कृति - करुणा
लेखक - प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
विधा - गद्यकाव्य
प्रकाशक एवं सम्पादक - डॉ नारायण दाश
पृष्ठ संख्या - 16
अंकित मूल्य - 25 रू
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी रचित सोलह पृष्ठों में निबद्ध इस उपन्यास की कथावस्तु सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। यद्यपि उपन्यास के कलेवर तथा काव्यशास्त्रीय नियमों के आधार पर इस कृति को कुछ समीक्षकों ने उपन्यास कहने में आपत्ति प्रकट की है, किन्तु डॉ. नारायण दाश ने आपत्तियों के निराकरणपूर्वक इसे उपन्यास ही कहा है तथापि इस कृति को उपन्यास कहना तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि स्वयं प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने उपन्यास की परिभाषा देते हुए कहा है- महाकाव्यमयी कथा गद्यबद्ध उपन्यासः (अभिनवकाव्यांलंकारसूत्रम्)। अतः इसे दीर्घकथा कहना अधिक उपयुक्त जान पडता है। अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने दीर्घकथा का लक्षण करते हुए दीर्घकथा को कथानिका व उपन्यास के बीच की वर्णना माना है। वह वर्णना इतनी भी एकदेशीय न हो कि कथानिका प्रतीत होने लगे और इतनी भी व्यापक न हो कि उपन्यास ही बन जाए-इयमेव कथा नैकखण्डपरिसमाप्ता विविधबृहद्घटनाचक्रवर्णनपरा दीर्घकथेत्युच्यते
कथानक-
प्रस्तुत कृति का कथानक विदेशी भूमि व संस्कृति पर आधारित है। बैंकॉक नगर में कितिफोम नामक वस्त्र व्यवसायी रहता है। वह समाचार पत्र में सिरिकित नामक बौद्ध भिक्षु को मूर्ति तस्करी के अपराध में पकडे जाने की खबर पढता है। उसे स्मरण होता है कि उसने सिरिकित बौद्ध भिक्षु के यहां तो बाल्यकाल में जीवननिर्वाह किया था और उसी ने मूर्ति तस्करी के मिथ्या आरोप में कितिफोम को जेल भिजवा दिया था। तत्पश्चात् जेल से छूटकर कितिफोम किसी वस्त्रव्यसायी के यहां काम करने लगा। वह वस्त्रव्यवसायी मरते समय अपनी पुत्री विपदा का विवाह कितिफोम से कर जाता है, किन्तु विपदा के विलासमय जीवन के कारण वह दरिद्र हो जाता है। विपदा अन्य किसी व्यापारी से विवाह कर लेती है। निराश, व्यथित कितिफोम अपना पूरा ध्यान अपने वस्त्र-व्यवसाय पर लगा देता है और वह एक प्रतिष्ठित व्यापारी बन जाता है।
अपनी यादों के लोक से कितिफोम वापस आता है। वह बैंकॉक के एक बहुमूल्य हॉटल में ठहरा हुआ है। कितिफोम की सुप्त वासना जाग्रत होती है। वह हॉटल के किसी कर्मचारी को युवति से सम्पर्क करवाने के लिये कहता है। जो लडकी उसके कमरे में पहुंचाई जाती है, उससे बातचीत करते हुए कितिफोम को पता लगता है कि यह तो उसकी ही पुत्री सिरी है, जिसे उसकी पूर्व पत्नी विपदा साथ ले गई थी। आत्मग्लानि में डूबा हुआ कितिफोम सिरी को अपने साथ ले जाता है। इस प्रकार इसका सुखान्त होता है।
लेखक - प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
विधा - गद्यकाव्य
प्रकाशक एवं सम्पादक - डॉ नारायण दाश
पृष्ठ संख्या - 16
अंकित मूल्य - 25 रू
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी रचित सोलह पृष्ठों में निबद्ध इस उपन्यास की कथावस्तु सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। यद्यपि उपन्यास के कलेवर तथा काव्यशास्त्रीय नियमों के आधार पर इस कृति को कुछ समीक्षकों ने उपन्यास कहने में आपत्ति प्रकट की है, किन्तु डॉ. नारायण दाश ने आपत्तियों के निराकरणपूर्वक इसे उपन्यास ही कहा है तथापि इस कृति को उपन्यास कहना तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि स्वयं प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने उपन्यास की परिभाषा देते हुए कहा है- महाकाव्यमयी कथा गद्यबद्ध उपन्यासः (अभिनवकाव्यांलंकारसूत्रम्)। अतः इसे दीर्घकथा कहना अधिक उपयुक्त जान पडता है। अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने दीर्घकथा का लक्षण करते हुए दीर्घकथा को कथानिका व उपन्यास के बीच की वर्णना माना है। वह वर्णना इतनी भी एकदेशीय न हो कि कथानिका प्रतीत होने लगे और इतनी भी व्यापक न हो कि उपन्यास ही बन जाए-इयमेव कथा नैकखण्डपरिसमाप्ता विविधबृहद्घटनाचक्रवर्णनपरा दीर्घकथेत्युच्यते
कथानक-
प्रस्तुत कृति का कथानक विदेशी भूमि व संस्कृति पर आधारित है। बैंकॉक नगर में कितिफोम नामक वस्त्र व्यवसायी रहता है। वह समाचार पत्र में सिरिकित नामक बौद्ध भिक्षु को मूर्ति तस्करी के अपराध में पकडे जाने की खबर पढता है। उसे स्मरण होता है कि उसने सिरिकित बौद्ध भिक्षु के यहां तो बाल्यकाल में जीवननिर्वाह किया था और उसी ने मूर्ति तस्करी के मिथ्या आरोप में कितिफोम को जेल भिजवा दिया था। तत्पश्चात् जेल से छूटकर कितिफोम किसी वस्त्रव्यसायी के यहां काम करने लगा। वह वस्त्रव्यवसायी मरते समय अपनी पुत्री विपदा का विवाह कितिफोम से कर जाता है, किन्तु विपदा के विलासमय जीवन के कारण वह दरिद्र हो जाता है। विपदा अन्य किसी व्यापारी से विवाह कर लेती है। निराश, व्यथित कितिफोम अपना पूरा ध्यान अपने वस्त्र-व्यवसाय पर लगा देता है और वह एक प्रतिष्ठित व्यापारी बन जाता है।
अपनी यादों के लोक से कितिफोम वापस आता है। वह बैंकॉक के एक बहुमूल्य हॉटल में ठहरा हुआ है। कितिफोम की सुप्त वासना जाग्रत होती है। वह हॉटल के किसी कर्मचारी को युवति से सम्पर्क करवाने के लिये कहता है। जो लडकी उसके कमरे में पहुंचाई जाती है, उससे बातचीत करते हुए कितिफोम को पता लगता है कि यह तो उसकी ही पुत्री सिरी है, जिसे उसकी पूर्व पत्नी विपदा साथ ले गई थी। आत्मग्लानि में डूबा हुआ कितिफोम सिरी को अपने साथ ले जाता है। इस प्रकार इसका सुखान्त होता है।
- यह गद्यकृति यथार्थवाद से ओतप्रोत है। यह हमारे समय के समाज को प्रतिबिम्बित करती है। कितिफोम को किस प्रकार मूर्ति चोरी के आरोप में फंसाया जाता है- कितिफोमो मुहुर्मुहुः स्वनिरपराधत्वं घोषयति, भगवतैव इयं प्रतिमा दत्ता फलभानाय दातुम् इति स्मारयति भदन्तं सिरिकितम्। न कोऽपि तद्वचः श्रद्धधे। अरे चोर, त्वमस्य देवस्थानस्य कृते कलंकभूतः-सिरिकितः साटोपम् अंगारप्रखराभ्यां नयनाभ्यां निर्दहन्निव तं कथयति स्म। विदेशों में उन्मुक्त जीवन का आचरण किस प्रकार का है, इस को विपदा के मुख से इस प्रकार कहलाते हैं- अरे त्वं तु सर्वथा बालोऽसि कितिफोम। अहं तु एतावता आयुषा पंचभिर्युवभिः संसर्गं विहितवती। इदमेव जीवनं स्त्रिया वर्तते इदं धनम् यस्मै स्पृहमाना पुरुषा कुक्कुरा इव तस्या चरणौ लिहन्तौ।
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ReplyDeleteइस उपन्यास की कथा बडी रोचकता लिए हुए आधुनिक युग के यथार्थ को बयां कर रही है और समाज को यह सोचने पर विवश करती है कि आधुनिकता,भौतिकता और थोथे विकास के नाम पर वर्तमान पीढी कहाँ जा रही है,क्या यही हमारी नियति है। फिर भी इस उपन्यास का सुखान्त सकारात्मकता का संदेश दे रहा है।
ReplyDeleteआभार ललित जी, आप ब्लॉग के साथ जुड़े रहें और प्रस्तुत पुस्तकों पर अपने विचार प्रकट करते रहें
ReplyDeleteयह करुणा नाम से ही स्मितरेखा कथासंग्रह में प्रकाशित है, संस्कृत भारती दिल्ली से 2011 में।
ReplyDeleteडॉ नौनिहाल गौतम
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