द्राक्षावल्ली
संकलयिता और सम्पादक-हर्षदेव माधव
प्रकाशक-साहित्य अकादेमी रवींद्र भवन 35 फ़िरोजशाह मार्ग दिल्ली
पृष्ठ सँख्या-243
अंकित मूल्य-300
यह एक संस्कृत ग़ज़ल संकलन है गौर तलब है कि संस्कृत में ग़ज़ल लेखन का प्रारम्भ भट्ट मथुरानाथ शास्त्री जी से माना जाता है जो स्वयं उर्दू फारसी के।बड़े जानकार थे सम्पादक ने भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से शुरू करके वर्तमान ऋषिराज जानी जैसे युवा गजलकार तक कुल 26 रचनाकारों को सम्मिलित किया है साथ ही रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है गजल पसन्द करने वालों और शोधछात्रों के लिए यह नितांत उपादेय है
इस संकलन से कुछ गजलकारों का परिचय प्रस्तुत है-
भट्ट मथुरानाथ शास्त्री मंजुनाथ तखल्लुस (उपनाम) से संस्कृत ग़ज़ल लिखते थे आपकी ग़ज़ल बहरों पर ही आधारित होती थी रदीफ़ काफिया बेजोड़ यथा-
विरहापगातटमुत्तरं पुनरागमिष्यति वा न वा
अपि मानसी मम वेदना विषमा गमिष्यति वा न वा
मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन
जगन्नाथ पाठक की ग़ज़लें उनकी पिपासा आदि संकलनों में निबद्ध हैं आप का ग़ज़ल विधा पर असाधारण अधिकार है वे प्राचीन ग्रन्थों की पंक्तियों को प्रयुक्त करते हुए भी उन्हें बहुत सुंदर तरीके से ग़ज़ल में ढाल देते हैं यथा-
त्वं मदन्तिके येषु ते हि नो गता दिवसा:
किं प्रतीक्षया तेषां ते हि नो गता दिवसा:
अभिराज जी की ग़ज़लें वर्तमान की विडंबनाओं विसंगतियों आदि को बखूबी प्रकट करती हैं -
विक्रयार्थं समागतौ विपणौ
निष्क्रियार्थं समागतौ विपणौ
नैव जाने महार्घतां स्वीयाम्
तन्निमित्तं प्रचारितो विपणौ
छोटी बहरों की ये गजलें अपना प्रभाव पाठक/श्रोता के मानस पर छोड़ती हैं
युवा गजलकारों में कई कवि बहुत अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं राजकुमार मिश्र की ग़ज़ल का यह शेर देखिए-
अस्तु देवभूरियं वसन्तु नाम सज्जना:
चिन्तितेs पि निन्दने रता नु ते जना हि के
बलराम शुक्ल संस्कृत के साथ साथ फारसी के भी अनुपम जानकार हैं उन्होंने कई गजलों का संस्कृत में अनुवाद भी किया है आपकी एक ग़ज़ल का अंश है-
क्व याता हे प्रयाता: सत्यमाप्तुम्
तदर्थं सज्जपादा: कण्टकारण्ये प्रयातुम्
संस्कृता मिश्रा की ग़ज़लें उनके साहस की सूचना देती है नारी शक्ति को अभिव्यंजित करती हैं-
पाषाणपथै: न बिभेमि सखे
घनभानुकरै: न बिभेमि सखे
कालेsहं विनययुतास्मि परं
गर्जन शब्दैर्न बिभेमि सखे
संकलयिता और सम्पादक-हर्षदेव माधव
प्रकाशक-साहित्य अकादेमी रवींद्र भवन 35 फ़िरोजशाह मार्ग दिल्ली
पृष्ठ सँख्या-243
अंकित मूल्य-300
यह एक संस्कृत ग़ज़ल संकलन है गौर तलब है कि संस्कृत में ग़ज़ल लेखन का प्रारम्भ भट्ट मथुरानाथ शास्त्री जी से माना जाता है जो स्वयं उर्दू फारसी के।बड़े जानकार थे सम्पादक ने भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से शुरू करके वर्तमान ऋषिराज जानी जैसे युवा गजलकार तक कुल 26 रचनाकारों को सम्मिलित किया है साथ ही रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है गजल पसन्द करने वालों और शोधछात्रों के लिए यह नितांत उपादेय है
इस संकलन से कुछ गजलकारों का परिचय प्रस्तुत है-
भट्ट मथुरानाथ शास्त्री मंजुनाथ तखल्लुस (उपनाम) से संस्कृत ग़ज़ल लिखते थे आपकी ग़ज़ल बहरों पर ही आधारित होती थी रदीफ़ काफिया बेजोड़ यथा-
विरहापगातटमुत्तरं पुनरागमिष्यति वा न वा
अपि मानसी मम वेदना विषमा गमिष्यति वा न वा
मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन मुतफ़ायलुन
जगन्नाथ पाठक की ग़ज़लें उनकी पिपासा आदि संकलनों में निबद्ध हैं आप का ग़ज़ल विधा पर असाधारण अधिकार है वे प्राचीन ग्रन्थों की पंक्तियों को प्रयुक्त करते हुए भी उन्हें बहुत सुंदर तरीके से ग़ज़ल में ढाल देते हैं यथा-
त्वं मदन्तिके येषु ते हि नो गता दिवसा:
किं प्रतीक्षया तेषां ते हि नो गता दिवसा:
अभिराज जी की ग़ज़लें वर्तमान की विडंबनाओं विसंगतियों आदि को बखूबी प्रकट करती हैं -
विक्रयार्थं समागतौ विपणौ
निष्क्रियार्थं समागतौ विपणौ
नैव जाने महार्घतां स्वीयाम्
तन्निमित्तं प्रचारितो विपणौ
छोटी बहरों की ये गजलें अपना प्रभाव पाठक/श्रोता के मानस पर छोड़ती हैं
युवा गजलकारों में कई कवि बहुत अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं राजकुमार मिश्र की ग़ज़ल का यह शेर देखिए-
अस्तु देवभूरियं वसन्तु नाम सज्जना:
चिन्तितेs पि निन्दने रता नु ते जना हि के
बलराम शुक्ल संस्कृत के साथ साथ फारसी के भी अनुपम जानकार हैं उन्होंने कई गजलों का संस्कृत में अनुवाद भी किया है आपकी एक ग़ज़ल का अंश है-
क्व याता हे प्रयाता: सत्यमाप्तुम्
तदर्थं सज्जपादा: कण्टकारण्ये प्रयातुम्
संस्कृता मिश्रा की ग़ज़लें उनके साहस की सूचना देती है नारी शक्ति को अभिव्यंजित करती हैं-
पाषाणपथै: न बिभेमि सखे
घनभानुकरै: न बिभेमि सखे
कालेsहं विनययुतास्मि परं
गर्जन शब्दैर्न बिभेमि सखे
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