Tuesday, May 19, 2020

संस्कृत में भूत प्रेत कथाओं की अवतारणा - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्

संस्कृत में भूत प्रेत कथाओं की अवतारणा - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्
कृति - नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्

विधा -कथा
रचयिता - नारायण दाश
मोबाइल नम्बर - 9432469547
प्रकाशक - कथा भारती , प्रयाग
संस्करण - प्रथम 2015
अंकित मूल्य -200
पृष्ठ संख्या -87

मानव-जाति का सम्पूर्ण वाङ्मय आद्यन्त कथा-साहित्य से भरा पडा है। इसका कारण यह रहा है कि जहां कथा-साहित्य भरपूर मनोरञ्जन करता है वहीं दैनिक व्यवहार में उदाहरण बनकर पथप्रदर्शन भी करता है। कथा कहने-सुनने की हमारी प्रवृत्ति इतनी प्रबल, इतनी लोकप्रिय रही है कि प्रत्येक मनुष्य के स्मृति-पटल पर आज भी दादी-नानी की कहानियां अङ्कित हैं। कभी गावों में चौपालों पर कथाश्रावक एवं उनके इर्द-गिर्द बैठे श्रोताओं के दृश्य आम थे। राजा तो अपने दरबार में किसी एक कथावाचक-विशेष की भी नियुक्ति करता था। संस्कृत साहित्य में जिस ‘विदूषक’ का उल्लेख नाटकों में होता आया है, वह तथा ऐंग्लो-सैक्सन राजसभाओं में ‘ग्लीमैन’ नामक विनोदी स्वभाव के व्यक्ति कथाओं को राजसभाओं में सुनकर अन्यों को सुनाते थे।
          जहां तक कथा-साहित्य की उत्पत्ति का प्रश्न है, तो इसका श्रेय भी अन्य साहित्य रूपों के समान ही भारत को जाता है। भारत में प्रचलित कथा कहने की शैली असीरिया हाती हुई यूनान तक पहुंची थी, इस के प्रमाण उपलब्ध हैं। बौद्धसाहित्य में प्रचलित ‘अवदान’ नामक नीतिकथाओं का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में हुआ। संस्कृत भाषा के समृद्ध कथा साहित्य से कौन कथा-रसिक परिचित नहीं होगा? प्राचीन समय में कथा के दो ही रूप प्रचलित हुए थे- आख्यायिका एवं कथा, जो उसके इतिहास पर अथवा कल्पना पर आधारित होने के कारण निर्धारित किये गये थे। कालान्तर में कथा-साहित्य के अन्य भेद भी प्रचलित हुए, यथा- पौराणिककथा, दृष्टान्तकथा, लोककथा, परीकथा, नीतिकथा, हास्यकथा, जातककथा, दन्तकथा, धूर्तकथा आदि। ये कथा-भेद विषय-वस्तु पर आधारित रहे हैं।  कथा-साहित्य ने पौराणिककथाओं के माध्यम से विश्वोत्पत्ति से सम्बन्धित जटिल प्रश्नों आदि का समाधान करने का प्रयास किया तो परीकथाओं के माध्यम से दादी-नानी ने बालकों का मनोरञ्जन भी किया। नीतिकथाओं के द्वारा नैतिक उपदेश दिये तो ऐतिहासिककथाओं के द्वारा हमारे गौरवमयी इतिहास पर पुनर्दृष्टि भी डाली।
                 कथा-साहित्य के क्षेत्र में संस्कृत भाषा के योगदान से सभी आलोचक, प्रशंसक परिचित हैं। साहित्य के आदिम युग से वर्तमान युग तक संस्कृत भाषा का कथा साहित्य पाठकों, श्रोताओं के स्मृति-पटल पर अपनी अमिट छाप छोडने में सक्षम रहा है। इधर, अर्वाचीन संस्कृत कथा साहित्य में प्रयोगधर्मी गद्यकारों के द्वारा  नवीन प्रयोग किये जा रहे हैं, जिससे अर्वाचीन संस्कृत कथा-साहित्य संस्कृतेतर भाषायी कथासाहित्य के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है। ऐसे ही प्रयोगधर्मी गद्यकारों में डॉ नारायण दाश का नाम अग्रगण्य है। ‘गङ्गे च यमुनैव च’ तथा ‘लज्जा’ नामक कथासंग्रहों से अर्वाचीनसंस्कृतकथासाहित्य में अपनी पहिचान बनाने वाले डा. नारायण दाश अनुवाद-कार्य के द्वारा भी संस्कृतकथासाहित्य को समृद्ध करते आये है। आपके मौलिक संस्कृत कथा संग्रह ‘हत्याकारी कः’ को संस्कृत कथा साहित्य का प्रथम स्पशकथासंग्रह ;जासूसी कथा संग्रह होने का गौरव प्राप्त है।

                       प्रस्तुत कथा संग्रह ‘नरेन्द्रपुरीयं रेलस्थानकम्’ के माध्यम से आप संस्कृत कथा साहित्य में भूत-प्रेत कथाओं का प्रवेश करवा रहे हैं, जिन्हें आंग्ल भाषा में हाॅरर स्टोरिज या घोस्ट स्टोरिज के नाम से जाना जाता है। यद्यपि प्राचीन संस्कृत कथाओं में कहीं-कहीं भूत-प्रेतों  का वर्णन उपलब्ध हो जाता है किन्तु जिस रूप में आज विश्व के अन्य भाषायी कथासाहित्य में हाॅरर स्टोरिज प्रचलित है, वैसा रूप देखने का नहीं  मिलता है।
             हाॅरर स्टोरिज में या तो भूत-प्रेत सम्मिलित होते हैं या फिर उन पर विश्वास दिखलाया जाता है। आम बोलचाल की भाषा में हम इन्हें डरावनी कहानियां कहते हैं। ये कथाएं ऐसे वातावरण की सृष्टि करती हैं कि पाठक, श्रोता को भय सा अनुभव होने लग जाता है। भूतों में विश्वास प्रायः विश्व की सभी सभ्यताओं, संस्कृतियों में पाया जाता रहा है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि भूत-प्रेत कथाएं भी मौखिक या लिखित किसी न किसी रूप में प्रत्येक कालखण्ड में प्रचलित रहीं। सर वाल्टर स्काॅट का नाम हाॅरर स्टोरिज के लिये आदर के साथ लिया जाता है। जैन सुलिवन की हाॅरर स्टोरिज को तो कई आलोचकों ने ‘‘भूत की कहानी का स्वर्ण युग’’ तक कहा है। सन् 1900 में लुगदी पत्रिकाओं के प्रारम्भ के साथ विदेशों में भूत कथाओं के प्रकाशन का नवीन मार्ग प्रशस्त हुआ। 20 वीं सदी में हाॅरर स्टोरिज के लिये प्रभावशाली कथाकार के रूप में जेम्स का नाम लिया जाता है।
          संस्कृत   कथा साहित्य  में 10 कथाओं के माध्यम से डा. नारायण दाश ने भूत-प्रेतकथाओं की अवतारणा कर अर्वाचीन कथाकारों के लिये नवीन मार्ग प्रशस्त किया है।  संग्रह की सभी दस कथाएं अपने उद्देश्य में सफल होती हैं। इनको पढते हुए पाठक के मन-मस्तिष्क में भय का वातावरण निर्मित हो जाता है। कहीं सुनसान रेलवे स्टेशन का वर्णन भय उत्पन्न करता है तो कहीं मारकर जल में फैंकी गई युवती की प्रेतात्मा का प्रतिशोध पाठक को न केवल भय के वातावरण में ले जाता है अपितु पीडिता के साथ सहानुभूति की भावना भी उत्पन्न करता है। एक कथा में चित्रकार के चित्र के कारण विचित्र स्थिति का वर्णन है तो एक कथा में तान्त्रिक साधना पर आस्था की विजय वर्णित की गई है। ‘चालकहीनं यानम्’ कथा चलचित्र की भांति पाठक के समक्ष चलती है। एक -दो उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

द्वितीयवारं प्रश्नं श्रुत्वा छाया स्थगिता | तस्या: कृष्णमुखे अन्धकारस्य आभा विलग्ना | सा अहसत् | हतवाग् जातः श्रीनाथ: | अज्ञाता, अपरिचिता, पुनश्चास्मिन् निर्जनप्रान्तरे रात्रे: गाढ़ान्धकारे  परपुरुषं दृष्ट्वा विहसति | किमिवैषा कन्या ? नष्टा तु नास्ति | अथवा डाकिनी काचिदेवमेवं पुरुषान् आहरति | मस्तिष्कं तस्य अज्वलत् | अन्तत: किमनेन कन्याभ्रमेण रात्रिर्यापनीया स्यात् |
(पृष्ठ संख्या - 31) 

पुनश्च रात्रौ द्वादशवादनम् | ऋता जागरिता एव शयानासी त् | दूरतः श्रूयमाण: करुणरव: क्रमशः निकटायते | भीता सा मनाक् नेत्रे उन्मीलितवती | आम्, सैव कन्या अद्यापि तस्या: पिहितप्रकोष्ठे प्रविष्टास्ति | सकरुणं रुदती सा शय्यालग्ना जाता |
 (पृष्ठ संख्या -39)

               डा. नारायण दाश अपनी कथा शैली के माध्यम से पाठक को कथा के साथ बांधे रखते हैं, जो कि उनकी सफलता है। कथा के आरम्भ के साथ ही पाठक उससे जुड जाता है और कथा में आगे क्या होने वाला है, इसके प्रति उसकी उत्सुकता बराबर बनी रहती है।  इस कथा संग्रह के माध्यम से संस्कृत कथा साहित्य में नये वातायन उद्घाटित होंगे। 

4 comments:

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  2. बहुत सुन्दर समीक्षा । किस विधा की चर्चा में उसकी सन्दर्भ उपस्थापन के लिए विश्व साहित्य परिक्रमा करना आधुनिक संस्कृत साहित्य समीक्षा की कोटी को दर्शाती है । और यह भी सिद्ध होता है की संस्कृत साहित्य विश्व दरवार में हर विधा से परिपूर्ण है । यह कथा तो रोचक है ही और जिसने नहीं पढा होगा यह समीक्षा पढकर पढने को उत्सुक होगा - यह आशा है । कौशल जी, आप समीक्षक के रूप में अपना नाम तो लिखिए इस लेख में। नमस्कार ।

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