Wednesday, May 29, 2024

नवीन संस्कृत गजल संग्रह _ संगता

कृति - संगता 

लेखक - राजकुमार कुमार मिश्र कुमार

विधा - ग़ज़ल संग्रह

प्रकाशक - सत्यम पब्लिशिंग हाउस , नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष -2021

पृष्ठ संख्या - 106

अंकित मूल्य - 400रु/-

                


               संस्कृत के युवा कवियों में राजकुमार मिश्र सुपरिचित नाम है| युवा कवि को साहित्य अकादेमी का युवा पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त हैं| कवि मिश्र पारंपरिक छंदों के साथ साथ ग़ज़ल, लोकगीत आदि की शैली में भी काव्य रचते हैं| संस्कृत युवा ग़ज़लकारों में भी राजकुमार मिश्र लोकप्रिय हैं| कुमार तखल्लुस (उपनाम) से लिखने वाले कवि राजकुमार के दो ग़ज़ल काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं| प्रथम संकलन 2020 में अभिज्ञान नाम से प्रकाशित हुआ,जिसमें 60 ग़ज़ल संकलित हैं| प्रस्तुत संकलन में 40 ग़ज़ल हैं| आत्मोद्गार में कवि कहता है कि संस्कृत ग़ज़ल रचना संसार में युगकवि अभिराज राजेंद्र मिश्र के पश्चात वह ही ऐसे ग़ज़ल कार हैं जिन्होंने संस्कृत में 100 ग़ज़ल लिखी हैं _

                                 अस्मिन् काव्यसङ्ग्रहे चत्वारिंशद् गलज्जलिकाः सङ्कलिताः सन्ति। यथाऽहं विभावये संस्कृतगलज्जलिकारचनासंसारे शताधिकगलज्जलिकानां स्चयिता इदानीं राष्ट्रे केवलः कविवरो युगकविः अभिराजराजेन्द्रमिश्रोऽस्ति। काममिदानीम् अनेके कवयो गलज्जलिकाविधायामस्यां प्रभूतं लिखन्ति तथापि कोऽपि अन्यः कविः गलज्जलिकालेखने शतं संख्यां न स्पृशति, दिष्ट्या अभिराजानन्तरम् अहं सञ्जातोऽस्मि इदानीं शतं संख्याकानां गलज्जलिकानां द्वितीयो रचयिता।

                         संग्रह की शुभाशंसा में dr राजेंद्र त्रिपाठी रसराज कवि के दावे को स्तुत्य और सराहनीय बताते हैं| किन्तु 1987 में प्रकाशित पिपासा नामक ग्रंथ में dr जगन्नाथ पाठक की 200 संस्कृत ग़ज़ल संकलित हैं तथा कवि महेश झा का संग्रह गलज्जलिकाशतकम 2014 में प्रकाशित हो चुका है| पिपासा के प्रकाशन के समय तक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री और जानकीवल्लभ शास्त्री जी प्रसिद्ध संस्कृत ग़ज़लकार थे जिनका नाम उल्लेख स्वयं कवि पाठक जी ने किया है| अस्तु 



                                    संग्रह का प्रारंभ तस्मै नमश्शम्भवे शीर्षक युक्त ग़ज़ल से होता है| दूसरी ग़ज़ल में सत्मार्ग पर चलने जैसी नीति की बातें सरस तरीके से कही गई हैं_


दूर्जनान् दूरतो नमेर्बन्धो ! 

मन्त्रमेनं सदा जपेर्बन्धो ! ।।

नाऽधुनाऽस्मिन् वने निजः कश्चित् 

वीक्ष्य कण्टान् ततस्सरेर्बन्धो !॥


श्रवणं न वरम् शीर्षक ग़ज़ल के एक शेर में कवि बड़ी प्यारी बात कहता है_


न शिक्षितं चेत् काऽपि हानिर्नो 

हठात् परं ते तरणं न वरम्॥

          अर्थात् यदि तुम्हे तैरना नहीं आता तो कोई बात नहीं पर तुम्हारा इस तरह हठ पूर्वक तैरना ठीक नहीं| पितर्दुःखितोऽहम् ग़ज़ल मार्मिक है, जो elegy यानी शोकगीत की श्रेणी में भी आती है| कवि ने अपने पिता के मृत्यु के पश्चात् उनका स्मरण करते हुए यह ग़ज़ल लिखी है_

                 


अनाथान् विधाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् 

श्रुतो नाऽन्तिमस्ते स्वरो भावपूर्णः पितर्दुःखितोऽहम्।।

जगन्नीरसं हा श्मशानायमानं मुहुर्भावयेऽहम् 

अकस्माद् विहाय प्रयातो दिवं नः पितर्दुःखितोऽहम् ।।


            कवि कहीं अन्योक्ति की शैली का भी प्रयोग करता है_


मानसं गन्तुकामोऽप्यसौ हंसराट्

पल्वले स्थातुकामोऽद्य चित्रा स्थितिः॥

नैव पूर्वं रुचिर्यस्य तस्मिन् बके 

तस्य सङ्गे स लीनोऽद्य चित्रा स्थितिः॥


     संग्रह की एक ग़ज़ल कोरोना के विभीषिका पर भी आधारित है_


इदानीं जीवनं विश्वे विपर्यस्तं हि विश्वस्मिन् 

विषं सर्वत्र सूतेऽयं विषाणुर्हा करोनाख्यः ।।

समस्ते मानवे यत्रेश्वरस्याऽऽसीत् पुरा वासः 

समन्तात् तत्र सञ्जातो विषाणुर्हा करोनाख्यः॥

 बहिस्स्थानां कथा का स्यात् सृताऽऽत्मभ्यो जनेभ्यो भीः

 विधत्ते किन्न दुर्दृश्यं विषाणुर्हा करोनाख्यः ॥



          कवि को शैली प्रायः अभिराज राजेंद्र मिश्र की ग़ज़ल शैली से मिलती है, जिसका संकेत शुभाशंसा में राजेंद्र त्रिपाठी रसराज ने भी किया है| इन ग़ज़ल का साथ में हिन्दी अनुवाद भी स्वयं कवि द्वारा किया गया है,‌जो इसकी उपादेयता को बढ़ा देता है| संस्कृत ग़ज़ल संग्रहों की वृद्धि करने वाले इस संकलन का आगमन स्वागत योग्य है| 

Tuesday, May 28, 2024

परमानन्दशास्त्रिरचनावलिः

कृति - परमानन्दशास्त्रिरचनावलिः

लेखक - परमानन्द शास्त्री

प्रधान सम्पादक - प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री

सम्पादक  - सत्यप्रकाश शर्मा

प्रकाशक - राष्टिय संस्कृत संस्थान , नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष -2016

पृष्ठ संख्या - 22 +,882

अंकित मूल्य - 720रु/-



                 अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के सुपरिचित कवि परमानन्द शास्त्री नूतन विधाओं और नूतन कथ्य के लिए सुपरिचित हैं | परमानन्द शास्त्री‌ जी की रचनाओं को एक स्थान पर लाने का सुकार्य किया है राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ने और संपादन का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है सत्यप्रकाश शर्मा जी ने| रचनावली के प्रारंभ में सत्यप्रकाश जी ने परमानन्द शास्त्री जी लें जीवन और कर्तृत्व का संक्षिप्त परिचय दिया है, जिससे ज्ञात होता है कि कवि परमानन्द शास्त्री जी का जन्म उत्तरप्रदेश के मेरठ मंडल के अनवरपुर गांव में  हुआ था| विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ाते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कवि ने लंबे समय तक कार्य किया और यही से सेवानिवृत्त हुए| कवि ने संस्कृत के साथ हिंदी में भी लेखन कार्य किया है| प्रस्तुत रचनावली में 2 संस्कृत महाकाव्यों के साथ अन्य 12 रचनाओं का संकलन हैं| कुछ काव्यों का हिंदी अनुवाद भी साथ में दिया गया है| इन रचनाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है




1 जनविजयम्

                         यह महाकाव्य विधा में रचा गया है| स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में हुई कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को लेकर कवि ने महाकाव्य का कथानक रचा है| यह 15 सर्गों का महाकाव्य है, जिसमें भारत में लागू हुए आपातकाल के समय की घटनाओं का वर्णन मुख्य रूप से किया गया है| इसका प्रथम प्रकाशन 1978 में हुआ था| अंतिम सर्ग में कवि का उद्बोधन भी है_

'रे पीडकाः ! क्रीडथ राजनीत्या, सभासु चाश्वासनदानदक्षाः! 

नेतार आलक्ष्यमतान्धमुग्धाः !, निबोधतादेष जनो ब्रवीति  ।


कियच्चिरं वेत्स्यथ मूढकं मां, कियच्चिरं लुण्ठथ मे मतानि ? 

भाग्येन खेला च कियच्चिरं मे, कियच्चिरं ब्रूत विशोषणं च ॥

                   कवि ने हड़ताल के लिए हठतालम्, नसबंदी के लिए शिराबन्धः, बंकर के लिए गुप्तसैन्यकक्ष शब्दों का प्रयोग किया है| 


2 चीरहरणम्

                       12 सर्गों का यह महाकाव्य यूं तो महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की घटना पर आधारित है किंतु इसमें हमारा वर्तमान समाज भी प्रतिबिंबित होता है| 11 वें सर्ग में द्रौपदी के मुख से भारतीय नारी की दशा दिखलाई गई है-

दृढतरं कुशलं पुरुषा व्यधुर्यदबलाचरणे बहुशृङ्खलाः।

 शिथिलयन्ति गतः किमुदारतामतितरां कतिचिन्न तदुत्सवे ।।

                         पुरुषों ने नारी के पाँव में कुशलता और दृढता के साथ जो बहुत सी शृङ्खलाएँ डाली हैं, उनमें से कुछ को वे उदार (?) बनकर उत्सवों में किसी प्रकार शिथिल कर देते हैं|


'प्रकृतिहीनगुणास्म्यबला मृदुः पुरुषसेव्यतया विधिना कृता।'

 इति बलादनुभावयताङ्गना बत नरेण कदा नहि वञ्चिता।॥

                                  'मैं स्वभाव से ही हीनगुण हूँ, अबला हूँ, विधि ने मुझे पुरुष की सेवा के लिए ही बनाया है' बलात् इस प्रकार का अनुभव कराते हुए पुरुष ने नारी को कब नहीं ठगा? 


3 गन्धदूतम्

                     मेघदूत की शैली में लिखे गए इस दूतकाव्य में पूर्वगंध और उत्तरगंध नाम से दो भाग हैं|  इनमें क्रमशः 78 और 82 श्लोक हैं| प्रथम भाग में किसी पति के विषम चरित्र को देख कर पत्नी पीहर चली जाती है| पति आत्मग्लानि से भरकर वाराणसी में स्थित अपनी पत्नी के पास संदेश भेजने के लिए गंध को दूत बनाता है_ 

सौम्यामोद ! त्वमसि विदितो मोददायीति लोके 

सर्वत्रापि प्रसरसि मरुद्द्यानरूढो जगत्याम्। 

वाराणस्यां वसति दयिता मानिनी मन्मदीया

 सन्देशं मे नय घटयितुं द्वन्द्वमद्यावयोस्त्वम्।।

               अर्थात् सौम्य आमोद ! तुम संसार में प्रसन्नता प्रदान करने वाले (के रूप में) प्रसिद्ध हो। वायु पर सवार होकर संसार में सर्वत्र विचरण करते हो। मेरी रूठी हुई प्रियतमा वाराणसी में रह रही है। हम दोनों का मिलन करने के लिए तुम मेरा संदेश ले जाओ ।। 

                     यहां पति के निवास स्थान से वाराणसी की यात्रा का मार्ग बतलाया गया है| फरीदाबाद, आगरा, फिरोजाबाद, कानपुर, प्रयाग होते हुए गंध को वाराणसी पहुंचना है| मार्ग में आए ताजमहल का वर्णन कवि कुछ यूं करता है_

पाषाणेषु स्फुटविलसनं शिल्पिनां कल्पनायाः 

स्नेहव्यक्तेः प्रणयिमनसो व्योमचुम्बि-प्रकारम्। 

सौन्दर्यस्य प्रसभमचलोद्‌भेदमुद्यत्प्ररोहम्

 मृत्योर्जेत्रं कुमुदविशदं चाट्टहासं कलायाः ।



गत्वा ताजं तत उपवने शीतकुल्या विगाह्य 

मोदस्पन्दं सुभग ! विहरेर्वाटिकायां सुमानाम्। 

प्राप्ते सर्वः परममुदितो जायते ज्ञातिबन्धौ 

पाराध्यैकव्रतिनि ललिते किं पुनस्त्वादृशे तु ॥

                         अर्थात् ताजमहल जहाँ पत्थरों में शिल्पियों की कल्पना का विलास फूट पड़ा है, जो प्रेमी-हृदय का स्नेह व्यक्त करने का एक आकाशचुम्बी ढंग है, अटल पृथ्वी को फोड़कर निकलता हुआ सौन्दर्य का अङ्‌कुर है और कुमुद के समान निर्मल मृत्युञ्जय अट्टहास है-उस ताजमहल में जाकर (वहाँ) उपवन की शीतल नहरों का अवगाहन कर सुगन्ध और आनन्द की थिरकन के साथ पुष्पवाटिका में विहार करना। अपने जाति-बन्धुओं के आने पर सभी प्रसन्न होते हैं फिर सदा परोपकार का ही व्रत धारण करने वाले तुम जैसे ललित व्यक्ति के आने की तो बात ही क्या

           उत्तरगंध में वाराणसी का वर्णन करते हुए पति अपना संदेश पत्नी को सुनाता है और अपने कृत्य की क्षमा याचना करता है| यहां कवि शराबी लोगों की दुर्दशा का वर्णन भी करते हैं|  यहां प्रसिद्ध संस्कृत विश्वविद्यालय और हिंदू विश्वविद्यालय का भी वर्णन प्राप्त होता है| लंका नामक प्रसिद्ध मुहल्ले का भी वर्णन है| 



4 परिवेदनम् _

                     ‌‌यह खंड काव्य शोकगीत elegy की श्रेणी में आता है| इसकी रचना 1980 में उस  समय की गई थी जब इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हुई थी| प्रस्तुत काव्य में 105 श्लोक हैं_

अयि राष्ट्रविचिन्तनामते ! 

तव शोको न ममैव केवलम्।

 इह कोऽपि मृतो गृहे गृहे

 सकलो लोक इवाद्य रोदिति ।


5 वानरसंदेश:_

                      दूतकाव्य (संदेश काव्य) की विधा में लिखा गया यह काव्य एक तरफ तो कालिदास की शैली का स्मरण करवाता है तो दूसरी और वर्तमान राजनीतिक वातावरण की विडंबना पर प्रहार करता हुआ उसे आईना दिखाता है|  काव्य का नायक  वानर को दूत बनाकर उसे अलीगढ़ से दिल्ली भेजना चाह रहा है और उसकी प्रेयसी है कुर्सी_ 


आस्ये हास्यं कथमिह सखे प्रेयसीत्थं निशम्य 

बाढं साऽऽस्ते मम खलु, वदाम्येहि, भूयः शृणुष्व। 

आसन्दीति प्रकृतिपुरुषैरद्य नव्यैश्च कुर्सी- 

त्याख्याता सा खलु मयि रता स्यान्नवा ऽहं रतोऽस्याम् ।।


           आज की राजनीति का एक चित्र इस प्रकार खींचा गया है_


शास्यो लोकः कपिवर ! सदा भेदनीतिं प्रयुज्य 

मीनानां संतरणमिव नो जन्मजातः स्वभावः । 

देशप्रेम्णो बहु विदधतो गीतगानं समन्तात् 

स्वार्थेप्साया विकटघटनामादधाना अटामः ||

             प्रस्तुत संकलन में 187श्लोक हैं| 



6 मन्थनम्

                   प्रस्तुत खण्ड काव्य का विभाजन 5 चक्रों में किया गया है| इसका प्रथम प्रकाशन 2001 में हुआ था| यह खण्डकाव्य शकुंतला की कथा पर आधारित है किंतु कवि की कुशलता कथा के बुनावट में साफ दिखलाई देती है| स्त्री विमर्श  का स्पर्श भी इसमें प्राप्त होता है| देवता अप्सराओं को एक अस्त्र की तरह प्रयुक्त करते हैं_

अहो समाजे पुरुषप्रधाने नार्यास्तु काचिद्गतिरेव नास्ति ।

 भेदे प्रयुक्ता छलिराजनीत्यां सदाऽसहाया प्रभुसत्सहाया ।


स्वार्थाय देवैरपि कूटनीत्यां विलासकार्ये च वयं प्रयुक्ताः।

 प्रयुक्तभुक्तं स्वमनोविरुद्धं महाभिशापश्चिरयौवनं नः ॥


प्रवर्तितः श‌िङ्कभिरेव देवै- यौनप्रयोगो भुवि कूटनीत्याम्। 

गतास्ततोऽग्रे मनुजाः कृतं यत् सुधाधराणां विषकन्यकात्वम्  ॥


7 कौन्तेयम् ॒-

                     यह खंडकाव्य भी महाभारत के कथानक पर आधारित है| इसमें 4 भाग हैं_ कर्णः, कुन्ती, अर्जुनः‌ और कृष्णः| 


8 भारतशतकम् -

                                114 श्लोकों में विभक्त यह खंडकाव्य प्राचीन भारत के गौरव का स्मरण करवाता है, वर्तमान की उपलब्धियों का वर्णन करता है और साथ ही भविष्य की आशा भी जगाता है_



नेतारो जनसेवका अपि जनश्चारित्र्यसन्नागर- 

श्चारित्र्यं विनयान्वितं च विनयो विद्याविलासैः कृतः। 

विद्या चार्थकरी तथार्थगरिमा त्यागानुविद्धः पुन-

 स्त्यागो दम्भमृतेऽत्युदारमनसा भूयान्नृणां भारते ॥


9 परमानन्दसूक्तिशतकम् -

                                     इस शतक काव्य में  कवि रचित 108 सूक्तियों का संकलन कवि कृत अनुवाद के साथ किया गया है| 


10 अन्योक्तितूणीरम् -

                                  आचार्य बच्चूलाल अवस्थी जी से प्रेरित होकर कवि ने जिन अन्योक्तियों की रचना की, उनका संकलन कर अन्योक्तितूणीरम् के नाम से 2008 में प्रकाशित करवाया था| यहां साथ में कवि कृत पद्य अनुवाद भी दिया गया है_


भ्रातर्हंस जनैर्वकेषु गणितः किं तावता खिद्यते 

नीर-क्षीर-विवेकि ! हेम तुलितं लोकेन गुंजाफलैः । 

यत्रान्धो नृपतिः पुरी तिमिरिता, भेदो न कृष्णे सिते 

मध्ये काककुलस्य यन्न गणितः श्रेष्ठं हि ते तत् कियत् ? ॥


बगुलों में गिनते लोग तुम्हें इससे मत हंस ! दुखी होना 

हे नीर-क्षीर-मर्मज्ञ ! यहाँ गुंजाफल से तुलता सोना

 अन्धेर नगर चौपट राजा, काला सफेद सब एक जहाँ, 

फिर भी कौओं में नहीं गिना क्या यह कम है उपकार यहाँ ।।


11 विप्रश्निका -

                 कवि ने परमानंद शास्त्री ने एक नूतन काव्य विधा का सृजन किया है, जिसे देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी ने प्रश्नकाव्य कहा है| कवि ने प्रति पद्य एक प्रश्न प्रस्तुत करके पाठक को सोचने के लिए प्रेरित किया है_


संस्थासु ये शीर्षगताः स्वबन्धून् बलादयोग्यानपि योजयन्ति।

 त्यजन्ति योग्यानपरांश्छलेन ते केन वाच्याः सुधियां पदेन ?।।


12  सन्तोषसुरतरुः_

                        प्रस्तुत कृति में 108 पद्य हैं, जो अनुष्टुप् छंद में हैं| इसमें कवि  कृत ब्रज भाषा दोहा अनुवाद भी साथ में दिया गया है_


नाना कामाः प्रजायन्ते कल्पवृक्षस्य सेवया।

 निष्कामं जायते चेतः संतोषतरुसेवया


कल्पवृक्ष की सेव तें उपजत नाना काम।

 तरु संतोस सेवा कियें चित्त सदैव अकाम 


13 स्वरभारती ( प्रथम भाग) _ 

                                       इस भाग में संकलित कविताएं संस्कृत के पारंपरिक छंद में नही हैं| कहीं हिंदी_ उर्दू के छंदों का प्रभाव है तो कहीं लोकगीतों की लय का| यहां 123 शीर्षको में कविताएं संकलित हैं_ 


उपालम्भः कस्य केन च दीयताम्, 

पातिता कूपेऽत्र विजया विद्यते।

हन्त ! 'आनन्दः' खपुष्पमजायत। 

वाङ् निरुद्धा हृदयमन्तः खिद्यते।


यहां उर्दू कविता का प्रभाव देखा जा सकता है| पातिता कूपेऽत्र विजया विद्यते भाषा में प्रचलित उक्ति  कुएं में भांग पड़ी है का संस्कृत रूपांतरण है| 



14 स्वरभारती ( द्वितीय भाग) _  

                     इसका अन्य शीर्षक आनन्दगीतिका भी दिया गया है| इसमें 15 कविताएं संकलित हैं| 






           


                          

 



Monday, May 27, 2024

गंगा के बेटे की मार्मिक कथा _ गंगापुत्रावदानम्

कृति - गंगापुत्रावदानम्

कृतिकार - डां निरंजन मिश्र

विधा - महाकाव्य

संस्करण - प्रथम 2013

प्रकाशक - मातृसदनम्, जगजीतपुरम्, कनखलः, हरिद्वारम्

फोन नं. : 01334-246241, 245333

पृष्ठ संख्या - 348

अंकित मूल्य - अंकित नहीं

            डां निरंजन मिश्र अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में सुपरिचित हैं| हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं में रचना करने वाले कवि मिश्र जी।की।संस्कृत साहित्य में अनेक पुस्तके प्रकाशित हुई हैं| आप महाकाव्य , खंडकाव्य, गजलकाव्य, बालकविता, कथा, नाट्य आदि नैक विधाओं में लिखते हैं| गंगापुत्रावदानम् कवि मिश्र का महाकाव्य विधा में लिखा गया ग्रंथ है जिसे 2017 में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार से भी पुरस्कृत किया गया है| 

       




          गंगापुत्रावदानम् महाकाव्य का अपर नाम स्वामिनिगमानन्दचरितम् है क्योंकि इस महाकाव्य के नायक स्वामी निगमानन्द जी हैं| स्वामी निगमानन्द को गंगापुत्र के नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त थी| कवि ने किसी अलौकिक दिव्य पात्र को नायक न बनाकर लौकिक किंतु दिव्य पात्र को नायक बनाया है| क्योंकि स्वामी निगमानन्द अपने कर्मों से दिव्य ही थे| पर्यावरण संरक्षण, भागीरथी गंगा की स्वच्छता और भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के संकल्प को लेकर स्वामी निगमानन्द ने अपने प्राणों की भी आहुति दे दी| यह महाकाव्य सत्य घटना पर आधारित है| कवि ने स्वयं इसकी अधिकांश घटनाओं को घटते हुए देखा है| मिथिला अंचल में जन्म लेने वाले स्वामी निगमानन्द जी की कर्मभूमि और तपोभूमि बना हरिद्वार स्थित मातृसदन नामक आश्रम| लेखक ने स्वयं लिखा है कि नायक के संन्यास लेने के पूर्व की कथा कल्पना पर आधारित है किंतु बाद की कथा सत्य घटनाओं को कहती है - संन्यासग्रहणात्प्राक्तनीया कथा यथाश्रुति वर्णिता वर्तते। कथासंयोजनाय कल्पना भवति बलीयसी कवीनामित्यत्रापि न संशयः । संन्यासिनः पूर्वजन्मविषये कल्पनैवाधारत्वमर्हति। कल्पनायामस्यामपि तन्मुखाद्गलित वचनमेव प्रमाणम् । 



                         वीर रस प्रधान इस महाकाव्य में 23 सर्ग हैं| कवि ने प्रथम सर्ग में उत्तरांचल का मनोहारी वर्णन किया है_

घनो घनस्तिष्ठति यत्र गेहे सौदामिनी यत्र करोति नृत्यम् । 

गभीरनादो गगने घनस्य गुहासु शैलस्य हरेश्च नित्यम् ॥

          अर्थात्  जहाँ घना मेघ घर में निवास करता है। (मेघ लोगों के घरों में प्रवेश कर जाता है।) सौदामिनी (विद्युत्) जहाँ अपना नृत्य प्रस्तुत करती है। जहाँ आकाश में मेघ का और पर्वत की गुफाओं में सिंहों का गम्भीर नाद नित्य हुआ करता है। (यह वही भूमि है।)

               द्वितीय सर्ग में हरिद्वार का विशिष्ट वर्णन प्राप्त होता है| किंतु कवि वर्तमान में धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म से भी आहत है_ 

तीव्रध्वनिर्भवति देवसमर्चनायां स्तोत्रेण तुष्यति न दुष्यति कर्णरन्यम् ।

लोकस्य दुःखमुपपाद्य कथं कदा वा लोकेश्वरस्य चरणेऽस्तु रतिर्न जाने ।।

           अर्थात्  यहाँ देवताओं की अर्चना में तीव्र ध्वनियाँ होती हैं। इन स्तोत्रपाठों से देवता तो तुष्ट होते नहीं, कर्ण रन्ध्र दोषपूर्ण अवश्य हो जाता है। लोगों के दुःखों को उत्पन्न कर लोकेश्वर के चरणों में प्रीति कैसे होगी, यह समझ में नहीं आता है।

                     तृतीय सर्ग में नायक की कर्म स्थली मातृ सदन का वर्णन किया गया है| चतुर्थ सर्ग से नायक की कथा शुरू होती है| नायक सीता, विद्यापति आदि की भूमि में जन्म लेते हैं जहां उनका नाम स्वरूपम् रखा जाता है| पंचम और षष्ठ सर्ग में नायक के आध्यात्मिक विचारों से अवगत कराया गया है| सातवें सर्ग से तेरहवें सर्ग तक की कथा में बतलाया गया है कि किस तरह स्वरूपम संन्यास लेकर स्वामी निगमानन्द बन जाता है-

शिष्यस्य चारुचरितेन गुरुः प्रसन्नः

 सेवाविधौ नियमनं च चकार तस्य ।

 संन्यासधर्ममधिगत्य नवीननाम्ना 

लोके स्वरूपमवटुर्निगमाभिधोऽभूत् ॥ भूत् ॥ 

                    अर्थात् शिष्य के सुन्दर चरित्र से गुरु ने प्रसन्न होकर अपनी सेवा विधि में उसका नियमन कर दिया। अर्थात् अपनी सेवा में लगा लिया। संन्यास धर्मा, विष को ग्रहण कर यह स्वरूपम नवीन नाम से निगमा (निगमानन्द सरस्वती) हो गया।

                     14 वें सर्ग में 63 श्लोकों के माध्यम से गंगा के मुख से ही गंगा की दुर्दशा का वर्णन किया गया है_ 

मलं सदा क्षालयतीह गङ्गा श्रुत्वेति वाक्यं स्वमलप्रवाहम् ।

विसर्जयन्त्यत्र हि मच्छरीरे रक्षन्ति देहे मनसो मलं ते ॥



           15 वें सर्ग से 23 वें सर्ग तक की कथा में बतलाया गया है कि किस प्रकार गंगा की रक्षा के लिए वाहनों के प्रतिबंध को लेकर और कुंभ की।भूमि को खनन मुक्त करवाने के लिए आश्रम वासी अनशन करते हुए आंदोलन करते हैं| कई बार उनकी बात मान ली जाती है किंतु फिर से गंगा को प्रदूषित करने और खनन करने का कार्य शुरू हो जाता है| इससे आहत होकर स्वामी निगमानन्द अनशन करते हैं जिसमें सरकार और पत्रकार उदासीन रवैया अपनाते हैं| यही पर वर्णन मिलता है कि उन्हे अस्पताल में धोखे से जहर दिया जाता है जिससे वह ब्रह्मलीन हो जाते हैं_

मध्येमार्ग कृतं यत्तैस्तत्फलं स्वामिनो मुखात् ।

निर्गतं फेनरूपेण तरङ्गिण्या यथा मलम् ॥

                 अर्थात्      इस बीच रास्ते में इन लोगों ने जो किया उसका परिणाम यह हुआ कि उस स्वामी (निगमानन्द) के मुख से फेन निकलने लगा। जैसे तरंगिणी अपनी का मल फेन रूप में निकलता है।

     अर्वाचीन संस्कृत महाकाव्यों में गंगापुत्रावदानम् निश्चित ही महत्वपूर्ण महाकाव्य है जिसमे एक साधु चरित को आधार बनाकर महाकाव्य का ताना बाना बुना गया है साथ ही हमारे समय के समाज के दोगलेपन का भी मार्मिकता से वर्णन किया गया है| नदियों को मां कहने वाले हम उन्हें किस तरह बर्बाद कर रहे हैं और उनकी रक्षा का व्रत लेने वालों की क्या स्थिति कर दी जाती है, इसका सच्चा परिचय यह महाकाव्य देता है| काव्य की।भाषा का प्रवाह प्रशंसनीय है| विविध अलंकारों के प्रयोग में कवि ने अपनी कुशलता प्रदर्शित की है और छंद प्रयोग भी श्लाघनीय है| 

Sunday, May 26, 2024

सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)

कति - सूर्यायते नभः (चतुर्भाषा काव्यसंग्रह)



कृतिकार  - रीता त्रिवेदी

विधा  - मुक्तछंद काव्यसंग्रह 

संस्करण  - प्रथम 2010

प्रकाशक - प्रकाशक वितरक डॉ. रीता त्रिवेदी 903, सत्यम् एपार्टमेन्ट, स्वामीनारायण सर्कल के पास, ठाकोरद्वार रांदेर रोड, सूरत – ३९५००९ 

पृष्ठ संख्या -84

अंकित मूल्य - 120



             अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में यूं तो बहुत मात्रा में काव्य रचे जा रहे हैं  किंतु महिला कवि अत्यल्प है| रीता त्रिवेदी गुजराती में तो कविता और कथाएं लिखती ही हैं साथ ही संस्कृत में भी उनकी कविताएं प्रकाशन में आई हैं| प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि की प्रायः मुक्त छंद की कविताओं का संकलन है, जो विविध विषयों पर आधारित हैं| इन  कविताओं के साथ हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है| हिंदी और गुजराती में अनुवाद स्वयं कवि ने किया है| अंग्रेजी अनुवाद चैतन्य देसाई आदि 5 अनुवादकों ने किया है| इस तरह तीन भाषाओं के साथ मूल संस्कृत की इन कविताओं का यह संग्रह चतुर्भाषा काव्यसंग्रह बन जाता है| 



                                   प्रथम कविता अतीत: में कवि भित्ति के आवरण को नहीं खोदने के लिए कहती हैं क्योंकि उसके पीछे फूत्कार है वासुकि नाग की -

मा खनतु 

इदं भित्तेरावणम् । 

तस्य पृष्ठतः 

फुत्कारः वासुकेः । 

त्वम् दाह्यसि, 

भस्मीभूतो भविष्यसि च । 

शनैः शनैः वासुकिस्त्वामवलोकयिष्यति, 

तस्य जिह्वया 

आस्वादयिष्यति, 

तीक्ष्णदंशं दास्यति ।

 त्वं भ्रमिष्यसि 

मोहयिष्यसि, 

विषादे प्रवक्ष्यसि कर्गजनौका इव ।

 पश्य ! वासुकिस्त्वां पश्यति

घटिका यन्त्रे....


            यहां अतीत को नहीं कुरेदने के लिए कहा जा रहा है क्योंकि कई बार अतीत रूपी बेताल वर्तमान के कांधों पर चढ़कर आपको असमंजस में डाल सकता है| वासुकि नाग जो शिव के गले में विराजता है यहां काल का प्रतीक बन जाता है| कविताओं में कहीं कोमल भावनाओं से सिक्त प्रणय निवेदन है तो कहीं स्त्री मुखर होकर कहती है कि विश्वास पुष्प गुच्छ तो नहीं है कि उसे तुम्हारे चरणों में रख दूं| एक कविता में वह अहल्या बन गौतम से प्रश्न करती दिखती हैं कि वह तो मुग्धा थी, इंद्रजाल को नहीं समझ सकी किंतु गौतम तो ज्ञानवृद्ध थे  - 

अहं शिला वा अहल्या ! 

न जानामि । 

स्थिताऽस्मि

 मुक्तावकाशे।

 गौतम ! तव दोषोऽपि कः। 

स्वजनेम्य क्रोधः 

इति सार्वत्रिकी रीतिः, 

किन्तु शल्या मम हृदये इति, 

कथं न पृच्छसि तां कथा। 

किमिति ! किमिति ! 

ऋजुहृदया ! मुग्धा ! न जानाम्यहम् 

ऐन्द्रजालबन्धनम् । 

किन्तु ज्ञानवृद्धः त्वम्

 त्वमपि न जानासि ! 


        ज्योतिष शास्त्र में सूर्य रेखा का वर्णन मिलता है| सूर्य रेखा अनामिका उंगली के एकदम नीचे होती है।  जो सबसे छोटी व मध्यम उंगली के बीच में होती है।  इस अनामिका के नीचे उभरते क्षेत्र को सूर्य पर्वत और इस पर्वत से नीचे हृदय रेखा की तरफ जाने वाली रेखा ही सूर्य रेखा कहलाती है।जिस किसी व्यक्ति की हथेली में सूर्य रेखा जीवन रेखाके पास से आरंभ होती है, उसके लिये यह रेखा उन्नति और यश बढ़ाने वाली मानी गयी है। सुख से आंख मिचौली खेलती कवि अपनी हथेली में सूर्य रेखा खोजती हुई उस से सुख की व्याख्या पूछती है_


सूर्यरेखे हे ! 

अन्विष्यामि त्वाम्।

 करतलं सम्पूर्णम्

इतस्ततः कृत्वा 

अन्विष्यामि त्वमेव । 

श्रुतम्, 

तव शासने सुखमस्ति ।

 मम स्थम्भितं रुधिरं वा

 'इन्हेलर' सहायेन 

अस्तित्वमयं मयाश्वासे 

सुखस्य व्याख्यां 

बोधयितुं शक्नोसि किम् !

     


                 चार भाषाओं का यह काव्य संग्रह पठनीय है| 





 !

मौन की गूंज _ नीरवतायाः प्रतिध्वनिः

कृति   - नीरवतायाः प्रतिध्वनिः Echo of Silence

कृतिकार - पराम्बा श्रीयोगमाया

विधा - मुक्तछंद काव्यसंग्रह 

संस्करण - प्रथम 2020

प्रकाशक - cyberwit net allahabad 

पृष्ठ संख्या - 202

अंकित मूल्य - 300






पराम्बा श्रीयोगमाया आधुनिक संस्कृत साहित्य की कतिपय महिला कवियों में प्रमुख हैं| डॉ. परम्बा श्री योगमाया एक वैदिक विदुषी हैं और भारत के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय में वेद विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उनके शोध के अन्य क्षेत्रों में इंडोलॉजी, महाकाव्य और पुराण, दर्शन और धर्म, और समकालीन संस्कृत साहित्य शामिल हैं। अपने शैक्षणिक रुझान के अलावा, वह कविताएं, लघु कथाएँ और निबंध ज्यादातर संस्कृत में, लेकिन अंग्रेजी, उड़िया और हिंदी भाषाओं में भी लिखती हैं और इन भाषाओं के साहित्य का संस्कृत में अनुवाद करती हैं। अब तक उनकी पांच पुस्तकें, एक निबंध संग्रह, एक अनुवादित विज्ञान कथा, एक कविता पुस्तक, एक लघु कहानी पुस्तक और एक शोध पुस्तक संस्कृत में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें 2014 में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा संस्कृत के लिए 'युवा पुरस्कार' और  2013 में भाओ राव सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा संस्कृत के लिए प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान भी प्राप्त हुआ है| 

                                     पराम्बा का नवीन काव्य संग्रह नीरवतायाः प्रतिध्वनिः शीर्षक से प्रकाशित हुआ है| यह मुक्त छंद विधा में रचा गया है| प्रस्तुत संकलन में कवि की 100 कविताओं निबद्ध हैं|  जिनका अन्य भाषाओं के लोगों की समझ के लिए कवि ने स्वयं अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है। इस पुस्तक का विषय जीवन में असफलताओं और उनसे सफलतापूर्वक निपटने और जीवन की यात्रा में आगे बढ़ने के बारे में कवि का आत्मनिरीक्षण है। इन कविताओं के माध्यम से कवि  संदेश देना चाहती है कि मन का दार्शनिक मिश्रण और आत्मा की आध्यात्मिक शक्ति हमें जीवन की नाव को असफलताओं के उबड़-खाबड़ पानी से निकालकर जीवन के अंतिम लक्ष्य के किनारे तक ले जाती है। कविताओं में वैदिक, भारतीय दार्शनिक प्रणालियां और जगन्नाथ पंथ की कुछ छवियाँ परिलक्षित होती हैं।



             राजनेता विकास की बहुत बात करते हैं लेकिन विकास सच्चे मायनों में क्या होता है यह समझाते हुए कवि लिखती हैं -


विकसितराष्ट्रस्य स्वप्नः 

साक्षात्कारसाफल्यपरिणामः

 प्रथमश्रेण्यां प्रथमछात्रस्य हर्षः 

प्राचुर्योल्लसितः कृषकः 

अन्नाहजारे-आदीनां विप्लवसमाप्तौ विश्रामः ।। 

जोषीमठशिख्गुरुद्वारे इस्लामभ्रातृणां नमाजपाठः

 वियुक्तपञ्चपञ्चाशत्तापमाने सियाचीने सैन्यं रक्षाकवचम् ।

 नक्सलमाओवादीनां सामूहिकात्मसमर्पणं 

लघूद्योगेन स्वात्मनिर्भरत्वम् ।

मध्याह्न भोजनद्विचक्रिकावितरणं विहाय 

शिक्षाया गुणात्मकत्वम् । 

दारिद्यापनोदनाय स्वदेशीद्रव्याणामुत्पादनम् ।।



Development


The dream of a developed nation 

Is like

 The success in an interview for job, 

The contentment of a laborious student 

When he/she stands first.

The gladness of a farmer 

When he cultivates a lot of crops, 

It's like taking rest after the revolution of

 Anna Hazare and others.

It's the 'Namaz' by Muslim brothers

 In Joshi Math and Gurudvara there

 As rainwater flooded the mosque,

 The bravery of the military troops at Siachen

 In -50 degree temperature,

 Surrender of the Maos and Naxals at a time 

And engaging themselves in short-term

 entrepreneurships.

Steps to maintain the quality education are needed

 Rather than the mid-day meals and distributing bicycles 

And more indigenous products can eradicate poverty.


  वस्तुतः सच्चा विकास तभी तो होगा जब वह जात पात धर्म आदि की सीमाओं से ऊपर उठकर सब के लिए समान रूप से लागू होगा| जो वंचित अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते हुए नक्सली माओवादी बन गए वे आत्मसमर्पण करें और मुख्यधारा में लौट आएं, ऐसी कामना भी कवि करती हैं तो साथ ही विद्यालय शिक्षा में मिड डे मील साइकिल वितरण जैसी योजनाएं संचालित होती हैं उनके स्थान पर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दी जाएं यह भी सही विकास होगा, कवि यह कहना चाहती है| 

          पलाश नामक कविता में पलाश  सुंदर किंतु गुणों से हीन पुरुष का प्रतीक बन जाता है -


सुरभिरहितः पलाशकुसुमः 

गुणहीनो रूपवान् पुरुषः

अन्तःसारहीनत्वं परिज्ञायते नितरां 

शीघ्रं भवतु वा विलम्बः ।।



स्फटिकः कविता में कवि चाहती है कि जिस तरह वह स्वच्छ है उसी तरह से अन्य भी स्वच्छ हृदय, स्वच्छ मन वाले बने,‌अन्यथा वह स्वयं भी कलुषित हो सकती है_



नाहं किञ्चिदपि कांक्षे

 तव स्वच्छहृदयं विना ।

 न धनं नालङ्कारं

 न मानं न पुरस्कारं 

न जनं न कोलाहलं

 त्वत् स्वच्छमानसं विना ।।

न म्लानयतु मां

 त्वहृदयकालुष्येण 

न जालयतु मां त्वन्मनसः कषायेण

 स्फटिकोऽहं शुभ्रोज्वलः ।।

कांक्षे सूर्यमयूखान् 

कांक्षे चन्द्राभाः 

कांक्षे आकाशविस्तारं

 कांक्षे आधारमपि धरातलम् ।।

सर्वेषां प्रतिबिम्बनं 

मन्मध्ये भवति यादृच्छिकं 

तन्न मन्मौलिकत्वम् ।।

शुद्धः स्फटिकोऽहं 

स्वच्छः स्फटिकोऽहं 

जानामि जगत्स्वरूपम् ।।


 स्फटिक बन के ही जगत के सही स्वरूप को जाना जा सकता है| पुलवामा अटैक के बाद सर्जिकल स्ट्राइक पर भी कवि ने अपने भाव कविता के माध्यम से व्यक्त किए हैं जो संस्कृत कवि की समकालीन जागरूकता को प्रदर्शित करती है_ 


अहं भारतदेशः 


यदि नेच्छसि समरं

तर्हि किमर्थं मत्सैन्यबलं मारितम् ??

यदि सैन्यमृत्यौ नास्ति ते भूमिका

 आतङ्किभिर्मारिताः 

तह्यतङ्कीनां हनने 

त्वत्प्रतिवादस्य का कथा ??

आतङ्कवादस्य निर्मूलनम- 

स्मदीयं सामान्यमेकादर्शभूतं

 शान्तिप्रीतिबन्धुत्वस्य विशालभूखण्डमा- 

वयोर्मेलनायोद्दिष्टम् ।।



परांबा ने प्रस्तुत काव्य संग्रह में अपने भावों को अभिव्यक्त करते हुए विभिन्न विषयों को छुआ है| वे मानव मन की कवि हैं| मुक्त छंद में कवि के मुक्त मन के भाव अविरल रूप से प्रवाहित हुए हैं| 

          


Saturday, May 25, 2024

नवीन संस्कृत हाइकु काव्य संग्रह

कृति   - शाखान्तरालानां गगनखण्डाः

कृतिकार - डाॅ हर्षदेव माधव

संपादिका- dr भावना सोनी 

विधा - हाइकु काव्यसंग्रह

संस्करण - प्रथम 2024

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन दिल्ली 

पृष्ठ संख्या - 240 

अंकित मूल्य - 400




आधुनिक संस्कृत साहित्य में हर्षदेव माधव प्रयोगधर्मी कवि के रूप में सर्वविदित हैं| कविता, उपन्यास, कथा, नाट्य, काव्यशास्त्र आदि अनेक विधाओं में अनेक कृतियों के माध्यम से आप संस्कृत साहित्य को उस स्थान पर लाए हैं जहां वह अन्य भाषाई साहित्य के साथ बिना किसी हिचकिचाहट के बात कर सकता है | हाइकु, तांका, सीजो कविता का बखूबी प्रयोग संस्कृत में माधव जी ने ही संभव करवाया है| 



               हाल ही में माधव जी का नवीन (31 वां) काव्यसंग्रह प्रकाशित हुआ है शाखान्तरालानां गगनखण्डाः| यह हाइकु  विधा में रचा गया है| इस पुस्तक में 3 खंड हैं, जिसके प्रथम  2 खंड हाइकु पर विविध आलेखों पर आधारित हैं और 240 पृष्ठों में से 157 पृष्ठ घेरे हुए हैं| इस तरह यह काव्य संग्रह के साथ लघु समीक्षा ग्रंथ को भी अपने में समेटे हुए हैं| 



प्रथम खंड - 

                   इस के 92  पृष्ठों में हर्षदेव जी के 8 आलेख संकलित हैं जो सभी हाइकु कविता के विभिन्न पक्षों पर आधारित है| स्वयं अपनी कविता पर कवि माधव जी को ही क्यों बोलना पड़ा इस का उत्तर वह खुद एक आलेख में देते हुए कहते हैं - "संस्कृत के कवि को अपनी कविता के बातें बोलना पड़े यह विवशता है|" यह विवशता क्या है यह आप उनके आलेखों से गुजरते हुए समझ सकते हैं| संस्कृत के तथाकथित पंडित जो संस्कृत में नए लिखे जा रहे के पक्षधर नहीं हैं, किसी अन्य भाषा की विधा में लिखे गए को देख कर नाक भौं सिकोड़ लेते हैं, उन्हीं मान्यों को जवाब देने के लिए यह आलेख लिखे गए हैं| भवभूति तो किसी समानधर्मा की आस में काव्य रचते गए लेकिन माधव जी ने ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए खुद कमर कस ली है| ऐसा भी नहीं है कि माधव जी को को कोई समानधर्मा मिला ही नहीं| आधुनिक संस्कृत साहित्य के आचार्य समीक्षक श्री राधावल्लभ त्रिपाठी जी नैक बार मुक्तकंठ से  कवि माधव जी की कविता की प्रशंसा कर चुके हैं और अनेक उदाहरणों के माध्यम से यह स्थापित कर चुके हैं कि आधुनिक संस्कृत साहित्य में माधव जी सरीखा कवि कोई और नहीं है| अगर किसी आधुनिक संस्कृत कवि के काव्यों के अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सर्वाधिक हुए हैं तो वे निश्चित रूप से माधव जी ही हैं| इसी ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में अनेक समीक्षकों ने माधव जी के हाइकु काव्यों की विशेषताओं को उल्लिखित किया है| 

        इन आलेखों में माधव जी हाइकु काव्य के झेन तत्त्व को उद्घाटित करते हैं तो साथ ही उनकी व्यंजना को भी प्रकट करते हैं| वे एक आलेख में तीन पंक्ति वाले हाइकु को वामन के तीन डग के माध्यम से समझाते हैं| हाइकु में फोटोग्राफी, चित्रकला आदि कलाएं किस प्रकार गूंथ सकती हैं यह भी दिखाया गया है| एक आलेख में माधव जी के ही अभिनव काव्य शास्त्रीय ग्रंथ वागीश्वरीकंठसूत्र के कुछ संदर्भों  से हाइकु कविता को जोड़ा गया है जो दिलचस्प है| 



द्वितीय खंड - 

                  इस खंड में कवि माधव जी के हाइकु रचना संसार पर 7 आलेख हैं जिनमें 5 हिंदी भाषा में और 2 अंग्रेजी भाषा में निबद्ध हैं| प्रो मंजुलता शर्मा ने माधव जी के हाइकु काव्यों में विद्यमान कॉलेज कन्या के मनोविज्ञान को बहुत रोचक तरीके।से प्रस्तुत किया है| गौरतलब है कि माधव जी के कई हाइकु के कॉलेज कन्या का चित्रण भिन्न भिन्न दृष्टि से किया गया है| प्रो सुदेश आहूजा ने कवि के हाइकु काव्यों में  वर्णित चांद और चांदनी पर चर्चा की है| भरत डी परमार ने  बारिश पर आधारित हाइकु काव्यों को प्रस्तुत किया है और उनकी बेहतरीन व्याख्या की है| युवा समीक्षक अरुण निषाद ने इन हाइकुओं को अछूते कोने की कविता कहा है| dr रीता त्रिवेदी ने हाइकु काव्यों के विशेष संदर्भ में माधव जी के सर्जकत्व का परिचय दिया है| राजेश जी  ने हाइकु काव्यों में  वृक्ष को लेकर अपना आलेख अंग्रेजी में लिखा है और शुभ्रजीत सेन ने इन हाइकु काव्यों में प्रतिबिंबित शहरी जीवन को उल्लिखित किया है| 


तृतीय खंड - 

            इस खंड में माधव जी के प्रत्यग्र 338 हाइकु काव्यों को संकलित कर प्रकाशित किया गया है और साथ में श्रीमती इला घोष जी कृत हिंदी अनुवाद भी दिया गया है | जिस तरह ये संस्कृत हाइकु वेधक हैं उसी तरह हिंदी अनुवाद भी बेहतरीन‌‌ किया गया है| कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -


सुधापटलैः 

क्षरन्ति स्मृतयोऽपि 

वृद्धगृहस्य ॥१॥


झर (क्षीण हो) रही है 

रेत-चूने के साथ, 

यादें भी, बूढ़े घर की 


न सन्ति पृष्ठे 

मे शत्रुप्रहाराणां 

चिह्नानि हन्त ! ॥६६॥


नहीं है, 

शत्रु-प्रहारों के चिह्न, 

मेरी पीठ पर  

(मैं युद्ध से, पीठ दिखाकर नहीं भागा हूँ। मैने अपने वक्षःस्थल पर प्रहारों को झेला है)।


 पाशयितुं मां 

जल-बिन्दुभिर्मेघैः

 कृतं पञ्जरम् ॥२३९॥


मुझे बाँधने के लिये, 

मेघों ने जल की बूंदों से, 

पिञ्जरा बनाया है 



 वस्तुतः यह काव्य संग्रह संस्कृत में हाइकु काव्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा| जो  कवि संस्कृत में हाइकु रच रहे हैं उन्हें भी इसे पढ़ कर विचार करना चाहिए कि क्या उनके लिखे गए हाइकु हाइकु कविता के इर्द गिर्द भी आ पा रहे हैं या केवल वे 17 अक्षरों की लघु कविता मात्र बन कर रह गए हैं| साथ ही हर लघु कविता को हाइकु कहने वालों को  भी हाइकु के तत्त्व को समझने की आवश्यकता है|  जो महाकवि हाइकु काव्य को हेय समझते हैं उन्हें देखना चाहिए कि हाइकु महज काव्य ना होकर साधना है| आप महाकाव्य लिखते ही हैं कतिपय हाइकु भी तो लिख के देखिए| संस्कृत में ग़ज़ल उपन्यास आदि लिख के भी हाइकु काव्यों को हेय समझने वाले जो मान्य हैं उनके लिए तो क्या कहें| इति 









 

Friday, May 24, 2024

आधुनिक संस्कृत साहित्य की समीक्षा का नवीन ग्रंथ

कृति - आधुनिक संस्कृत साहित्य अभिनव प्रयोग एवं संभावनाएं

कृतिकार - प्रो मंजूलता शर्मा

विधा - आलोचना

संस्करण - प्रथम 2024

प्रकाशक - परिमल पब्लिकेशन दिल्ली 98911 43247

पृष्ठ संख्या - 250

अंकित मूल्य - 550




आधुनिक संस्कृत साहित्य में रचनाएं तो प्रभूत मात्रा में लिखी जा रही हैं, किंतु उनकी समीक्षा उस रूप में नहीं हो पा रही है जिस तरह होनी चाहिए| कुछ एक समीक्षक ही हैं जो रचना के साथ न्याय कर पाते हैं| साहित्य जिस रूप में लिखा गया है, जिस विधा में लिखा गया है, उस की तह तक पहुंच कर उस कृति पर लिखना कठिन कार्य है| नवीन साहित्य की समीक्षा के लिए नवीन काव्यशास्त्र भी रचे जा रहे है , यथा अभिनवकाव्यालंकारसूत्र, अभिराजयशोभूषण, काव्यालंकारकारिका, वागीश्वरीकंठसूत्र आदि| किंतु इन ग्रंथों और संस्कृत से भिन्न भारतीय आदि भाषाओं के साहित्य की आलोचना को पढ़ कर नवीन संस्कृत साहित्य की समीक्षा बहुत कम की जाती है, जबकि यह बहुत आवश्यक है | 



                        प्रो मंजुलता शर्मा‌‌ आधुनिक संस्कृत साहित्य की समीक्षीका के रूप में सर्वविदित हैं| विभिन्न पत्रिकाओं आदि में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं| मंजुलता जी के आधुनिक संस्कृत साहित्य पर इस से पूर्व भी कई ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं को सहृदयों द्वारा सराहे गए हैं , यथा अर्वाचीन संस्कृत साहित्य दशा और दिशा, आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, आधुनिक संस्कृत साहित्य के नए भाव बोध आदि| इसी वर्ष आपका नया आलोचना ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है आधुनिक संस्कृत साहित्य अभिनव प्रयोग एवं संभावनाएं | इसकी शुभाशंसा वरिष्ठ आलोचक इला घोष जी ने लिखी है और साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त प्रो अरुण रंजन मिश्र जी ने भी अंग्रेजी भाषा में इस कृति पर अपने विचार प्रकट किए हैं| 

            प्रस्तुत कृति में 16 लेखों का संकलन किया गया है जो आधुनिक संस्कृत की विभिन्न भावों को उद्घाटित करते हैं | ललित निबंध से हम परिचित हैं किंतु देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी ने इसी के रूप को कुछ परिवर्तित करते हुए एक नवीन विधा का सूत्रपात किया और उसे नाम दिया ललित कथा| कलानाथ जी की पुस्तक ललितकथाकल्पवल्ली की ललित कथाओं का परिचय देते हुये मंजुलता जी ने इस विधा से भी बहुत अच्छे से परिचित करवाया है| आधुनिक संस्कृत कविता में किस प्रकार वेदांत दर्शन प्रतिबिंबित हो सकता है इसका बखूबी परिचय देते हुए आलेख है- वेदांत को आत्मसात करती आधुनिक कविताएं | राधावल्लभ त्रिपाठी, हर्षदेव माधव,‌ सीतानाथ आचार्य आदि की कविताओं से यहां उदाहरण भी दिए गए हैं| अरुण रंजन मिश्र संस्कृत में उत्तर आधुनिकता के लिए जाने जाते हैं| उत्तर आधुनिक कविता का नया पड़ाव आलेख में मिश्र जी के दो काव्य संग्रहों से उदाहरण देते हुए उन्हें उत्तर आधुनिक संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ सर्जक के रूप में प्रदर्शित किया है, जो यथोचित भी है| हर्षदेव माधव के स्मृतकथा संग्रह स्मृतीनां जर्जरितानि पृष्ठानि पर एक सुंदर आलेख संकलित हैं | स्मृतियों की जुगाली करते हुए इंसान अपने अतीत का अपने तरीके से स्मरण करता है, उन्हे सहेजता है|



                     जनार्दन प्रसाद पांडेय मणि जी की कृति सौरभेयी, सर्वाधिक प्रतिभाशाली युवा कवि ऋषिराज जानी के संस्कृत के प्रथम वैज्ञानिक उपन्यास अंतरिक्षयोधा, हरिदत्त शर्मा रचित वैदिशिकाटनम्, कौशल तिवारी के काव्य संग्रह गुलिका पर भी पृथक से आलेख संकलित किए गए हैं| युवा प्रखर कवि प्रवीण पंड्या जी के विभिन्न काव्यों से उदाहरण देते हुए समीक्षिका ने पंड्या जी की कविता के मर्म को बेहतर तरीके से परत दर परत खोला है | 

         आधुनिक संस्कृत काव्य में प्रसिद्ध मुक्तछंद, स्त्रीविमर्श, मोनोइमेज, लोकधर्मीछंद, नवीन अलंकार एवं बिंब, 21 शताब्दी की नई कविताआदि पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक की विशेषता है| 



          यह संकलन उन के लिए उपयोगी है जो आधुनिक संस्कृत साहित्य में लिखे गई रचनाओं से परिचित होना चाहते हैं, शोध करना चाहते हैं, उसके मर्म को, व्यंजना को।समझना चाहते हैं| मंजुलता जी की सरस शैली आपको कहीं भी रिक्तता का अनुभव नहीं करवाती| आलेख की भाषा पाठक को थामे रखती है| यह ग्रंथ निश्चित ही आधुनिक संस्कृत साहित्य के दस्तावेज के रूप में याद किया जाएगा|