुरू से लेकर अंत तक पाठक को बांधे रखती है । कहानियों का संवाद और वातावरण पाठक को भ्रम डाल देता है । ऐसा लगता कि-यह सारी घटनायें उसके कालेज या विश्वविद्यालय की हैं ।  कहानियों के बीच-बीच में कुछ विदेशी शब्दों (लालटेन, काफी,ब्रैडरोल, कैरम, सैण्डबिच, सर आदि) का भी प्रयोग हुआ है । जिन्हें हम प्रायश: प्रयोग में लाते हैं । उसके लिए लेखक ने किसी संस्कृत शब्द की खोज नहीं की । यह उनके लेखन की अपनी विशेषता है । मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि- आधुनिक कथा साहित्य के शोधार्थियों के लिए यह संग्रह मील का पत्थर साबित होगा । मनोरंजन की दृष्टि से भी यह संकलन बहुत ही रुचिकर है । थोड़ी सी भी संस्कृत जानने वाले इसकी भाषा को आसानी से समझ लेंगे । डा.प्रमोद भारतीय से पाठकों को अभी बहुत आशायें हैं ।
समीक्षक-डॉ.अरुण कुमार निषाद
सम्पर्क -08318975118
Mail id- arun.ugc@gmail.com


प्रकाशित कृतियाँ- 1.आधुनिक संस्कृत साहित्य की महिला रचनाधर्मिता 2.आधुनिक संस्कृत साहित्य : विविध आयाम 3.तस्वीर-ए-दिल (काव्य-संग्रह) ।देश विदेश की दर्जनों शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र (६०)और समीक्षाएं (२२)।  प्रकाशित।पचास सेमिनार

Monday, May 11, 2020

काव्यसङ्ग्रहः - पं. प्रेमनारायण द्विवेदी

काव्यसङ्ग्रहः - पं. प्रेमनारायण द्विवेदी

पुस्तक- काव्यसङ्ग्रहः (पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः प्रथमो भागः)
रचयिता- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-93-86111-79-1
पृष्ठ संख्या- 301
अंकित मूल्य- 170रू.

संस्करण- 2012 प्रथम

कवि-  हिन्दी के प्रसिद्ध कवि पद्माकर की भूमि सागर में जन्मे, अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना की है। उन्होंने परम्परागत पद्धति से शास्त्री, आचार्य तथा आधुनिक पद्धति से बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. उपाधियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने जीवन भर अध्यापन किया और अनुवाद भी। उन्होंने तुलसीदास आदि भारतीय कवियों के साथ ही कन्फ्यूशियस आदि विदेशियों की रचनाओं का भी सुललित संस्कृत भाषा में पद्यानुवाद किया। देवकाव्य कहे जाने वाले वैदिक सूक्तों को संस्कृत पद्यों में उतारा तो बुन्देली बोली के देशज रसिया गीतों को भी संस्कृत में सहेज दिया है। उन्हें 2005 ई. में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 2009 ई. में श्रीमद्रामचरितमानसम्  पर साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार प्रदान किया गया।


पुस्तक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली की लोकप्रिय साहित्य ग्रन्थमाला के अन्तर्गत क्रमांक-35 पर काव्यसङ्ग्रहः ग्रन्थ प्रकाशित है। भूमिका के रूप में संस्थान के कुलपति और प्रधान संपादक आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी का पुरोवाक् और डॉ. ऋषभ भारद्वाज का सम्पादकीय है। इस ग्रन्थ में चार खण्ड हैं। प्रथम खण्ड स्तुतिकुसुममाला है। इसमें कवि की 28 स्तुतिपरक मौलिक रचनाएं संकलित हैं। इनमें गणेश, शिव, दुर्गा, सरस्वती, सूर्य, हनुमान्, राम, कृष्ण आदि देवों के अष्टक, स्तुतियाँ हैं। इन स्तुतियों में लय और गत्यात्मकता होने के साथ ही ये गेय हैं। इन्हें कुछ प्रसिद्ध गीतों की तर्ज पर भी गाया जा सकता है। स्वयं द्विवेदी जी अपने शिष्यों को ये स्तुतियाँ गाकर सुनाते थे। द्रष्टव्य-

भज विश्वपतिं कमलारमणं
भज केशिनिषूदनमाशु हरिम्।
भज माधवमार्तिहरं सततं
यदि वांछसि जन्म निजं सफलम्।।

काव्यसङ्ग्रहः, पृ. 27

द्रुतमातपतापितभूमितले नहि धाव हरे नहि धाव हरे!
नवनीतमहो नयसे नय भो द्रुतमेहि पुनर्विहसन् निकटे।
रुचिरं नवनीतयुतं स्वमुखं किल दर्शय सञ्चितपापहरम्
भवसिन्धुगतं परिपाहि पुनः किल देहि सुखं हर मे विपदम्।।

काव्यसङ्ग्रहः, पृ. 39

द्वितीय खण्ड स्फुटकाव्यानि है। इसमें कवि की विभिन्न विषयों पर 84 मौलिक रचनाएं संकलित हैं। ये कविताएं सहृदयों के हृदयाह्लाद तथा समाज के मार्गदर्शन की सामर्थ्य रखती हैं। इनमें ग्रीष्मादि ऋतुओं, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों, कार्गिल युद्ध जैसे संवेदनशील और चुनाव आदि समसामयिक विषयों पर रचनाएं हैं। द्रष्टव्य-

कार्गिलक्षेत्रं कपटाद् रिपुणा निजाधिकारे नीतम्।
तान् दूरयितुं देशशासकै रक्षाबलमानीतम्।।
तत्र शतघ्नीधरा निगूढाः प्रतिपक्षा विचरन्ति।
गुप्तमदृश्याः सुदृढकोष्ठकाद् गुलिकाभिर्वर्षन्ति।।

काव्यसंग्रह, पृ. 57

काचकलितकुतुपात् किल मदिरां, पीत्वा जनः प्रमाद्यति रे।
को वा शृणुयाद् देशविपत्तिं, जनप्रतिनिधिः पश्यति रे।। 

काव्यसंग्रह, पृ. 107

तृतीय खण्ड अनूदितलघुकाव्यम् है। इसमें कवि ने इटालियन कवि ग्योवन्नी रैबॉनी आदि विभिन्न कवियों की रचनाओं का संस्कृत पद्यानुवाद किया है। ‘अकेली घेरी बन में आय, श्याम तेनें कैसी ठानी रे’ का पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

एकाकिनीं श्याम वने कथं मां रुणत्सि मानिन्निवलां हि बालाम्।
वृन्दावनं यामि ततो निवृत्ता, ह्येष्यामि वर्षावनमेव भूयः।। 

एकाकिनीं, काव्यसंग्रह, पृ. 271

चतुर्थ खण्ड वैदिकसूक्तसौरभम् है। इसमें कवि ने छः सूक्तों का संस्कृत पद्यानुवाद किया है। गुरु मुख से वेद-वेदाङ्ग का विधिवद् अध्ययन करने वाले द्विवेदी जी ने पुरुषसूक्त को अनुवाद में बोधगम्य बना दिया है। द्रष्टव्य-

ब्रह्माण्डमस्माच्च विराट्स्वरूपं, ब्रह्मा ततोऽभूत् पुरुषः परो यः।
ससर्ज भूमिं  च पुरश्च सर्वास्तासु प्रविष्टः स्वपुरीषु जीवः।। 

काव्यसंग्रह, पृ. 279
डॉ नौनिहाल गौत्तम
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com


Sunday, May 10, 2020

विक्रमचरितम् - रोचक आख्यान


प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी का रचना संसार विपुल है | आपने प्रायः काव्य की हर विधा में रचनाएं लिखी हैं | प्रो त्रिपाठी का विक्रमचरित एक ऐसा  गद्यकाव्य है जो लिखा तो गया है पशु पात्रों को आधार बनाकर किंतु वह मनुष्य समाज की वर्तमान राजनीति को बखूबी अभिव्यक्त करता है | यहां पशु प्रतीक बन जाते हैं | पंचतंत्र, हितोपदेश आदि का स्मरण कराता यह आख्यान हमारे समय का दस्तावेज है | इस गद्यकाव्य का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं डॉ महावीर प्रसाद साहू |




विक्रमचरितम् - रोचक आख्यान
कृति - विक्रमचरितम्

रचयिता - राधावल्लभ त्रिपाठी
पृष्ठ संख्या- 122
अंकित मूल्य - 200
संस्करण-प्रथम 2000
प्रकाशक-प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली

प्रो, राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा रचित विक्रमचरित आख्यान की शैली में रचा गया गद्यकाव्य है। इसका विभाजन नौ उच्छ्वासों में किया गया है। परम्परा से हटकर इसमें वीभत्स रस मुख्य रूप से निबद्ध है। इस आख्यान के केंद्र में  एक पशु पात्र घूकर नामक सूअर है।

कथानक-   एक ग्राम में घूकर सूअर तिलकसिंह नामक ग्राम मुखिया की हवेली के निकट एक मलिन गली में निवास करता है। उसके साथ उसकी सोलह शूकर सुन्दरियां भी रहती हैं। एक बार उस हवेली पर आधिपत्य करने की इच्छा से वह सूअर हवेली में प्रवेश करता है किन्तु वहां उसकी जमकर पिटाई होती है। अपमानित घूकर सूअर सब कुछ त्यागकर एक दुर्गम वन में चला जाता है, जहां विक्रम नामक सिंह शासन करता है। घूकर के उस जंगल में प्रवेश करने से पहले सबकुछ ठीक था। घूकर चतुरिका नामक लोमडी (जो विक्रम की निजी सचिव थी) तथा कम्बुकण्ठ नामक सियार (पूर्व कोशाध्यक्ष) के साथ मिलकर तख्तापलट कर देता है और सूअर साम्राज्य की स्थापना करता है। तत्पश्चात् उस राज्य में सब कुछ बदल जाता है। सर्वत्र भ्रष्टाचार, अनाचार व्याप्त हो जाता है। मंत्री परिषद् का नाम बदलकर शूकरपरिषद् कर दिया जाता है। कुछ समय बाद विक्रम सिंह अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ मिलकर पुनः राज्य प्राप्त कर लेता है। घूकर सूअर जान बचाकर वहां से भाग निकलता है किन्तु फिर से अपना राज्य स्थापित करने का स्वप्न देखने लगता है। यही पर आख्यान समाप्त हो जाता है।
                     इसमें  वर्तमान राजनीति की शैली पर करारा व्यंग्य किया गया है। शूकर राज्य स्थापित होने पर किस प्रकार स्तुतियां बदल जाती हैं, चापलूसी किस हद तक बढ जाती है,  इसका उदाहरण द्रष्टव्य है-

जय जय शूकर जय जय घूकर जय भूधर विश्रान्तमते
जय धरणीधर जय घोणीवर पीनश्रोणीजनितनते।
कर्दमचारिन् मलचयहारिन् सततं  लेपितपंकतते
धरणीधारिन् जय जय नितरां मुस्ताक्षतिपातालगते।।

जब कुशासन प्रवेश करता है तो योग्यजन तंत्र से दूर हो जाते हैं। यथा-

इतस्तु विक्रमसिंहो दुर्गमवनस्यातिदुर्गमायां गुहायामेकस्यामेकाकिजीवनमयापयत्। विष्कम्भो नाम व्याघ्र इतस्तु शूकराः सुखेन निवसितुं न ददतीत्युक्त्वा पलाय्य विदेशे वसतिमकरोत्। कुम्भो नाम गजस्तु स्वयूथेन सह सुदूरं तीर्थयात्रार्थमगच्छत्। 

इसके साथ ही यह भी दिखाया गया है कि जब शासन बदल जाता है तो किस प्रकार सभी जगहों के नाम बदल दिये जाते हैं-

तस्माच्च दिनाद् दुर्गमवने सकलानां स्थानानां  नदीनां पर्वतानामुपवनानां च नामपरिवर्तनक्रमः प्रचचाल। तथाहि-दुर्गमवनमारात् प्रववाह मालिनी नदी। अस्या मालिनीति नाम्नि सामन्तवादगन्ध उज्जृमभत इति तैः शूकरानुयायियिनः घूकरमहाराजस्य मातुः पूतिकर्या नाम्नाo तस्या नद्यीः पूतिकरीति संज्ञया व्यपदेश आरब्धः।

साहित्य में जब राजनीति प्रवेश करती है तो साहित्य का क्षेत्र किस प्रकार विकृत हो जाता है, किस प्रकार शिक्षा की स्थिति बदहाल हो जाती है, किस प्रकार पुरस्कारों में बंदरबाट चलती है, इसका वर्णन करते हुए कहते हैं-

तेषु एकेन मिथ्याव्रतशास्त्रिनाम्ना रासभेन ‘आदिवराह-घूकरशूकरयोश्चरितस्य तुलनात्मकमध्ययन’ मिति शोधप्रबन्धे विरचितः, विद्यावारिधिरित्युपाधिश्च लब्धः। अनन्तरं महता समारोहेण तस्य शोधप्रबन्धस्य मुद्रितो ग्रन्थो लोकार्पणं नीतः। अन्येन केनचित् मलकान्तनाम्ना शुना घूकरमहाराजचरितं नात महाकाव्यं पूरितं प्रकाश्यतां च नीतम्। तदधिकृत्यासौ लक्षरूप्यकमितेन श्रीशारदापुरस्कारेण सम्मानितः

यह सम्पूर्ण गद्यकाव्य वर्तमान राजनीति का दर्पण है और अपनी विषय वस्तु तथा शैली के कारण पठनीय है



डॉ. महावीरप्रसाद साहू
मोबाइल नम्बर -9460244537

आपने आधुनिक संस्कृत उपन्यासों पर अपना शोध कार्य किया है। सम्प्रति राजस्थान में  स्थित महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है। आपकी एक पुस्तक सहित विविध शोधपत्र. प्रकाशित हुए है।

Saturday, May 9, 2020

श्रीमद्रामचरितमानसम्

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी जी संस्कृत के अद्भुत साधक रहे | मध्यप्रदेश के सागर में एक स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए आपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का संस्कृत में अनुवाद किया | ये संस्कृत के मौन रचनाकार थे, जिनकी रचनाएं उनकी कीर्ति को बढ़ा रही हैं | हमारे आग्रह पर नौनिहाल गौत्तम जी ने श्रीमद्रामचरितमानसम् का संक्षिप्त परिचय भेजा है | नौनिहाल गौत्तम वर्तमान में डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं  | गौत्तम जी के द्वारा हमें उनकी अन्य रचनाओं का भी परिचय मिलेगा, ऐसा हमारा विश्वास है | अब यह ब्लॉग सार्थकता कि ओर बढ़ रहा है |

श्रीमद्रामचरितमानसम्


पुस्तक- श्रीमद्रामचरितमानसम्
रचयिता- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- देववाणी परिषद्, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. रमाकान्त शुक्ल (पद्मश्री विभूषित)
पृष्ठ संख्या- 736
अंकित मूल्य- 202रू.
संस्करण- 2005 प्रथम


कवि-   पं. प्रेमनारायण द्विवेदी 21000 संस्कृत पद्य रचना करने वाले अनुवाद में पारंगत कवि हैं। उन्होंने तुलसीदास आदि भारतीय कवियों, कन्फ्यूशियस आदि विदेशियों की रचनाओं का सुललित संस्कृत भाषा में पद्यानुवाद किया, वहीं वैदिक सूक्तों को संस्कृत पद्यों में उतारा है। महामहिम राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 2005 ई. में राष्ट्रपति भवन में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया। श्रीमद्रामचरितमानसम्  पर साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009ई.) प्रदान किया गया है।

पुस्तक-    श्रीमद्रामचरितमानसम् की रचना 1977 ई. में पूर्ण हो चुकी थी किन्तु इसका प्रथम प्रकाशन 2005 ई. में हो सका। यह गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस का संस्कृत में पद्यानुवाद है। श्रीमद्रामचरितमानसम् में बालकाण्डम् में 44, अयोध्याकाण्ड में 39, अरण्यकाण्ड में 10, किष्किन्धाकाण्ड में 6, सुन्दरकाण्ड में 10, लंकाकाण्ड में 24 और उत्तरकाण्ड में 24 सर्ग हैं। कुल सर्ग 157 तथा पद्यों की संख्या 7814 है। ग्रन्थारम्भ में कवि ने 25 पद्यों में मंगलाचरण, सज्जनवन्दन किया है। भूमिका के रूप में डॉ. रमाकान्त शुक्ल का प्रास्ताविक तथा कवि का निवेदन प्रकाशित है। अनुवाद में दोहों की संख्या निर्दिष्ट की गयी है। इसमें स्रग्धरा, शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप्, आर्या, मालिनी, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, वसन्ततिलका, वंशस्थ, रथोद्धता, भुजंगप्रयात, तोटक, प्रहर्षिणी, पंचचामर, पृथ्वी, द्रुतविलम्बित, मन्दाक्रान्ता, शालिनी, पुष्पिताग्रा, स्वागता, शिखरिणी, गीतिका, हरिगीतिका आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है। पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरितमानस को अनुवाद का आधार बनाया है। यह सरस, रोचक और मर्मस्पर्शी अनुवाद है। भाषा प्रवाहपूर्ण है। शब्दचयन उपयुक्त है। शब्दाडम्बर का अभाव है। भावाभिव्यक्ति को प्रधानता दी गयी है। संस्कृत परम्परा के गम्भीर अध्येता पं. प्रेमनारायण द्विवेदी मूल ग्रन्थ के कथ्य की तह तक जाकर उसे अनुवाद में उतारने में सफल रहे हैं।

रामचरितमानस-

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

सतां समाजोऽखिलमङ्गलाय समुज्ज्वलो जङ्गमतीर्थराजः।
मन्दाकिनी यत्र च रामभक्तिः सरस्वती ब्रह्मविचारणा च।। 
श्रीमद्रामचरितमानसम्, पृ. 9

रामचरितमानस-

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई।।
 सुंदरकाण्ड दोहा-5

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

हर्म्यस्य रामायुधराजितस्य शोभा प्रवक्तुं वचनैर्न शक्यते।
नवं सुरम्यं तुलसीकदम्बकं तत्रैव पश्यन् हनुमान् ननन्द च।। 
श्रीमद्रामचरितमानसम्, पृ. 478



डॉ नौनिहाल गौत्तम
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

भृत्याभरणम्


श्रीराम दवे बैंक में मैनेजर रहे लेकिन साहित्यिक रुचि इतनी थी कि संस्कृत में उन्होंने कई  काव्य रचे और साथ ही अनुवाद भी किये | आपके संस्कृत काव्य पारम्परिक विषयों से हटकर हैं | परिखायुध्द एक ऐसा खण्डकाव्य है जो खाड़ी युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखा गया है तो राजलक्ष्मीस्वयम्वर महाकाव्य पारम्परिक नायक नायिका पर आधारित न होकर वर्तमान राजनीति पर आधारित है | 
दवे जी ने गीतांजलि का संस्कृत अनुवाद किया तथा प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास को भी संस्कृत में उतारा |
आपके ही एक और संस्कृत महाकाव्य भृत्याभरण का परिचय दे रहे हैं डॉ तारेश कुमार शर्मा | आप सम्प्रति दिल्ली में निवास करते हैं और संस्कृत अध्यापन से जुड़े हुए हैं |

भृत्याभरणम्

रचयिता - पं० श्रीराम दवे
जन्मस्थान - बाड़मेर, राजस्थान
जन्मतिथि - 22/09/1922
विधा - महाकाव्य
अंकित मूल्य - 120
संस्करण - प्रथम वर्ष 1993
प्रकाशक - राजस्थान संस्कृत अकादेमी, जयपुर


पं० श्रीराम दवे का जन्म दिनांक २२-०९-१९२२ आश्विन कृष्ण प्रतिपदा गुरुवार संवत् १९७९ को राजस्थान प्रदेश के बाड़मेर जिला स्थित  समदड़ी गाँव में श्रीमाली ब्राह्मण समाज के एक सामान्य परिवार में हुआ। आपके पिता पं० श्री शंकर लाल बहुत ही सरल एवं साधारण व्यक्ति थे। आपकी माता श्रीमती मथुरा देवी बहुत ही मेधावी एवं सात्त्विक वृत्ति की थीं।
   पं० दवे कराची में संस्कृत के शिक्षक रहे थे। देश विभाजन के बाद जोधपुर आ गए थे। जहाँ स्टेट बैंक अॉफ बीकानेर एण्ड जयपुर--जोधपुर शाखा से वर्ष १९८० में सेवानिवृत्त होने के बाद लेखन कार्य को प्राथमिकता दी। नौकरी की मनोवृत्ति के कारण समाज एवं शिक्षा में आये परिवर्तन अर्थात् लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के बुरे परिणाम को लेकर एवं अपने बैंक सेवा काल में प्राप्त अनुभवों के आधार पर आपने "भृत्याभरणम्" नामक महाकाव्य लिखा।
     पं० श्रीराम दवे आधुनिक संस्कृत के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ में स्वतंत्र भारत की साम्प्रतिक स्थिति को पौराणिक कथानक के माध्यम से चित्रित किया गया है। ३७ सर्गात्मक इस काव्य में नायिका प्रधान भृत्या को उद्देश्य बनाकर जो कुछ भी वर्णित किया गया है वह सब तथ्यात्मक रूप से विवेचित है। पूर्णतः व्यंग्य प्रधान व्यंजनामूलक रचना में सुश्री  भृत्या कुमारी नायिका के रूप में विलसित है जो भगवान विश्वेश्वर विष्णु की मायारूपिणी विचित्रवीर्या शक्ति है।
     "भृत्याभरणम्" युग प्रवृत्ति बोधक महाकाव्य है। नायिका प्रधान इस काव्य में भृत्या अर्थात् नौकरी प्राप्त करना ही मानव मात्र का लक्ष्य बन गया है। यह भृत्या कुमारी अवस्था में(कौमार्य भंग किये बिना) ही अपने उत्कोच नामक रिश्वत पुत्र को जन्म देती है। उत्कोच से मानव अपने जीवन में क्या क्या हासिल कर सकता है का अनेक रूपकों, उपमानों, अन्योक्तियों और मानवीकरण के साथ सुगमतापूर्वक वर्णन करना कवि का ध्येय रहा है। इस कृति पर लेखक को १९९२ में राजस्थान संस्कृत अकादमी से "माघ" पुरस्कार मिल चुका है।
     महाकाव्य के प्रथम सर्ग में नारद का भारत की वर्तमान स्तिथि को देखकर भ्रमण करने से लेकर अन्तिम सर्ग में उत्कोच वध भरतवाक्य पर्यन्त वर्णन सहृदयजनों को हठात् आकर्षित  करता है। कवि की कल्पना बहुत ही विशद है। रिश्वत के प्रभाव से बलहीन व्यक्ति भी बलशाली बन जाता है। उसके आधिपत्य को कुचलने में यदि भीम और प्रशासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति भी आ जाए तो वह मौका पाकर संकट में भी भाग जाता है-

मशत्यसौ राष्ट्रभृत: किरीटे
सुनोत्ययं भीममपि प्रचण्डम्।
चोपत्यवाप्ते विषम प्रहारे
स्थलत्यभीत: प्रबले च पक्षे।।

मशति-भिनभिनाना, सुनोति-दबाना,  चोपते-दबे पाँव चलना, स्थलति-स्थिर रहना।
   लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति पर करारा व्यंग्य करता हुआ कवि कहता है कि विषकन्या की तरह राष्ट्र में प्रविष्ट ,गौरांगपुत्री भृत्या भारत के प्राण हरण कर रही है। यह भाषा वाराङ्गना की तरह नानाविध छल-कपटों के द्वारा कुलधर्म नष्ट कर रही है-

श्वित्राभिभूतवदना    कृतकाङ्गरागा
लज्जा-प्रसाद-करुणादिगुणानभिज्ञा।
वाराङ्गनेव जषते कुल-जातिधर्मान्
नाना-विलासचतुरा छलन-प्रवीणा।

हिन्दी साहित्य में पढ़ा था "भोलाराम का जीव"-साहब फाईल के पन्ने क्यों उड़ रहे हैं? इन पर बजन रखना होता है। कथानक से याद आया कि ये अधीक्षक कितना भी जोर लगा दें, यदि भृत्यापुत्र का अनुग्रह न हो तो सारी योजनाएं पत्रगर्भ में रह जाती हैं। कवि के शब्दों में-

कुर्वन्तु कामं  नवयोजनानां
संकल्पमेते कतिशोप्यधीशा:।
अस्मिन् मनागानुरतां प्रयाते
वसन्ति सर्वा अपि पत्र-गर्भे।।

अन्तिम ३७ वें सर्ग में शारदा के ओजस्वी उपदेशों से कुपिता जनता द्वारा उत्कोच के मारे जाने पर भृत्या विलाप करती है। वह बहुत व्यथित होकर अपने उद्गारों को इस प्रकार प्रकट करती है --मेरे माता-पिता तो बचपन में ही मुझे छोड़कर चले गये थे, मुझ कुवाँरी को तुमने ही मातृत्व का सौभाग्य प्रदान किया था-

पितरस्तनु -पोषका   इतो
मम हा ! शैशव एव निर्गता।
अनवाप्त-विवाह-बन्धनाsप्युप
 लेभे तव गर्भ-सौभाग्यम्।।

अन्तिम समय में भृत्या अपने पुत्र के वियोग में विलाप करती हुई अपने अवसान हेतु हिमालय की ओर चली गई। अन्ततः वह भगवान विष्णु की माया में विलुप्त होकर विष्णुधाम  को प्राप्त हो गई। इस प्रकार भरत वाक्य के अनुसार ग्रन्थ का समापन होता है।

डॉ तारेश कुमार शर्मा
मोबाइल नम्बर - 9810869055
मेल आई डी - kumartaresh82@gmail.com



Friday, May 8, 2020

ऊं शान्तिः - यथार्थवादी उपन्यास

संस्कृत में आधुनिक उपन्यासों का प्रारम्भ पं. अम्बिकादत्त व्यास  के शिवराजविजय से माना जाता है, यद्यपि कई शोधकर्ताओं ने इस पक्ष में अपने तर्क दिए हैं कि यह पूर्णतः मौलिक उपन्यास न होकर किसी बांगला उपन्यास पर आधारित था। अस्तु, 18 वीं सदी के अन्त में तथा 19 वीं सदी की शुरुआत में आये इस उपन्यास ने संस्कृत रचानाकारों को उपन्यास लिखने की प्रेरणा दी। तब से लेकर अब तक प्रायः 300 से अधिक संस्कृत उपन्यास संस्कृत में लिखे गये हैं। केशवचन्द्र दाश के उपन्यास इस मामले में अनूठे हैं कि वे अपने पात्रों का न केवल सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण ही करते हैं अपितु उनकी दृष्टि सदैव यथार्थ पर रहती है। वह अपने आसपास के वातावरण से कथावस्तु  का चयन करते हैं। आपके साहित्य का समग्र प्रकाशन प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली से हुआ है। वागर्थ आधुनिक संस्कृत ब्लॉग के लिये डॉ. महावीर प्रसाद साहू ने केशवचन्द्र दाश के एक उपन्यास का परिचय लिखा है। हम उनके आभारी हैं-

ऊं शान्तिः - यथार्थवादी उपन्यास
कृति - ऊं शान्तिः
विधा-उपन्यास
रचयिता-केशवचंद्र दाश
पृष्ठ संख्या - 120
अंकित मूल्य - 300
संस्करण-प्रथम 1997
प्रकाशक- प्रतिभा प्रकाशन, शक्ति नगर, दिल्ली


                      संस्कृत गद्य साहित्य की परम्परा में केशवचन्द्र दाश का ऊं शान्तिः उपन्यास अपना विशिष्ट स्थान रखता है। केशवचन्द्रदाश ने 14 से अधिक संस्कृत उपन्यासों का सृजन किया है। केशवचन्द्रदाश के उपन्यास उस दृष्टि से अनुपम हैं कि उनमें जीवन का यथार्थ पक्ष  प्रकट हुआ है। ऊं शान्तिः एक सामजिक उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु में मानव के मानसिक पक्ष को उद्घाटित किया गया है। उपन्यास का प्रमुख पात्र चक्रधर है जो अपनी निर्धनता के कारण शहर में जाकर एक कारखाने मेें काम करने लग जाता है। कारखाने के  मालिक का उस में विश्वास बढता जाता है और वह चक्रधर को मेनेजर बना देता है। यह देखकर मालिक की पुत्री  चन्द्रा का प्रेमी महेन्द्र चक्रधर को एक षडयन्त्र में फंसाने के लिए प्रयत्न करता है किन्तु चक्रधर न केवल उस षडयन्त्र से बच  निकल जाता है अपितु महेन्द्र को भी जेल में पहुंचा देता है। कारखाने का मालिक अपनी बेटी चन्द्रा का विवाह चक्रधर से करना चाहता है किन्तु मॉर्डन विचारों की चन्द्रा महेन्द्र को जेल से मुक्त करवाकर उससे विवाह कर लेती है। दुःखी मालिक अपनी सम्पत्ति चक्रधर के नामकर प्राण त्याग देता है। क्रोधित महेन्द्र कारखाने में आग लगा देता है किन्तु उसी आग में स्वयं भी जल कर मर जाता है। चक्रधर सारी सम्पत्ति चन्द्रा के नाम कर अपने गांव चला जाता है और वहां प्राण त्याग देता है।
                               वर्तमान समाज के विविध पक्षों को उद्घाटित करने वाला यह उपन्यास आद्यन्त अशान्त पात्रों से भरा है, किन्तु परम शान्ति को चक्रधर प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस उपन्यास का नाम ऊं शान्तिः रखा गया है।
सम्प्रति समाज में व्याप्त अनाचार, रिश्वत, मद्यपान, गृहक्लेश आदि के कारण सर्वत्र अशान्ति हो रही है। इसी अशान्ति के कारण मानव मन व्याकुल रहता है। वर्तमान समाज में त्याग, प्रेम, करुणा इत्यादि जीवनमूल्य समाप्त हो रहे हैं। इनका स्थान  ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा आदि ने ले लिया है। मानव के चारित्रिक पतन को ही उपन्यासकार ने अशान्ति का कारण कहा है- वैपणीकता सम्प्रति जीवनस्य भूमिः। शठता कर्मयोगः। आतंकः कौशलम्। आत्मसात्करणम् उपलब्धिः, प्रभुत्वं विन्यासः सम्मानस्य शीर्षकम्। आत्मप्रचारः परमतुष्टिः। का पुनः सुखस्य अपरा परिभाषा क्व वा शान्तये परिनिष्ठितः पन्थाः।
उपन्यास में मानव जीवन के विविध मनोवैज्ञानिक पक्षों एवं समाज के यथार्थ को उद्घाटित किया गया है। श्रमिकों की चिन्तनीय दशा का यहां वर्णन मिलता है- अधिकारिणो विलासप्रियाः। श्रमजीविनः असन्तुष्टाः, भ्रष्टाचारग्रस्तं प्रशासनम्। क्रीतदासा इव अत्र श्रमजीविनो निवसन्ति। तेषां सौविध्यं सौकर्यं च अधिकारिणो न पश्यन्ति। किमेते पशवः।  किमेते वेतननाम्ना क्रीताः सन्ति? साथ ही वर्तमान शिक्षा पद्धति पर भी करारा व्यंग्य किया गया है- शिक्षण-संस्थात्र विपणौ। नात्र जीवनस्य महत्त्वं प्रतिपाद्यते न वा जीविकाया लक्ष्यमुपस्थाप्यते। न उभयस्य सन्तुलनं विचार्यते। अत्र विद्यार्थिनः साक्षात् वन्यपशवः एकोऽपि मानवो न दृश्यते। किमत्र केवला पशवो निर्मीयन्ते।‘‘ 

वस्तुतः केशवचन्द्र दाश का यह उपन्यास यथार्थवाद से पूर्ण उपन्यास है जो अपनी नवीन कथावस्तु के कारण भी ग्राह्य है।

डॉ. महावीरप्रसाद साहू
मोबाइल नम्बर -9460244537


आपने आधुनिक संस्कृत उपन्यासों पर अपना शोध कार्य किया है। सम्प्रति राजस्थान में  स्थित महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है। आपकी एक पुस्तक सहित विविध शोधपत्र. प्रकाशित हुए है।