कृति - वीरभद्ररचनावली (प्रथमो भागः)
लेखक - वीरभद्रमिश्र
सम्पादक - महराजदीन पाण्डेय
प्रधानसम्पादक - प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री
प्रकाशक - राष्टिय संस्कृत संस्थान , नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष -2017
पृष्ठ संख्या - 42 +362
अंकित मूल्य - 270रु/-
डॉ. वीरभद्र मिश्र आधुनिक संस्कृत साहित्य में सुपरिचित लेखक हैं। आप संस्कृत भाषा के अनन्य साधक तो रहे ही साथ ही आपने संस्कृत भाषा के प्रचार में भी महत्त्वपूर्ण अवदान दिया है। डॉ. वीरभद्र मिश्र का परिवार संस्कृतमय रहा है। डॉ. मिश्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आपके द्वारा 1977 से 2000 ई. तक सर्वगन्धा नामक पत्रिका का सम्पादन किया गया जो रचना व आलोचना की पत्रिका रही है| सर्वगन्धा के प्रत्येक अंक में सम्पादक की कविता रहती थी। महराजदीन पाण्डेय, जो कि स्वयं आधुनिक संस्कृत साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं, ने बहुत परिश्रम से डॉ. वीरभद्र मिश्र की रचनाओं को संकलित कर वीरभद्र-रचनावली के नाम से दो भागों में प्रकाशित करवाया है।
वीरभद्र-रचनावली का प्रथम भाग आठ खण्डों में विभक्त है। जिनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
खण्ड - 1:-
इस खण्ड को पुनः तीन भागों में बांटा गया है। कविता - प्रथम भाग में वीरभद्र मिश्र रचित 116 कविताएं हैं। कवि क्रान्ति के लिये गीत गाते हैं-
पुनरपि लब्धः श्वासो जागृहि वीता रात्रिः काली
क्रान्तिर्नवा कृता जनताभिः प्राप्ता नवा प्रणाली
स्वाधीनता-विरहिते तन्त्रे नहि भारत-विश्वासः
पुनरपि लब्धः श्वासः।।
कवि की रचनाओं में व्यंग्य का प्रयोग बखूबी किया गया है। वर्तमान राजनीति पर व्यंग्य करते हुए कवि कहते हैं कि आज जो दण्डनीय है वह कल मन्त्री पद का उत्तराधिकारी भी हो सकता है, राजनीति का इन्द्रजाल है ही ऐसा-
अद्य यः सर्वाधिशासी
श्वः स कारागारवासी
योऽद्य घुष्टः दण्डनीयः
श्वः स मन्त्रीपदविलासी
जयी मुक्तः सर्वदोषाद् जिते लिम्पति दोषजालम्
राजनीतेरिन्द्रजालम्।।
गेहे गेहे डैडी मम्मी, हे गर्दभः! तुभ्यं नमः, स स एव पतिर्मे, नो त्रपेथाः इत्यादि रचनाएं हास्य-व्यंग्य से भरपूर हैं। कवि ने जातिप्रथा पर भी करारा व्यंग्य करते हुए एक मात्र जाति मानव जाति को कहा है-
जातिं पृच्छति वेदविहीनः
वेदो ब्रह्म तदीयो ज्ञाता योसौ स स्याद् यदा ब्राह्मणः
वेदविरोधी ब्राह्मणपुत्रो राक्षसपदभाग् यथा रावणः
वेदविहीनः शूद्रः सर्वो नहि वर्णी, स तु वर्णविहीनः। जातिं.......................,
एका जातिः मानवजातिः न तु विप्रक्षत्रादिः जातिः
स तु वर्णः, वरणात् वृत्तिमान्, वर्णात्पृथक्प्रसिद्धा जातिः
शूद्रो वेदं पठन् ब्राह्मणः, विप्रोऽपठन्, शूद्रको दीनः। जातिं.......................,
नैव शिरो हार्यम् कविता में कवि ने दलितजनों के उत्थान की बात कही है।
ताजमहल पर लिखी मार्मिक कविता बतलाती है कि ऊंचे ताजमहल के नीचे कितनी दमित इच्छाएं दबी हुई हैं।
कविता - द्वितीय भाग में वीरभद्र मिश्र रचित 18 कविताएं हैं। एति वसन्तः कविता में वसन्त के आगमन का गीत गाया गया है तो आगता होली! कविता में होली के आगमन की प्रसन्नता दृष्टिगोचर होती है। होलिका गीतिका ‘बुरा न मानो होली है’ की तर्ज पर लिखी गई रचना है, जिसमें राजनेताओं के नाम लेकर हास्य-व्यंग्य की सृष्टि की गई है। सिता राका हिन्दी सिनेमा के गीत ‘सुहानी चांद रातें’ की लय पर निबद्ध गीत है।
कविता - तृतीय भाग में वीरभद्र मिश्र रचित 34 कविताएं हैं। ये सभी कविताएं बालसाहित्य की अनुपम उदाहरण हैं। लालनी कविता शिशुस्वापगीति है। खन्तम् मन्तम् गीत उल्लेखनीय गीत है। एक जांघ पर शिशु को लेटाकर शरीर को झूले के समान हिलाते हुए लोकगीत गाया जाता है। कवि ने संस्कृत में उसकी अनुरूप गीत रचा है। खन्तम् मन्तम् निरर्थक ध्वनि है जो झूलाने की बोधक है-
खन्तं मन्तं................पणकं लब्धम्
तद् गंगायै मया प्रदत्तम्
तया गंगया रजः प्रदत्तम्
मया भर्जकं प्रति तद् दत्तम्
बाललीला, चल मम घोटक!, दुग्धं पिब रे, चन्द्र मातुल!,दोलागीतम् आदि सभी बालगीत सरल संस्कृत में रचे गये हैं।
खण्ड - 2:- (युगधर्मः)
प्रस्तुत खण्ड में डॉ. वीरभद्र मिश्र विरचित युगधर्मः नामक महाकाव्य दिया गया है। इसमें पांच सर्ग हैं। इसका नायक धीरोदत्त है। पंचम सर्ग में पारम्परिक छन्दों के साथ दोहा, चौपाई आदि का भी प्रयोग किया गया है।
खण्ड - 3:- (लघुवंशम्)
इस खण्ड मे डॉ. वीरभद्र मिश्र विरचित लघुवंशम् नामक महाकाव्य संकलित है, जो कालिदास के रघुवंश महाकाव्य की शैली में लिखा गया विडम्बन काव्य है। इस महाकाव्य के तीन सर्ग हैं। प्रथम सर्ग में 95 श्लोक तथा द्वितीय सर्ग में 75 श्लोक हैं। तृतीय सर्ग केवल 18 श्लोक तक ही उपलब्ध है। इस महाकाव्य में खलनायक प्रतिनिधि लघु का वर्णन किया गया है। महाकाव्य के कई श्लोक रघुवंश के श्लोकों की शैली के ही हैं-
मधु-मक्षिकवद् युक्तौ मधुमाक्षिक-सिद्धये।
नेतृणां पितरौ वन्दे मिथ्यास्वार्थौ निरन्तरम्।।
क्व कूटप्रभवो वंशः क्व संस्कृतगता मतिः।
पुपूषुर्दूषितां जाडयात् काव्येनास्मि जाह्नवीम्।।
खण्ड - 4:- (रूपकम्)
प्रस्तुत खण्ड में कवि वीरभद्र मिश्र रचित 14 रूपक संकलित हैं। सभी रूपक एकांकी हैं। पूजायां सत्यमहिमा, अहं संस्कृतसेवकः, वेतालकथा, पादुकाशासनम् आदि समस्त रूपक अभिनेय हैं। इनका मंचन संस्कृत कार्यक्रमों में किया जाना चाहिए ताकि जनसामान्य की रूचि भी संस्कृत के प्रति बढे।
खण्ड - 5:- (अस्तव्यस्तपुराणम्)
यह पुराणों में प्रसिद्ध गल्पविधान पर रचा गया काव्य है। वर्तमान समय को आधार बनाकर लिखी गई यह कृति पठनीय है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-
सूत उवाच- कलियुगे वस्तुतः पुराणमार्गः फलप्रदः। ते एव राजानो भविष्यन्ति ये निर्वाचनकाले असंभवाद् अपि असम्भवाः प्रतिज्ञाः करिष्यन्ति। समाजस्य यः अप्रबुद्धो वर्गः तं लोभयिष्यन्ति, यस्मिन् क्षेत्रे यस्मिन् वर्गे च गमिष्यन्ति तं तं पुराणरीत्या प्रशंसयिष्यन्ति, यथा हि हिन्दीक्षेत्रे वक्तव्यं- हिन्दी देशस्य राष्ट्र भाषा सा स्वस्थानं प्रापयिष्यते। अहिन्दीक्षेत्रे वक्तव्यं हिन्दी कस्यापि उपरि बलान्न आरोपयिष्यते। इति परस्परं विरुद्धं वचो निर्भयं निर्लज्जं वक्तव्यं, तेनैव सिद्धिः इति।
खण्ड - 6:- (धृतराष्ट्रोपनिषद्)
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह त्याग देकर जब केन्द्र में चले गये थे, तब की राजनीति को आधार बनाकर कवि ने इस की रचना की। तत्कालीन राजनीति पर व्यंग्यपरक यह रचना पाठकों के मनोरंजन के साथ-साथ राजनीति का चरित्र उद्घाटित करती चलती है। यह गीता की कहनशैली में रचा गई है, यथा-
धृतराष्ट्रो उवाच -
कुतस्त्वां कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनेतृजुष्टं नीतिघ्नं सत्ताशास्त्रविगर्हितम्।।
न त्वेवाहं सती साध्वी, न त्वं नेमे विराधिनः।
न चैव न भविष्यामो भ्रष्टा वयमितः परम्।।
खण्ड - 7:- (अनुनयः)
इस खंड में एक विरही नायक की अभिव्यक्ति है|
खण्ड - 8:- (भद्रकोषः)
प्रस्तुत खण्ड में आधुनिक शब्दावली के लिए नवीन संस्कृत शब्द दिए गए हैं| यथासंभव उनके लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द भी दिए गए हैं| इस तरह के कोष अर्वाचीन साहित्य के लिए बहुत आवश्यक हैं| भारती पत्रिका में लम्बे समय तक देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी ने अंग्रेजी, हिंदी और संस्कृत तीन भाषाओं में शब्द दिए थे| यदि कोई शोधार्थी अर्वाचीन साहित्य में प्रयुक्त नवीन शब्दों को संकलित कर सके और वह प्रकाशन में आए तो यह एक बहुत बड़ा कार्य होगा|
विभाष कवि (डॉ महराज दीन पाण्डेय जी) का यह प्रशस्त कार्य है और वह संस्कृत साहित्य के एक विशिष्ट स्वर डा. वीरभद्र मिश्र की रचनावली के संपादन के लिए प्रणम्य और बधाई के अधिकारी हैं। वीरभद्र मिश्र का जीवन एक व्रत था, एक नैष्ठिक अनुष्ठान और गहन उपासना था और जिसमें देवता भी संस्कृत, पूजा के पुष्प भी संस्कृत और उपासक भी संस्कृत है। सर्वगन्धा के अंकों के संपादकीय में उनकी जो स्पंदित चेतना अनुभूत होती है, वह बहुत कम लेखकों और संपादकों में होती है। डा मिश्र द्वारा संपादित सर्वगन्धा के अंक डिजिटल संस्करण में सार्वजनिक उपलब्ध करवाए जा सके तो उसका एक एक शब्द जलता हुआ अंगारा है और वह हमारे समय की भस्म को दूर कर उसे प्रकाशित करेगा।
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