Saturday, June 13, 2020

दूतककाव्य परम्परा का नवोन्मेष - दूतप्रतिवचनम्

दूतककाव्य परम्परा का नवोन्मेष - दूतप्रतिवचनम् 
कृति - दूतप्रतिवचनम् (प्रणवरचनावली में संकलित)
विधा - पद्यकाव्य
लेखक -डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणव’
प्रकाशक - देववाणी परिषद्, दिल्ली
पृष्ठ संख्या - 505
अंकित मूल्य - 1100 रू


दूतकाव्य परम्परा में कालिदास कृत मेघदूत एक कालजयी कृति है। इस रचना की भावभूमि के आधार पर संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में अनेक रचनाएं होती रही हैं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में भी इस परम्परा में कई रचनाएं सामने आई हैं, जिनमें अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत प्रबोधशतकम् (यहां यक्षिणी को पत्र के माध्यम से संदेश भेजा गया है), हर्षदेव माधव कृत यक्षस्य वासरिका (उपन्यासविधा) प्रमुख हैं। इसी क्रम में डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणव’ ने मित्रदूतम् व दूतप्रतिवनम् की रचना की है।
                                दूतप्रतिवचनम् सर्वप्रथम देववाणी परिषद्, दिल्ली से सन् 1989 में प्रकाशित हुआ। तत्पश्चात् इसका संकलन  प्रणवरचनावली में सुप्रभातम्, प्रणवभागवतम्, बालगीतांजलिः, समुज्जवला आदि के साथ किया गया है| इसमें कुल 62 पद्य हैं, जो आद्यन्त मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध हैं। मेघदूत का मेघ जब यक्षिणी को सन्देश देकर लोटता है तो यक्ष उससे उस भारत के विषय में पूछता है, जिसे उसने मार्ग में देखा है। प्रणव कवि के काव्य में मात्र सुकुमार भावों का ही प्रवाह नहीं हैं वरन् वर्तमान भारत देश की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओं और विसंगतियों भी हैं। काव्य के प्रारम्भ में कवि भारतयक्षों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं -

 हं हो! भारतयक्षा! दूतप्रतिवचनं निशम्य चित्ते।
कुरुथ विचारं सततं देशे  किं तेऽस्ति करणीयम्।।

मेघ यक्षिणी की विरहजनित पीडा का साक्षी बनता है। पति के समीप न रहने  नारी को जो दंश झेलने पडते हैं, कवि मन ने उन्हें अनुभूत किया है। जैसे स्नेह (तेल) के अभाव में बत्ती जल जाती है, उसी प्रकार प्रियतम के स्नेह से रहित प्रियतमा का जीवन नष्ट हो जाता है-

बन्धो! हन्त  त्रुटितमधुना  धर्मचक्रं समन्ताद्,
भिन्नः सेतुः प्रणयसरितो यस्त्वया बद्धपूर्वः।
साधो सर्वं शिथिलमभवत् स्नेहजातं  प्रियाणां 
क्षीणे स्नेहे  ज्वलति विकला वर्तिका नात्रं चित्रम्।।

इस काव्य में वर्तमान में परिवर्तित होते सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का बखूबी वर्णन किया गया है। अब यक्षिणी अपनी आजीविका चलाने के लिये घर से बाहर निकलती है और रास्ते में पुरुषों के द्वारा किये गये अश्लील शब्दों एवं उपहासों को सहन करती है। अब यक्षिणी कृशांगी,विरहिणी नहीं है अपितु वह तो इस प्रकार की हो गई है-

तन्वी श्यामा शिखरिदशना यक्षिणी या त्वदीया,
टी.वी.मध्ये चपलनयना तारिका दृश्यते सा। 
कान्ते स्वांगे विमलवटिकं फेनिलं  लिप्यमाना,
स्नान्त्युन्मुक्ता भवति विविधक्रयवस्तुप्रचारे।।

समाज में प्रदूषित होते वातावरण, शिक्षा के गिरते स्तर, बढती महंगाई व बेरेाजगारी आदि अनेक समस्याओं का वर्णन इस काव्य में प्राप्त होता है, यथा-

गेहे गेहे नगरविपणौ व्याकुलता नो युवानो,
येषां हस्तेष्वलघुभरवनत्यंकपत्राणि सन्ति।
नित्यं प्राप्तुं किमपि धनदां कांचिदाजीविकां ते,
कायार्गारादुवसि निकटे पंक्तिबद्धा भवन्ति ।।


इस काव्य में कवि प्रणव ने सामाजिक स्थिति का ही नहीं वरन् देश की राजनीतिक स्थिति का भी यथार्थ चित्रण किया है। सफेद खादी में धूर्त नेतागण स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं। कवि ने धूर्त नेताओं की तुलना बगुले से की है।  कवि कटाक्ष करते हुए कहते हैं-

योऽसौ दृष्टो धवलवसनो यानमध्ये निविष्टः,
स्टेनोयुक्तश्चपलवचनो मन्त्रिनाम्ना प्रसिद्धः।
सोऽयं नेताऽपहृतविभवो भूतपूर्वे चुनावे,
कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।।

कवि ने यहां मेघदूत की पंक्ति का सुन्दर उपयोग किया है। 
कालिदास के मेघदूत में विदिशा की राजधानी वाला महान् देश दशार्ण अब धनधान्य और शोभा को खोकर दीनहीन हो गया है। बेतवा में जल की धारा भी स्वल्प हो गई है। रेवा नदी पर बांध बांधने के कारण घना वन प्रदेश काटा जा रहा है तथा फैक्टरियों  के कारण नदियों का जल प्रदूषित हो गया है।  सीमेन्ट बनाने के कारण विन्ध्य पर्वत चूर-चूर हो गया है-

रेवा खिन्ना प्रतिदिनमहो बन्धकृद्भिर्विबद्धा, 
ठेकेदारैः परमनुदिनं छिद्यते काननं तत्।
सीमेण्टार्थं कणविरचने यन्त्रशालाऽसुरिभिः,
तुंगो विन्ध्यो व्यथितहृदयश्चूर्ण्यते पिष्यते च ।। 

डॉ. इच्छाराम द्विवेदी ने गिरते मूल्यों व अपसंस्कृति के विविध चित्रों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। मेघ के माध्यम से कवि ने भारत देश में व्याप्त विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया है। कविकुलगुरु कालिदास की अलंकारयुक्त शैली का अनुगमन करते हुए उपमा, श्लेष, अनुप्रास की त्रिवेणी प्रवाहित की है। कवि ने अपने हृदय की पीडा को मेघ के दौत्य कर्म के माध्यम से व्यक्त किया है। दूतकाव्यों की अभिनवीनता मेें कवि का प्रयास स्तुत्य है।


-डॉ. सुदेश आहुजा
सम्पर्कसूत्र- 9413404463

4 comments:

  1. बहुत ख़ूबसूरत लिखा है मैडम आपने। हार्दिक बधाई।
    डॉ द्विवेदी ने अपनी लेखनी से समाज में व्याप्त विकृतियों पर जो कटाक्ष किया है, आपने उसे रेखांकित कर महाकवि के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त की है।
    पुनश्च बधाई।

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  2. Meghdhoot is a very creative and unique piece of writing work of Dr.Ichcharam dwivedi among many of his precious work done in sanskrit.He was a multitalented personality.I really appreciate you for your beautiful explanation of this wonderful creation called meghdoot. Thanks a lot sudesh madam.

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