Friday, January 2, 2026

गायत्रम् _ संस्कृत कविता का सशक्त निदर्शन

कृति - गायत्रम्

कृतिकार - प्रवीण पण्ड्या

विधा - कवितासंग्रह

प्रकाशक - विश्वबानी पब्लिकेशंस, भोपाल

प्रकाशन वर्ष - 2025

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या -96

अंकित मूल्य - 220/-



   प्रवीण पण्ड्या की गणना संस्कृत के प्रखर, तेजस्वी कवियों में होती है। कवि संस्कृत में चार काव्यसंग्रह, एक नाट्ससंकलन, एक कथासंग्रह, छह समीक्षात्मक पुस्तकों सहित आठ अनुवादसंग्रह एवं तीन शास्त्रीय ग्रन्थ प्रकाशित हैं। साहित्य अकादेमी के दो पुरस्कारों सहित कवि को आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी सम्मान, माघ पुरस्कार आदि प्राप्त हैं। प्रस्तुत संग्रह कवि का पांचवा काव्यसंग्रह है।

          इस संग्रह में कविताएं मुक्तच्छन्द में निबद्ध हैं। संकलित कविताओं की संख्या 36 हैं। कवि ने स्वयं इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है। संग्रह के आरम्भ में ही कवि अपनी कविताओं को द्रष्टा की कविता न कहकर श्रोता की कविताएं कहता है - कोई कवि मुझमें अवतीर्ण हुआ। वह बोला। मैंने कभी सावधान तो कभी अनवधान होकर सुना। ये द्रष्टा की नहीं, श्रोता की कविताएं हैं। श्रवण से मैं कवि हुआ। संग्रह के नामकरण को अन्वर्थ बताते हुए कहते हैं कि ज्ञान (सविता) जब धरती को छूता है तो वह गायत्री होता है। कवि अपनी अजंलि में जितना ले पाते हैं, वह धरातल पर उतरा हुआ गायत्र होता है।



       प्रथम कविता कस्त्वम् (कौन हो तुम) एक दीर्घ कविता है। कवि प्रश्न करता हुआ कहता है -

हे! हे! हे!

उपरि व्योम,

न स्वात्मनि विस्तरति।

अधो धरणी,

न स्वातन्त्र्येण प्रसरति।

उभे गुप्तं परतस्तुभ्यम्।

इतस्ततो या दिशज्ञता न दिशो

डाकिन्यस्त्वदिङ्गितैकजीविन्यः।


हे कौन हो तुम?

ऊपर आकाश नहीं फैलता है

स्वात्मा में,

और नीचे धरती

नहीं पसरती है अपनी मर्जी से।

दोनों जासूस हैं तुम्हारे।

इधर उधर की दिशाएं दिशाएं नहीं ,

तुम्हारी डाकिनियां हैं।      

         आत्मविष्णवो वयम् कविता युगबोध की कविता है, जो अपने समय का संज्ञान लेती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प की कर्णावती यात्रा में सडक के दोनों ओर सात फीट की दीवार बनाकर झुग्गी झोपडियोें को उनकी दृष्टि से बचाने का प्रयास किया गया था। इस को लेकर कवि ने यह कविता रची है-

राजन्!

आयाति ते राष्ट्रं सम्राट्,

किमर्थं दिदर्शयिषुस्त्वं

देशस्याऽर्धम्,

अर्धं चावृत्य।


कोई सम्राट् आ रहे हैं

राजन्! उन्हें क्यों दिखाना चाहते हैं

आधा अधूरा देश।

(आधे को छुपाकर)    



       समकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाले अनेक कवि हैं किन्तु केवल समसामयिक घटनाओं के वर्णन मात्र से ही आधुनिकता नही आती है। घटनाओं का सपाट वर्णन उसे अखबार की खबर मात्र जैसा बनाकर रख देता है। प्रतीयमानार्थ अर्थात् व्यंग्यार्थ जब तक काव्य में नहीं होगा, वह उत्कृष्ट नहीं बन सकती है। प्रवीण पण्ड्या एक कुशल कवि हैं। वे समसामयिक घटनाओें को यदि अपनी कविता का पात्र बनाते हैं तो उसमेे एक समूचा युगबोध प्रतिबिम्बित होता दृष्टिगोचर होता है-

सम्राट्! अलमलम्

ते देदीप्यमानेभ्यो यानपथेभ्यो यानेभ्यः,

उज्ज्वलं प्रकाशमानेभ्यो विविधेभ्यो बाह्यप्रदर्शनेभ्यः समं

तोलयितुम्,

नो निर्वापयितुमशक्यैर्हृज्योतिभिः।

सम्राट्!

देहविष्णुस्त्वम्

आत्मविष्णो वयम्।


सम्राट्!

तुम्हारी

चमाचम सडकों, कारों

झमाझम तामझामों की तुलना मत कर बैठना

हमारे हृदयों के उजाले से।

देह बडा हो सकता है तुम्हारा

आत्मा में विशाल हैं हम।

      संग्रह में दीर्घ कविताओं के साथ लघु कलेवर वाली कविताएं भी है। तेन तत्र. किं दृष्टम् डर कर भागे हुए एक बच्चे के मनोविज्ञान को टटोलने का प्रयास करती है तो विन्दुवृत्तौ कविता बिंदु और वृत्त के माध्यम से परमात्मा और प्रकृति की कथा कहती है। मिथकों के माध्यम से भी कवि अपना कथ्य प्रस्तुत करता है और वर्तमान राजनीति के प्रत्येक पक्ष को प्रकट करता हुआ अक्षाः प्रवर्तन्ताम् रचता है। सन्नाहः अथार््त् तैयार नामक छोटी सी कविता हमारे बाजारवाद की परते उघाड कर रख देती है। अगर आकाश यह सोचे कि राकेट को भेजना बच्चों का खेल है तो वह गलत सोच रहा है। वह तो इसलिए भेजे जा रहे हैं क्योंकि वहां अभी तक पृथ्वी की तरह बाजार नहीं खुला है और इस कारण आकाश को अधूरेपन का अहसास होता होगा-

व्योमन्!

त्वयि न सन्ति विपणयः।

वराकस्य तेऽनैयून्यसम्पादनाय

यतामहे वयम्,

नो रॉकेटप्रेक्षेपणं

नास्ति

नास्ति

नास्ति

बाललीला।।



      नास्ति क्रिया का प्रयोग तीन बार दृढता के लिए किया गया है। विचिकित्सा कविता में कवि वैयाकरणों, अर्थवेत्ताओं, वैतालिकों आदि से कुछ प्रश्न करता है। अन्नदाता शब्द के लिए कवि कहता है कि किसानों के लिए प्रयुक्त अन्नदाता शब्द क्या उपहास मात्र नहीं बन कर रह गया है क्योंकि अपनी देह को जोतते हुए ये किसान अब स्वयं अन्न बन चुके हैं -

अर्थज्ञ!

अन्नदातेति हासस्तु नास्ति,

हासस्तूज्ज्वल उक्तः।

नास्ति किमेष उपहासः कश्चित्

स्वात्मनि दैन्यं जीवते

स्वयमन्नीभूताय

कस्मैचित्।

कर्षन्तो स्वदेहं कर्षका एव।

       यहां कृष् धातु का प्रयोग साभिप्राय किया गया है। इसी तरह कवि प्रश्न करता है कि जब संसद् में सांसद एक साथ मिलकर बैठ (सदन) नहीं सकते तो फिर वह संसद् कैसी, वे सांसद कैसे-

एकीभवनाय न सदनं येषां

तैः कथं संसद् भवति-

इति कस्तावन्मां बोधयितुं शक्तो

निःशक्ते क्षणे?

ऐक्यं विघटियुतं वांछन्तः

सांसदाः कथं भवेयुः?



       ये कविताएं एक ओर संस्कृत भाषा के गाम्भीर्य को प्रदर्शित करती है तो दूसरी ओर यह भी सिद्ध करती है कि संस्कृत में समसामयिक विषयों पर बेहतरीन कविताएं रची जा रही हैं।



Thursday, January 1, 2026

आधुनिक संस्कृत साहित्य का विहंगावलोकन

 कृति -  भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् modern sanskrit literature in india:A Bird's eye view

कृतिकार - शुभ्रजित् सेन

विधा - आलोचना

प्रकाशक - संस्कृत पुस्तक भण्डारकोलकत्ता

प्रकाशन वर्ष - 2019

संस्करण - प्रथम

पृष्ठ संख्या - 504

अंकित मूल्य - 600/-



      आधुनिक संस्कृत साहित्य का फलक अत्यन्त विस्तृत है। न केवल मात्रात्मक अपितु गुणात्मक दृष्टि से भी संस्कृत का आधुनिक साहित्य प्रकर्ष पर है।  इसके परिचय के लिए कई ग्रन्थ भी लिखे गए हैयथा हीरालाल शुक्लकेशवराव मुसलगांवरकरश्रीधरभास्कर वर्णेकरदेवर्षि कलानाथ शास्त्रीआचार्य राधावल्लभ त्रिपाठीमंजुलता शर्मा आदि द्वारा लिखे गए ग्रन्थ। आधुनिक संस्कृत साहित्य के विहंगावलोकन के लिए युवा विद्वान् शुभ्रजित् सेन द्वारा भारतवर्षे आधुनिकसंस्कृतसाहित्यम्: विहंगमदृष्ट्या परिशीलनम् यह ग्रन्थ लिखा गया है। ग्रन्थ संस्कृत भाषा में ही लिखा गया है।



        प्रस्तुत ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है-

प्रथम अध्याय - आधुनिकतायाः तत्स्वरूपं च

      इस अध्याय में आधुनिकता की परिभाषाएं देते हुए अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के काल विभाजन पर भी विचार किया गया है। यहां भारतीय विद्वानों के मतों के साथ-साथ  पाश्चात्य विद्वानों के मतों का भी उल्लेेख करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि आधुनिकता न केवल कालगत है और न केवल मनोभावगत है अपितु दोनों ही आधुनिकता के नियामक शक्तिरूप हैं- एतदाधुनिकत्वं न कालगतं किन्तु मनोभावगतमिति। किन्तु न हि केवलं मनोभावापरपर्यायमाधुनिकत्वंसमयनिष्ठमपीति। एतद्द्वयमाधुनिकसाहित्यस्य तथा संस्कृतसाहित्यस्यापि नियामकशक्तिरूपम्।

द्वितीय अध्याय - आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये वस्त्वाङ्गिकदृष्ट्या परिवर्तनम्

               प्रस्तुत अध्याय में आधुनिक नाटक साहित्यगद्य साहित्य तथा पद्य साहित्य में आये प्रमुख परिवर्तनों तथा नवीन प्रवृत्तियों का सोदाहरण उल्लेख किया गया है। आधुनिक संस्कृत नाटकों मे आये भाषागत परिवर्तनोंतकनीकि परिवर्तनोंवस्तुगत परिवर्तनों के साथ रंगमंच के परिवर्तनों पर भी चर्चा की गई है। नाट्य की एक प्रमुख विधा नृत्यनाटिका का भी यहां वर्णन किया गया है। रेडियो नाटक की चर्चा करते हुए राधावल्लभ त्रिपाठी कृत प्रेक्षणकसप्तकम् को इस विधा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया हैकिन्तु यह सही नहीं है। प्रेक्षणकसप्तकम् रेडियोनाटक न होकर नुक्कडनाटक विधा का ग्रन्थ है।

   संस्कृत गद्यकाव्य की प्रवृत्तियों में प्रणयकथासामाजिक-कथालोककथाहास्यकथाचित्रकथा आदि के साथ उपन्यास नामक महत्त्वपूर्ण विधा का सोदाहरण वर्णन है। साथ ही ललितनिबन्ध नामक नवीन विधा पर चर्चा उपादेय है। संस्कृत कविता में हुए अन्तरंग और बहिरंग परिवर्तननवीन छन्द-प्रयोग,   महाकाव्य विधा में हुए परिवर्तन जीवनीमूलक काव्य आदि के वर्णन से यह अध्याय महत्त्वपूर्ण बन जाता है।



तृतीय अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतालंकारशास्त्रम्

      काव्य की समीक्षा के लिएउसके लक्षणभेदगुण-दोष आदि की चर्चा के लिए काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) रचे जाते रहे हैंजो लेखकसमीक्षक और सहृदय पाठकों/श्रोताओं के लिए उपादेय होते हैं। चूंकि संस्कृत में नये काव्य लिखे जा रहे हैं तो तदनुरूप नवीन काव्यशास्त्र भी लिखे गए हैं। इस अध्याय में पण्डितराज जगन्नाथ के बाद से 21 वीं सदी तक लिखे गए महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों पर चर्चा की गई है। यहां अलंकारशास्त्री के परिचय के साथ उनके द्वारा लिखित अलंकारशास्त्र का संक्षिप्त परिचय दिया गया हैयथा - रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत काव्यालंकारकारिकाअभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत अभिराजयशोभूषणम्राधावल्लभ त्रिपाठी कृत अभिनवकाव्यालंकारसूत्रब्रह्मानन्द शर्मा कृत रसालोचन। 

चतुर्थ अध्याय - अर्वाचीनसंस्कृतेवाङ्मये छन्दसां वैचित्र्यम्

         यद्यपि छन्द वैविध्य का वर्णन द्वितीय अध्याय में किया गया है किन्तु यहां पृथक् से उसका वर्णन विस्तार से किया गया है। मुक्तच्छन्दहिन्दी भाषा के छन्दहाइकुसॉनेटतांकासीजो जैसे वैदेशिक छन्द आदि छन्दोवैविध्य की विशद चर्चा की गई है। साथ ही वीरेन्द्र भट्टाचार्यकालीपद तर्काचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी के छन्द प्रयोग पर अलग से चर्चा की गई है। गौरतलब है कि  सॉनेट छन्द प्रयोग में वीरेन्द्र भट्टाचार्य तथा राधावल्लभ त्रिपाठी ने विशेष रूप से काव्यसर्जन किया है। इसी तरह हर्षदेव माधव हाइकुतांका और सीजो छन्दों के प्रयोग में विशेष रूप से जाने जाते हैं।



पंचम अध्याय - भारतवर्षे अर्वाचीनसंस्कृत वाङ्मय कवयितारः

     प्रस्तुत अध्याय के चार दिशाओं के आधार पर चार भाग करके प्रत्येक दिशा में स्थित राज्यों का आधुनिक संस्कृत में किये गए योगदान का वर्णन किया गया है। उत्तरप्रदेशहिमाचलप्रदेशमध्यप्रदेशराजस्थानदिल्ली आदि राज्यों के साहित्यकारों के योगदान के वर्णन के साथ त्रिपुरानागालैण्डमिजोरम जैसे राज्यों का संस्कृत साहित्य में योगदान का वर्णन इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है। उत्तरप्रदेशराजस्थान आदि राज्यों के साहित्यिक योगदान को तो रेखांकित किया जाता रहा है किन्तु पूर्वोत्तर के इन राज्यों में संस्कत में क्या कार्य हो रहा हैइसकी चर्चा प्रायः उपलब्ध नहीं होती है।

षष्ठ अध्याय - बङ्गभूमेः अर्वाचीनसंस्कृतसाहित्यम्

             यद्यपि पंचम अध्याय में बंगाल प्रदेश के येागदान पर चर्चा की जा सकती थी किन्तु लेखक ने इस प्रदेश के विस्तृत वर्णन के लिए पृथक् से अध्याय रखा है। ब्राह्मण-वशिष्ठ न्याय से हुए इस उल्लेख का कारण सम्भवतः लेखक का बंगभूमि से सम्बद्ध होना हो सकता है। इस अध्याय को दो पर्वों में विभक्त करके विधा तथा रचनाकार की दृष्टि से बंगप्रदेश के साहित्यिक योगदान का वर्णन किया गया है। यहां हरिदास सिद्धान्त वागीशयतीन्द्र विमल चौधुरीवीरेन्द्र भट्टाचार्य के साहित्यिक कार्यों के उल्लेख से पाठक समृद्ध होता है।



सप्तम अध्याय - आधुनिक संस्कृतसाहित्ये भारतवर्षे कवयित्र्यः

          संस्कृत साहित्य में महिला लेखकों के योगदान के वर्णन के लिए यह अध्याय रखा गया हैजो प्रशंसनीय है। प्रायः यह समझा जाता है कि संस्कृत में पुरुष लेखकों की ही रचनाएं हैं किन्तु आधुनिक संस्कृत की प्रायः 30 महिला लेखकों के साहित्य का यह परिचय इस को झुठला देता है।



 परिशिष्ट के रूप में साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार के विजेता संस्कृत साहित्यकारों तथा उनकी कृतियों की सूची दी गई है। साथ ही प्रमुख आधुनिक संस्कृत साहित्कारांें के चित्रों को भी यहां दिया गया है। यह ग्रन्थ आधुनिक संस्कृत का परिचय बखूबी प्रस्तुत करता है। यद्यपि इस ग्रन्थ मंे कतिपय रचनाकारों और कृतियों का उल्लेख नहीं हो पाया है क्योंकि एक ही ग्रन्थ में यह सम्भव नहीं है तथापि अपनी उत्तम सामग्री से यह ग्रन्थ उपादेय सिद्ध होगा।