कृति - गायत्रम्
कृतिकार - प्रवीण पण्ड्या
विधा - कवितासंग्रह
प्रकाशक - विश्वबानी पब्लिकेशंस, भोपाल
प्रकाशन वर्ष - 2025
संस्करण - प्रथम
पृष्ठ संख्या -96
अंकित मूल्य - 220/-
प्रवीण पण्ड्या की गणना संस्कृत के प्रखर, तेजस्वी कवियों में होती है। कवि संस्कृत में चार काव्यसंग्रह, एक नाट्ससंकलन, एक कथासंग्रह, छह समीक्षात्मक पुस्तकों सहित आठ अनुवादसंग्रह एवं तीन शास्त्रीय ग्रन्थ प्रकाशित हैं। साहित्य अकादेमी के दो पुरस्कारों सहित कवि को आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी सम्मान, माघ पुरस्कार आदि प्राप्त हैं। प्रस्तुत संग्रह कवि का पांचवा काव्यसंग्रह है।
इस संग्रह में कविताएं मुक्तच्छन्द में निबद्ध हैं। संकलित कविताओं की संख्या 36 हैं। कवि ने स्वयं इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है। संग्रह के आरम्भ में ही कवि अपनी कविताओं को द्रष्टा की कविता न कहकर श्रोता की कविताएं कहता है - कोई कवि मुझमें अवतीर्ण हुआ। वह बोला। मैंने कभी सावधान तो कभी अनवधान होकर सुना। ये द्रष्टा की नहीं, श्रोता की कविताएं हैं। श्रवण से मैं कवि हुआ। संग्रह के नामकरण को अन्वर्थ बताते हुए कहते हैं कि ज्ञान (सविता) जब धरती को छूता है तो वह गायत्री होता है। कवि अपनी अजंलि में जितना ले पाते हैं, वह धरातल पर उतरा हुआ गायत्र होता है।
प्रथम कविता कस्त्वम् (कौन हो तुम) एक दीर्घ कविता है। कवि प्रश्न करता हुआ कहता है -
हे! हे! हे!
उपरि व्योम,
न स्वात्मनि विस्तरति।
अधो धरणी,
न स्वातन्त्र्येण प्रसरति।
उभे गुप्तं परतस्तुभ्यम्।
इतस्ततो या दिशज्ञता न दिशो
डाकिन्यस्त्वदिङ्गितैकजीविन्यः।
हे कौन हो तुम?
ऊपर आकाश नहीं फैलता है
स्वात्मा में,
और नीचे धरती
नहीं पसरती है अपनी मर्जी से।
दोनों जासूस हैं तुम्हारे।
इधर उधर की दिशाएं दिशाएं नहीं ,
तुम्हारी डाकिनियां हैं।
आत्मविष्णवो वयम् कविता युगबोध की कविता है, जो अपने समय का संज्ञान लेती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प की कर्णावती यात्रा में सडक के दोनों ओर सात फीट की दीवार बनाकर झुग्गी झोपडियोें को उनकी दृष्टि से बचाने का प्रयास किया गया था। इस को लेकर कवि ने यह कविता रची है-
राजन्!
आयाति ते राष्ट्रं सम्राट्,
किमर्थं दिदर्शयिषुस्त्वं
देशस्याऽर्धम्,
अर्धं चावृत्य।
कोई सम्राट् आ रहे हैं
राजन्! उन्हें क्यों दिखाना चाहते हैं
आधा अधूरा देश।
(आधे को छुपाकर)
समकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाले अनेक कवि हैं किन्तु केवल समसामयिक घटनाओं के वर्णन मात्र से ही आधुनिकता नही आती है। घटनाओं का सपाट वर्णन उसे अखबार की खबर मात्र जैसा बनाकर रख देता है। प्रतीयमानार्थ अर्थात् व्यंग्यार्थ जब तक काव्य में नहीं होगा, वह उत्कृष्ट नहीं बन सकती है। प्रवीण पण्ड्या एक कुशल कवि हैं। वे समसामयिक घटनाओें को यदि अपनी कविता का पात्र बनाते हैं तो उसमेे एक समूचा युगबोध प्रतिबिम्बित होता दृष्टिगोचर होता है-
सम्राट्! अलमलम्
ते देदीप्यमानेभ्यो यानपथेभ्यो यानेभ्यः,
उज्ज्वलं प्रकाशमानेभ्यो विविधेभ्यो बाह्यप्रदर्शनेभ्यः समं
तोलयितुम्,
नो निर्वापयितुमशक्यैर्हृज्योतिभिः।
सम्राट्!
देहविष्णुस्त्वम्
आत्मविष्णो वयम्।
सम्राट्!
तुम्हारी
चमाचम सडकों, कारों
झमाझम तामझामों की तुलना मत कर बैठना
हमारे हृदयों के उजाले से।
देह बडा हो सकता है तुम्हारा
आत्मा में विशाल हैं हम।
संग्रह में दीर्घ कविताओं के साथ लघु कलेवर वाली कविताएं भी है। तेन तत्र. किं दृष्टम् डर कर भागे हुए एक बच्चे के मनोविज्ञान को टटोलने का प्रयास करती है तो विन्दुवृत्तौ कविता बिंदु और वृत्त के माध्यम से परमात्मा और प्रकृति की कथा कहती है। मिथकों के माध्यम से भी कवि अपना कथ्य प्रस्तुत करता है और वर्तमान राजनीति के प्रत्येक पक्ष को प्रकट करता हुआ अक्षाः प्रवर्तन्ताम् रचता है। सन्नाहः अथार््त् तैयार नामक छोटी सी कविता हमारे बाजारवाद की परते उघाड कर रख देती है। अगर आकाश यह सोचे कि राकेट को भेजना बच्चों का खेल है तो वह गलत सोच रहा है। वह तो इसलिए भेजे जा रहे हैं क्योंकि वहां अभी तक पृथ्वी की तरह बाजार नहीं खुला है और इस कारण आकाश को अधूरेपन का अहसास होता होगा-
व्योमन्!
त्वयि न सन्ति विपणयः।
वराकस्य तेऽनैयून्यसम्पादनाय
यतामहे वयम्,
नो रॉकेटप्रेक्षेपणं
नास्ति
नास्ति
नास्ति
बाललीला।।
नास्ति क्रिया का प्रयोग तीन बार दृढता के लिए किया गया है। विचिकित्सा कविता में कवि वैयाकरणों, अर्थवेत्ताओं, वैतालिकों आदि से कुछ प्रश्न करता है। अन्नदाता शब्द के लिए कवि कहता है कि किसानों के लिए प्रयुक्त अन्नदाता शब्द क्या उपहास मात्र नहीं बन कर रह गया है क्योंकि अपनी देह को जोतते हुए ये किसान अब स्वयं अन्न बन चुके हैं -
अर्थज्ञ!
अन्नदातेति हासस्तु नास्ति,
हासस्तूज्ज्वल उक्तः।
नास्ति किमेष उपहासः कश्चित्
स्वात्मनि दैन्यं जीवते
स्वयमन्नीभूताय
कस्मैचित्।
कर्षन्तो स्वदेहं कर्षका एव।
यहां कृष् धातु का प्रयोग साभिप्राय किया गया है। इसी तरह कवि प्रश्न करता है कि जब संसद् में सांसद एक साथ मिलकर बैठ (सदन) नहीं सकते तो फिर वह संसद् कैसी, वे सांसद कैसे-
एकीभवनाय न सदनं येषां
तैः कथं संसद् भवति-
इति कस्तावन्मां बोधयितुं शक्तो
निःशक्ते क्षणे?
ऐक्यं विघटियुतं वांछन्तः
सांसदाः कथं भवेयुः?
ये कविताएं एक ओर संस्कृत भाषा के गाम्भीर्य को प्रदर्शित करती है तो दूसरी ओर यह भी सिद्ध करती है कि संस्कृत में समसामयिक विषयों पर बेहतरीन कविताएं रची जा रही हैं।










