Wednesday, June 19, 2024

जीवन दृष्टि से युक्त मुक्तककाव्य _ जीवनमुक्तकम्

कृति _ जीवनमुक्तकम्

कृतिकार - शंकर देव अवतरे 

विधा _ मुक्तक काव्य 

प्रकाशक_साहित्य सहकार , दिल्ली

संस्करण_ 1990 प्रथम

पृष्ठ संख्या _ 303

अंकित मूल्य_ 120 रुपए 





       संस्कृत साहित्य में मुक्तककाव्य विधा में अनेक काव्य रचे गए हैं| इनके विषय प्रायः सूक्ति, स्तुति, प्रशस्ति, शृंगार आदि पर आधारित होते हैं| किंतु कवि अब इन काव्यों में समसामयिक विषयों पर भी कविताएं लिख रहा है| शंकर देव अवतरे की रचनाएं हिन्दी और संस्कृत दोनों में ही प्राप्त होती है| नारीगीतम् नाम से इनका एक काव्य अत्यंत प्रसिद्ध रहा है| जीवनमुक्तकम् काव्य संग्रह में कवि ने जीवन संबंधी स्फुट पद्य लिखे हैं, जो परस्पर निरपेक्ष हैं| इस संग्रह में पारंपरिक छंदों में लिखे गए 375 पद्य निबद्ध हैं| संग्रह के प्रारंभिक पद्यों में भक्ति भावना से युक्त श्लोक हैं, कवि कहता है कि  भाषा के रूप में जब सरस्वती ज्ञान विज्ञान के बोझ से थक जाती है तो भक्ति रूपी गंगा के प्रवाह में स्नान करके ही उसे शांति प्राप्त होती है_


ज्ञानविज्ञानभारेण परिश्रान्ता सरस्वती 

भक्तिगंगाप्रवाहेण क्षालिता शान्तिमृच्छति ||

 



         कविता मात्र शब्दों का जोड़ तोड़ नहीं है अपितु वह तो कवि की संवेदनाओं में सिक्त होकर ही अपनी अर्थवत्ता प्रकट करती है_



न वसुधा वसुधान्यवती न या 

न रजनी रजनीश्वरवञ्चिता 

न दयिता दयितासुरसा न चेत्

न कविता कवितापविवर्जिता ||


       अर्थात्  वह भूमि बेकार है जिसमें धन-धान्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। वह रात्रि अच्छी नहीं लगती जिसमें चन्द्रमा का प्रकाश नहीं है। वह प्रिया नहीं है जो अपने प्रिय को प्राणों (जीवन) का रस नहीं दे सकती  और वह कविता भी नहीं के बराबर है जो कवि की हार्दिक वेदना या संवेदना से अछूती होती है| यहां यमक अलंकार का भी सुंदर प्रयोग किया गया है, जो द्रुतविलंबित छंद में निबद्ध है| 

             वर्तमान समय में सहिष्णुता प्रायः विलुप्त हो चुकी है| लगता है हम अपनी धर्म निरपेक्षता को कहीं ताक पर रख कर भूल गए हैं| ऐसी स्थिति में कवि का कर्तव्य बनता है कि वह अपने पाठकों, श्रोताओं को उसका स्मरण कराता रहे_


 कस्यापि धर्मस्य मतावलम्बिना

 परस्य धर्मो न कदापि गर्ह्यताम्

 विश्वासमन्यस्य सदैव विश्वसे - 

दियं समाजस्श्रितिरौपपत्तिकी ||

                      अर्थात्  किसी भी धार्मिक सिद्धान्त को मानने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी दूसरे के धर्म की निन्दा न करे। क्योंकि धर्म तात्त्विक रूप में विश्वास का ही पर्याय है इसलिए एक दूसरे के विश्वास पर विश्वास करना ही चाहिए तभी एक-दूसरे के धर्म का सन्मान हो सकता है। सामाजिक मर्यादा का यही तकाजा है, अन्यथा समाज तितर-बितर हो जाएगा। 

        कवि ने वर्तमान राजनीति की दशा पर भी चिंता प्रकट की है| प्रजातन्त्र मे जनशक्ति, धनशक्ति  और पदशक्ति से प्रभावित होकर वोट दिया जाता है, उसी का परिणाम यह होता है कि नेता नाट्यशास्त्र के धृष्ट नायक के समान प्रजातंत्र का गला घोंट देता है_


जनस्य शक्तिश्च धनस्य शक्तिः

 पदस्य शक्तिश्च मतग्रहेषु 

व्यक्तेः प्रमाणीक्रियते न वृत्तम्

कृता प्रजातन्त्रविडम्बनेयम्  ||


प्रार्थयन् यो मतात् पूर्वं पश्चाल्लोकं कदर्थयन् 

धृष्टनायकवन्नेता स प्रजातन्त्रघातकः ||


एक श्लोक में मनुष्य जाति पर व्यंग्य किया गया है जो पहले महापुरुषों को मारकर  उनकी समाधि बनाती है फिर उन पर रोती  है_


पूर्व स्वेनैव हत्त्वा निजयुगपुरुषान् निघृणा मर्त्यजातिः

 पश्चात् तेषां समाधिं रचयति रचयन्त्यश्रुधारां मुखाग्रे

 पुंश्चल्या वृत्तमेतद् रहसि निजपतिं यत् स्वयं मारयित्त्वा

 पश्चात् पिण्डेन सार्धं समुचितविधिना सा सतीत्त्वं प्रयाति ||


अर्थात् यह नृशंस मानव जाति पहले तो अपने युगपुरुषों को अपने हाथ से मार देती है और पीछे मुंह पर आंसू बहाती हुई उन्हीं महापुरुषों की समाधि  बनवाया करती है। यह कुछ-कुछ उस कुलटा स्त्री के समान है जो पहले तो एकान्त में अपने पति की हत्या करती है परन्तु पीछे उसकी ल्हाश के साथ विधिपूर्वक सती होने का ढोंग करती है।



   कवि ने नारी विषयक अच्छे श्लोकों की रचना की है, जिनमें दांपत्य का भी सुंदर चित्रण किया गया है| कुछ श्लोक प्राचीन श्लोकों की भांति सूक्तिपरक हैं| श्लोकों के साथ उनका हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में अनुवाद भी दिया गया है| 




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