कृति – एकदा
विधा- बालोपयोगी लघुकथासंग्रह
प्रणेता – डाँ. केशवचन्द्रदाश
प्रकाशिका – लोकभाषा प्रचार समिति, शरधाबालि, पुरी – 752002 ।
द्वितीयसंस्करण – 1999,
मूल्यम् – Rs. 10/-
पृ. सं. – vi + 30.
प्रोफेसर केशव चन्द्र दाश का जन्म 06. 03. 1955 को ओडिशा प्रदेश के याजपुर जिलेन के हाटसाहि ग्राम में हुआ । एम्. ए., एम्. फिल्, पिएच्.डि, डि.लिट्, आचार्य, जर्मन भाषा तथा फ्रेञ्च् भाषा में डिप्लोमा, फिल्म निर्देशन तथा कम्प्यूटर प्रोग्रामिङ्ग आचार्य दाश की शिक्षागत योग्यतायें हैं । श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर न्याय विभाग से प्रोफेसर दाश सेवानिवृत्त हुए हैं । न्यायदर्शन के प्रख्यात विद्वान् होने के साथ साथ संस्कृत नव सर्जन में नव शैली के प्रयोक्ता के रूप में प्रोफेसर दाश प्रसिद्ध हैं । केशव चन्द्र दाश संस्कृत लेखन जगत् में कवि तथा उपन्यासकार के रूप में यशः धनी हैं । अपने लेखन में नामधातुओं का प्रयोग उनकी विशेषता है । लघु-लघु वाक्य प्रयोग के साथ गम्भीर दार्शनिक तत्त्व का सरल रूप में अपने उपन्यास और काव्यों में गुम्फन पाठक को एक नयी दुनिया में ले जाता है। प्राय 35 से भी अधिक पुस्तकें संस्कृत जगत् को उनकी देन है । कवि की कृतिओं का संग्रह साल 2013 में केशवकाव्यकलानिधिः इस शीर्षक से प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह का प्रथम भाग काव्य खण्ड है, द्वितीय भाग लघु कथा खण्ड है, तृतीय एवं चतुर्थ भाग उपन्यास खण्ड है । कभी आचार्य केशव चन्द्र दाश की सारी कृतिओं के ऊपर आलेख प्रस्तुत करने को अवसर मिलेगा तो प्रस्तुत करेङ्गे । यहाँ उनके एक बाल उपयोगी कथा संग्रह 'एकदा' का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं ।
इस बोलोपयोगी लघु कथा संग्रह में कुल 10 कथाएं हैं । हर एक कथा के प्रारम्भ में कथा की पृष्ठभूमि संक्षेप में प्रस्तुत की गई है । माधव और पुलोमजा नामक भाई - बहन के लिए दादी के मुख से प्रतिदिन शाम को जीवन में नीति, मूल्य और बौद्धिक विकास के लिए कवि ने कथाएं कहलवाई हैं । इन कथाओं को पढने से अपना बचपन याद आ जाता हैं जब हम लोग भी इस तरह की कहानियां सुना करते थे । कभी भगवान् की लीलाओं की कहानियां तो कभी पञ्चतन्त्र जैसी पशु पक्षियों की कहानियां, कभी हास्य रस के साथ अनगिनत पक्षियों के उडने की कहानियां तो कभी भूत प्रेतों की मनगढ़न्त डरावनी कहानियां । इस लघु कथा संग्रह में विवादः, धनम्, सत्यम्, अभिमानः, मृदु, अहिंसा, तिरस्कारः, अभयम्, समदर्शी और दैनन्दिनी शीर्षकों से दस कथायें हैं । अत्यन्त लघु-लघु वाक्य और सरल संस्कृत बालकों के संस्कृत सीखने के लिए भी उपयोगी है । हर एक कथा के अन्त में उस कथा की नीतिशिक्षा को कवि ने एक श्लोक के माध्यम से प्रस्तुत किया है । कथाओं की भाषा अत्यन्त सरल है । निदर्शन के रूप में अहिंसा शीर्षक कथा की पृष्ठभूमि से कुछ उद्धृतियां –
- पितामहि ! किं पुनः प्रार्थनां करोषि ? प्रार्थनया किं भवति ? पितामही बोधयितुमारब्धा ।
- प्रार्थनया मनः शुद्धं शान्तं च भवति । हिंसा च दूरीभवति । अहिंसायाः आविर्भावे परस्परविवादोऽपि नश्यति ।
- माधवः त्वरया अपृच्छत् तर्हि मार्जारोऽपि मूषिकं न खादेत् ? नकुलश्च सर्पं न मारयेत् ?
पितामही विमुखतया अवदत् ।
- नहि ... नहि ... तन्न वदामि । जीवनधारणाय केचन प्राकृतिकनियमाः सन्ति । तेन जीवाः जीवन्ति ।
माधवः अपृच्छत् ।
- तर्हि कोऽर्थः अहिंसायाः ?
पितामही अवर्णयत् ।
- शृणु... । एकदा ... (एकदा, अहिंसा, पृ. सं. 16)
इस तरह हर एक कथा का प्रारम्भ एकदा पद से हुआ है । इसलिए कथा संग्रह का नाम एकदा रखा गया है । प्रत्येक कथा कवि का नव सृजन है । कुछ स्थानों पर कवि ने नए शब्दों का प्रयोग भी किया है जो प्रान्तीय भाषा से प्रभावित हैं, जैसे निकटस्थपल्वलतः जलम् आनीय वृक्षलतानां मूले निगालितवती । (एकदा, अभयम्, पृ. सं. 23) हिन्दी में निकालना या फिर ओडिआ में निगाडिवा के अर्थ में यह शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है ।
प्रतिदिन मनुष्य को आत्म समीक्षण करना चाहिए । इस तथ्य को कवि ने अपनी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया है –
पितामही उपसंहारमुखेन अबोधयत् । प्रतिदिनं कर्म समीक्षणीयम् । अन्यथा महती हानिः भवेत् । तदेव उक्तम् अस्माकं शास्त्रे –
प्रत्यहं प्रत्यवेक्ष्येत नरश्चरितमात्मनः ।
किन्नु मे पशुभिस्तुल्यं किन्नु सत्पुरुषैरिव ।। (एकदा, दैनन्दिनी, पृ, सं. 30)
यह संग्रह यद्यपि लघुकाय हैं तथापि बालकों को कथा सुनाने के लिए संग्रहणीय हैं ।
-प्रो. केशवचंद्र दाश और उनके साहित्य की जानकारी के लिए ये लिंक उपयोगी है -
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Keshab_Chandra_Dash
विधा- बालोपयोगी लघुकथासंग्रह
प्रणेता – डाँ. केशवचन्द्रदाश
प्रकाशिका – लोकभाषा प्रचार समिति, शरधाबालि, पुरी – 752002 ।
द्वितीयसंस्करण – 1999,
मूल्यम् – Rs. 10/-
पृ. सं. – vi + 30.
प्रोफेसर केशव चन्द्र दाश का जन्म 06. 03. 1955 को ओडिशा प्रदेश के याजपुर जिलेन के हाटसाहि ग्राम में हुआ । एम्. ए., एम्. फिल्, पिएच्.डि, डि.लिट्, आचार्य, जर्मन भाषा तथा फ्रेञ्च् भाषा में डिप्लोमा, फिल्म निर्देशन तथा कम्प्यूटर प्रोग्रामिङ्ग आचार्य दाश की शिक्षागत योग्यतायें हैं । श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर न्याय विभाग से प्रोफेसर दाश सेवानिवृत्त हुए हैं । न्यायदर्शन के प्रख्यात विद्वान् होने के साथ साथ संस्कृत नव सर्जन में नव शैली के प्रयोक्ता के रूप में प्रोफेसर दाश प्रसिद्ध हैं । केशव चन्द्र दाश संस्कृत लेखन जगत् में कवि तथा उपन्यासकार के रूप में यशः धनी हैं । अपने लेखन में नामधातुओं का प्रयोग उनकी विशेषता है । लघु-लघु वाक्य प्रयोग के साथ गम्भीर दार्शनिक तत्त्व का सरल रूप में अपने उपन्यास और काव्यों में गुम्फन पाठक को एक नयी दुनिया में ले जाता है। प्राय 35 से भी अधिक पुस्तकें संस्कृत जगत् को उनकी देन है । कवि की कृतिओं का संग्रह साल 2013 में केशवकाव्यकलानिधिः इस शीर्षक से प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह का प्रथम भाग काव्य खण्ड है, द्वितीय भाग लघु कथा खण्ड है, तृतीय एवं चतुर्थ भाग उपन्यास खण्ड है । कभी आचार्य केशव चन्द्र दाश की सारी कृतिओं के ऊपर आलेख प्रस्तुत करने को अवसर मिलेगा तो प्रस्तुत करेङ्गे । यहाँ उनके एक बाल उपयोगी कथा संग्रह 'एकदा' का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं ।
इस बोलोपयोगी लघु कथा संग्रह में कुल 10 कथाएं हैं । हर एक कथा के प्रारम्भ में कथा की पृष्ठभूमि संक्षेप में प्रस्तुत की गई है । माधव और पुलोमजा नामक भाई - बहन के लिए दादी के मुख से प्रतिदिन शाम को जीवन में नीति, मूल्य और बौद्धिक विकास के लिए कवि ने कथाएं कहलवाई हैं । इन कथाओं को पढने से अपना बचपन याद आ जाता हैं जब हम लोग भी इस तरह की कहानियां सुना करते थे । कभी भगवान् की लीलाओं की कहानियां तो कभी पञ्चतन्त्र जैसी पशु पक्षियों की कहानियां, कभी हास्य रस के साथ अनगिनत पक्षियों के उडने की कहानियां तो कभी भूत प्रेतों की मनगढ़न्त डरावनी कहानियां । इस लघु कथा संग्रह में विवादः, धनम्, सत्यम्, अभिमानः, मृदु, अहिंसा, तिरस्कारः, अभयम्, समदर्शी और दैनन्दिनी शीर्षकों से दस कथायें हैं । अत्यन्त लघु-लघु वाक्य और सरल संस्कृत बालकों के संस्कृत सीखने के लिए भी उपयोगी है । हर एक कथा के अन्त में उस कथा की नीतिशिक्षा को कवि ने एक श्लोक के माध्यम से प्रस्तुत किया है । कथाओं की भाषा अत्यन्त सरल है । निदर्शन के रूप में अहिंसा शीर्षक कथा की पृष्ठभूमि से कुछ उद्धृतियां –
- पितामहि ! किं पुनः प्रार्थनां करोषि ? प्रार्थनया किं भवति ? पितामही बोधयितुमारब्धा ।
- प्रार्थनया मनः शुद्धं शान्तं च भवति । हिंसा च दूरीभवति । अहिंसायाः आविर्भावे परस्परविवादोऽपि नश्यति ।
- माधवः त्वरया अपृच्छत् तर्हि मार्जारोऽपि मूषिकं न खादेत् ? नकुलश्च सर्पं न मारयेत् ?
पितामही विमुखतया अवदत् ।
- नहि ... नहि ... तन्न वदामि । जीवनधारणाय केचन प्राकृतिकनियमाः सन्ति । तेन जीवाः जीवन्ति ।
माधवः अपृच्छत् ।
- तर्हि कोऽर्थः अहिंसायाः ?
पितामही अवर्णयत् ।
- शृणु... । एकदा ... (एकदा, अहिंसा, पृ. सं. 16)
इस तरह हर एक कथा का प्रारम्भ एकदा पद से हुआ है । इसलिए कथा संग्रह का नाम एकदा रखा गया है । प्रत्येक कथा कवि का नव सृजन है । कुछ स्थानों पर कवि ने नए शब्दों का प्रयोग भी किया है जो प्रान्तीय भाषा से प्रभावित हैं, जैसे निकटस्थपल्वलतः जलम् आनीय वृक्षलतानां मूले निगालितवती । (एकदा, अभयम्, पृ. सं. 23) हिन्दी में निकालना या फिर ओडिआ में निगाडिवा के अर्थ में यह शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है ।
प्रतिदिन मनुष्य को आत्म समीक्षण करना चाहिए । इस तथ्य को कवि ने अपनी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया है –
पितामही उपसंहारमुखेन अबोधयत् । प्रतिदिनं कर्म समीक्षणीयम् । अन्यथा महती हानिः भवेत् । तदेव उक्तम् अस्माकं शास्त्रे –
प्रत्यहं प्रत्यवेक्ष्येत नरश्चरितमात्मनः ।
किन्नु मे पशुभिस्तुल्यं किन्नु सत्पुरुषैरिव ।। (एकदा, दैनन्दिनी, पृ, सं. 30)
यह संग्रह यद्यपि लघुकाय हैं तथापि बालकों को कथा सुनाने के लिए संग्रहणीय हैं ।
-प्रो. केशवचंद्र दाश और उनके साहित्य की जानकारी के लिए ये लिंक उपयोगी है -
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Keshab_Chandra_Dash
प्रस्तुति – डा. पराम्बाश्रीयोगमाया
सहायक आचार्या, स्नातकोत्तर वेद विभाग,
श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीविहार,पुरी 752003, ओडिशा ।
सहायक आचार्या, स्नातकोत्तर वेद विभाग,
श्रीजगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीविहार,पुरी 752003, ओडिशा ।
मोबाइल नम्बर - 8917554392
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