Saturday, May 16, 2020

प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः

प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः


पुस्तक- प्रो. विश्वनाथभट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः
लेखक- प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य (राष्ट्रपति पुरस्कृत)
जन्म- 19 अगस्त 1930
मृत्यु - 04 दिसंबर 2019
जन्मस्थान- काशी (उ.प्र.)
प्रकाशक- किशोर विद्या निकेतन, वाराणसी
सम्पादक- डॉ. वत्सला, एसो.प्रोफेसर, राजकीय महाविद्यालय, झालावाड़ (राज.) 
आईएसबीएन- 978-93-84299-80-4
पृष्ठ संख्या- 406
अंकित मूल्य- 800रू.
संस्करण- 2016 प्रथम

लेखक-
      सर्वविद्या की राजधानी काशी में पारंपरिक पण्डित परिवार में जन्मे, संस्कृत वाङ्मय के गंभीर अध्येता और हिन्दी, बांग्ला, संस्कृत और अंग्रेजी के ज्ञाता प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य सागर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी (उ.प्र.) में संस्कृत के आचार्य रहे। प्रो. भट्टाचार्य युवावय में विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए और प्रिय शिक्षक के रूप में आजीवन शिष्यों के ‘गुरुजी’ बने रहे। वे ‘‘आचार्य’’ होकर जिये। कालिदास की ‘आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः’ यह उक्ति उन पर चरितार्थ होती थी। उन्होंने पैतृकपरंपरा से, विद्यार्थी जीवन में गुरुजनों से और बाद में स्वाध्याय से जो ज्ञान पाया, उसको सरल से सरल रूप में अपने विद्यार्थियों को हृदयंगम करा देने का उनका सामर्थ्य अद्भुत था। मर्यादित हास्य के साथ उदाहरणों और संस्कृतेतर साहित्य के कथानकों से पाठ्य का दृश्य उपस्थित कर देने की उनकी अध्यापन शैली अनुकरणीय है। साहित्य लेखन की अपेक्षा उनका सहज रुचिकर कार्य अध्यापन था। अध्ययन और अध्यापन की सहज प्रक्रिया के अन्तराल में जो कुछ लेखन के द्वारा व्यक्त हुआ है, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और उस पर भी शिक्षकीय प्रभाव झलकता है। उनके निर्देशन में साठ से अधिक शोधार्थियों ने शोधकार्य किया। नाट्य एवं रंगमंच से भी उन्हें लगाव रहा। संस्कृत सेवा के लिए उन्हें 2016 ई. में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ।



पुस्तक-
 प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य ने अर्जित ज्ञान को सरल रूप में विद्यार्थियों तक पहुँचाया और यथावसर लेखनी से निबद्ध भी किया। उनके लेखन कार्य को पुस्तकाकार में सम्पादित करने का महनीय कार्य करने वाली डॉ. वत्सला ने उनके निर्देशन में पीएच. डी. उपाधि प्राप्त की है। पुस्तक के आरम्भ में प्रो. भट्टाचार्य के ही शिष्य प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, पूर्व कुलपति का नान्दीवाक्, प्रो. रमेशकुमार पाण्डेय, कुलपति, दिल्ली की प्ररोचना, प्रो. गोपबन्धु मिश्र, कुलपति श्रीसोमनाथ वि.वि. का पुरोऽभिमत और संपादिका की भूमिका हैं। संपादिका ने मोतियों की तरह बिखरे पड़े अपने श्रद्धेय गुरुजी के आलेखों को श्रमपूर्वक पिरोकर संस्कृत जगत् के लिए यह पुस्तक रूपी एकावली समर्पित की है, इसके लिए वे अभिनन्दनीय हैं। इस पुस्तक में पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य का वैयक्तिक एवं साहित्यिक परिचय है। द्वितीय अध्याय में हिन्दी भाषा में लिखित नौ शोधपत्र हैं। इनमें से चार कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट और रवीन्द्रनाथ टैगोर कवियों पर हैं। अन्य रस सम्प्रदाय, नाट्य साहित्य के मूल तत्त्व, पुराण चिन्तन, गोपीनाथ कविराज और चैतन्य महाप्रभु पर हैं। तृतीय अध्याय में संस्कृत में लिखित बारह शोधपत्र हैं। इनमें सात साहित्यशास्त्रीय विषयों पर, दो कालिदास पर, दो जवाहरलाल और गोपीनाथ कविराज पर और एक संस्कृत विद्या पर हैं। चतुर्थ अध्याय में अंग्रेजी भाषा में लिखित तेरह शोधपत्र हैं। इनमें से छः काव्यशास्त्रीय विषयों पर, तीन कालिदास पर, दो संस्कृत भाषा पर, एक गोपीनाथ कविराज पर और एक काशी में बंगाली उत्सवों का परिचय कराने वाला है। पंचम अध्याय में तीन भाग हैं। प्रथम भाग ग्रन्थसमालोचन के अन्तर्गत डॉ. वेंकट राघवन् के नौ ग्रन्थों और सोलह अन्य ग्रन्थों की समीक्षा की गयी है। द्वितीय भाग में संस्कृत कविता हैं। कालिदास पर दो कविताएं, अन्य कविताओं में- संस्कृतदिवसोत्सवः, काशीहिन्दूविश्वविद्यालये स्वतन्त्रताभवनस्थापनम्, नलिन्याः प्रार्थना, कविभारत्याः स्वागतमङ्गलम्, ऊर्जस्वि-उपदेशः, काश्यां ज्ञानप्रवाहः और गुरु गोपीनाथ कविराज की स्मृति में रचित ‘गुरुस्मरणम्’ हैं। महाकवि रवीन्द्रनाथ की एक कविता का बंगला से संस्कृत में सॉनेट छन्द में अनुवाद है। तृतीय भाग में दैनिक समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित साक्षात्कार है। पुस्तक के अन्त में प्रो. भट्टाचार्य के विभिन्न अवसरों से संबंधित चित्र भी दिये गये हैं। बहुश्रुत विद्वान् द्वारा सरल रूप में प्रस्तुत साहित्य व साहित्यशास्त्रीय आलेखों का संग्रह इस पुस्तक में है। साहित्य के अध्येताओं को इस पुस्तक का अनुशीलन अवश्य  करना चाहिए।

डॉ नौनिहाल गौतम 
असिस्टेंट प्रोफेसर -डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय 
मोबाइल नम्बर - 9826151335
मेल आईडी - dr.naunihal@gmail.com

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