Wednesday, May 20, 2020

विविधकाव्यसङ्ग्रहः - पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः

विविधकाव्यसङ्ग्रहः - पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः

पुस्तक- विविधकाव्यसङ्ग्रहः (पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः चतुर्थो भागः)
रचयिता- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-93-85791-02-4
पृष्ठ संख्या- 238
अंकित मूल्य- 180रू.
संस्करण- 2017 प्रथम

कवि- सत्साहित्य के अध्येता और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने हिन्दी के प्रायः सभी बड़े कवियों की रचनाओं को संस्कृत में अनूदित किया है। पं. द्विवेदी संस्कृत काव्य परम्परा के गंभीर अध्येता थे लेकिन उन्होंने विदेशी सत्साहित्य को पढ़ा, समझा और परखा था। काशी वास के समय उन्होंने स्वामी करपात्री जैसी विभूतियों को देखा-सुना था। विभिन्न शास्त्रों का उन्होंने जिन गुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया उनके प्रति वे आजीवन कृतज्ञ बने रहे। कुछ समय उन्होंने विरक्त संसार से विरक्त होकर यायावर जीवन जिया था। संस्कृत में अनुवाद करना उन्हें अच्छा लगता था, यही उन्होंने जीवन भर किया भी। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। वे पारम्परिक पण्डित थे किन्तु आधुनिकता को निरखते, परखते और भली-भाँति बूझते थे। भारतीय ज्ञान-परंपरा के मौन साधक द्विवेदी जी की अनुवाद कार्य में प्रवृत्ति ‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा’ की तरह थी। उनका अधिकतर साहित्य मृत्यूपरांत प्रकाशित हुआ। राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं जो उन्हें मिले।




पुस्तक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली की लोकप्रिय साहित्य ग्रन्थमाला के अन्तर्गत क्रमांक-83 पर विविधकाव्यसङ्ग्रहः ग्रन्थ प्रकाशित है। भूमिका के रूप में संस्थान के कुलपति और प्रधान संपादक प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री का पुरोवाक्, कवि-परिचय और सम्पादक डॉ. ऋषभ भारद्वाज का प्रास्ताविक है। इस ग्रन्थ में चार खण्ड हैं जिनमें भारतीय और विदेशीय कवियों के काव्यों के संस्कृत पद्यानुवाद प्रकाशित हैं। द्विवेदी जी ने प्रतिष्ठित कवियों के काव्यों का ही अनुवाद किया है जो उनकी साहित्यिक रुचि का भी परिचायक है। अनुवाद के लिए चुने गये काव्य भी अनुवादक की साहित्यिक रुचि को प्रकट करते हैं। द्विवेदी जी के अनुवाद में मूल काव्य का रसास्वाद किया जा सकता है। कहीं कहीं मूलकाव्य की लय में ही अनुवाद को भी पढ़ा जा सकता है। अनुवाद करने का उद्देश्य लोकप्रसार है अतः भाषा इतनी सरल है कि जिन पाठकों को प्रसंग पहले से ज्ञात है, वे संस्कृत में मूलकाव्य के अर्थ तक पहुँच सकते हैं। कहीं तो अनुवाद मूल से भी बेहतर प्रतीत होता है। सहृदय स्वयं मूल व अनुवाद का एक साथ आस्वाद कर इसका अनुभव कर सकते हैं। संस्कृत के विशाल शब्दकोष के ज्ञान से द्विवेदी जी के लिए अनुवाद कार्य सुकर रहा।

प्रथम खण्ड- रहीमकाव्यसुषमा
इस खण्ड में रहीम की रचनाओं के पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत संस्कृत पद्य अनुवाद दोहावली, रहीम-सोरठा, रहीमशृङ्गारसोरठा, रहिमनवरवै, नगरशोभा, घनाक्षरीछन्दांसि प्रकाशित हैं। रहीमकाव्यसुषमा पर द्विवेदी द्वारा लिखित पाँच पृष्ठ का निवेदनम् भी आरम्भ में छपा है। मूलकाव्य और अनुवाद का एक साथ पाठ साहित्यरसिकों को अपूर्व मनस्तोष प्रदान करता है।

कहु रहीम कैसे बने, केर बेर को संग।
वे रस डोलत आपने, इनके फाटत अंग।। 

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

कदलीबदरीसङ्गः कथं क्षेमाय कल्पते।
दोलायते रसेनैका विदीर्णाङ्गी तथापरा।। 

रहीमदोहावली, श्लोक 34

द्वितीय खण्ड- अश्रुकाव्यम्
इस खण्ड में जयशंकर प्रसाद के ‘आँसू’ काव्य का पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत संस्कृत पद्य अनुवाद अश्रुकाव्यम् प्रकाशित है। घनीभूत पीड़ा का काव्य के माध्यम से प्रकटीकरण है- आँसू काव्य। अनुवादक द्विवेदी जी मूलकाव्य में विद्यमान भावप्रवणता को संस्कृत में उतारने में सफल रहे हैं।

जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति सी छाई।
दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आई।।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

सा मे पीडा घनीभूता, मस्तके स्मृतिवत् स्थिता।
दुर्दिने बाष्पधारेवाधुना वर्षितुमागता।

अश्रुकाव्यम्, 20

तृतीय खण्ड- स्फुटकाव्यानि
इस खण्ड में मीरा, सुन्दरदास, जगन्नाथ, कबीर, महादेवीवर्मा, नारायण स्वामी, रसखान, हठी, आनन्दघन, रविदास, बुद्ध, सुकरात, कन्फ्युशियस, आंगस्टाइन और एमरसन के काव्य और सद्वचनों के पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत संस्कृत पद्य अनुवाद प्रकाशित हैं।

निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

समीपं निन्दकं रक्ष कारयित्वाङ्गणे कुटीम्।
विना तोयं विना फेनं स्वभावं क्षालयत्यसौ।। 

विविधकाव्यसङ्ग्रहः, पृ. 104

चतुर्थ खण्ड- गद्यम्
इस खण्ड में सात आलेख हैं। इनमें पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का साहित्य-समीक्षक रूप दृष्टिगोचर होता है। आलोचना पर उनकी लेखनी कम ही चली किन्तु उनके समीक्षा के मानदण्ड उच्च थे। वे रामायण को काव्य का आदर्श रूप मानते थे। उन्होंने ‘भारतीयकाव्यशास्त्रपरम्परा प्रयोजनं सौन्दर्यञ्च’ लेख में रामायण के लिए लिखा है-
 ‘काव्यमिदं गभीरं समग्रकाव्यगुणसम्पन्नम् अतिमधुरं च वर्तते।’ विविधकाव्यसङ्ग्रहः, पृ. 224


असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

Tuesday, May 19, 2020

संस्कृत में भूत प्रेत कथाओं की अवतारणा - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्

संस्कृत में भूत प्रेत कथाओं की अवतारणा - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्
कृति - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्

विधा -कथा
रचयिता - नारायण दाश
मोबाइल नम्बर - 9432469547
प्रकाशक - कथा भारती , प्रयाग
संस्करण - प्रथम 2015
अंकित मूल्य -200
पृष्ठ संख्या -87

मानव-जाति का सम्पूर्ण वाङ्मय आद्यन्त कथा-साहित्य से भरा पडा है। इसका कारण यह रहा है कि जहां कथा-साहित्य भरपूर मनोरञ्जन करता है वहीं दैनिक व्यवहार में उदाहरण बनकर पथप्रदर्शन भी करता है। कथा कहने-सुनने की हमारी प्रवृत्ति इतनी प्रबल, इतनी लोकप्रिय रही है कि प्रत्येक मनुष्य के स्मृति-पटल पर आज भी दादी-नानी की कहानियां अङ्कित हैं। कभी गावों में चौपालों पर कथाश्रावक एवं उनके इर्द-गिर्द बैठे श्रोताओं के दृश्य आम थे। राजा तो अपने दरबार में किसी एक कथावाचक-विशेष की भी नियुक्ति करता था। संस्कृत साहित्य में जिस ‘विदूषक’ का उल्लेख नाटकों में होता आया है, वह तथा ऐंग्लो-सैक्सन राजसभाओं में ‘ग्लीमैन’ नामक विनोदी स्वभाव के व्यक्ति कथाओं को राजसभाओं में सुनकर अन्यों को सुनाते थे।
          जहां तक कथा-साहित्य की उत्पत्ति का प्रश्न है, तो इसका श्रेय भी अन्य साहित्य रूपों के समान ही भारत को जाता है। भारत में प्रचलित कथा कहने की शैली असीरिया हाती हुई यूनान तक पहुंची थी, इस के प्रमाण उपलब्ध हैं। बौद्धसाहित्य में प्रचलित ‘अवदान’ नामक नीतिकथाओं का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में हुआ। संस्कृत भाषा के समृद्ध कथा साहित्य से कौन कथा-रसिक परिचित नहीं होगा? प्राचीन समय में कथा के दो ही रूप प्रचलित हुए थे- आख्यायिका एवं कथा, जो उसके इतिहास पर अथवा कल्पना पर आधारित होने के कारण निर्धारित किये गये थे। कालान्तर में कथा-साहित्य के अन्य भेद भी प्रचलित हुए, यथा- पौराणिककथा, दृष्टान्तकथा, लोककथा, परीकथा, नीतिकथा, हास्यकथा, जातककथा, दन्तकथा, धूर्तकथा आदि। ये कथा-भेद विषय-वस्तु पर आधारित रहे हैं।  कथा-साहित्य ने पौराणिककथाओं के माध्यम से विश्वोत्पत्ति से सम्बन्धित जटिल प्रश्नों आदि का समाधान करने का प्रयास किया तो परीकथाओं के माध्यम से दादी-नानी ने बालकों का मनोरञ्जन भी किया। नीतिकथाओं के द्वारा नैतिक उपदेश दिये तो ऐतिहासिककथाओं के द्वारा हमारे गौरवमयी इतिहास पर पुनर्दृष्टि भी डाली।
                 कथा-साहित्य के क्षेत्र में संस्कृत भाषा के योगदान से सभी आलोचक, प्रशंसक परिचित हैं। साहित्य के आदिम युग से वर्तमान युग तक संस्कृत भाषा का कथा साहित्य पाठकों, श्रोताओं के स्मृति-पटल पर अपनी अमिट छाप छोडने में सक्षम रहा है। इधर, अर्वाचीन संस्कृत कथा साहित्य में प्रयोगधर्मी गद्यकारों के द्वारा  नवीन प्रयोग किये जा रहे हैं, जिससे अर्वाचीन संस्कृत कथा-साहित्य संस्कृतेतर भाषायी कथासाहित्य के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है। ऐसे ही प्रयोगधर्मी गद्यकारों में डॉ नारायण दाश का नाम अग्रगण्य है। ‘गङ्गे च यमुनैव च’ तथा ‘लज्जा’ नामक कथासंग्रहों से अर्वाचीनसंस्कृतकथासाहित्य में अपनी पहिचान बनाने वाले डा. नारायण दाश अनुवाद-कार्य के द्वारा भी संस्कृतकथासाहित्य को समृद्ध करते आये है। आपके मौलिक संस्कृत कथा संग्रह ‘हत्याकारी कः’ को संस्कृत कथा साहित्य का प्रथम स्पशकथासंग्रह ;जासूसी कथा संग्रह होने का गौरव प्राप्त है।

                       प्रस्तुत कथा संग्रह ‘नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्’ के माध्यम से आप संस्कृत कथा साहित्य में भूत-प्रेत कथाओं का प्रवेश करवा रहे हैं, जिन्हें आंग्ल भाषा में हाॅरर स्टोरिज या घोस्ट स्टोरिज के नाम से जाना जाता है। यद्यपि प्राचीन संस्कृत कथाओं में कहीं-कहीं भूत-प्रेतों  का वर्णन उपलब्ध हो जाता है किन्तु जिस रूप में आज विश्व के अन्य भाषायी कथासाहित्य में हाॅरर स्टोरिज प्रचलित है, वैसा रूप देखने का नहीं  मिलता है।
             हाॅरर स्टोरिज में या तो भूत-प्रेत सम्मिलित होते हैं या फिर उन पर विश्वास दिखलाया जाता है। आम बोलचाल की भाषा में हम इन्हें डरावनी कहानियां कहते हैं। ये कथाएं ऐसे वातावरण की सृष्टि करती हैं कि पाठक, श्रोता को भय सा अनुभव होने लग जाता है। भूतों में विश्वास प्रायः विश्व की सभी सभ्यताओं, संस्कृतियों में पाया जाता रहा है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि भूत-प्रेत कथाएं भी मौखिक या लिखित किसी न किसी रूप में प्रत्येक कालखण्ड में प्रचलित रहीं। सर वाल्टर स्काॅट का नाम हाॅरर स्टोरिज के लिये आदर के साथ लिया जाता है। जैन सुलिवन की हाॅरर स्टोरिज को तो कई आलोचकों ने ‘‘भूत की कहानी का स्वर्ण युग’’ तक कहा है। सन् 1900 में लुगदी पत्रिकाओं के प्रारम्भ के साथ विदेशों में भूत कथाओं के प्रकाशन का नवीन मार्ग प्रशस्त हुआ। 20 वीं सदी में हाॅरर स्टोरिज के लिये प्रभावशाली कथाकार के रूप में जेम्स का नाम लिया जाता है।
          संस्कृत   कथा साहित्य  में 10 कथाओं के माध्यम से डा. नारायण दाश ने भूत-प्रेतकथाओं की अवतारणा कर अर्वाचीन कथाकारों के लिये नवीन मार्ग प्रशस्त किया है।  संग्रह की सभी दस कथाएं अपने उद्देश्य में सफल होती हैं। इनको पढते हुए पाठक के मन-मस्तिष्क में भय का वातावरण निर्मित हो जाता है। कहीं सुनसान रेलवे स्टेशन का वर्णन भय उत्पन्न करता है तो कहीं मारकर जल में फैंकी गई युवती की प्रेतात्मा का प्रतिशोध पाठक को न केवल भय के वातावरण में ले जाता है अपितु पीडिता के साथ सहानुभूति की भावना भी उत्पन्न करता है। एक कथा में चित्रकार के चित्र के कारण विचित्र स्थिति का वर्णन है तो एक कथा में तान्त्रिक साधना पर आस्था की विजय वर्णित की गई है। ‘चालकहीनं यानम्’ कथा चलचित्र की भांति पाठक के समक्ष चलती है। एक -दो उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

द्वितीयवारं प्रश्नं श्रुत्वा छाया स्थगिता | तस्या: कृष्णमुखे अन्धकारस्य आभा विलग्ना | सा अहसत् | हतवाग् जातः श्रीनाथ: | अज्ञाता, अपरिचिता, पुनश्चास्मिन् निर्जनप्रान्तरे रात्रे: गाढ़ान्धकारे  परपुरुषं दृष्ट्वा विहसति | किमिवैषा कन्या ? नष्टा तु नास्ति | अथवा डाकिनी काचिदेवमेवं पुरुषान् आहरति | मस्तिष्कं तस्य अज्वलत् | अन्तत: किमनेन कन्याभ्रमेण रात्रिर्यापनीया स्यात् |
(पृष्ठ संख्या - 31) 

पुनश्च रात्रौ द्वादशवादनम् | ऋता जागरिता एव शयानासी त् | दूरतः श्रूयमाण: करुणरव: क्रमशः निकटायते | भीता सा मनाक् नेत्रे उन्मीलितवती | आम्, सैव कन्या अद्यापि तस्या: पिहितप्रकोष्ठे प्रविष्टास्ति | सकरुणं रुदती सा शय्यालग्ना जाता |
 (पृष्ठ संख्या -39)

               डा. नारायण दाश अपनी कथा शैली के माध्यम से पाठक को कथा के साथ बांधे रखते हैं, जो कि उनकी सफलता है। कथा के आरम्भ के साथ ही पाठक उससे जुड जाता है और कथा में आगे क्या होने वाला है, इसके प्रति उसकी उत्सुकता बराबर बनी रहती है।  इस कथा संग्रह के माध्यम से संस्कृत कथा साहित्य में नये वातायन उद्घाटित होंगे। 

Monday, May 18, 2020

मूको रामगिरिर्भूत्वा - आधुनिक संस्कृत उपन्यास

मूको रामगिरिर्भूत्वा - आधुनिक संस्कृत उपन्यास

हर्षदेव माधव संस्कृत के प्रयोगधर्मी कवि हैं | उनकी कविताएं इस का प्रमाण हैं | पद्य काव्य के साथ साथ माधव जी ने नाट्य और गद्य में भी अभिनव प्रयोग किये  हैं | मूको रामगिरिर्भूत्वा उपन्यास संस्कृत उपन्यास परम्परा में अनूठा है |  इस उपन्यास में कालिदास के काव्य मेघदूत की कहानी को आधार बनाया गया है  किंतु इसका यक्ष माधव जी का अपना यक्ष है, जो उनकी मौलिक कल्पना शक्ति से उद्भूत है | प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी ने इसे अन्यच्छाया सौंदर्य का अनुपम उदाहरण बताया है |  यह डायरी शैली में लिखा गया है , जिसमें तिथियां भारतीय मासानुसार अंकित हैं | माधव जी ने डायरी के लिए वासरिका शब्द का प्रयोग किया है, इस उपन्यास का एक नाम यक्षस्य वासरिका भी प्रचलित है | पुस्तक में डॉ मंजुलता शर्मा जी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद भी साथ में दिया गया है, जो इसकी सहृदयसंवैद्यता में वृद्धि करता है | डॉ रीता त्रिवेदी जी इस उपन्यास का परिचय हमारे लिए प्रस्तुत कर रही हैं, एतदर्थ हम उनके आभारी हैं | वस्तुतः उन्होंने इस उपन्यास में निहित नारी विमर्श को बहुत सूक्ष्मता से स्पर्श करते हुए रेखांकित किया है |

कृति - मूको रामगिरिर्भूत्वा (यक्षस्य वासरिका)

विधा - उपन्यास
रचयिता - डॉ. हर्षदेव माधव  
Isbn 81-86111-64-6
संस्करण - प्रथम 2008
मूल्य - 110
पृष्ठ संख्या- 198
प्रकाशक- राष्टीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली

             आधुनिक संस्कृत साहित्य में यक्षस्य वासरिका (मूको रामगिरिर्भूत्वा) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ हर्षदेव माधव रचित यह उपन्यास दैनन्दिनी (डायरी) के रूप में लिखा गया है जो 165 पृष्ठों में निबद्ध है। डॉ. हर्षदेव माधव संस्कृत कविता में विशिष्ट सार्थक प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध है, किन्तु इस उपन्यास में कवि की गद्यलीला पद्य के मनोहारी शिखरों को छू कर चलती है।
                           कालिदास कृत मेघदूत की कथा के अनुसार शापग्रस्त यक्ष पृथ्वी पर आता है। एक साल पृथ्वी पर रहता है। लेकिन इस एक साल में यक्ष की संवेदना या कार्य का आलेखन अप्राप्य है, जो इस उपन्यास में प्राप्त होता है। समग्र कथा चार विभागों में फैली है- श्याममेघ, अरुणमेघ, रक्तमेघ और सुवर्णमेघ

          यहां देव, असुर, प्रेत, प्राकृतिकसत्ता, मानव, पशु सब पात्र स्वरूप बन कर प्रकट हुए हैं। नायक की संवेदनाओं का निराशा से आशा और आशा से विजय तक का अभूतपूर्व आलेखन हुआ है, साथ ही नायक के पुरुषार्थ और अन्तर्द्वन्द्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण भी किया गया है।
यथा -
कार्तिकशुक्लद्वितीया-
अधुना नास्ति मम समीपे पृथ्वी, नास्ति अलका। त्रिशंकुवद् अन्तराले स्थितोऽस्मि। अलकां त्यक्त्वा मया न किंचिद् हारितम्, ऋते तव प्रीतेः, किन्तु अर्जितं बहु बहु। भोगपरायणे मे जीवने परमसुखं प्राप्तम्। अधुना त्वलकां गत्वा  किं करिष्यामि? यत् स्वातन्त्र्यं मया प्राप्तं तत् नाशयितुं मम मनीषा नास्ति। 
पुनरपि चक्रवाकचीत्कारयुक्ता रात्रिः समागताः। 
 
      नायक के पात्र से लेखक यह सन्देश देने में सफल रहे हैं कि सबसे बडा पराक्रम, सबसे बडा पुरुषार्थ है अपने मन को जीतना।
                             नायिका के पात्र लेखन में लेखक ने भारतीय नारी का विशिष्ट चित्रण किया है, जिससे यह कथा भारतीय संस्कृति गान की कथा बन जाती है। नायिका पार्थिवी मानवकन्या है। उसे अपना पूर्वजन्म याद है और वह यक्ष को अपने पूर्वजन्म के पति के रूप में पहचानती है। पृथ्वी पर दुःखी होकर घूम रहे यख को पार्थिवी शनैः शनैः सहारा देती है। लेकिन अपनी पहचान वह प्रकट नही होने देती। अपना परिचय वह बहुत देर बात देती है। वेदना के कारण अपाहिज जैसे यक्ष को नायिका पृथ्वी का महत्त्व, जीवन का सौन्दर्य, श्रेय और प्रेय तथा स्वतंत्रता का महत्त्व सीखाती है। यक्ष को वह सतत अप्राप्त की प्राप्ति के लिये प्रेरित करती है। फिर भी वह अपना व्यक्तित्व मुखरित नहीं होने देती जैसे भारतीय नारी। अन्त में यक्ष पृथ्वी को, पृथ्वी पर व्याप्त मानव जीवन के महत्त्व को पहचान कर अलका नगरी में नहीं जाता, पृथ्वी पर ही रह जाता है।
    इस तरह प्राचीन परिवेश, प्राचीन कथानक के माध्यम से लेखक ने एक विशिष्ट कथा का निर्माण किया है।

डॉ. रीता त्रिवेदी

गुजराती, संस्कृत, हिन्दी भाषाओं में कविता, कथा, समीक्षा आदि में विशेष लेखन
मोबाइल नम्बर- 9429089552

Sunday, May 17, 2020

मलालाचरितम् - स्त्री-शिक्षा के महत्त्व का काव्य

मलालाचरितम् - स्त्री-शिक्षा के महत्त्व का काव्य
कृति - मलालाचरितम्
कृतिकार – प्रो. रवीन्द्र कुमार पण्डा 
प्रकाशक – अर्वाचीन संस्कृत परिषद्, बडोदरा  
प्रथम संस्करण 2017 
मूल्य- 150  रू.
पृष्ठ-70

प्रतिभा किसी किसी की मोहताज नहीं होती । इसके लिए धर्म जाति, लिंग और आयु  कोई मायने  नहीं रखता । समय उसे ही स्मरण करता है जो लोगों द्वारा बने बनाए मार्ग से हटकर कुछ अलग करते हैं । मलाला युसुजई इसी प्रकार की एक बालिका है जिसने लीक से हटकर कुछ अलग किया । इसलिए अफगानिस्तान ही नहीं संपूर्ण विश्व उसे जानता और पहचानता है । उसी निडर और निर्भीक बालिका के जीवनचरित्र पर आधारित काव्य का प्रणयन किया है डॉ. रवीन्द्र कुमार पण्डा ने अपने ‘मलालाचरितम्’ काव्य में ।
  इस काव्य में कवि ने अपनी काव्य प्रतिभा का बहुत ही सुंदर परिचय दिया है । कवि ने कहीं पर विद्या की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती की वंदना की है, तो कहीं मित्रता के महत्व को बताया है । कवि ने नारी शिक्षा पर भी जोर दिया है । उसने ऐसे माता-पिता की प्रशंसा की है जो अपने बच्चे को शिक्षित तथा निडर बनाते हैं । कहा भी गया है

माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥

स्त्रियों को कुछ रूढिवादी आज भी पुरुष के हाथ की कठपुतली के रुप में देखना पसन्द करते हैं । उनको लगता है कि अगर नारी ने घर के बाहर कदम निकाला तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जाएगा ।  हमारे उस झूठ का पर्दाफाश हो जाएगा जिसकी आड़ में हम अनैतिक कृत्य करते हैं । कवि ने स्त्री को हाशिए से उठाकर मुख़्यधारा में लाने का प्रयास किया है और इसमें वह सफल भी हुआ है ।

स्त्रीणां मनोदशामनोदशां दृष्ट्वा तथा च निनिकबप्रथाम् ।
कृष्णांगकृष्णांगवरणं चैव स भवति स्म कातर: ॥

कवि कहता है कि शिक्षित नारी एक नहीं बल्कि दो कुलों का उद्धार करती है । इसी बात को  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अपने शब्दों में इस प्रकार कहा था कि – “एक आदमी को पढाओगे तो एक व्यक्ति शिक्षित होगा | एक स्त्री  को पढ़ाओगे तो पूरा परिवार शिक्षित होगा ।’’

अस्माकं  संस्कृते शास्त्रे तनयां दुहितेति च ।
कथ्यते कारणं यस्मात् सा कुलद्वयतारिणी ॥

कवि का मानना है कि शिक्षा सबके लिए आवश्यक है वह जितना पुरुष के लिए आवश्यक है उतना ही स्त्री के लिए भी ।
        पाकिस्तान और अफगानिस्तान की स्त्रियों की दशा का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है कि वहाँ पर स्त्री शिक्षा आज भी न के बराबर है । अशिक्षा के कारण वहाँ की स्त्रियाँ अपनी आवाज नहीं उठा सकती । पुरातंपथी और रूढिवादी धर्मगुरु उनको जितना बताते हैं वे उतना ही जानते समझते हैं । उनकी अपनी स्वयं की कोई नहीं सोच है और न ही स्वयं का कोई विचार । तालिबानी आतंकियों के कारण वे अपने घरों में सदैव कैद रहती हैं ।

बन्दिनीव गृहे स्थित्वा या यापयन्ति ।
पुरुषाणां बलैर्बद्धा भवन्ति स्म प्रतिक्षणम् ॥ 
जीवन्ति कुदशापन्ना: शोषिताश्चापमानिता ।
अशिक्षिता रमण्यो या भयव्याघ्रविदारिता: ॥ 
 तालिबानभयव्याघ्रो यथा गर्जति भूतले ।
प्रभावेण सदा यस्य दु:खिन्य: सन्ति बालिका ॥ 

‘शिक्षक उस मोमबत्ती के समान है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है’ इसका उदाहरण मलाला की शिक्षिका मैडम मरियम हैं । लोग आज शिक्षक को चाहे जो कहें परंतु आज भी यह सत्य है कि समाज में अच्छे शिक्षकों की कमी नहीं है । मलाला के इस समाज सेवा रुपी कार्य में अप्रत्यक्ष रुप से मरियम का बहुत बड़ा योगदान रहा है । 

उच्चविद्यालये तस्या आसीच्चोत्तमशिक्षिका ।
स्वतन्त्रा शेमिषीयुक्ता मरियंनामधारिणी ॥  

विद्या की महत्ता बताते हुए कवि कहता है कि विद्या के बिना इस जगत में कुछ भी संभव नहीं है । इसलिए प्रत्येक मनुष्य को विद्या अवश्य ग्रहण  करनी चाहिए । विद्या ही सारे सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति का साधन है ।

वित्तं विद्यासमं नास्ति न वै विद्यासमो मणि: ।
नहि विद्यासमा शक्तिर्विद्या परमदेवता ॥ 
विद्यासमो न शोभते निर्गन्धा  इव किंशुका ।
आहारभोगनिद्रासु नित्यं ये सन्ति संयुता: ॥    

मलाला ने सदैव पर्दा प्रथा तथा रूढ़िवादिता और दकियानूसी विचारधारा का  हमेशा विरोध किया । इस परिणाम यह हुआ कि उसे गोली तक मारा गया । परन्तु ईश्वर की कृपा से वह बच गयी ।
अनुष्टुप्, शार्दूलविक्रीडित, त्रोटक, युग्मकम् आदि छ्न्दों में निबद्ध यह काव्य पाठक को शुरू से अन्त तक बाँधे रखने की सामर्थ्य रखता है ।  इसके लिए कवि साधुवाद के पात्र हैं । उन्हें भविष्य के लिए अशेष शुभकामनायें । 

डॉ अरुण कुमार निषाद

सम्पर्क -08318975118
Mail id- arun.ugc@gmail.com



Saturday, May 16, 2020

प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः

प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः


पुस्तक- प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः
लेखक- प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्म- 19 अगस्त 1930
मृत्यु - 04 दिसंबर 2019
जन्मस्थान- काशी (उ.प्र.)
प्रकाशक- किशोर विद्या निकेतन, वाराणसी
सम्पादक- डॉ. वत्सला, एसो.प्रोफेसर, राजकीय महाविद्यालय, झालावाड़ (राज.) 
आईएसबीएन- 978-93-84299-80-4
पृष्ठ संख्या- 406
अंकित मूल्य- 800रू.
संस्करण- 2016 प्रथम

लेखक-
      सर्वविद्या की राजधानी काशी में पारंपरिक पण्डित परिवार में जन्मे, संस्कृत वाङ्मय के गंभीर अध्येता और हिन्दी, बांग्ला, संस्कृत और अंग्रेजी के ज्ञाता प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य सागर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी (उ.प्र.) में संस्कृत के आचार्य रहे। प्रो. भट्टाचार्य युवावय में विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए और प्रिय शिक्षक के रूप में आजीवन शिष्यों के ‘गुरुजी’ बने रहे। वे ‘‘आचार्य’’ होकर जिये। कालिदास की ‘आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः’ यह उक्ति उन पर चरितार्थ होती थी। उन्होंने पैतृकपरंपरा से, विद्यार्थी जीवन में गुरुजनों से और बाद में स्वाध्याय से जो ज्ञान पाया, उसको सरल से सरल रूप में अपने विद्यार्थियों को हृदयंगम करा देने का उनका सामर्थ्य अद्भुत था। मर्यादित हास्य के साथ उदाहरणों और संस्कृतेतर साहित्य के कथानकों से पाठ्य का दृश्य उपस्थित कर देने की उनकी अध्यापन शैली अनुकरणीय है। साहित्य लेखन की अपेक्षा उनका सहज रुचिकर कार्य अध्यापन था। अध्ययन और अध्यापन की सहज प्रक्रिया के अन्तराल में जो कुछ लेखन के द्वारा व्यक्त हुआ है, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और उस पर भी शिक्षकीय प्रभाव झलकता है। उनके निर्देशन में साठ से अधिक शोधार्थियों ने शोधकार्य किया। नाट्य एवं रंगमंच से भी उन्हें लगाव रहा। संस्कृत सेवा के लिए उन्हें 2016 ई. में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ।



पुस्तक-
 प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य ने अर्जित ज्ञान को सरल रूप में विद्यार्थियों तक पहुँचाया और यथावसर लेखनी से निबद्ध भी किया। उनके लेखन कार्य को पुस्तकाकार में सम्पादित करने का महनीय कार्य करने वाली डॉ. वत्सला ने उनके निर्देशन में पीएच. डी. उपाधि प्राप्त की है। पुस्तक के आरम्भ में प्रो. भट्टाचार्य के ही शिष्य प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, पूर्व कुलपति का नान्दीवाक्, प्रो. रमेशकुमार पाण्डेय, कुलपति, दिल्ली की प्ररोचना, प्रो. गोपबन्धु मिश्र, कुलपति श्रीसोमनाथ वि.वि. का पुरोऽभिमत और संपादिका की भूमिका हैं। संपादिका ने मोतियों की तरह बिखरे पड़े अपने श्रद्धेय गुरुजी के आलेखों को श्रमपूर्वक पिरोकर संस्कृत जगत् के लिए यह पुस्तक रूपी एकावली समर्पित की है, इसके लिए वे अभिनन्दनीय हैं। इस पुस्तक में पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य का वैयक्तिक एवं साहित्यिक परिचय है। द्वितीय अध्याय में हिन्दी भाषा में लिखित नौ शोधपत्र हैं। इनमें से चार कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट और रवीन्द्रनाथ टैगोर कवियों पर हैं। अन्य रस सम्प्रदाय, नाट्य साहित्य के मूल तत्त्व, पुराण चिन्तन, गोपीनाथ कविराज और चैतन्य महाप्रभु पर हैं। तृतीय अध्याय में संस्कृत में लिखित बारह शोधपत्र हैं। इनमें सात साहित्यशास्त्रीय विषयों पर, दो कालिदास पर, दो जवाहरलाल और गोपीनाथ कविराज पर और एक संस्कृत विद्या पर हैं। चतुर्थ अध्याय में अंग्रेजी भाषा में लिखित तेरह शोधपत्र हैं। इनमें से छः काव्यशास्त्रीय विषयों पर, तीन कालिदास पर, दो संस्कृत भाषा पर, एक गोपीनाथ कविराज पर और एक काशी में बंगाली उत्सवों का परिचय कराने वाला है। पंचम अध्याय में तीन भाग हैं। प्रथम भाग ग्रन्थसमालोचन के अन्तर्गत डॉ. वेंकट राघवन् के नौ ग्रन्थों और सोलह अन्य ग्रन्थों की समीक्षा की गयी है। द्वितीय भाग में संस्कृत कविता हैं। कालिदास पर दो कविताएं, अन्य कविताओं में- संस्कृतदिवसोत्सवः, काशीहिन्दूविश्वविद्यालये स्वतन्त्रताभवनस्थापनम्, नलिन्याः प्रार्थना, कविभारत्याः स्वागतमङ्गलम्, ऊर्जस्वि-उपदेशः, काश्यां ज्ञानप्रवाहः और गुरु गोपीनाथ कविराज की स्मृति में रचित ‘गुरुस्मरणम्’ हैं। महाकवि रवीन्द्रनाथ की एक कविता का बंगला से संस्कृत में सॉनेट छन्द में अनुवाद है। तृतीय भाग में दैनिक समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित साक्षात्कार है। पुस्तक के अन्त में प्रो. भट्टाचार्य के विभिन्न अवसरों से संबंधित चित्र भी दिये गये हैं। बहुश्रुत विद्वान् द्वारा सरल रूप में प्रस्तुत साहित्य व साहित्यशास्त्रीय आलेखों का संग्रह इस पुस्तक में है। साहित्य के अध्येताओं को इस पुस्तक का अनुशीलन अवश्य  करना चाहिए।

डॉ नौनिहाल गौतम 
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

Friday, May 15, 2020

तुलसीसूरकाव्यसङ्ग्रहः

तुलसीसूरकाव्यसङ्ग्रहः


पुस्तक- तुलसीसूरकाव्यसङ्ग्रहः (पं. प्रेमनारायणद्विवेदिरचनावलिः तृतीयो भागः)
रचयिता- पं. प्रेमनारायण द्विवेदी (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्मतिथि- 05 जून 1922
ब्रह्मलीन- 28 अप्रैल 2006
जन्मस्थान- पूर्व्याऊ टौरी, जनता स्कूल के पास, सागर (म.प्र.)
सम्पर्क- श्री सूर्यकान्त द्विवेदी (कवि के पौत्र, संस्कृत शिक्षक) मो. 88273 18716
प्रकाशक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली
सम्पादक- डॉ. ऋषभ भारद्वाज 
आईएसबीएन- 978-93-82091-76-9
पृष्ठ संख्या- 333
अंकित मूल्य- 208रू.
संस्करण- 2013 प्रथम

कवि- भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ और अनुवाद विधा के पारंगत कवि पं. प्रेमनारायण द्विवेदी ने 21000 संस्कृत पद्यों की रचना रचना कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने हिन्दी के प्रायः सभी बड़े कवियों की रचनाओं को संस्कृत में अनूदित किया है। संस्कृत काव्य परम्परा के गंभीर अध्येता पं. द्विवेदी ने गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य को तो जैसे हृदयंगम ही कर लिया था। कुछ समय उन्होंने विरक्त का जीवन जिया था। अध्यापन उनकी वृत्ति थी और अनुवाद उनका सहज कर्म जो उन्होंने जीवन भर किया भी। उनकी रचनाएं अर्वाचीनसंस्कृतम् आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। वे पारम्परिक पण्डित थे। भक्त कवियों के प्रति उनके मन में आत्मीय भाव था। उनकी भी ईश्वर के प्रति गहरी आस्था थी। राष्ट्रपति पुरस्कार (2005 ई.) और साहित्य अकादमी, दिल्ली का अनुवाद पुरस्कार (2009 ई.) प्रमुख पुरस्कार हैं जो उन्हें मिले।


पुस्तक- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नई दिल्ली की लोकप्रिय साहित्य ग्रन्थमाला के अन्तर्गत क्रमांक-70 पर तुलसीसूरकाव्यसङ्ग्रहः ग्रन्थ प्रकाशित है। भूमिका के रूप में संस्थान के कुलपति और प्रधान संपादक आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी का पुरोवाक् और डॉ. ऋषभ भारद्वाज का सम्पादकीय है। इस ग्रन्थ में दो खण्ड हैं जिनमें हिन्दी कवि तुलसीदास और सूरदास के काव्यों के संस्कृत पद्यानुवाद प्रकाशित हैं। मूल काव्य के तत्सम शब्दों को ग्रहण करने से द्विवेदी जी के अनुवाद में मूल काव्य का रसास्वाद किया जा सकता है। कहीं कहीं मूलकाव्य की लय में ही अनुवाद को भी पढ़ा जा सकता है। अनुवाद करने का उद्देश्य लोकप्रसार है अतः भाषा इतनी सरल है कि जिन पाठकों को प्रसंग पहले से ज्ञात है, वे संस्कृत में मूलकाव्य का भाव समझ सकते हैं।

प्रथम खण्ड- तुलसीकाव्यसङ्ग्रहः
इस खण्ड में भक्तकवि गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं के पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत संस्कृत पद्य अनुवाद विनयपत्रिका, कवितावलिः, श्लोकावलिः, श्रीजानकीमङ्गलम्, श्रीपार्वतीमङ्गलम्, वैरागयसन्दीपनी, वरवैरामायणम् और श्रीमद्हनुमद्बाहुकम् प्रकाशित हैं।

राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर।
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर।।
राम नाम मणि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरै जो चाहसि उजियार।।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

श्रीजानकी यस्य विभाति वामतः, श्रीलक्ष्मणो दक्षिणतश्च राजते।
ध्यातश्च यो मङ्गलमोदशान्तिदः, स एव रामस्तुलसीसुरद्रुमः।। 
रामनाममणिदीपं दधत स्वरसनाद्वारदेहल्याम्।
अन्तर्बहिः प्रकाशं यदि वाञ्छथ तद् वदति तुलसी।। श्लोकावलिः, श्लोक 1, 6

त्वया सह वृषारूढो यदा यास्यति धूर्जटिः।
हसिष्यन्ति नरा नार्यो मुखमाच्छाद्य पाणिभिः।।
कुतर्ककोटिभिश्चेत्थं वटुर्वक्ति यथारुचि।
न शैल इव वातेन चचालाऽद्रिसुतामनः।। श्रीपार्वतीमङ्गलम्, श्लोक 57-58

द्वितीय खण्ड- सूरकाव्यसङ्ग्रहः
इस खण्ड में भक्तकवि सूरदास की रचनाओं के पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत संस्कृत पद्य अनुवाद सूररामचरितावलिः और सूरविनयपत्रिका प्रकाशित हैं।

प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो।
समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो।
एक लोहा पूजा में राखत एक घर बधिक परो।
पारस गुण अवगुण नहीं चितवत कंचन करत खरो।

पं. प्रेमनारायण द्विवेदी कृत अनुवाद-

चित्ते कदाप्यवगुणान् न निधेहि मे त्वं
ख्यातो यथाऽसि समदृक् च तथा विधेहि।
पूजास्थले प्रणिहितं खलु लोहमेकं
दृष्टं जनैर्बधिकगेहगतं तथान्यत्।।
न स्पर्शरत्नमिह नाथ करोति भेदं 
स्वर्णं करोति सकलं सममेव सद्यः। तुलसीसूरकाव्यसङ्ग्रहः, पृ. 329

असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

Wednesday, May 13, 2020

मृत्यु: चन्द्रमस: - अनूदित गद्य काव्य


मृत्यु : चन्द्रमस: - अनूदित गद्य काव्य
जब यह वागर्थ ब्लॉग शुरू किया गया था तब यह सोचा गया था कि मौलिक कृतियों के साथ अनूदित कृतियां भी प्रकाश में आये | संस्कृत से अन्य भाषाओं में तो अनुवाद होता आया ही है किंतु साथ में अन्य भारतीयेतर भाषाओं और विदेशी भाषाओं से भी संस्कृत में अनुवाद कार्य हो रहा है | इससे संस्कृत के पाठक को संस्कृतेतर साहित्य का आस्वादन हो जाता है | पराम्बा श्री योगमाया आधुनिक संस्कृत साहित्य की उभरती कवयित्री हैं | आपको साहित्य अकादेमी का युवा पुरस्कार भी प्राप्त है | मौलिक रचनाओं के साथ आपने कई महत्त्वपूर्ण अनुवाद किये हैं| योगमाया के द्वारा अनूदित एक ऐसी ही कृति का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं हेमराज सैनी | यह भी प्रसन्नता का विषय है कि नए समीक्षक ब्लॉग के साथ जुड़ रहे हैं |

मृत्यु: चन्द्रमस: - अनूदित गद्य काव्य
कृति- मृत्यु: चन्द्रमस: 
रचयिता -डा. गोकुलानंद महापात्र (ओडियामूलम्)
संस्कृतानुवाद: - पराम्बा श्रीयोगमाया
प्रकाशन - संस्कृतभारती देहली)
पृष्ठ संख्या-१३९
मूल्य-50.00   
प्रथम प्रकाशन-२००९-१०


प्रस्तुत कथाग्रन्थ में लेखक द्वारा पृथ्वीलोक के आधुनिक अमेरिकी एवं भारतीय समाज तथा प्राचीन मोहनजोदड़ो सभ्यता के साथ साथ चन्द्रलोक की मानव सभ्यता का अत्यंत विलक्षण एवं सुंदर वर्णन किया गया है।कथा का प्रारंभ अमेरिकी देश के न्यूयॉर्क प्रांत स्थित केंद्रीय उद्यान के रमणीय वातावरण में प्रधान पात्र रमेशचंद्र एवं नायिका सेंडी मनोरम वार्तालाप से होता है।इसी वक्त नेभाड प्रांत में अमेरिकी सामरिक अधिकारियों द्वारा चन्द्रलोक से अवतरित किसी 'नवागत'के पकड़ लिया जाता है।वह नवागत केवल वैदिक संस्कृत भाषा जानता है ।आंग्ल भाषा के जानकार अमेरिकी अधिकारी इस प्राचीन आर्य भाषा से अनभिज्ञ थे। अतः नवागत की भाषा के अवबोध हेतु प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रो.मेकगिल के सुझाव पर योजनान्तर्गत बनारस स्थित हिन्दू विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण एवं वर्तमान में अमेरिका के भिन्न-भिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत रमेशचंद्र, वेंकटरमण तथा देशपांडेय नामक शोधार्थियों को एक साथ नेभडा राज्य स्थित सामरिक केंद्र लाया जाता है। वस्तुत: यह तीनों संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार थे तथा नवागत की भाषा को समझने में सक्षम थे। रमेशचंद्र द्वारा नवागत से वार्तालाप करने पर ज्ञात होता है कि वह (नवागत)आज से पांच हजार वर्ष पूर्व सिंधु नदी के किनारे विकसित मोहनजोदड़ो सभ्यता का अधिवासी था।उसका मूल नाम'उत्कलावर्त' है।उस समय चन्द्रलोक पर सभ्य एवं विकसित मानव सभ्यता विद्यमान थी। अचानक जल एवं वायु की अल्पता के कारण चन्द्रलोक मृत के समान हो गया।अतः जल एवं वायु के संचय हेतु विशेष विमान से एक वैज्ञानिक दम्पती सैन्धव प्रदेश पर आते हैं।वह  मोहनजोदड़ो के राष्ट्राध्यक्ष की स्वीकृति से दो वर्ष के अथक प्रयास एवं उत्कलावर्त की सहायता से जल एवं वायु का संग्रहण करके चन्द्रलोक को चले जाते हैं।  चन्द्रलोक के राष्ट्राध्यक्ष की अनुमति मिलने पर उत्कलावर्त भी वैज्ञानिक दम्पती (केवलप्राय-शार्ङिना) के साथ चन्द्रलोक को चला जाता है।
               कथा के प्रवाह के साथ ही रोचक शैली में बालकों के ज्ञानवर्धन हेतु दार्शनिक जानकारी उपस्थापित की गई है,यथा 'वस्तु' शब्द के साथ ही वायु तत्व को परिभाषित किया गया है-" यत् दर्शनार्हं स्पर्शनार्हं च,यस्य स्थिति:अनुभवगोचरतां यायात् तदेव वस्तु।भवन्त: किं वायुं न जानन्ति ? भवद्भि: श्वासोच्छवासाय य:उपयुज्यते ,से: एव वायु: नाम।"(पृ.४१) लेखक आनुवंशिक विज्ञान की परखनली निषेचन प्रक्रिया का भी उल्लेख करता है। लेखक गुरुत्वाकर्षण शक्ति को ही सम्पूर्ण मानव संस्कृति एवं चराचर जगत की उत्पत्ति का एक मात्र कारण मानता है।यथा- " यत: पृथिव्या: पुरुषस्य शुक्राणु:स्त्रिया: डिम्बाणु: वा पृथिव्या: गुरुत्वाकर्षण बलस्य अनुगुणं वर्धनं प्राप्तुम् अर्हति। "(पृ.९२) इसी प्रकार पृथ्वी की आयु ज्ञात करने वाली रेडियो एक्टिव विधि से भी बालकों को अवगत करवाता है-"आयुष:निर्द्धारणे सुदक्षा: पच्चविंशत्यधिका: वैज्ञानिका: परीक्षा कृत्वा स्वाभिप्रायम् अवदन् यत् अस्य आयु: चत्वारिंशत् नाधिकम् ।"(पृ.१८) कथा में न्यूयॉर्क के केंद्रीय उद्यान,सैन्धव प्रदेश एवं चन्द्रलोक स्थित ' नन्दन वन' के प्राकृतिक वातावरण का मनोहर वर्णन किया गया है ।सैन्धव प्रदेश के सूर्योदय की आभा को देखकर मनुष्य प्रमादित  प्राणी के समान व्यवहार करने लगता है-" उषस: अपूर्वेण सौन्दर्येण  विमोहिता इव जाताऽस्ति इति।पृथिव्याम् एष: सूर्योदय: वस्तुत: पृथिव्या: अधिवासिन: एव भाग्यशालिन:।"(पृ.४७) इसी तरह नन्दन वन स्वर्णमयी नगरी के समान अत्यंत विलक्षण एवं आकर्षक है-" विद्यते चन्द्रलोकस्य श्रेष्ठं रमणीयं तपोवनं नन्दनवनम्।तत्र गमनात् दार्शनिक: कवि भूत्वा   प्रत्यागच्छति।......... तत् स्वपननगरी इव प्रतीयते स्म । (पृ.८१) कथा में वेदों के अपौरुषेय को भी उल्लेखित किया है-"वेद: तु संकलित: न तु रचित: । स: च अपौरुषेय: ।"(पृ.१४) भाषा को अलंकृत करने के लिए उपमा अलंकार की छटा सर्वत्र बिखरी हुई दिखाई देती है-" तस्य नासिका करवालस्य धारा इव तीक्ष्णा " । ( पृ.२७) इसी प्रकार कथा के गूढ़ भावों को अभिव्यक्त करने वाली गागर में सागर भरने वाली सूक्तियों का प्रयोग भी कथा की विलक्षणता को द्योतित करती है-"समयस्त्रोत: न कमपि प्रतीक्षते इति ।"( समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता) । ," प्रमाणं विना कथ्यमाने वचने को विश्वस्यात् ?" अतः हे रमेश! तुम्हारे द्वारा कहीं हुईं बात पर बिना प्रमाण के कैसे विश्वास किया जाए? " (पृ.५) लेखक द्वारा लिखित यह पुस्तक सरल सरस एवं मनोरंजक तरीके से बालकों को विज्ञान के गूढ़ ज्ञान को उपलब्द करवाने में पूर्णतया सक्षम है।

प्रो. गोकुलानंद महापात्र- उत्कल प्रदेश में जन्में (सन् १९२२) प्रो महापात्र मूलतः रसायन शास्त्र के विद्वान् है । आपके द्वारा उड़िया भाषा में विज्ञान की पृष्ठभूमि आधारित दश से अधिक बालोपयोगी  कथा ग्रंथों की रचना की गई।

पराम्बा श्रीयोगमाया - वाराणसी से स्नातकोत्तर एवं भूवनेश्वर से कलाभूषण पदवी प्राप्त श्रीयोगमाया द्वारा उड़िया भाषा की अनेकों कविता, कथा एवं काव्यो का संस्कृत में अनुवाद किया है ।
मोबाइल नम्बर - 8917554392

हेमराज सैनी - आप वर्तमान में राजस्थान में  असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं तथा संस्कृत बाल साहित्य पर शोध कार्य कर रहे हैं|
मोबाइल नम्बर -  9660755441