शोध पत्रिका- सागरिका
आरम्भ- विक्रम संवत् 2019 (1962 ई.)
प्रकाशक- सागरिका समिति, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) 470003
भाषा- संस्कृत
आवृत्ति- त्रैमासिक
विधा- शोधपत्रिका
संस्थापक संपादक- प्रो. रामजी उपाध्याय
प्रधान संपादक- प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
संपादक- प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी
प्रबन्ध संपादक-डॉ. शशिकुमार सिंह
संपादक मण्डल- डॉ. नौनिहाल गौतम, डॉ. संजय कुमार, डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. किरण आर्या
आईएसएसएन- 2229-5577
संस्कृत की प्राचीन पत्रिकाओं में सागरिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रकाशन सुविधाओं के अभाव और संचारसाधनों की न्यूनता के बावजूद संस्कृत की पत्रिका का प्रकाशन साहसपूर्ण कार्य था। शुरुआत में इसका मुद्रण वाराणसी या प्रयाग से करवाया जाता था। आरम्भ में यह पत्रिका षाण्मासिक थी जो बाद में त्रैमासिक हो गयी। इसका प्रकाशन भारतीय तिथियों के अनुसार प्रतिवर्ष चैत्र, आषाढ, आश्विन और पौष माह में होता है। आरम्भिक अंकों में पत्रिका में संपादकीय, शोधपत्र, काव्य, संस्कृत वृत्त, ग्रन्थ समीक्षा, सागर विश्वविद्यालय में जारी शोधकार्य स्तम्भ होते थे। वर्तमान में इसमें केवल शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। सागरिका का पहला अंक डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, श्री जीवन्याय तीर्थ, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, श्री मंगलदेव शास्त्री, श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य, श्री धीरेन्द्र वर्मा, श्री सत्यव्रत सिंह, कृष्णनम्पूतिरिपाद, श्री कृष्णदत्त वाजपेयी, श्री गणपति शुक्रु, श्री व्रतीन्द्रकुमार सेनगुप्त, श्री रामकिशोर मिश्र, श्री शिवचन्द्र भट्टाचार्य, श्री मंजुलमय कपंतुल, श्री रुद्रदेव त्रिपाठी, श्रीमती वनमाला भवालकर, श्री विश्वनाथ शास्त्री और श्री रामगोपाल मिश्र के लेख, काव्य और संस्कृत वृत्त से समन्वित होकर प्रकाशित हुआ था। पिछली शती के विद्वान् आचार्यों, लेखकों और शोधार्थियों के गंभीर चिन्तनपरक लेख इसकी गरिमा के परिचायक हैं। एक ओर स्थापित विद्वानों को इस पत्रिका में आदर मिला वहीं दूसरी ओर शोधरत छात्रों को भी प्रकाशन का अवसर प्राप्त हुआ। पण्डित वायुनन्दन पाण्डेय, आचार्य अमरनाथ पाण्डेय, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, पं. बच्चूलाल अवस्थी, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया था। आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का सीताचरितमहाकाव्य प्रथमतः सागरिका में ही प्रकाशित हुआ था। देश के प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों को एक साथ पढ़ना विद्यारसिकों के लिए आनन्ददायक होता है। संस्कृतवाङ्मय के शास्त्रीय विषयों पर इसमें लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जैसे श्री गोपीनाथ कविराज का लेख ‘शाक्तदृष्ट्या सृष्टितत्त्वविमर्शः’। इसमें प्रकाशन हेतु भाषा की अर्हता रही है, वह है संस्कृत। विषयानुकूल होने पर अन्य भाषा में प्रकाशित लेखों को संस्कृत में अनूदित करके भी प्रकाशित किया गया है। विषयानुकूल लेखों का पुनः प्रकाशन भी किया गया है। इसके प्रकाशन की लगभग साठ वर्षों की अवधि में प्रो. रामजी उपाध्याय, डॉ. वनमाला भवालकर, डॉ विश्वनाथ भट्टाचार्य, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. रामगोपाल मिश्र, डॉ. मनोरमा त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया ने सम्पादन के दायित्व का निर्वहन किया है। प्रो. अच्युतानन्द दाश कुछ वर्षों तक प्रबन्ध संपादक रहे। काव्यशास्त्र विशेषांक के अतिथि संपादक प्रो. रमाकान्त पाण्डेय हैं। इकतालीसवें वर्ष में डॉ. शीतांशु त्रिपाठी संपादनसहायक रहे हैं। इसके अब तक सोलह विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं जो संग्रहणीय हैं। उनका विवरण इस प्रकार है-
राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक (महामहिम राष्ट्रपति) - प्रथम वर्ष में
भारतीय संस्कृति विशेषांक - द्वितीय वर्ष में
विश्व संस्कृत सम्मेलन विशेषांक - दशम वर्ष में
कालिदास विशेषांक- द्वादश त्रयोदश वर्ष में
ज्योतिष विशेषांक- षोडश वर्ष में
नाट्यवेद विशेषांक- सप्तदश वर्ष में
मध्ययुगीन संस्कृत नाटक विशेषांक- अष्टादश वर्ष में
भट्टतौत विशेषांक- बाईसवें वर्ष में
रजत जयन्ती विशेषांक- पच्चीस वें वर्ष में
प्राचीन भारतीय समाज दर्शन विशेषांक- उनतीसवें वर्ष में
मनुस्मृति विशेषांक- तैंतीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत साहित्य विशेषांक- पैंतीसवें वर्ष में
संस्कृत गौरव विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
संस्कृत व्याकरण विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत गद्यकाव्य विशेषांक- सैतीसवें वर्ष में
काव्यशास्त्र विशेषांक- उनतालीसवें वर्ष में
आचार्यरामजीउपाध्यायस्मृतिविशेषांक- बयालीसवें वर्ष में
इनके अतिरिक्त अंक 47.1-4 में केवल महाकवि कालिदास से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित हैं, इसी प्रकार अंक 48.4 में महाकवि भास व भवभूति पर केन्द्रित शोधपत्र प्रकाशित हैं। अंक 48.1-2 में केवल डॉ. पूर्णचन्द्र उपाध्याय का बृहत् शोधकार्य ‘अर्वाचीनाचार्यराधावल्लभीयसंस्कृतसाहित्ये पार्यावरणचेतना’ प्रकाशित है।
आईएसएसएन युक्त यह पत्रिका यूजीसी एप्रूव्ड जर्नल में सूचीबद्ध रही है। इसमें शोधपत्रों का प्रकाशन निःशुल्क होता है। आरम्भ से ही शोधपत्र लेखकों को लेखकीय प्रति निःशुल्क दी जाती रही है। इस पत्रिका का सदस्यता शुल्क 25रू प्रति अंक, 100 रू वार्षिक, 1000 रू प्रतिव्यक्ति आजीवन, 2000 रू. प्रति संस्था आजीवन है। आजीवन सदस्यता ग्रहण करने पर पुराने उपलब्ध अंक निःशुल्क दिये जाते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका सागरिका संस्कृत पत्रकारिता में एक प्रतिष्ठापूर्ण नाम है। सागर की यह सागरिका शोधपत्रिका शोधार्थियों के लिए ‘गागर में सागर’ की तरह अत्यन्त उपादेय है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत जगत् के लिए गौरव का विषय है।
आरम्भ- विक्रम संवत् 2019 (1962 ई.)
प्रकाशक- सागरिका समिति, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) 470003
भाषा- संस्कृत
आवृत्ति- त्रैमासिक
विधा- शोधपत्रिका
संस्थापक संपादक- प्रो. रामजी उपाध्याय
प्रधान संपादक- प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
संपादक- प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी
प्रबन्ध संपादक-डॉ. शशिकुमार सिंह
संपादक मण्डल- डॉ. नौनिहाल गौतम, डॉ. संजय कुमार, डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. किरण आर्या
आईएसएसएन- 2229-5577
संस्कृत की प्राचीन पत्रिकाओं में सागरिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रकाशन सुविधाओं के अभाव और संचारसाधनों की न्यूनता के बावजूद संस्कृत की पत्रिका का प्रकाशन साहसपूर्ण कार्य था। शुरुआत में इसका मुद्रण वाराणसी या प्रयाग से करवाया जाता था। आरम्भ में यह पत्रिका षाण्मासिक थी जो बाद में त्रैमासिक हो गयी। इसका प्रकाशन भारतीय तिथियों के अनुसार प्रतिवर्ष चैत्र, आषाढ, आश्विन और पौष माह में होता है। आरम्भिक अंकों में पत्रिका में संपादकीय, शोधपत्र, काव्य, संस्कृत वृत्त, ग्रन्थ समीक्षा, सागर विश्वविद्यालय में जारी शोधकार्य स्तम्भ होते थे। वर्तमान में इसमें केवल शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। सागरिका का पहला अंक डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, श्री जीवन्याय तीर्थ, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, श्री मंगलदेव शास्त्री, श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य, श्री धीरेन्द्र वर्मा, श्री सत्यव्रत सिंह, कृष्णनम्पूतिरिपाद, श्री कृष्णदत्त वाजपेयी, श्री गणपति शुक्रु, श्री व्रतीन्द्रकुमार सेनगुप्त, श्री रामकिशोर मिश्र, श्री शिवचन्द्र भट्टाचार्य, श्री मंजुलमय कपंतुल, श्री रुद्रदेव त्रिपाठी, श्रीमती वनमाला भवालकर, श्री विश्वनाथ शास्त्री और श्री रामगोपाल मिश्र के लेख, काव्य और संस्कृत वृत्त से समन्वित होकर प्रकाशित हुआ था। पिछली शती के विद्वान् आचार्यों, लेखकों और शोधार्थियों के गंभीर चिन्तनपरक लेख इसकी गरिमा के परिचायक हैं। एक ओर स्थापित विद्वानों को इस पत्रिका में आदर मिला वहीं दूसरी ओर शोधरत छात्रों को भी प्रकाशन का अवसर प्राप्त हुआ। पण्डित वायुनन्दन पाण्डेय, आचार्य अमरनाथ पाण्डेय, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, पं. बच्चूलाल अवस्थी, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया था। आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का सीताचरितमहाकाव्य प्रथमतः सागरिका में ही प्रकाशित हुआ था। देश के प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों को एक साथ पढ़ना विद्यारसिकों के लिए आनन्ददायक होता है। संस्कृतवाङ्मय के शास्त्रीय विषयों पर इसमें लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जैसे श्री गोपीनाथ कविराज का लेख ‘शाक्तदृष्ट्या सृष्टितत्त्वविमर्शः’। इसमें प्रकाशन हेतु भाषा की अर्हता रही है, वह है संस्कृत। विषयानुकूल होने पर अन्य भाषा में प्रकाशित लेखों को संस्कृत में अनूदित करके भी प्रकाशित किया गया है। विषयानुकूल लेखों का पुनः प्रकाशन भी किया गया है। इसके प्रकाशन की लगभग साठ वर्षों की अवधि में प्रो. रामजी उपाध्याय, डॉ. वनमाला भवालकर, डॉ विश्वनाथ भट्टाचार्य, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. रामगोपाल मिश्र, डॉ. मनोरमा त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया ने सम्पादन के दायित्व का निर्वहन किया है। प्रो. अच्युतानन्द दाश कुछ वर्षों तक प्रबन्ध संपादक रहे। काव्यशास्त्र विशेषांक के अतिथि संपादक प्रो. रमाकान्त पाण्डेय हैं। इकतालीसवें वर्ष में डॉ. शीतांशु त्रिपाठी संपादनसहायक रहे हैं। इसके अब तक सोलह विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं जो संग्रहणीय हैं। उनका विवरण इस प्रकार है-
राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक (महामहिम राष्ट्रपति) - प्रथम वर्ष में
भारतीय संस्कृति विशेषांक - द्वितीय वर्ष में
विश्व संस्कृत सम्मेलन विशेषांक - दशम वर्ष में
कालिदास विशेषांक- द्वादश त्रयोदश वर्ष में
ज्योतिष विशेषांक- षोडश वर्ष में
नाट्यवेद विशेषांक- सप्तदश वर्ष में
मध्ययुगीन संस्कृत नाटक विशेषांक- अष्टादश वर्ष में
भट्टतौत विशेषांक- बाईसवें वर्ष में
रजत जयन्ती विशेषांक- पच्चीस वें वर्ष में
प्राचीन भारतीय समाज दर्शन विशेषांक- उनतीसवें वर्ष में
मनुस्मृति विशेषांक- तैंतीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत साहित्य विशेषांक- पैंतीसवें वर्ष में
संस्कृत गौरव विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
संस्कृत व्याकरण विशेषांक- छत्तीसवें वर्ष में
आधुनिक संस्कृत गद्यकाव्य विशेषांक- सैतीसवें वर्ष में
काव्यशास्त्र विशेषांक- उनतालीसवें वर्ष में
आचार्यरामजीउपाध्यायस्मृतिविशेषांक- बयालीसवें वर्ष में
इनके अतिरिक्त अंक 47.1-4 में केवल महाकवि कालिदास से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित हैं, इसी प्रकार अंक 48.4 में महाकवि भास व भवभूति पर केन्द्रित शोधपत्र प्रकाशित हैं। अंक 48.1-2 में केवल डॉ. पूर्णचन्द्र उपाध्याय का बृहत् शोधकार्य ‘अर्वाचीनाचार्यराधावल्लभीयसंस्कृतसाहित्ये पार्यावरणचेतना’ प्रकाशित है।
आईएसएसएन युक्त यह पत्रिका यूजीसी एप्रूव्ड जर्नल में सूचीबद्ध रही है। इसमें शोधपत्रों का प्रकाशन निःशुल्क होता है। आरम्भ से ही शोधपत्र लेखकों को लेखकीय प्रति निःशुल्क दी जाती रही है। इस पत्रिका का सदस्यता शुल्क 25रू प्रति अंक, 100 रू वार्षिक, 1000 रू प्रतिव्यक्ति आजीवन, 2000 रू. प्रति संस्था आजीवन है। आजीवन सदस्यता ग्रहण करने पर पुराने उपलब्ध अंक निःशुल्क दिये जाते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका सागरिका संस्कृत पत्रकारिता में एक प्रतिष्ठापूर्ण नाम है। सागर की यह सागरिका शोधपत्रिका शोधार्थियों के लिए ‘गागर में सागर’ की तरह अत्यन्त उपादेय है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत जगत् के लिए गौरव का विषय है।
रामजी उपाध्याय ने 1956 में आधुनिक संस्कृत साहित्य पर परिसंवाद कराया था। इस परिसंवाद के शेष बचे पैसे से सागरों का पत्रिका आरम्भ हुई थी। प्रोफेसर विश्वनाथ भट्टाचार्य जी ने यह बताया था।वे पहले सागर विश्वविद्यालय में थे।प्रोफेसर रामजी उपाध्याय के वे बड़े प्रशंसक थे।उनका संस्कृत के प्रति अनुराग बड़ी दृढ़ तरथा। यह पत्रिका आज भी जीवित है। सागर विश्वविद्यालय का इसको जीवित रखने का योगदान महत्वपूर्ण है। संस्कृत विभाग बधाई का पात्र है।आद्योपांत परिचय देने के लिए ननिहाल गौतम जी भी बधाई के पात्र है
ReplyDeleteपैसे से सागरिका
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